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भारतीय सामाजिक व्यवस्था में सार्वकालिक समरसता के तत्व..!

      छायाकार : मुकुल यादव "भारतीय सामाजिक व्यवस्था में सार्वकालिक समरसता के तत्व..!"     सुप्रभात श्री राम कृष्ण हरि भारतीय सामाजिक व्यवस्था को इस बात से घबराने की जरूरत नहीं है कि भविष्य में कोई भी संस्कृति उस पर हावी हो जावेगी। इस कथन पढ़ने जा सुनने के बाद आप चकित हो जाएंगे आपको विश्वास नहीं होगा आप कहेंगे इससे बड़ा मिथ्या कथन और कुछ नहीं की हमने अपनी जीवनशैली को बदल दिया है इसके बावजूद यह दावा किया जा रहा है कि -" कोई अन्य संस्कृति हमारे जीवन पर प्रभाव कारी नहीं होगी ..?"    अगर आप यह समझते हैं कि कपड़े पहनने बोलचाल अथवा जीवन शैली में परिवर्तन किसी अन्य संस्कृति का प्रभाव है तो आप गलत समझते हैं क्योंकि यह सांस्कृतिक बदलाव का आधार नहीं है ना ही यह मानक हैं और न ही संस्कृति के प्रतीक है ।    अब अंदाज कीजिए कि अगर शिकागो में वहां के जाने से बचने के लिए विवेकानंद कोट नहीं पहनते और वही ठंडे सूती वस्त्र पहनते तो क्या विवेकानंद सनातन संस्कृति के विभिन्न बिंदुओं को सबके सामने रख सकने में समर्थ थे ?   कदापि नहीं ,  वे बीमार हो जाया करते थे जाड़े के प्रभ