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: फ़िल्म आज फ़िर जीने की तमन्ना है में आभास जोशी

आभास जोशी का पहला एलबम साईं नाथ को समर्पित है "बावरे-फकीरा" जिसका संगीत रचा है उससे बड़े भाई श्रेयस ने जो आजकल "मोंटी शर्मा जी" की शागिर्दी में भविष्य के लिए मुकाम की तलाश में हैं साथी-स्वर श्रीमती संदीपा के हैं गीत मेरे हैं ये न कह कर ये मानता हूँ गीत साईनाथ के हैं.आज आभास के पास १८ साल की उम्र में एक फ़िल्म "आज फ़िर जीने की तमन्ना है ",दो एलबम.ढेरों कार्यक्रम हैं...इसे बाबा का आशीर्वाद ही कहेंगे

प्रोवोग

अंतस तक छू लिया इस फ़िल्म ने , महिला बाल विकास विभाग के भोपाल मुख्यालय में "घरेलू हिंसा के विरुद्ध"हम सभी अधिकारियों को जब ये फ़िल्म दिखाई गई तो लगा नारी के खिलाफ़ हिंसक सोच को रोकने यदि हमको अवसर मिल रहा है तो इसमें बुराई क्या है।

मंटो ने फ्रायड को पछाडा है

मुझे मंटो में कोई गंदगी नहीं नज़र आई,लायसेंस पढकर तो आँखे भर आयीं थीं। औरत की जिन्दगी की तस्वीरें जो मंटो ने खींची थीं , उन से समाज में नारी की दशा की सच्ची व्याख्या कर ही डाली। इधर अपने मनोहर श्याम जी तक ने अपनी हद पार कर दीं ,खुशवंत जी की बात करना फिजूल है, मंटो को मेरा सलाम । मुझे जबलापुरिया होने पे गर्व इस लिए है क्योंकि मेरे इस शहर ने सौ केंडल पावर का बल्बःनींद,जबलपुर में बनी मन्टो पर फिल्म बनाई,सआदत हसन मंटो की नज़र नारी के लिए पाजिटिव ही है,