8.3.23

राजनेताओं के लिए गधे कम पड़ गए थे


जबलपुर में रसरंग बरात का अपना 30 साल पुराना इतिहास है। हम भी नए-नए युवा होने का एहसास दिलाते थे। कार्यक्रमों में येन केन प्रकारेण उपस्थिति और उपस्थिति के साथ अधकचरी कविताएं कभी-कभी सुनाने का जुगाड़ हो जाता था।

देखा देखी हमने भी राजनीति पर व्यंग करना शुरू कर दिया.... सफल नहीं रहे....कहां परसाई जी कहां हम.... कहाँ राजा-भोज कहाँ गंगू तेली,,,!

 हमने अपनी कविताएं जेब में रख ली और अभय तिवारी इरफान झांसी सुमित्र जी  मोहन दादा यानी अपने मोहन शशि भैया की राह पकड़ ली। गीत लिखने लगे शशि जी के गीत गीत गीले नहीं होते बरसात में की तर्ज पर अपनी हताशा दर्ज करती गीत मिले हुए अब के बरसात में और ठिठुरते रहे सावनी रात में..! अथवा सुमित्र जी का गीत “मैं पाधा का राज कुंवर हूं...!”

पूर्णिमा दीदी के गीत अमर दीदी के गीत गहरा असर छोड़ते थे और अभी भी भुलाए नहीं भूलते। बड़े गजब के गीत लिखते हैं सुकुमार से कवि चौरसिया बंधु हमारे अग्रज उस दौर की कविताएं बिल्कुल घटिया न थी।

छंद मर्मज्ञ भाई आचार्य संजीव वर्मा सलिल ने तो गीत रचना में छंद की प्रतिष्ठा को रेखांकित कर दिया था।

जी हां 30-35  बरस पुराना साहित्यिक एनवायरमेंट जबलपुर में वापस नहीं लौटेगा,  कारण क्या है, मुझे नहीं मालूम पर यूनुस अदीब,  पथिक जी रसिक जी कमाल के गीतकार हैं।

आज आप जिनको पत्रकार कहते हैं वह पत्रकार नहीं कवि और गीतकार भी थे जी हां मैं जिक्र कर रहा हूं गंगा पाठक जी का। फैक्ट्री से लौटकर मानसेवी पत्रकार के रूप में गंगा भैया की कविता प्रभावित करने के लिए काफी हुआ करती थी।

पूज्य रामनाथ अग्रवाल जी के घर की गोष्ठी हो या सुमित्र जी के ठिकाने पर आनंद का अनुभव होता था भले ही घर देर से लौटने पर यानी लगभग रात 3 बजे तक लौटने पर कितनी फटकार न मिली हो।

दूसरे दिन अखबारों में अपने नाम को तलाशना हमारा शौक बन गया था। शशि जी ने खूब छापा कवि बना दिया। एक गोष्ठी में शायद वह गोष्टी सुमित्र जी के जन्मदिन पर थी। मेडिकल निवासी गेंदालाल जी सुमित्रा जी को जरी शॉपी उपहार स्वरूप। और कहने लगे माला काहे से बनती है जरी से और फूल से - तो गेंदा हम हैं जा जरी लै लो कमरा उन्मुक्त खिलखिला हट से गूंज गया। तभी  पूज्य मां गायत्री ने खीर खिला दी। सुमित्र जी और शशि जी ने बताया था कि-" कवि गोष्ठियों को कार्यशाला समझा जाना चाहिए।"

 सच में अब कार्यशालाएं नहीं होती। अनेकांत को छोड़कर कोई भी संस्था निरंतर कवि गोष्ठी नहीं करती। मध्यप्रदेश लेखक संघ ने कुछ दिन तक मोर्चा संभाला पर कवियों में भी राजनेता के गुण आ ही जाते हैं कोई बात नहीं मध्य प्रदेश लेखिका संघ ने बहुत दिनों तक इस परंपरा को आगे बढ़ाया।

सूरज भैया का पढ़ने का तरीका और मानवीय संवेदना ओं को उभार कर लिखने की प्रवृत्ति अद्भुत है अद्वितीय है।

गणेश नामदेव जी का डायरी खोलने का स्टाइल अभी तक आंखों के सामने घूमता है। कुछ दिनों बाद तो यह लगने लगा था कि जबलपुर में पुष्प वर्षा करो तो हर तीसरा फूल किसी ना किसी कवि के माथे पर ही लगता है। फिर धीरे-धीरे कहानी मंच मिलन मित्र संघ की यादें ताजा हो रही है।

हिंदी मंच भारती ने भी नए स्वर नए गीत कार्यक्रमों का सिलसिला जारी रखा था। अखंड कवि सम्मेलन इसी जबलपुर में हुआ है। गजब की बात है कि कवियों का टोटा नहीं पड़ा।

उस दौर में समाचार पत्र भी गजब काम करते थे। तब साहित्यकार पत्रकार भी हुआ करते थे अब यदा-कदा अरुण श्रीवास्तव जैसे साहित्यकार पत्रकार की तरह नजर आते हैं।

माटी की गागरिया जैसी कविता लिखने वाले भवानी दादा को कौन भूलेगा। पूजनीय सुभद्रा जी केशव पाठक पन्नालाल श्रीवास्तव नूर के इस शहर में कविता अब कराह रही है ।

ऐसा नहीं है कि बसंत मिश्रा यशोवर्धन पाठक विनोद नयन कोई कोशिश नहीं कर रहे हैं या राजेश पाठक प्रवीण ने कोर कसर छोड़ रखी हो। पर पता नहीं क्या हो गया है वह कार्यशाला नहीं होती जिसे हम गोष्ठी कहते थे। मणि मुकुल जी को भूलना गलत होगा। साधारण सा व्यक्तित्व साधारण सी कविता मणि मुकुल के अलावा बहन गीता गीत भी लिखती हैं तो डॉ संध्या जैन श्रुति ने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। विनीता पैगवार, रजनी कोठारी

सवाल गंगाचरण से भी है जब लिखते हैं तो अटेंशन पाते हैं जब पढ़ते हैं तो गहरा असर छोड़ते हैं। यूनुस अदीब, संतोष नेमा अभी की कोशिश कर रहे हैं।

    राजनेताओं के लिए गधे कम पड़ गए थे के लिए इंतज़ार कीजिये 



 

1.3.23

सामरिक ताकत बनने से पहले मानव संसाधन का विकास जरूरी है

    कॉलेज के दिनों में बढ़-चढ़कर हम अक्सर निशस्त्रीकरण पर बेहद प्रभावशाली ढंग से अपने विचार रखा करते थे। उस दौर में हमारे मस्तिष्क में भी शस्त्र विहीन राष्ट्र की कल्पना अत्यधिक आदर्शवादी ताकि चलते हावी रहा करती थी।

