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न ही तुम हो स्वर्ण-मुद्रिका- जिसे तपा के जांचा जाए

जितनी बार बिलख बिलख के  रोते रहने को मन कहता उतनी बार मीत तुम्हारा भोला मुख मेरे ही सन्मुख है रहता....! ************************* सच तो है अखबार नहीं तुम, जिसको को कुछ पल बांचा जाये. न ही तुम हो स्वर्ण-मुद्रिका- जिसे तपा के जांचा जाए. मनपथ की तुम दीप शिखा हो यही बात हर गीत है कहता जितनी बार बिलख बिलख के ........... ************************* सुनो प्रिया मन के सागर का जब जब मंथन मैं करता हूं तब तब हैं नवरत्न उभरते अरु मैं अवलोकन करता हूँ हरेक रतन तुम्हारे जैसा..! तुम ही हो , मन  है कहता. जितनी बार बिलख बिलख के ............... मनके मनके साझा करतीं पीर अगर तो मुस्कातीं तुम । पर्व दिवस के आने से पहले कोना कोना चमकाती तुम ! दुविधा अरु संकट के पल में मातृ रूप , तुम में मन लखता ।। जितनी बार बिलख बिलख के ............ *गिरीश बिल्लोरे मुकुल* छाया :- मुकुल यादव