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कान देखने लगे हैं अब :व्यंग्य गिरीश मुकुल

   कानों से देखने की एक अधुनातन तकनीक का विकास एवम उपयोग इन्सानी सभ्यता के बस में ही है यक़ीन कीजिये  इसका उपयोग  इन दिन दिनों बेहद बढ़ गया है.अब कान भी बढ़चढ़ के देखने के अभ्यस्त हो चले हैं. अब गुल्लू को ही लो जित्ते निर्णय लेता है कानन देखी के सहारे लेता है गुल्लू करे भी तो क्या अब आधी से ज़्यादा आबादी के पास  नज़रिया  ही कहां जिससे साफ़ साफ़ देखा जाए.तो भाई लोगों में जैनेटिक बदलाव आने तय थे . एक ज़िराफ़ की गर्दन की लम्बाई भी तो जैनेटिक बदलाव का नतीज़ा है.कहतें है कि लम्बी झाड़ियों से हरी हरी पत्तियां चट करने के लिये बड़ी मशक्क़त करनी होती थी जिराफ़ों को तो बस उनमें बायोलाजिकल बदलाव आने शुरु हो गये . पहले मैं भी इस बात को कोरी गप्प मानता था लेकिन जब से आज के लोगों पर ध्यान दिया तो लगता है है कि सही थ्योरी है जिराफ़ वाली.       मेरे एक मित्र  अखबार निकालते हैं. मुझे मालूम है कि वे बस हज़ार अखबार छापते हैं हमने पूछा : भई, कैसा चल रहा है अखबार  बहुत उम्दा दस हज़ार तक जाता है..? यानि, अब एक नहीं दस हज़ार कापी छाप रए हो दादा वाह बधाई.. ! न भाई छाप तो ऎकै हज़ार रहे हैं पहुंच