उन दिनों सैन्य शक्ति के संदर्भ में भरत किसी भी गिनती में नहीं आता था। परंतु हमारे मस्तिष्क में हमेशा ही विश्व की भारत के लिए की जाने वाली चैरिटी का ख्याल बना रहता था। आर्थिक दृष्टि से भारत की विकास दर इतनी धीमी थी जितनी थी चीटियां भी धीमी गति से नहीं चलती। तब हम चिंतित जरूर थे परंतु हताश नहीं । तब भारत कई मोर्चों पर युद्ध रत रहा है। सीमा पर हमेशा चीन और पाकिस्तान की हरकतें देश कौन उत्साह विहीन करने की कोशिश करती रही हैं। दूसरा मुद्दा भारतीय जनता की स्वास्थ्य शिक्षा से संबंधित समस्याएं।

एक और कुपोषण रक्त अल्पता औसत आयु में कमी तथा सामाजिक स्वास्थ्य के गिरते हुए समंक हमारे मस्तिष्क को जब जोड़ देते थे वहीं दूसरी ओर शिक्षा का स्तर भी बेहद शर्मनाक था। सोचिए जब हम अपने जॉब में आए तब भी शिक्षा का स्तर और स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों में कोई उत्साहवर्धक परिणाम नजर नहीं आते थे।

   खेतों में उपस्थित का अनाज अपर्याप्त था।  केयर जैसे संस्थान अमेरिका से प्राप्त खाद्यान्न सहायता के परिवहन का कार्य करती थी। तब यूनिसेफ टीके लगाने के लिए अभी प्रेरक और प्रमुख सहायक एजेंसी के रूप में हमारी के लिए तत्पर हुआ करती थी।

   मेरा चिंतन हमेशा से ही समाज में कुछ धनात्मक देखना चाहता था। इसके पीछे एक कारण है वह कारण जानेंगे तो आप समझ जाएंगे कि मैंने एक खास विभाग में नौकरी करना क्यों पसंद किया। ऐसा नहीं कि मेरे पास विकल्प न रही हों। बहुत सारे विकल्प थे पत्रकारिता वकालत और ढेरों सरकारी नौकरियां। पत्रकारिता में मेरे मित्र आज कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं तो वकालत करने वाले साथियों ने तो हाई कोर्टस में न्यायाधीश का रुतबा हासिल कर दिया है। मुझसे मेरे इंटरव्यू में पूछा गया कि-"आपने यह जॉब क्यों पसंद की?"

मैं जानता नहीं जानता था कि प्रश्न किस उद्देश्य से किया गया? शायद वह समझ रहे होंगे कि- इससे बेहतर अपॉर्चुनिटी मुझे मिल सकती है। मैंने अपनी बैसाखियों   की ओर इशारा करते हुए कहा-" मैडम अगर उस वक्त जब मेरा जन्म हुआ था पल्स पोलियो अभियान चलाया गया होता तो शायद मैं इन बैसाखियों के सहारे नहीं चलता ।  मैंने सोचा नहीं था कि ऐसा मैं कह पाऊंगा।

   पर यही वाक्य शायद उनके हृदय पर गहराई से अंकित हो गया था।

अपनी नौकरी के साथ-साथ लोग सोशियो इकोनामिक डेवलपमेंट के लिए अगर  चिंता करने लगेंगे तो तय है कि किसी ना किसी दिन भर आदर्श स्थिति में नजर आएगा ऐसा उस वक्त भी मेरा मानना था और आज भी यही सोचता हूं।

   काम करते-करते समझ में आता था कि महिलाओं का प्रसूति के दौरान मरना स्वाभाविक प्रक्रिया है आंकड़े रोके नहीं रुक रहे हैं। कई बच्चे तो पहला जन्मदिन भी नहीं बना पा रहे। जब फैमिली प्लानिंग पर किसी को समझा रहा था तब भीड़ में से एक महिला ने ठेठ देहाती भाषा में मुझे डपकते हुए कहा-" बेकार की बातें मत कीजिए साहब, हमारे परिवार में हम यह सब नहीं कर सकते। परिवार में अब तक कोई भी बच्चा 6 महीने या 1 साल से ज्यादा जिंदा नहीं रहा है हम अगर परिवार कल्याण अपना लेंगे तो शायद हमें मुक्ति भी ना मिल पाए?"

   मेरा प्रति प्रश्न था कि क्या आपने घर परिवार में बच्चों के जन्म को लेकर केवल ईश्वर पर भरोसा किया है? उत्तर होना स्वाभाविक था। तब मैंने कहा माताजी अगर आप मुझ पर भरोसा करें आंगनवाड़ी पर भरोसा करें तो शायद इस बार ऐसा ना हो? फिर आप जैसा कहोगी मैं मान लूंगा और यहां तक कह डाला कि-" तुम्हारे साथ चलूंगा सरकारी नौकरी से त्यागपत्र देने के लिए"

  बात का पूरा पूरा असर हुआ आखिर बुजुर्ग महिला अपने कुल के लिए इससे बेहतर और क्या सोच सकती है। इस परिवार पर मेरी विशेष नजर थी। परिवार में हर गर्भवती के रजिस्ट्रेशन और टाइमली टीकाकरण के साथ-साथ आयरन की गोलियां उपलब्ध कराई जाती थी और उसे नियमित रूप से प्रेगनेंसी पीरियड में खाने की मॉनिटरिंग भी सुनिश्चित कर ली थी ।

    यहां आइए 30 से 35 वर्ष पुराने भारत की तस्वीर है जो मैंने आपको दिखाई। आप देख नहीं पाते क्योंकि विकास केवल ढांचागत आकृतियों में नजर आता है। विकास को देखने का नजरिया सबसे पुख्ता तौर पर किसी भी देश की वाइटल स्टैटिसटिक्स को देखने का नजरिया ही होता है। जन्म दर मृत्यु दर मातृ मृत्यु दर एनीमिया स्कूल ड्रॉपआउट रेट से लेकर कम्युनिटी मेडिसिन और प्रैक्टिसेज देखने वाला मुद्दा है। मेरे मित्र स्वर्गीय डॉक्टर संजय श्रीवास्तव कहा करते थे कि- 10 परसेंट मरीज मेरे हैं 90% आपके ही आप चाहे तो तस्वीर बदलते देर नहीं लगेगी।"

हुआ भी वही परंतु मुझे महसूस हो रहा था कि तस्वीर बदलने में शिक्षा आड़े आती है उन पर पारिवारिक परंपराएं हावी रहती हैं और इस बात का भय भी कि 4 लोग क्या कहेंगे।

