सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

पोस्ट

ग़ज़ल लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कुछ बेवकूफ़ रोज़ मिला करतें हैं मुझे कल है रविवार हम भी बा-सुकू़ं हुए

जब भी तन्हां हुए तुझसे रूबरू हुए बरसों हुए - बज़्म  हुए ,गुफ़्तगूं  हुए !! आए हैं जबसे सामने  धुआंधार  हम तेरे- थमते गए तूफ़ां वो बेआबरू हुए !! कुछ बेवकूफ़ रोज़ मिला करतें हैं मुझे कल है रविवार हम भी बा-सुकू़ं हुए. बेवज़ह चापलूसी का ईनाम मिला यार- कुछ इस तरह एक से चार हम हुए. बच्चों को पालना है वर्ना खोलता छतैं- कोई बताए आके हम ऐसे क्यूं हुए .

क़रीब दिल के क़िताब रखना !

टेक्स्ट                   क़रीब दिल के क़िताब रखना !                   छिपा के उसमें गुलाब रखना !                    नज़र में पहली ये प्यार कैसा -                    नज़र-नज़र का हिसाब रखना !                    लबों से बिखरे हंसी अचानक -                    तो लब पे हाज़िर ज़वाब रखना !                    हां कह दो जाके सितमग़रों से                    है रब को आता हिसाब रखना !                    हां इक कमीं है मुकुल में यारो-                    नहीं सुहाता हिसाब रखना !!                            * गिरीश बिल्लोरे "मुकुल”