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मत्स्य गंधी होके जल से आपको एतराज़ कैसा

मत्स्य गंधी होके जल से आपको एतराज़ कैसा इस आभासी फलक पे आपका विश्वास कैसा..? पता था की धूप में होगा निकलना , स्वेद कण का भाल पे सर सर फिसलना साथ छाजल लेके निकले, सर पे साफा बाँध के खोज है  इस खोज में मधुमास क्या बैसाख कैसा ? बागवां हो   बाड़ियों में शूल के बिरवे न रोपो तुम सही  हो इस सत्य को कसौटी पे कसो सोचो बूढ़ा बरगद और पीपल सब तो हैं कंटीली झाड़ी तले तपस्वी आवास कैसा …?

गिरीश बिल्लोरे मुकुल की तीन कविताएं

जो गीत तुम खुद का कह रहे हो मुकुल ने उसको जिया है पगले

कि जिसने देखा न खुद का चेहरा उसी  के  हाथों  में  आईना है, था जिसकी तस्वीर से खौफ़ सबको,सुना है वो ही तो रहनुमां है. हां जिनकी वज़ह से है शराफ़त,है उनकी सबको बहुत  ज़रूरत- वो  चार लोगों से डर रहा हूं… बताईये क्या वो सब यहां हैं..? अगरचे मैंने ग़ज़ल कहा तो गुनाह क्या है.बेचारे  दिल का... वो बेख़बर है उसे खबर दो    कि उसके चर्चे कहां कहां हैं..? वो लौटने का करार करके गया था, लेकिन कभी न लौटा- करार करना सहज सरल है- निबाहने का ज़िगर कहां है . जो गीत तुम खुद का कह रहे हो मुकुल ने उसको जिया है पगले किसी को तुम अब ये न सुनाना सभी कहेंगे सुना- सुना है .

ग़ज़ल:ज़िंदगी

From भारत-ब्रिगेड कभी स्याह रात कभी माहताब ज़िंदगी इक अर्से से मुसलसल बारात -ज़िंदगी तेरी बज़्म , तू बेखबर मैं बेख़बर.... इक ऐसी ही सुहाग-ए-रात "ज़िंदगी" बाद अर्से के मिला यार मेरा- तब उफ़नके रुके ज़ज़्बात ज़िंदगी.. बाद मरने के कहोगे मेरे... धुंये के बुत से थी मुलाक़ात ज़िंदगी.. न पूछ इस उससे कैसे जियें इसको .. बहुत हसीन है जी ले चुपचाप-ज़िंदगी !!

ब्लाग क्यों बांचें भई ?

साभार: रायटोक्रेट कुमारेंद्र जी के ब्लाग से  हिंदी ब्लागिंग अब व्यक्तिगत-डायरी की संज्ञा से मुक्ति की पक्षधर नज़र्  आ रही है. इस विषय की पुष्टि इन दिनों आ रही पोस्ट से सहज ही हो जाती है . कुछ ब्लाग्स पर गौर करें तो बेशक वे सामयिक परिस्थितियों पर त्वरित अभिव्यक्ति की तरह सामने आ रहे हैं. इतना ही नहीं कुछ ब्लाग्स अपनी विषय परकता के कारण पढ़े जा रहे हैं.    यानी  एक ग़लत फ़हमी थी बरसों तक कि ब्लाग केवल व्यक्तिगत मामला है किंतु हिन्दी ब्लागिंग में माइक्रो ब्लागिंग साइट ट्विटर को छोड़ दिया जाए तो अब ऐसी स्थिति नहीं अब तो ट्विटर पर भी विषय विस्तार लेते नज़र आ रहे हैं. हिंदी ब्लागिंग का सकारात्मक पहलू ये है कि अब लोग स्वयम से आगे निकल कर बेबाक़ी से अपनी बात सामाजिक राजनैतिक वैश्विक मामलों पर रखने लगे हैं. ज़ी-न्यूज़ दिल्ली के सीनियर प्रोड्यूसर खुशदीप सहगल के ब्लाग देशनामा www.deshnama.com  पर समसामयिक मसलों पर  आलेखों की भरमार है तो दिल्ली के मशहूर व्यवसायी राजीव तनेजा आम जीवन से जुड़ी घटनाऒं एवम परिस्थियों से उपजे हास्य को पेश करते नज़र आते हैं अपने ब्लाग “ हंसते-रहो ” ( http://www.h