   यह चार लोग कौन हैं मैंने तो आज तक नहीं देखा आपने देखा हो तो बताइए। इसका भय हर मन से हटना जरूरी है। बहुत मेहनत मशक्कत लगती है अच्छी परंपराओं को बरकरार रखने और गलत परंपराओं को समाप्त करने में। एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग एक रामबाण इलाज है परंतु यह मुद्दा भी बड़ी मुश्किल से समझ में आने लगा है। शहरी दंपत्ति खास तौर पर महिलाएं यहां तक कि डॉक्टर्स भी कोलोस्ट्रम वाला दूध पिलवाने के संदेश को तेजी से प्रोत्साहित नहीं करते हैं , बताएगा इस मुद्दे पर झगड़े भी कर लेता था।

  बदलाव के लिए केवल मैं ही जिम्मेदार हूं ऐसा मैं नहीं कह रहा हूं बदलाव के लिए मेरे जैसे लाखों लोग इसमें शामिल है। जो यह जानते हैं कि मानव संसाधन का विकास बिना वाइटल स्टैटिसटिक्स के आंकड़ों में पॉजिटिव सुधार लाए संभव नहीं है। भारत की स्वास्थ्य सेवाओं में गुणवत्ता तभी से नजर आने लगी थी। कोविड-19 के दौरान जब लोग इस बात के लिए घबराए हुए थे कि हम 10 साल में भी टीका लगा पाएंगे या नहीं तब हम जैसे लोग इस मुद्दे पर किसी तरह का मानसिक टेंशन नहीं लेते थे। वजह थी हमारी मजबूत वर्किंग फोर्स।

और उससे भी बड़ी वजह थी व्यवस्था में आपसी तालमेल। स्वास्थ्य आंगनवाड़ी शिक्षा के साथ-साथ सामुदायिक सहयोग का सिंक्रोनाइजेशन कोविड-19 टीकाकरण की सफलता का प्रमुख रहस्य रहा है।

अब जब कुछ दिनों में मैं सरकार से रिटायर हो जाऊंगा तब भी इस परिवर्तन को देखकर अपने आप को सौभाग्यशाली मानूंगा की किस तरह से हमने एक युग को बदलते देखा है।

मेरी मैदानी वर्कर अक्सर दुखी रहा करती थी कि उनके केंद्र पर महिलाएं नहीं आती। हमने एक प्रयोग शुरु कर दिया और आपस में थोड़ा बहुत चंदा किया तथा हर गर्भवती महिला की गोद भरने की रस्म प्रारंभ की गई। हम महिला को यह बताने में सफल रही थे कि-" हमारा मैदानी केंद्र आपके लिए पिता का घर है।" 

  इंस्टीट्यूशनल डिलीवरी तक महिलाओं को उनके ससुराल में बांध कर रखना मेरी कल्पना थी। और इस परिकल्पना को आकार देने में हमारे विभाग की कमिश्नर श्रीमती कल्पना श्रीवास्तव एवं सबके लिए प्रिय एवं आदरणीय आईएएस अधिकारी श्री ने इस योजना को पूरे प्रदेश में लागू कर दिया।

    यह एक निजी इनीशिएटिव था जो आगे चलकर विराट रूप लेने वाला था इसका मुझे और मेरी टीम को ज्ञान नहीं था। हमारी केंद्र एक सांस्कृतिक आकर्षण पैदा कर सके जिससे हम अपनी बात पुख्ता तौर पर कहने के लिए समर्थ हो चुके थे।

   ऐसा मशीनें नहीं करती हैं मशीनें सटीक काम तो करती है लेकिन संवेदना एवं सुविधाओं के साथ नहीं।

   हां मुझे याद आ रहा है जब बीसीजी की वाइल खोलने के लिए 4 बच्चों का होना जरूरी होता था। इस सिस्टम को खत्म करने के लिए जोरदार तरीके से हम लोगों ने अपनी बातें स्टेट सेमिनार में रखी। इससे यूनिफॉर्म इम्यूनाइजेशन कार्यक्रम को ताकत मिली और उम्र के पहले वर्ष में लगने वाले टीके समय पर लगने लगे। पोलियो के मामलों पर भारत ने जिस तरह से चक्रव्यूह रच दिया है उसका तोड़ स्वयं विश्व स्वास्थ्य संगठन के पास भी न होगा क्योंकि भारत के पास मानव संसाधन का एक विराट कोर्स उपलब्ध है।

   इस आर्टिकल का उद्देश्य केवल यही है कि अगर आप भारत को विश्व गुरु के रूप में देखना चाहते हैं तो  बारीकी से सामाजिक चिंतन की जरूरत है। यूं ही नहीं हो जाता है socio-economic डेवलपमेंट।

26.2.23

“क्या मूर्ति-पूजा त्याज्य है अथवा मूर्तिपूजक काफिर है?”



मूर्ति पूजा और मूर्ति पूजा को को लेकर एक विचित्र सा वातावरण उत्पन्न कर दिया गया है। यह वातावरण इस्लाम के प्रसार के साथ बहुत अधिक तेजी से निर्मित हुआ। मंदिरों में तोड़फोड़ करना उन्हें जमींदोज करना एक मिशन बन गया था। मोहम्मद गजनवी से पहले भी ऐसी वारदातें होती रहे हैं। भारत में  वास्तुकला एवं मूर्ती-कला  का विकास पूर्व वैदिक काल तथा वैदिक काल में ही हो गया था। परंतु मूर्तिकला का विस्तार मिलते ही कई शिल्पकार वास्तु एवं शिल्प संरचना के लिए सक्रीय हो गये.  शिल्प एवं मूर्तिकला के विकास के सहारे किसी भी  सभ्यता के विकास को अस्वीकार नहीं की जा सकती. अर्थात सभ्यता के विकास लिए शिल्प एवं मूर्तिकला के विकास को एक घटक मानना चाहिए. सुर-असुर कथानकों को पर ध्यान दें तो... हम पातें हैं कि असुरों ने बड़े बड़े ऐसे किलों का निर्माण कराया जिससे सुर-समूह  से सुराक्षा  मिल सके. इंद्र को पुरंदर की पदवी असुरों  के दुर्ग ध्वस्त करने के कारण ही प्राप्त थी.

आइये अब हम विचार करतें हैं... मूर्ति-कला के विस्तार की वजह क्या है. वास्तव में मूर्तिकला जब बड़े पैमाने पर जनता द्वारा अपनाई जाने लगी तब उसे राजाश्रय भी मिला. राजाश्रय से कला का तीव्रता से विकास हुआ .भारतीय नदी-घाटी सभ्यताओं में  यूनानी सभ्यताओं तथा हर सभ्यताओं में रहने वाली नस्लों ने अपनी संस्कृति में कला तत्वों के मौजूदगी के प्रमाण दिए हैं.  भारतीय सन्दर्भ में देखा जाए तो वेदों में भले ही पूजन प्रणाली देवी-देवताओं को यज्ञ में हव्य (समिधा)  डालकर आहूत किया जाता रहा है  किन्तु कालान्तर में शिव पूजन के लिए अनाकृत-मूर्तियों का पूजन प्रारम्भ हो गया . कालान्तर में ईश्वर / ईश्वर के स्वरूपों एवं देवताओं को आकृति के रूप में पूजा जाने लगा.

