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अरब इजरायली , विरोधाभाषी जीवन : डैनियल पाइप्स

क्या इजरायल की कुल जनसंख्या के 1\5 अरब यहूदी राज्य के प्रति स्वामिभक्त हो सकते हैं? मस्तिष्क में इसी प्रश्न के साथ हाल में मैंने इजरायल के अरब निवासियों वाले क्षेत्र( जफा, बका अल गराबिया, उम्म अल फहम , हायफा , एकर, नजारेथ, गोलन पहाडियाँ , जेरूसलम) का दौरा किया और साथ ही मुख्यधारा के अरब और यहूदी इजरायलियों के साथ वार्ता की। मुझे बहुत से अरब भाषी नागरिक मिले जो कि यहूदी राजनीति में जीवन व्यतीत करने को लेकर स्वयं में संघर्ष की स्थिति में हैं। एक ओर तो वे देश के विशेषाधिकार सम्पन्न धर्म के रूप में यहूदी धर्म का विरोध करते हैं , उस कानून का जो कि केवल यहूदियों को अपनी इच्छा के अनुसार आप्रवास का अधिकार वापस लौटने के कानून के अंतर्गत देता है, राज्य की मुख्य भाषा हिब्रू हो इसका विरोध करते हैं, ध्वज में डेविड के तारे को पसंद नहीं करते , राष्ट्रगान में " यहूदी आत्मा" उन्हें पसंद नहीं है। दूसरी ओर वे देश की आर्थिक सफलता की प्रशंसा करते हैं , स्वास्थ्य सुविधा के स्तर , कानून के शासन और चलायमान लोकतंत्रकी भी सराहना करते हैं। इस संघर्ष की अनेक अभिव्यक्तियाँ भी हैं। छोटी, अशिक

50 वर्ष पूर्व अरबवासियों के प्रति दृष्टि :डैनियल पाइप्स

डैनियल पाइप्स 1962 में अत्यंत आकर्षक, चिकने आवरण पर 160 पृष्ठों की  The Arab World  शीर्षक की पुस्तक में तात्कालिक रूप में कहा गया, "कभी अत्यन्त समृद्ध और फिर पराभव को प्राप्त विस्तृत अरब सभ्यता आज परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। कुछ फलदायक अव्यवस्था प्राचीन जीवन की निश्चित परिपाटी को बदल रही है" । इस संस्करण ने इस बात का दावा किया कि इसकी तीन विशेषतायें आधी शताब्दी के बाद भी इसे समीक्षा के लिये बाध्य करती हैं। पहला, उस समय की उच्चस्तरीय अमेरिकी साप्ताहिक पत्रिका लाइफ ने इसे प्रकाशित किया जिसमें कि सांस्कृतिक केंद्रीयता निहित थी । दूसरा, एक सेवा निवृत्त विदेश मंत्रालय के अधिकारी जार्ज वी एलेन ने इसकी प्रस्तावना लिखी थी जिससे कि पुस्तक के मह्त्व की ओर संकेत जाता था। तीसरा, एक ख्यातिलब्ध ब्रिटिश पत्रकार, इतिहासकार और उपन्यासकर्ता डेसमन्ड स्टीवर्ट ( 1924 – 1981) ने इस पुस्तक को लिखा । द अरब वर्ल्ड अत्यंत प्रभावी रूप से दूसरे काल के समय को प्रस्तुत करता है; वैसे तो पूरी तरह अपने विषय को बहुत मधुर बनाकर नहीं रखा है लेकिन स्टीवर्ट ने सहज और शालीन भाव से अपनी

तेहरान के मुकाबले ईरानी लोगों को सशक्त करो : डैनियल पाइप्स

 डैनियल पाइप्स नेशनल रिव्यू आनलाइन 19 जुलाई, 2011 http://hi.danielpipes.org/ article/10311 पश्चिमी सरकारों को इस्लामिक रिपब्लिक आफ ईरान के साथ किस ढंग से कार्यव्यवहार करना चाहिये जिसे कि वाशिंगटन ने " आतंकवाद का सबसे सक्रिय राज्य प्रायोजक बताया है'? ईरान की आक्रामकता 1979 में तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर कब्जे से आरम्भ हुई और इसके कुछ कर्मचारियों को कुल 444 दिनों तक बंधक बना कर रखा। इसके बाद हुए कुछ बडे आक्रमणों में 1983 में बेरूत में अमेरिकी दूतावास पर आक्रमण जिसमें 63 लोग मौत के घाट उतारे गये और अमेरिका की नौसेना बैरक पर आक्रमण जिसमें 241 लोग मारे गये। अभी हाल में अमेरिका के रक्षा सचिव लिवोन पनेटा ने कहा, " हमें दिखाई दे रहा है कि इन हथियारों में से अधिकतर इराक के रास्ते ईरान को जा रहे हैं और यह निश्चित रूप से हमें क्षति पहुँचा रहा है" । संयुक्त चीफ आफ स्टाफ के अध्यक्ष माइक मुलेन ने इसमें और जोडा कि, " ईरान प्रत्यक्ष रूप से कट्टरपंथी शिया गुटों की सहायता कर रहा है जो कि हमारे सैनिकों को मार रहे हैं" । अमेरिका की प्रतिक्रिया मूल रूप से दो

आतंक वाद कबीलियाई सोच का परिणाम है

इस पोस्ट के लिखने के पूर्व मैंने यह समझने की कोशिश की है कि वास्तव में किसी धर्म में उसे लागू कराने के लिए कोई कठोर तरीके अपनाने की व्यवस्था तो नहीं है........?किंतु यह सत्य नहीं है अत: यह कह देना कि "अमुक-धर्म का आतंकवाद" ग़लत हो सकता है ! अत: आतंकवाद को परिभाषित कर उसका वर्गीकरण करने के पेश्तर हम उन वाक्यों और शब्दों को परख लें जो आतंकवाद के लिए प्रयोग में लाया जाना है. इस्लामिक आंतकवाद , को समझने के लिए हाल में पाकिस्तान के इस्लामाबाद विस्फोट , पर गौर फ़रमाएँ तो स्पष्ट हो जाता है की आतंक वाद न तो इस्लामिक है और न ही इसे इस्लाम से जोड़ना उचित होगा । वास्तव में संकीर्ण कबीलियाई मानसिकता का परिणाम है। भारत का सिर ऊँचा करूँगा-कहने वाले आमिर खान,आल्लामा इकबाल,रफी अहमद किदवई,और न जाने कितनों को हम भुलाएं न बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हो रहे घटना क्रम को बारीकी से देखें तो स्पष्ट हो जाता है की कबीलियाई समाज व्यवस्था की पदचाप सुनाई दे रही थी जिसका पुरागमन अब हो चुका है, विश्व की के मानचित्र पर आतंक की बुनियाद रखने के लिए किसी धर्म को ग़लत ठहरा देना सरासर ग़लत है । हाँ य