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मत्स्य गंधी होके जल से आपको एतराज़ कैसा

मत्स्य गंधी होके जल से आपको एतराज़ कैसा इस आभासी फलक पे आपका विश्वास कैसा..? पता था की धूप में होगा निकलना , स्वेद कण का भाल पे सर सर फिसलना साथ छाजल लेके निकले, सर पे साफा बाँध के खोज है  इस खोज में मधुमास क्या बैसाख कैसा ? बागवां हो   बाड़ियों में शूल के बिरवे न रोपो तुम सही  हो इस सत्य को कसौटी पे कसो सोचो बूढ़ा बरगद और पीपल सब तो हैं कंटीली झाड़ी तले तपस्वी आवास कैसा …?

स्व.श्री हरिशंकर परसाई का एक व्यंग्य: " अपनी-अपनी हैसियत "

परसाई जी का दुर्लभ छाया चित्र फ़ोटो : स्व०शशिन यादव  हरिशंकर परसाई  ( २२ अगस्त ,  १९२२  -  १० अगस्त ,  १९९५ ) हिंदी के प्रसिद्ध लेखक और व्यंग्यकार थे। उनका जन्म जमानी ,  होशंगाबाद ,  मध्य प्रदेश   में हुआ था। वे हिंदी के पहले रचनाकार हैं जिन्होंने व्यंग्य को विधा का दर्जा दिलाया और उसे हल्के – फुल्के मनोरंजन की परंपरागत परिधि से उबारकर समाज के व्यापक प्रश्नों से जोड़ा। उनकी व्यंग्य रचनाएँ हमारे मन में गुदगुदी ही पैदा नहीं करतीं बल्कि हमें उन सामाजिक वास्तविकताओं के आमने – सामने खड़ा करती है , जिनसे किसी भी व्यक्ति का अलग रह पाना लगभग असंभव है। लगातार खोखली होती जा रही हमारी सामाजिक और राजनॅतिक व्यवस्था में पिसते मध्यमवर्गीय मन की सच्चाइयों को उन्होंने बहुत ही निकटता से पकड़ा है। सामाजिक पाखंड और रूढ़िवादी जीवन – मूल्यों की खिल्ली उड़ाते हुए उन्होंने सदैव विवेक और विज्ञान – सम्मत दृष्टि को सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया है। उनकी भाषा – शैली में खास किस्म का अपनापा है , जिससे पाठक यह महसूस करता है कि लेखक उसके सामने ही बैठा है। ( साभार विकी )          परसाई जी की रचनावलियों

परिकल्पना ब्लागोत्सव की एक झलक जीवन के रंगमंच से ...चाँद के पार ....

वेब दुनिया इंदौर की वरिष्ठ सदस्या   स्मृति जोशी   को हिंदी जगत में एक प्रखर लेखिका के रूप में जाना जाता है . अपने आलेखों में नए और लालित्यपूर्ण विंबों के माध्यम से सामाजिक जनचेतना को आयामित करने में इन्हें महारत हासिल है . विगत दिनों उनके बेस्ट वेब फीचर “ कठोर परंपरा का भीना समापन ” के लिए उन्हें लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उन्हें दूसरी बार प्राप्त हुआ है . चाँद के पार स्तंभ के अंतर्गत प्रस्तुत है उनका एक चर्चित ललित निबंध बदली से निकला है चाँद ….! ============================================================= नहीं जानती अं‍तरिक्ष के इस चमकीले चमत्कार से मेरा क्या संबंध है लेकिन जब भी कुछ बहुत अच्छा लिखने का मन होता है चाँद मेरी लेखनी की नोंक पर बड़े अधिकार के साथ आ धमकता है। यूँ तो मेरी लेखनी की कुछ बातें खुद मुझे हैरत में डाल देती है। ब्लागोत्सव 2011 में प्रकाशित प्रसारित हो रही पोस्ट की इन दिनों उसी तरह प्रतीक्षा की जा रही है जैसे कोई पहुना की बाट जोहता हो. यही तो एक अदभुत परिकल्पना है जो अनेकों को एक सूत्र में पिरोती है.   देखिये ये पोस्ट   जीवन के रंगमंच

बवाल के स्वरों में सुनिये गीत " कुछ झन झन झन था"