लोकरंग का सार्थक आयोजन

                    शनिवार दिनांक 12 नवम्बर 2011 को सरस्वतिघाट भेड़ाघाट में    जिला पंचायत अध्यक्ष भारत सिंह यादव,के मुख्य-आतिथ्य, एवम श्री अशोक रोहाणी,पूर्व-सांसद पं.रामनरेश त्रिपाठी,नगर-पंचायत अध्यक्ष श्री दिलीप राय,पूर्व-महापौर सुश्री कल्याणी पाण्डेय के विशिष्ठ आतिथ्य  में आयोजित लोकरंग का शुभारंभ मां नर्मदा एवम सरस्वती पूजन-अर्चन के साथ हुआ .       इस अवसर पर विचार रखते हुए श्री भारत सिंह यादव ने कहा –“लोक-कलाओं के संरक्षण के लिये ऐसे आयोजन बेहद आवश्यक हैं मेला-संस्कृति के पोषण के लिये भी कम महत्व पूर्ण नहीं हैं ऐसे आयोजन. सरस्वतिघाट पर हो रहे ऐसे आयोजन के आयोजन एवम प्रायोजक दौनों ही साधुवाद के पात्र हैं”.   पूर्व सांसद श्री रामनरेश त्रिपाठी ने कहा –“मोक्षदायिनी मां नर्मदा के तट पर मां नर्मदा का यशोगान बेशक स्तुत्य पहल है विग्यान के नियमों को उलट देने वाली मां नर्मदा का तट पर आयोजित लोकरंग एक सार्थक-पहल है जिसके साक्षी बन कर हम हितिहास का एक हिस्सा बन रहे हैं.”  सुश्री कल्याणी पाण्डेय के अनुसार-“ जहां एक ओर मां नर्मदा के तट पर अध्यात्म, संस्कृति को बढ़ावा मिला वहीं पुण्य-सल

साहब आए और गये

    विक्रम की पीठ पे लदा बेताल टाइम पास करने की गरज़ से बोला :- विक्रम,   साहब का आने और वापस जाने के बीच से  एक  बरसाती नदी की तरह सियासती नदी उन्मुक्त रूप से बहा करती है. सुनो कल सा’ब आएंगे ? अच्छा कल ! काहे से आएंगे .. चलो अच्छा हुआ वो पुराना वाला था न ससुरा हर छुट्टी में आ धमकता था.. इनमें एक बात तो है कि ये .. छुट्टी खराब नहीं करते थे  ज़्यादा परेशान भी नहीं करते.  और ये अरे राम राम........मत पूछो गुप्ता बाबू..        इस "अरे राम राम........मत पूछो गुप्ता बाबू.." में जितना कुछ छिपा है उसे आसानी से कोई भी समझ सकता है.        पुराना साहब अक्सर बुरा और उपेक्षा भाव से भरे "ससुरा" शब्द से कमोबेश हर डिपार्टमेंट में अलंकृत हुआ करता है. जितने भी साहब टाइप के पाठक इस आलेख को बांच रहे हैं बाक़ायदा अपनी स्थिति को खुद माप सकते है.यानी आज़ से उम्दा और कल से बेदतर न कुछ था न होगा ऐसा हर सरकारी विभाग में देखा जा सकता है. कल ही की बात है एक विभाग का अधिकारी अपने आकस्मिक आन पड़े कार्यों के चलते दिल्ली मुख्यालय से रीजनल आफ़िस आए स्थानीय अधिकारी  निर्देश के परिपालन में  क

इतिहास तमाशबीनों का नहीं होता…. ..अविनाश दास

    मेरे नेटिया मित्र अविनाश दास ने अपनी बात में सभी को सजग कर दिया कि किसी भी स्थिति में तमाशबीन महत्व हीन हो जाते हैं इतिहास के लिये.. अविनाश की बात के पीछे से एक ललकार सुनाई दे रही है कि... आंदोलन यानी बदलाव के लिये की गई कोशिश कमज़ोर न हो.. “ यह किसी आंदोलन में विश्‍वास करने या न करने का समय नहीं है। समय है , इस उबाल को व्‍यवस्‍था के खिलाफ एक सटीक प्रतिरोध में बदल देने का । जिन्‍हें अन्‍ना से दिक्‍कत है , वे अन्‍ना का नाम न लें , लेकिन सड़क पर तो उतरें । जिन्‍हें लोकपाल-जनलोकपाल से दिक्‍कत है , वे इस जनगोलबंदी को एक नयी दिशा देने के लिए तो आगे बढ़ें। इतिहास तमाशबीनों का नहीं होता ….” अविनाश का कथन एक वास्तविकता है. अनपढ़ ग़रीब तबका जिसे ये बात समझने का सामार्थ्य नहीं रखता पर वो ये बात जानता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ़ एक जुट होना ज़रूरी है ऐसा जैसे आज़ादी के वक़्त हुआ था वही सब हो रहा है. गांधी सहित सभी समकालीन आईकान्स के संदेशों में क्या था यही न कि :- “ अंग्रेज़ों से मुक्ति के लिये एकता ज़रूरी है ” बस इसी संदेश ने एक तार में पिरो दिया लोग गोलबंद हो गए.. और शुरु हो गया परदेशियों

अन्ना हज़ारे को समर्पित समर्थन-गीत : वो जो गा रहा है वह भी तो है राष्ट्र गीत..!