मूर्तिकला के विकास के साथ साथ कला के सम्मान को चिर-स्थायित्व देने के लिए उसे पूजा प्रणाली का अनिवार्य हिस्सा समकालीन भारतीय सामाजिक व्यवस्था द्वारा बनाया गया. इस क्रम में यह उल्लेख अनिवार्य है कि-“भारतीय सभ्यता में बुद्ध के पूर्व आंशिक रूप से मूर्ति-आराधना का शुभारंभ हो गया था.” परन्तु बुद्ध के बाद मठों में मूर्ती-पूजा अधिक विस्तारित हुई. इसी क्रम में सिन्धु-घाटी सभ्यता में मूर्ति पूजा के प्रमाण मिलें हैं. मध्यप्रदेश के पचमढ़ी क्षेत्र एवं मंदसौर  में मिले गुफा चित्रों एवं कप्स की खोज  वाकणकर जी ने खोजकर गुफा कालीन 70 हज़ार साल पुरानी मानव प्रजाति की विक्सित होती  सभ्यता के विकास में कला की मौजूदगी का प्रमाण दिया था. जो मूर्तिकला का अत्यंत प्राथिक प्रमाण था. 7000 हज़ार वर्ष-पूर्व रामायण काल  में तथा 5000 साल प्राचीन महाभारत काल में  शिव की पूजन के दो उदाहरण मिलते हैं. रामेश्वरम में शिव लिंग की श्री राम द्वारा तथा गंधार (कंधार) में गांधारी द्वारा की साधना का विवरण उल्लेखनीय है. कामोबेश प्रारम्भ में भगवान शिव की क्षवियों की पूजन का उल्लेख मिलता है. आदिवासी प्रतीकात्मक रूप से शिवाराधना करते रहे हैं . आज भी वे बड़ा-देव के स्वरुप पूजित हैं.

तदुपरांत बुद्ध एवं जैन मतों  के विस्तार के साथ अखंड भारत में उतर पश्चिमी भू-भाग अफगानिस्तान से लेकर सम्पूर्ण भारत में बौद्ध,जैन सहित सभी सम्प्रदायों क्रमश: वैष्णव, शाक्त, ने भी अपनी अपनी आराधना प्रणालियों में मूर्ति-पूजन को शामिल किया. निर्गुण ब्रह्म के उपासकों ने  भी ब्रह्म के  प्रतीकात्मक स्वरूपं चित्रों, मूर्तियों की आराधना स्वीकृत की . यह एक सांस्कृतिक बदलाव था. ब्रह्म के स्वरुप का लौकिक अवतरण कराया गया. चोल पांड्य आदि नें दक्षिण भारत से मध्यप्रांत तक तथा समुद्रीमार्ग से जिन जिन द्वीपों पर राज्य स्थापित किये वहा भी पवित्र मंदिरों का निर्माण कराया . मार्तंड सूर्य मंदिर का निर्माण 8वीं शताब्दी ईस्वी में कर्कोटा राजवंश के तहत कश्मीर के तीसरे महाराज ललितादित्य मुक्तापिदा द्वारा किया गया था ।

 चंदेल राजाओं ने दसवीं से बारहवी शताब्दी तक मध्य भारत में शासन किया। खजुराहो के मंदिरों का निर्माण 950 ईसवीं से 1050 ईसवीं के बीच इन्हीं चन्देल राजाओं द्वारा किया गया। मंदिरों के निर्माण के बाद चन्देलों ने अपनी राजधानी महोबा स्थानांतरित कर दी। लेकिन इसके बाद भी खजुराहो का महत्व बना रहा।

इसके अतिरिक्त काश्मीर के  शारदा-पीठ, के बारे में तो आप सभी जानते हैं . इसके अतिरिक्त 51 शक्ति पीठों का विवरण निम्नानुसार विकी पीडिया तक में उपलब्ध है.

1. किरीट शक्तिपीठ : पश्चिम बंगाल में हुगली नदी के लालबाग कोट तट पर स्थित है। किरात यानी सिराभूषण या सती माता का मुकुट वहां गिराया गया था। मूर्तियाँ विमला (शुद्ध) के रूप में देवी हैं और संगबर्ता के रूप में शिव हैं।

2. कात्यायनी शक्तिपीठ : मथुरा के वृंदावन में भूतेश्वर में स्थित है, जहां सती के केश गिरे थे। देवी शक्ति का प्रतीक हैं जबकि भैरव भूतेश (जीवों के भगवान) का प्रतीक हैं।

3. कृवीर शक्तिपीठ : महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित है। देवी की तीन आँखें वहाँ गिरी थीं। मूर्तियाँ महिषमर्दिनी के रूप में देवी और क्रोधीश के रूप में शिव हैं।

4. श्री पर्वत शक्तिपीठ :   कुछ विद्वानों का मानना ​​है कि यह लद्दाख में स्थित है तो कुछ का मानना ​​है कि यह असम के सिलहट में है। मूर्तियाँ श्री सुंदरी के रूप में देवी हैं और सुंदरानंद के रूप में शिव हैं।

5. विशालाक्षी शक्तिपीठ : यहां देवी के कुंडल (कुंडल) गिरे थे और यह वाराणसी के मीराघाट पर स्थित है, जो  देवी के रूप में विश्वलक्ष्मी और शिव कला के रूप में हैं।

6. गोदावरी तट शक्तिपीठ : आंध्र प्रदेश के गोदावरी तट के कब्बूर में स्थित है। देवी का बायाँ गाल यहाँ गिरा था और मूर्तियाँ विश्वेश्वरी (जगत की माँ) और शिव दंडपाणि के रूप में हैं।

7. शुचिन्द्रम शक्तिपीठ: भारत के सबसे दक्षिणी सिरे के पास, तमिलनाडु में कन्याकुमारी स्थित है। देवी के ऊपरी दाँत यहाँ गिरे थे और मूर्तियाँ नारायणी के रूप में देवी और संघर के रूप में शिव हैं।

8. पंचसागरशक्ति: इस पीठ का सही स्थान ज्ञात नहीं है, लेकिन देवी के निचले दांत यहां गिरे थे और मूर्तियाँ बरही के रूप में देवी और महारुद्र के रूप में शिव हैं।

9. ज्वालामुखी शक्तिपीठ : हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में स्थित है। देवी की जीभ यहाँ गिरी थी और मूर्तियाँ अम्बिका के रूप में देवी और उन्मत्त के रूप में शिव हैं। 