लुकमान चाचा  बवाल हिंदवी यानी एक सम्पूर्ण कलाकार यानी एकदम पूरा का पूरा बवाल जब मंच पर आये तो समझिये लोग एक पल भी ऐसे बवाल से दूर न होने की क़सम खा लेते हैं. विनोबा-भावे ने  जबलपुर को सैंत में न दिया ये नाम एक बानगी तो देखिये.... लाल और बवाल ब्लाग से साभार   ब वाल एक ऐसे उस्ताद का शागिर्द है जिनने उर्दू -कव्वाली कव्वाली से उर्दू का एकाधिकार समाप्त किया.हिंदी कविताओं गीतों को प्रवेश दिलाया था कवाली-शैली की गायकी में. बवाल के गुरु स्वर्गीय लुकमा न जो गंधर्व से कम न थे. हम लोगों में  गज़ब की दीवानगी थी चच्चा के लिये...देर रात तक उनको सुनना उनकी महफ़िल सजाना एक ज़ुनून था.. फ़िल्मी हल्के फ़ुल्के संगीत से निज़ात दिलाती चचा की महफ़िल की बात कैसे बयां करूं गूंगा हो गया हूं..गुड़ मुंह में लिये    आप सोच रहें हैं न कौन लुकमान कैसा लुकमान कहाँ  का लुकमान जी हाँ इन सभी सवालों का ज़वाब उस दौर में लुकमान ने दे दिया था जब  उनने पहली बार भरत-चरित गाया. और हाँ तब भी तब भी जब गाया होगा ''माटी की गागरिया '' या  मस्त चला इस मस्ती से थोड़ी-थोड़ी मस्ती ले लो     ( आगे देखिये

दीप अकेला -- अज्ञेय जी की एक रचना

आज एक कविता "अज्ञेय" जी की--- जो प्राप्त हुई है  सिद्धेश्वर जी के सौंजन्य से... सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' उपनाम: अज्ञेय जन्म: ७ मार्च   १९११ कुशीनगर ,  देवरिया ,  उत्तर प्रदेश ,  भारत मृत्यु: ४ अप्रैल   १९८७ दिल्ली ,  भारत कार्यक्षेत्र: कवि, लेखक राष्ट्रीयता: भारतीय भाषा : हिन्दी काल: आधुनिक काल विधा : कहानी ,  कविता ,  उपन्यास ,  निबंध विषय: सामाजिक ,  यथार्थवादी साहित्यिक आन्दोलन : नई कविता , प्रयोगवाद प्रमुख कृति(याँ): आँगन के पार द्वार ,  कितनी नावों में कितनी बार हस्ताक्षर: विकीपीडिया से साभार  दीप अकेला - अज्ञेय यह दीप अकेला स्नेह भरा है गर्व भरा मदमाता पर इसको भी पंक्ति को दे दो यह जन है : गाता गीत जिन्हें फिर और कौन गायेगा पनडुब्बा : ये मोती सच्चे फिर कौन कृति लायेगा? यह समिधा : ऐसी आग हठीला बिरला सुलगायेगा यह अद्वितीय : यह मेरा : यह मैं स्वयं विसर्जित : यह दीप अकेला स्नेह भरा है गर्व भरा मदमाता पर इस को भी पंक्ति दे दो यह मधु है : स्वयं काल की मौना का युगसंचय यह गोरसः जीवन-कामधेनु का अमृत-प

एक मै और एक तू......हम बने तुम बने एक दूजे के लिए

हिंद-युग्म साधकों की साधना अंतरज़ाल के लिये एक अनूठा उपहार है. और जब मुझे उनके साथ काम करने का मौका मिलता तो मैं सब कुछ छोड़कर पूरी लगन से काम करतीं हूं. मुझे ही नही सभी को हिंद-युग्म की प्रतीक्षा होती है. मिसफ़िट पर सादर प्रस्तुत है हिन्द-युग्म से साभार  आवाज हिन्दयुग्म से ओल्ड इज़ गोल्ड श्रंखला---भाग 8 और 9----- एक मै और एक तू ---  हम बने तुम बने एक दूजे के लिए- -----  

आचार्य संजीव वर्मा सलिल

    पेशे से अभियंता आचार्य संजीव वर्मा "सलिल"   के जीवन का लक्ष्य सतत क्रियेटिविटी थी तो है. गीत,नवगीत,गद्य,पर सतत रचनाएं देते सलिल जी का मुख्य ब्लाग " दिव्य-नर्मदा " है. वास्तु नन्दनी , विज्ञान-विपाशा , मन रंजना , राम नाम सुखदाई , काव्यकालिंदी सहित ढेरों ब्लॉग पर सतत लिखने वाले आचार्य जी को सतत लिखना सोहता है. अन्य वेब साइट्स एवं पोर्टल्स पर भी अक्सर उनको देख सकते हैं आप हम . उनका एक बाल गीत आओ हिल-मिल खेलें हम लंगड़ी प्रस्तुत है.अर्चना जी के स्वरों में

प्रेयसी की पुकार :अर्चना चावजी

 बारिशों के मौसम में---------------------------------सुनिए समीर जी का लिख एक गीत-----------जो शायद कोई पहचान नही पाया-------------मेरी आवाज में------------------

