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यमुनाघाट चित्रकला : अभिव्यक्ति पर

अभिव्यक्ति : सुरुचि की - भारतीय साहित्य, संस्कृति, कला और दर्शन पर आधारित। बंदऊं गुरु पद कंज पूर्णिमा वर्मन जी  अंतरजाल पर    पूर्णिमा वर्मन अपने  साहित्यिक  दायित्व का निर्वहन करते जो भी कुछ दे रहीं हैं उससे उनकी कर्मशील प्रतिबद्धता  उज़ागर होती है. अगर मैं नेट पर हूं तो पूर्णिमा वर्मन, बहन श्रृद्धा जैन और भाई समीरलाल की वज़ह से इनका कर्ज़ उतार पाना मेरे लिये इस जन्म में असम्भव है... हिंदी विकी पर उनका परिचय कुछ इस तरह है " पूर्णिमा वर्मन   (जन्म २७ जून, १९५५,   पीलीभीत   ,   उत्तर प्रदेश ) [1] , जाल-पत्रिका   अभिव्यक्ति   और   अनुभूति   की संपादक है।   पत्रकार   के रूप में अपना कार्यजीवन प्रारंभ करने वाली पूर्णिमा का नाम   वेब   पर   हिंदी   की स्थापना करने वालों में अग्रगण्य है। उन्होंने प्रवासी तथा विदेशी हिंदी लेखकों को प्रकाशित करने तथा अभिव्यक्ति में उन्हें एक साझा मंच प्रदान करने का महत्वपूर्ण काम किया है।   माइक्रोसॉफ़्ट   का यूनिकोडित हिंदी   फॉण्ट   आने से बहुत पहले   हर्ष कुमार   द्वारा निर्मित   सुशा फॉण्ट   द्वारा उनकी जाल पत्रिकाएँ अभिव्यक्ति तथा अनुभूत

आभास पे फ़िदा हुए अन्नू कपूर

आभास पे फ़िदा हुए अन्नू कपूर आभास पे फ़िदा हुए अन्नू कपूर आभास की प्रतिभा की दीवानगी का हर तरफ़ असर दिखाई देता है. एन डी टी वी इमेजिन के बेहतरीन म्यूजिकल शो जुनून के आने वाले शो में सबसे मार्मिक और भावुक कर देने वाला दृश्य होगा आभास और अन्नू कपूर के बीच सम्मान और सराहना का आदान प्रदान बेहद भावुक किंतु संगीत के लिए प्रतिबद्ध एंकर अन्नू ने आभास की परफोर्मेंस के बाद बेहद अनोखे तरीके से की तारीफ़ जिससे प्रभावित हो आभास ने इस हस्ती के पाँव छू लिए . इस बात से बेखबर सभी आभास की प्रस्तुति और विनम्रता पे मोहित थे की अन्नू कपूर ने आभास के पाँव छुऐ..........!इस बात का आभास न तो आभास को था और न ही आडिएंस को , जजेज भी हतप्रभ हुए और अन्नू जी की ऊंचाई को ताकते रह गए सभी . की अन्नू जी ने कहा:-"बेटे,इस ग़लत फहमी में मत रहना की मैंने तुम्हें प्रणाम किया मैंने तो तुममे बसी माँ सरस्वती को प्रणाम किया है"अन्नू कपूर की ऊंचाई को नापना सबके बस में नही तभी तो यह घटना और अन्नू कपूर का कथन सबके लिए प्रेरक प्रसंग सी बन गया है .

गुरु का सायकल-लायसेंस ....!!

मेरा भतीजा गुरु जिसे स्कूल में चिन्मय के नाम से सब जानतें है जब चार बरस का था ...सायकल खरीदने के लिए रोज़ फरमाइश करता था । हम नहीं चाहते थे कि चार साल की छोटी उम्र में दो-पहिया सायकल खरीदी जाए..मना भी करना गुरु को दुखी करना ही था ।सो हमने उसे बहलाने के लिए उसे बताया कि "सरकार ने सायकल के लिए लायसेंस का प्रावधान किया है...!" जिसे बनाने में तीन चार महीने लगते हें। बच्चे भी कितने भोले होते हें हमने भोलेपन का फायदा उठाना चाहा और लायसेंस बनाने का वादा कर दिया सोचा था गुरु भूल जाएगा इस बात को किन्तु रोज़ रोज़ की मांग को देखते हुए मैंने अपने मित्र अब्दुल समी के साथ मिल कर एक लायसेंस बनाया । जो एक आई डी कार्ड था जिस पर गुरु का फोटो चस्पा था उस पर सिक्के से एक गोल सील लगाईं गई था.. और लिखा था- “आँगन में इस लायसेंस के धारक बच्चे को आँगन में सायकल चलाने की अनुमति दी जाती है.   उस दिन लायसेंस पाकर खूब खुश हुआ था गुरु । हाथ मे लायसेंस और सायकल के सपने । आज गुरु 10 साल का है बड़ी सायकल चलाता है उसके पास लायसेंस सुरक्षित है। खूब हंसता है जब लायसेंस देखता है ।