10. भैरव पर्वत शक्तिपीठ :   इसके स्थान को लेकर विद्वानों में मतभेद है। कुछ लोग गिरिनगर, गुजरात में होने का तर्क देते हैं, जबकि कुछ मध्य प्रदेश के उज्जैन में शिप्रा नदी के पास होने का तर्क देते हैं, जहाँ देवी के ऊपरी होंठ गिरे थे। मूर्तियाँ अवंती के रूप में देवी और लम्बकर्ण के रूप में शिव हैं। हरसिद्धि मंदिर

11. अट्टाहस शक्तिपीठ :   पश्चिम बंगाल के निकट लाभपुर में है। देवी के निचले होंठ यहां गिरे थे और मूर्तियाँ फुलरा के रूप में देवी और भैरव विश्वेश के रूप में शिव हैं।

12. जनस्थान शक्तिपीठ: महाराष्ट्र के नासिक में पंचवटी में स्थित है। देवी की ठोड़ी यहाँ गिरी थी और मूर्तियाँ भ्रामरी के रूप में देवी और विक्रमाटक के रूप में शिव हैं।

13. कश्मीर या अमरनाथ शक्तिपीठ :   जम्मू कश्मीर के अमरनाथ में है। देवी की गर्दन यहाँ गिरी थी और मूर्तियाँ महामाया के रूप में देवी और त्रिसंध्यास्वर के रूप में शिव हैं।

14. नंदीपुर शक्तिपीठ :   पश्चिम बंगाल के सांथ्य में स्थित है। देवी का हार यहां गिरा था और मूर्तियां नंदिनी के रूप में देवी और नंदकिशोर के रूप में शिव हैं।

15. श्री शैल शक्तिपीठ :   कुरनूल, आंध्र प्रदेश के पास। यहां देवी के गले का हिस्सा गिरा था। मूर्तियाँ महालक्ष्मी के रूप में देवी और शम्बरानंद के रूप में शिव हैं।

16. नलहटी शक्तिपीठ :   पश्चिम बंगाल के बोलपुर में है। देवी की मुखर नली यहां गिरी थी और मूर्तियां कालिका के रूप में देवी और योगेश के रूप में शिव हैं।

17. मिथिला शक्तिपीठ : इसका स्थान अभी अज्ञात है। स्थान तीन स्थानों पर माना जाता है, नेपाल के जनकपुर में और बिहार के समस्तीपुर और सहरसा में, जहाँ देवी का बायाँ कंधा गिरा था। मूर्तियाँ महादेवी के रूप में देवी और महोदरा के रूप में शिव हैं।

18. रत्नावली शक्तिपीठ : स्थान अज्ञात है, चेन्नई, तमिलनाडु के पास स्थित होने का सुझाव दिया। देवी का दाहिना कंधा यहाँ गिरा था और मूर्तियाँ कुमारी के रूप में देवी और भैरव के रूप में शिव हैं।

19. अंबाजी शक्तिपीठ : गुजरात की गिरनार पहाड़ियों में स्थित है। देवी का पेट यहां गिरा था और मूर्तियां चंद्रभागा के रूप में देवी और वक्रतुंड के रूप में शिव हैं।

20. जालंधर शक्तिपीठ : पंजाब के जालंधर में स्थित है। देवी के बाएं स्तन यहाँ गिरे थे और मूर्तियाँ त्रिपुरमालिनी के रूप में देवी और भिसन के रूप में शिव हैं।

21. रामगिरी शक्तिपीठ :   सटीक स्थान ज्ञात नहीं है, चित्रकूट, यूपी में कुछ बहस करते हैं जबकि अन्य मेहर, मध्य प्रदेश में बहस करते हैं। देवी के दाहिने स्तन यहाँ गिरे थे और मूर्तियाँ शिवानी के रूप में देवी और चंदा के रूप में शिव हैं।

22. वैद्यनाथ शक्तिपीठ : झारखंड के गिरिडीह, देवघर में स्थित है। देवी का दिल यहां गिर गया और मूर्तियां देवी के रूप में जयदुर्गा और शिव वैद्यनाथ के रूप में हैं। ऐसा माना जाता है कि यहां सती का अंतिम संस्कार किया गया था।

23. वक्रेश्वर शक्तिपीठ: पश्चिम बंगाल के सांथ्य में स्थित है। देवी का मन या भौंहों का केंद्र यहां गिरा था और मूर्तियां महिषमर्दिनी के रूप में देवी और वक्रनाथ के रूप में शिव हैं।

24. कन्याकाश्रम कन्याकुमारी शक्तिपीठ :   कन्याकुमारी के तीन सागरों हिन्द महासागर, अरब सागर में स्थित तथा बंगाल की खाड़ी, तमिलनाडु के संगम पर स्थित है। देवी की पीठ यहाँ गिरी थी और मूर्तियाँ देवी के रूप में शरवानी और शिव निमिषा के रूप में हैं।

25. बहुला शक्तिपीठ: कटवा, वीरभूम में स्थित, डब्ल्यूबी देवी की बाईं भुजा यहाँ गिरी थी और मूर्तियाँ बहुला के रूप में देवी और भीरुक के रूप में शिव हैं।

26. उज्जयिनी शक्तिपीठ: मध्य प्रदेश के उज्जैन में पवित्र क्षिप्रा के दोनों किनारों पर स्थित है। देवी की कोहनी यहाँ गिरी थी और मूर्तियाँ मंगलचंडी के रूप में देवी और कपिलंबर के रूप में शिव हैं।

27. मणिवेदिका शक्तिपीठ : राजस्थान के पुष्कर में स्थित है। गायत्री मंदिर का दूसरा नाम है। देवी की हथेलियों के बीच या दोनों कलाइयां यहां गिरी थीं और मूर्तियाँ गायत्री के रूप में देवी और सर्वानंद के रूप में शिव हैं।

28. प्रयाग शक्तिपीठ : इलाहाबाद में स्थित यूपी देवी की दस अंगुलियां यहां गिरी थीं और मूर्तियां ललिता और शिवा भाव के रूप में देवी हैं।

29. विरजक्षेत्र, उत्कल शक्तिपीठ: उड़ीसा के पुरी और याजपुर में स्थित है। देवी की नाभि यहाँ गिरी थी और मूर्तियाँ देवी के रूप में विमला और शिव जगन्नाथ के रूप में हैं।

30. कांची शक्तिपीठ:  तमिलनाडु के कांचीवरम में स्थित है। देवी का कंकाल यहां गिरा था और मूर्तियां देवगर्भ के रूप में देवी और रुरु के रूप में शिव हैं।

31. कलमाधव शक्तिपीठ: सटीक स्थान ज्ञात नहीं है। लेकिन देवी के दाहिने कूल्हे यहाँ गिरे और मूर्तियाँ काली के रूप में देवी और असितानंद के रूप में शिव हैं।

