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माता-पिता के लिये सिर्फ़ एक दिन नियत मत करो ..भई..!!

जब लौटता दफ़्तर से रास्ते में मुझे एक ज़रूरी काम होता है. बिना ड्रायवर को ये कहे कि ज़रा रुकना मैं वो काम पूरा कर ही लेता हूं जानते हैं कैसे डा. वेगड़ के पिता माता यानी   अमृतलाल जी बेगड़ सपत्नीक शाम छै: बजे के आस पास अपने घर से निकलते हैं शाम की तफ़रीह पर और मुझे लगता है देव-पुरुष सहचरी के साथ मुझे दर्शन देने स्वयम बाहर आते हैं.  _____________________________________                 मेरे सहकर्मी धर्मेंद्र के बाबूजी फ़्रीडम फ़ाइटर के सी जैन  शाम पांच बजे से बेटे का इंतज़ार करती इनकी आंखें .....  फ़ादर्स डे पर  ..... धर्मेंद्र कहते हैं.. "सर,अपन तो पिता के नाम पूरी ज़िंदगी कर दें तो बहुत छोटी सी बात है...!!". ___________________________________  आते ही सबसे दयनीय पौधे के पास गए फ़िर अगले ही पल मुस्कुराने लगते मेरे बाबूजी  सुबह सबेरे की अपने   छत वाले गार्डन तक जाते हैं गार्डन वाले बच्चों  दुलारते हैं.. पौधे भी एहसास कर ही लेते होंगे :-''पितृत्व कितना स्निग्ध होता है "  नन्हे-मुन्ने पौधे  इंतज़ार करते हैं.बाबूजी बग