"वंदे-मातरम" आज़ वक़्त है सही....... हज़ारों को तू पाठ दे . सोच मत कि क्या बुरा   क्या भला है मेरे मीत हिम्मतवर की ही   होती  है   सदा ही जीत.! सोच मत कि क्या                                                           करेगा  लोकपाल                                                             सोच मत कि इंतज़ाम झोल-झाल  , ऊपरी कमाई बिन कैसा होगा अपना हाल ! वक़्त शेष है अभी   सारे काम टाल दे ! जेब भर तिज़ोरी भर बोरे भर के नोट भर  , खैंच हैंच फ़ावड़े से या यंत्र का प्रयोग कर ! सवाल पे भी नोट ले जवाब के भी नोट ले ! ले सप्रेम भेंट मीत - परा ज़रा सी ओट से ! किसने धन से जीतीं है हज़ारों दिल की धड़कनें.! मुफ़लिसी के दौर में   पुख़्ता होती हैं जड़ें..!! मेरी बात मान ले ... मीत अब तू ठान ले क्यों अभी तलक तू चुप आगे आ उफ़ान ले.. क्यों तुझे देश के दुश्मनों से प्रीत मीत वो जो गा रहा है वह भी तो है राष्ट्र गीत..!! न ओट से तू नोट ले न बोरे भर के नोट ले न सवाल न ज़वाब किसी वज़ह से नोट ले न वोट के तू नोट ले न खोट के

वेड्नेस डे : "स्टुपिट कामन मैन की क्रांति "

w ednesday     फ़िल्म को देखते ही अहसास हुआ  एक कविता का एक क्रांति का एक सच का  जो कभी भी साकार हो सकता है.अब इन वैतालों का अंत अगर व्यवस्था न कर सके तो ये होगा ही   " अपनी पीठ पर लदे बैतालो   को सब कुछ सच सच कौन बताएगा शायद हम सब .. तभी एक आमूल चूल परिवर्तन होगा... चीखने लगेगी संडा़ंध मारती व्यवस्था , हिल जाएंगी   चूलें जो कसी हुईं हैं... नासमझ हाथों से . अब आप और क्या चाहतें हैं ?  अब भी हाथ पर हाथ रखकर घर में बैठ जाना. ..? सच तो ये है कि अब आ चुका है वक़्त सारे मसले तय करने का  हाथ पर हाथ रखकर घर में बैठना अब सबसे बड़ा पाप होगा        

वो आदमी सुलगाया जाता है..!!

सुबह   अखबार बांचते ही चाय की चुस्कियों के साथ एकाध गाली निकल जाती है अचानक मुंह से उसके व्यवस्था के खिलाफ़ ! फ़िर अचानक बत्ती का गुम होना बिजली वालों की मां-बहनों से शाब्दिक दुराचरण सब्जी के दाम सुन कर फ़िर उसी अंदाज़ में एक बार फ़िर मंत्र की तरह गूंजती गालियां..!! अचानक मोबाईल पर बास का न्योता भी उसे पसंद नहीं..आता हर बार तनाव के कारणों पर वो बौछार कर देता है अश्लील गालियों की शाम बेटी के हाथ से रिमोट ले समाचार देखता वो झल्ला जाता है पर्फ़्यूम के “ब्लू-फ़िल्मिया-एड” देख कर ..! फ़िर लगा लेता है मिकी-माउस वाला चैनल  अच्छा है उसमें इतनी तमीज़ तो है बेटी के सामने गाली न देने की..!! सोचता हूं.. फ़िर भी दिन भर में कितनी बार और क्यों भभकता है ये आदमी करता है कितनों की  मां बहनों से शाब्दिक दुराचरण..? नहीं सच है  वो ये सब न करता था पहले कभी ! सुलगता भी न था भभकता भी तो न था आज़कल क्या हुआ उसे तभी सेंटर-टेबिल पर रखा अखबार फ़ड़फ़ड़ाया दीवार पर टंगा टी.वी. मुस्कुराया अब समझा वो आदमी सुलगाया जाता है रोज़ इन्हीं के ज़रिये