32. सोना शक्तिपीठ : बिहार में स्थित है। देवी के बाएं कूल्हे यहाँ गिरे थे और मूर्तियाँ नर्मदा के रूप में देवी और वाड्रासेन के रूप में शिव हैं।

33. कामाख्या शक्तिपीठ : असम के कामगिरी की पहाड़ियों में स्थित है। देवी की योनी या योनि यहाँ गिरी थी और मूर्तियाँ कामख्या के रूप में देवी और उमानंद के रूप में शिव हैं।

34. जयंती शक्तिपीठ: जयंतिया हिल्स, असम में स्थित है। देवी की बायीं जंघा यहां गिरी थी और मूर्तियाँ जयंती के रूप में देवी और भैरव के रूप में शिव हैं ??क्रमदीश्वर।

35. मगध शक्तिपीठ : बिहार के पटना में स्थित है। देवी की दाहिनी जांघ यहां गिरी थी और मूर्तियां देवी के रूप में सर्वानंदकारी और शिव व्योमकेश के रूप में हैं।

36. त्रिस्तोता शक्तिपीठ: पश्चिम बंगाल में जलपाईगुड़ी जिले के शालबारी गाँव में तिस्ता नदी के तट पर स्थित है। देवी के बाएँ पैर यहाँ गिरे थे और मूर्तियाँ भ्रामरी के रूप में देवी और ईश्वर के रूप में शिव हैं।

37. त्रिपुरा सुंदरी शक्तित्रीपुरी शक्तिपीठ : त्रिपुरा के किशोर ग्राम में स्थित है। देवी का दाहिना पैर यहां गिरा था और मूर्तियां त्रिपुरसुंदरी के रूप में देवी और त्रिपुरेश के रूप में शिव हैं।

38. विभाष शक्तिपीठ: पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर जिले के तमलुक में स्थित है। देवी का बायाँ टखना यहाँ गिरा था और मूर्तियाँ भीमारूपा के रूप में देवी और सर्वानंद के रूप में शिव हैं।

39. देवीकुप पीठ कुरुक्षेत्र शक्तिपीठ: हरियाणा के कुरुक्षेत्र जंक्शन में द्वैपायन शक्ति के पास झील के पास स्थित है। देवी का दाहिना टखना यहाँ गिरा था और मूर्तियाँ सावित्री या स्थाणु के रूप में देवी और अश्वनाथ के रूप में शिव हैं।  देवीकूप पीठ कुरुक्षेत्र

40. युगद्य शक्तिपीठ, क्षीरग्राम शक्तिपीठ: पश्चिम बंगाल के खिरग्राम में स्थित है। देवी का दाहिना पैर का अंगूठा यहां गिरा था और मूर्तियां देवी के रूप में योगदया और शिव को खिरकंठ के रूप में हैं।

41. अंबिका विराट शक्तिपीठ : राजस्थान के जयपुर में वैराटग्राम में स्थित है। देवी के पैरों के छोटे पैर यहां गिरे थे और मूर्तियाँ अंबिका के रूप में देवी और अमृता के रूप में शिव हैं।

42. कालीघाट शक्तिपीठ : पश्चिम बंगाल के कलकत्ता में कालीघाट में स्थित है। कालीमंदिर के नाम से भी जाना जाता है। उनके दाहिने पैर से देवी के चार छोटे पैर यहाँ गिरे थे और मूर्तियाँ काली के रूप में देवी और नकुलेश या नकुलेश्वर के रूप में शिव हैं।

43. मनसा शक्तिपीठ: मानसरोवर झील, तिब्बत के निकट स्थित है। देवी का दाहिना हाथ या हथेली गिर गई और मूर्तियाँ देवी के रूप में दखचायनी और शिव अमर के रूप में हैं।

44. लंका शक्तिपीठ :  श्रीलंका में स्थित है। देवी के पैरों की घंटियाँ (नूपुर) यहाँ गिरी थीं और मूर्तियाँ देवी के रूप में इन्द्रकशी और शिव को राक्षसेश्वर के रूप में हैं।

45. गंडकी शक्तिपीठ : नेपाल के मुक्तिनाथ में स्थित है। देवी का दाहिना गाल यहाँ गिरा था और मूर्तियाँ गंडकीचंडी के रूप में देवी और चक्रपाणि के रूप में शिव हैं।

46. ​​गुह्येश्वरी शक्तिपीठ: नेपाल के काठमांडू में पशुपतिनाथ मंदिर के पास स्थित है। देवी के दो घुटने यहाँ गिरे थे और मूर्तियाँ महामाया के रूप में देवी और कपाली के रूप में शिव हैं।

47. हिंगलाज शक्तिपीठ: पाकिस्तान के हिंगुला में स्थित है। देवी का मन या मस्तिष्क यहाँ गिर गया और मूर्तियाँ कोटरी के रूप में देवी और भीमलोचन के रूप में शिव हैं।

48. सुगंधा शक्तिपीठ: बांग्लादेश के खुलना में नदी के तट पर स्थित है। देवी की नाक यहाँ गिरी थी और मूर्तियाँ सुनंदा के रूप में देवी और त्रयंबक के रूप में शिव हैं।

49. कार्तोयागत शक्तिपीठ: बांग्लादेश के करोतोआ तट पर स्थित है। देवी की बाईं सीट या उनके कपड़े यहां गिरे थे और मूर्तियाँ अपर्णा के रूप में देवी और भैरव के रूप में शिव हैं।

50. छत्तल शक्तिपीठ : बांग्लादेश के चटगाँव में स्थित है। देवी की दाहिनी भुजा यहाँ गिरी थी और मूर्तियाँ भवानी (देवी) के रूप में देवी और चंद्रशेखर के रूप में शिव हैं।

51. यशोर शक्तिपीठ: बांग्लादेश के जेस्सोर में स्थित है। देवी के हाथों का केंद्र यहां गिरा था और मूर्तियां चंदा के रूप में जशोरेश्वरी और शिव हैं।

[स्रोत:- डिवाइन इंडिया  https://www.thedivineindia.com/51-shakti-peeths/5918]

प्राचीन पौराणिक-टेक्स्ट के अनुसार समाजं एवं राजाओं द्वारा मंदिरों का निर्माण कराया. इसके अलावा जैन तीर्थों, बौद्ध-मठों, पगोडाओं, में मूर्तियाँ स्थापित हैं. जिनकी आराधना पूर्ण पवित्रता के साथ करना बंधन कारी है. यह एक सामाजिक सांस्कृतिक परम्परा है. जिसे कोई कुछ भी कहे पर सनातन में इन सार्वजनिक आराधना स्थलों के अलावा आदि शंकराचार्य द्वारा प्रेरित “आराधना-सरलीकरण” व्यवस्था में घर के दीवाले अर्थात देवालय में पंचायतन के रूप में पूजा जाना एक पवित्र परम्परा है.