दिलीप जी का गीत सुनिये अर्चना चावजी के सुरों में

भोपाल त्रासदी का ये चित्र देखा और मन विचलित हो गया.. दिलीप भाई ने .इससे ही प्रेरित होकर ये रचना लिखी... थी कभी छत पर मेरे कुछ धूप आकर तैरती... और नीचे छाँव भी थी सुस्त थोड़ी सी थकी... छाँव के कालीन पर नन्हा खिलौना रेंगता... कुछ उछलती कूदती साँसों को मुझपे फेंकता... हाँ वो बचपन था कभी कुछ झूमता कुछ डोलता... आँख मून्दे मुँह सटाये मुझसे क्या क्या बोलता.... फिर तभी आवाज़ कोई खनखनाते प्यार की... कुछ तो ख़ाले धूप मे क्यूँ खेलता तू हर घड़ी... फिर मेरी उंगली पे चादर थी कई लटका गयी... प्यार ममता आज फिर नीयत मेरी भटका गयी... फिर तभी वो घूमते पहिए वहाँ आकर रुके... चूमने मुन्ने को दो लब थे ऊँचाई से झुके... फिर धरी थी हाथ उसके चमचमाती कुछ खुशी... फिर उतरकर लाड़ ने मासूमियत थी गोद ली... फिर किवाडो मे छिपे जा प्यार के पंछी सभी... मैने भी थोडा उचक्कर एक ठंडी साँस ली... पेड़ था पीपल का इक मैं जाने कबसे था खड़ा... पर बगल के लाल घर ने था सदा बाबा कहा... हाँ बहू ही थी मेरी वो नित्य आकर पूजती... बंधनों मे बाँध कर कुछ मांगती कुछ पूछती... रात अपनी डाल से सहला रहा था छत वही... ब

कवयत्रि अर्चना की पहली कविता प्रस्तुत है पाडकास्ट पर

कवयत्रि अर्चना की पहली  कविता प्रस्तुत है पाडकास्ट  पर . हिन्दी कविता और उसके लिए समर्पित अर्चना  जी की एक बेहतरीन कविता '' टुकड़ों में बंटी मैं '' उत्कृष्ट बन पडी है . अच्छी कविता के लिएउनका ब्लॉग '' मेरे मन की '' अवश्य देखिये खेल-खेल मे....mp3 साथ ही साथ ये गीत भी सुनिये      Get this widget |      Track details  |         eSnips Social DNA   

उफ़्फ़ शरद कोकास भीषण गर्मी को भी एन्जोय करते है ?

इस बात में कोई दो राय नहीं प्यासे पाखी-और पेड पानी पियॆं इसके लिये सजग हमको रहना है बस हमें जो करना है कि उनके लिये छत आंगन में पानी और  सूखते झुलसते पेडों पौधौं को पानी पिलाना है जी हां यही तो कह रहें हैं शरद कोकास जी सुनिये क्या कहा है उनने

सफ़ेद मुसली खिलाडियों के वरदान और खिलाड़ी अनजान : अलका सरवत मिश्रा

अलका सरवत मिश्रा   भारत में जडी-बूटियों का अनुप्रयोग औषधि के रूप में किया जाना सदियों से ज़ारी है किंतु उपेक्षा की सुईंयां अक्सर चुभा दीं जाती हैं  इन कोशिशों और कोशिश में लगे लोंगों को....! फ़िर भी हौसलों के ज़खीरे लिये ये लोग अपने अपने मोर्चे पर तैनात हैं. चाहे  बाबा रामदेव  अथवा  अलका सरवत मिश्रा  ............ जो  जडी-बूटियों से जीवन को बेहतर बनाने की कोशिशे जारी रखे हुये हैं  अलका जी एक ऐसे विषय पर लिखतीं हैं जिसकी ज़रुरत आज हर व्यक्ति को है वे अपने सारे शोध-आलेख ब्लॉग  मेरा समस्त पर पोस्ट करतीं हैं तथा आभार व्यक्त करतीं हैं  हिंद युग्म  वाले  शैलेश भारतवासी  का जिन्हौने उनको एक   लोक प्रिय ब्लॉगर बनाया. इसी दौरान हमसे रहा न गया हमने ज़नाब सरवत ज़माल जी से बात चीत भी की                 सरवत ज़माल साहब                                

अदा जी ने ले ही लिया इंटरव्यू हमारा

आज सुबह  सवेरे  ललित जी पाबला जी से प्राप्त  स्नेहिल शुभ कामनाएँ और शाम की आहट के साथ पाबला जी के  ब्लॉग एवं +९१९८७०८०७०७० एस एम एस के ज़रिये सूचना के प्रकाशित एवं प्रचारित होते ही कि आज मेरे विवाह की साल गिरह है ढ़ेरो शुभ-कामनाएँ अंतरजाल की दुनियाँ से प्राप्त हुईं सभी का शुक्रिया अदा जी ने मुझे पकढ़ ही लिया और ले ही लिया इंटरव्यू हमारा   साथ ही इन स्नेही मित्रों को मित्रानियों /पूज्यों के प्रति कृतज्ञता  काजल कुमार जी संगीता पुरी जी दिनेशराय द्विवेदी जी कुलवंत  हैप्पी ललित शर्मा जी ,  वन्दना जी ,  Vivek रस्तोगी जी उड़न  तश्तरी जी ,  राकेश कौशिक जी  ,  उन्मुक्त जी ,    ताऊ रामपुरिया जी ,  धीरू सिंह जी ,  महेन्द्र मिश्र जी ,  रश्मि  रविजा ,  राज भाटिय़ा दादाजी , ' अदा जी     सिद्धार्थ जोशी जी    praween trivedi ji