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हम विकास की भाषा से अनजान हैं..

          विश्व में  शांति की बहाली को लेकर समझदार लोग बेहद बेचैन हैं  कि किस प्रकार विश्व में अमन बहाल हो ? चीनी राष्ट्रपति के भारत आगमन के वक़्त तो अचानक मानों चिंतन और चर्चा को पंख लग गए . जिधर देखिये उधर चीन की विस्तारवादी नीति के कारण प्रसूते सीमाई विवाद के चलते  व्यवसायिक अंतर्संबंधों को संदर्भित करते हुए  चर्चाओं में खूब ऊर्ज़ा खर्च की जा रही है .                हम भारतीयों की एक आदत है कि हम किसी मुद्दे को या तो सहज स्वीकारते हैं या एकदम सिरे से खारिज़ कर देते हैं. वास्तव में आज़कल जो भी वैचारिक रूप से परोसा जा रहा है उसे पूरा परिपक्व तो कहा नहीं जा सकता. आप जानते ही हैं कि जिस तरह अधपका भोजन शरीर के लिये फ़ायदेमंद नहीं होता ठीक उसी तरह संदर्भ और समझ विहीन वार्ताएं मानस के लिये . तो फ़िर इतना वैचारिक समर क्यों .. ? इस बिंदु की पड़ताल से पता चला कि बहस   कराने वाला एक ऐसे बाज़ार का हिस्सा है जो सूचनाओं के आधार पर अथवा सूचनाओं (समाचारों को लेकर ) एक प्रोग्राम प्रस्तुत कर रहा होता है. उसे इस बात से कोई लेना देना नहीं कि संवादों के परिणाम क्या हो सकते हैं.               बाज़ार का विर

गृहणी श्रीमति विधी जैन के कोशिश से आयकर विभाग में हरक़त

        भारतीय भाषाओं के सरकारी एवम लोक कल्याणकारी , व्यावसायिक संस्थानों द्वारा अपनाने में जो  समस्याएं आ रही थीं वो कम्प्यूटर अनुप्रयोग से संबंधित थीं.  यूनिकोड की मदद से अब कोई भी हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं को प्रयोग में लाने से इंकार करे तो जानिये कि संस्थान या तो तकनीकि के अनुप्रयोग को अपनाने से परहेज कर रहा है अथवा उसे भारतीय भाषाओं से सरोकार नहीं रखना है.             भारतीय भाषाओं की उपेक्षा अर्थात उनके व्यवसायिक अनुप्रयोग के अभाव में गूगल का व्यापक समर्थन न मिल पाना भी भाषाई सर्वव्यापीकरण के लिये बाधक हो रहा है. ये वही देश है जहां का युवा विश्व को सर्वाधिक तकनीकी मदद दे रहा है. किंतु स्वदेशी भाव नहीं हैं.. न ही नियंताओं में न ही समाज में और न ही देश के ( निर्णायकों में ? ) बदलाव से उम्मीद  है कि इस दिशा में भी सोचा जावे. वैसे ये एक नीतिगत मसला है पर अगर हिंदी एवम अन्य भारतीय भाषाई महत्व को प्राथमिकता न दी गई तो बेतरतीब विकास ही होगा. आपको आने वाले समय में केवल अंग्रेज़ियत के और कुछ नज़र नहीं आने वाला है. हम विदेशी भाषाओं के विरुद्ध क़दापि नहीं हैं किंतु भारतीय भाषाओं को ताबू

हिन्दी-दिवस

आप भी इसका इस्तेमाल करें हिन्दी,मराठी,गुजराती,बंगाली,कन्नड़,तमिल,उर्दू,उड़िया,पंजाबी, इन भाषाओं को लेकर कोई भी बच्चा कभी किसी अन्य बच्चे से नहीं लड़ा," बच्चों से सीखने के इस दौर में आप भी इन के बीच जाइए सदभाव के सत्य से परिचय पाइए ################ देश में लिंग परीक्षण,दहेज़ सामाजिक असमानता जैसे कई विषय हैं जिन पर आज से ही आन्दोलन चालू करने ज़रूरी हैं, किंतु भारतवासियों राज़ की बात है हमारे लोग स्थान,भाषा,धर्म,रंग,के लिए आंदोलित हैं .... ईश्वर इनको सुबुद्धि दे जो हमारे देश में कई देश बना रहें हैं .....हमारे तुम्हारे का बेसुरा राग गा रहे हैं ################ माँ, यकीन करो,मुझे अपनी किसी भी मौसी की भाषा से कोई गुरेज़ नहीं है माँ वो भी तो माँ...सी ही है....! है न......? माँ, यू पी का भैया,मराठी काका,पंजाबी पापाजी,सब आएं है तुम्हें देखने जब से तुम बीमार हो माँ इन से इनकी भाषा में ज़बाब दूँ कैसे ...? माँ बोली-बेटे,संवेदना,की कोई बोली भाषा नहीं होती उनको मेरे पास भेज दो मैं बात कर लूँ ज़रा उनसे ? फ़िर सारे लोग मेरी मरणासन्न माँ के पास आए किस भाषा में कुशल-क्षेम की कामना व्यक्त हुई मुझे