मूर्तिपूजा तब गलत मानी जा सकती थी जब कि-“इससे जीवों के विरुद्ध संघातिक यातनाएं दीं जातीं हों अथवा यह  मानवता के अस्तित्व के लिए खतरा हो . ऐसा नहीं है तो फिर क्यों –“ मूर्ति-पूजा त्याज्य हो अथवा  मूर्तिपूजक काफिर कहे जावें ? ”

 

 

21.2.23

विश्व का सबसे खतरनाक बुजुर्ग : जॉर्ज सोरोस

               जॉर्ज सोरोस
(जॉर्ज सोरस पर आरोप है कि वह भारत में धार्मिक वैमनस्यता फैलाने में सबसे आगे है इसके लिए उसने कुछ फंड भी जारी किया है? इसकी सच्चाई जो भी हो पर  भारत के लिए सकारात्मक दृष्टिकोण नहीं रखता रखता)
 93 वर्षीय जॉर्ज सोरोस का जन्म बुडापेस्ट  हंगरी में  एक  यहूदी परिवार में  12 अगस्त, 1930 को हुआ था. यूएसए  के लोगों ने  फाइनेंसर, लेखक,   सामाजिक  कार्यकर्ता   निवेशक एव मौद्रिक व्यापार (सट्टे-बाज़ी) करते   हैं. इन महाशय  को पश्चिम के सुविधा भोगी एग्रेसिव मीडिया घरानों ने दानी  व्यक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करा दिया   । उन्हें उदार सामाजिक कारणों के एक शक्तिशाली और प्रभावशाली समर्थक के रूप में भी जाने लगा  है ।  यहाँ तक तो सब ठीक-ठाक है ऐसे लोगों की दुनियाँ में कम नहीं है जिनका धनवान होना किसी के लिए भी संकट की वज़ह बन जाता है. जार्ज भी इसी श्रेणी के हैं. लंदन स्कूल आफ इकानामिक्स में पढ़े सोरोस की व्यक्तिगत संपत्ति 14 बिलियन डालर से अधिक की है. इस व्यक्ति के कारण 1992 में बैंक-ऑफ़-लन्दन को कंगाल हो जाना पडा था. 16 सितंबर 1992 लन्दन की मुद्रा पोंड  का अवमूल्यन इसी विवादित व्यक्ति की दिमागी बाजीगरी का कारनामा माना जाता है. अर्थात इस व्यक्ति की ज़िद और वित्तीय निर्ममता की हद तब हो गई जब इसने मुद्रा पोंड  का अवमूल्यन करा के  एक महीने में ही लगभग 1.5 बिलियन डॉलर लाभ के तौर पर कमाए. बाज़ार एवं मुद्रा  को प्रभावित करने में कई लोग माहिर हैं परन्तु यह व्यक्ति पूरे सिस्टम को नेस्तनाबूत करने का हुनर जानता है. डोनाल्ट-ट्रंप एवं राष्ट्रवादी सरकारों, उनके पैरोकारों से लगभग घृणा करने वाले सोरोस ने डेमोक्रेट्स के लिए सदा ही आत्मिक प्रेम प्रदर्शित किया. जो बाईडन के सपोर्ट के मामले में में इनका कोई विकल्प दूर दूर तक कोई विकल्प नज़र नहीं आता.   
सोरोस का व्यक्तिगत वैवाहिक जीवन असफल है उनकी दो पत्नियों जीवन-संगनियों क्रमश:  एनालिज़ विट्सचक और सुसान वेबर सोरोस तलाक हो चुका है. इनके बच्चों के नाम रॉबर्ट, एंड्रिया, जोनाथन, अलेक्जेंडर, ग्रेगरी है. वैसे भी  पाश्चात्य-सभ्यता में सात-जन्मों वाला कोई मामला महत्वहीन होता है. 
जार्ज के बारे में 2020 के दौरान  मेरे सोशल-मीडिया  अप्रवासी मित्र समीर शर्मा ने बताया था. वे विश्व में अपने व्यावसायिक कारणों  घूमते रहते हैं. कई और मित्रों से चर्चा के दौरान ज्ञात हुआ कि-“2024 में भारत  के प्रजातंत्र-पर्व में यह व्यक्ति असहिष्णुता का वातावरण अवश्य ही निर्मित करने का प्रयास ज़रूर करेगा...!” सोशल-मीडिया की बातों को सामान्य से कम आंकना स्वाभाविक है. मेरे लिए यह जानकारी तब महत्वहीन थी. परन्तु सी ए ए, एन आर सी , काश्मीर-मुद्दे पर टिप्पणियाँ, एवं भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था पर इनकी टिप्पणीयाँ भारत के विरुद्ध इनकी विध्वंसक मनोवृति का प्राथमिक परिचय है. 
हंगरी के लिए सोरोस के कुछ कार्य:- 1984-89 में , साम्यवाद से पूंजीवाद का अभ्युदय हुआ . इस कार्य में एक कैटेलिस्ट के रूप में जार्ज की भूमिका रही है.   उच्च शिक्षा के लिए   बुडापेस्ट में सेंट्रल यूरोपियन यूनिवर्सिटी को दी गई थी. कुल मिलाकर जार्ज की का लक्ष्य   शैक्षणिक कार्यक्रम, मानवाधिकार आंदोलन स्वास्थ्य 
न्याय सुधार,वैश्विक शासन,  एवं  लोकतंत्र की मजबूत पर धन का व्यय करना है. परन्तु इसका दूसरा पहलू उनके भारत, रूस, पर दिए गए बयानों से स्पष्ट है. सोरोश की वैचारिक मुठभेड़  मलेशिया के पूर्व प्रधान मंत्री महाधिर मोहम्मद से भी हो चुकी है. वर्तमान में सोरोस भले ही खुद को दार्शनिक साबित करने की कवायद कर  हों पर वास्तव में इनकी प्रसिद्धि  ग्राफ तेज़ी से नकारात्मक होता जा रहा है. 
अपनी माता को आत्महत्या में मदद करने की पेशकश:-  साल 1994 में सोरोस ने एक भाषण में बताया कि उन्होंने अपनी मां को आत्महत्या करने में मदद देने की पेशकश की थी, उनकी मां हेमलॉक सोसाइटी की सदस्य थीं. यह व्यक्ति फिर भी अपने को नास्तिक – दर्शनशास्त्री मानता है. 
संस्थानों से सम्बद्धता :-  1945 में नामक एक किताब Open Society and Its Anime पर आधारित Open Society Foundation की स्थापना की.   फाउंडेशन का हेडक्वाटर न्यूयार्क में तथा  60 से ज्यादा देशों प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से सक्रिय हैं. इस संस्था की सक्रियता विशाल डेमोक्रेटिक राष्ट्रों में नज़र आती है.भारत में यह फ़ाउडेशन किस तरह से काम करता है इस बात का परीक्षण भी अब आवश्यक प्रतीत होने लगा है.
अन्वेषण एवं प्रस्तुति : गिरीश बिल्लोरे “मुकुल” 
(वैश्विक (विशेषकर दक्षिण एशियाई) सोशियो-एकोनामिक  के टिप्पणीकार ) 

11.2.23

दक्षिण एशिया का बदनाम देश : पाकिस्तान

 


आर्थिक बदहाली, गिरते जीवन-समंक, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा , लोकशाही की दुर्दशा , बन्दूक की नोक पर चकाघिन्नी होती डेमोक्रेसी, आतंक का एपी-सेंटर, 14 अगस्त 1947 को ब्रिटिश-इंडिया से आज़ाद हुए जिन्ना के नापाक इरादों, एवं जयचंदों की मदद से पैदा पाकिस्तान अब दक्षिण एशिया का सबसे बदनाम देश हो चुका है.विश्व मानता है कि इस देश के नागरिकों की साख भी संदिग्ध हो गई है. किल मिलाकर  पाकिस्तानी पासपोर्ट की इज्ज़त नकारात्मक रूप से प्रभावित हुई है.

समाज विज्ञानी एवं रक्षा क्षेत्र के विद्वानों का मानना है कि-“भारत के खिलाफ इस्लामिक  कार्ड खेलने के किसी भी अवसर को नहीं चूकने वाले इस देश ने अपनी नस्लों को जो इतिहास पढ़ाया जाता है कि –“हिन्दू, सिख, यहूदी और हर गैर इस्लामिक एवं बुत-परस्त काफिर हैं वे हमारे दुश्मन हैं. !”.. इसके आगे क्या क्या सिखातें हैं हम सब जानते हैं विश्व भी जानता है . आज हम इस मुल्क यानी पाकिस्तान की एक और करतूत उजागर करते हैं , जिस पर विश्व खासतौर पर यूरोप 9/11 के बावजूद खामोश है. जी हाँ हम बलोच सिन्धु, पश्तूनों की आज़ादी के दीवानों के मानवाधिकारों की बात करतें हैं......  

ऐसी स्थिति में वहाँ की युवा जनसंख्या दिशा-भ्रमित है. किशोर अवस्था तक इस्लामिक जेहाद को सर्वोपरी मान बैठता है. 1971 में आज़ाद हुए  

बलूचिस्तान , पाकिस्तान  का पश्चिमी प्रान्त है जिसकी जनसंख्या 2 करोड़ के आसपास है.। बलूचिस्तान  ईरान के सिस्तान एवं बलूचिस्तान”  तथा अफ़गानिस्तान के सटे हुए क्षेत्रों में बँटा हुआ है, बलोचिस्तान की राजधानी क्वेटा  है । यहाँ के लोगों की प्रमुख भाषा बलूच या बलूची   है 

1944 में बलूचिस्तान को स्वतन्त्रता देने के लिए ब्रिटिश इंडिया के एक जनरल मनी ने किया था .  पाकिस्तान के संस्थापक और प्रथम गवर्नर-जनरल मोहम्मद अली जिन्ना ने अंतिम स्वाधीन बलूच शासक मीर अहमद यार खान को पाकिस्तान में शामिल होने के समझौते पर कुरआन की क़सम देकर समझौते दस्तखत करने के लिए मजबूर किया था 

यह कार्य 11 अगस्त 1947 को ब्रिटिश एवं यूरोपीयन देशों के  इशारे पर इसे जिन्ना ने पाकिस्तान में शामिल कर लिए गए बलूचिस्तान में 1970 के दशक से प्रो-आर्मी पाकिस्तानी डेमोक्रेसी एवं प्रशासनिक सामाजिक भेदभाव से दु:खी होकर बलोच-राष्ट्रवाद का अभ्युदय हुआ.इस प्रांत की जनसंख्या 78 लाख से अधिक एवं क्षेत्रफल  347190 वर्ग कि.मी.  (1,34,050 वर्गमील) है. जो पाकिस्तान का 44% भू-भाग है.

पाकिस्तान में बलूचिस्तान,सिंध,केपीके में मौजूद प्राकृतिक-संपदा एवं व्यापारिक दृष्टि से अन्य प्रान्तों से अपेक्षाकृत अधिक है परन्तु वहां की जनता की बदहाली  (स्वास्थ्य,शिक्षा, रोज़गार,) चिंताजनक है. सारी सुख-सुविधाएं  पाकिस्तानी पंजाब सूबे के पास जाती है.  बलूचिस्तान,सिंध,केपीके की जनता बेहद गरीब हैं. उनका जिनोसाईट किया जाता है. हाल ही में स्पेस में बलोचों नें बताया –“2 हज़ार महिलाओं को लापता कर दिया गया. ताहिर बलोच, हनी बलोच, मिराब्ल बलोच ने बताया कि-हमारे पढ़ने लिखने वाले बच्चों, महिलाओं, तक  को कंसंट्रेशन-कैम्पस में रखा जा रहा है.

2015 में  जिनेवा में आयोजित कांफ्रेंस जिसका विमर्श एजेंडा था  'बलूचिस्तान इन द शैडोज' , कांफ्रेंस का सारांश , "बलूचिस्तान में मानवाधिकारों की स्थिति बुरी तरह से खराब हो रही है। नागरिकों को सुरक्षा देने और कानून का राज कायम रखने के बुनियादी कर्तव्य में क्षेत्र की प्रांतीय एवं राष्ट्रीय सरकार नाकाम साबित हुई हैं वहां केवल सेना और उनकी बन्दूक वाला विधान चलता है.

  1948-49 से अब तक पाकिस्तान के विरुद्ध अब तक  ब्लोचों द्वारा पांच बार सशस्त्र क्रांतिकारी आन्दोलन की गई है. वर्तमान में बलोच-सिन्धुदेश-केपीके की आज़ादी के लिए सोशल-मीडिया पर अंतर्राष्ट्रीय-नैरेटिव लगातार जारी है.  

 मशहूर बलूच कार्यकर्ता नाएला कादरी ने एक प्रेस मीटिंग में कहा था कि- 'राजनैतिकलोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष स्वतंत्रता संघर्ष को दबाने के लिए पाकिस्तान नरंसहार कर रहा है।यह भी उनके द्वारा ही  कहा था-बीते एक दशक में लाख बलूचियों को मार डाला गया है। 25000 पुरुष एवं  महिलाएं  लापता हुई हैंजिनमें पाकिस्तान की सेना का हाथ रहा है। वो लोग नरंसहार की पहचान के लिए निर्धारित संयुक्त राष्ट्र के सभी आठ संकेतों पर अमल कर रहे हैं और इसमें अमानवीयकरणध्रुवीकरणविनाश और अस्वीकार भी शामिल हैं 

 

 

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