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तुम बिन माँ भावों ने सूनेपन के अर्थ बताए !!

  मां सव्यसाची प्रमिला देवी की पुण्यतिथि  28.12.2013  पर पुनर्पाठ  सव्यसाची स्व. मां         यूं तो तीसरी हिंदी दर्ज़े तक पढ़ी थीं मेरी मां जिनको हम सब सव्यसाची कहते हैं क्यों कहा हमने उनको सव्यसाची क्या वे अर्जुन थीं.. कृष्ण ने उसे ही तो सव्यसाची कहा था..? न वे अर्जुन न थीं.  तो क्या वे धनुर्धारी थीं जो कि दाएं हाथ से भी धनुष चला सकतीं थीं..?  न मां ये तो न थीं हमारी मां थीं सबसे अच्छी थीं मां हमारी..!  जी जैसी सबकी मां सबसे अच्छी होतीं हैं कभी दूर देश से अपनी मां को याद किया तो गांव में बसी मां आपको सबसे अच्छी लगती है न हां ठीक उतनी ही सबसे अच्छी मां थीं .. हां सवाल जहां के तहां है हमने उनको सव्यसाची   क्यों कहा..! तो याद कीजिये कृष्ण ने उस पवित्र अर्जुन को "सव्यसाची" तब कहा था जब उसने कहा -"प्रभू, इनमें मेरा शत्रु कोई नहीं कोई चाचा है.. कोई मामा है, कोई बाल सखा है सब किसी न किसी नाते से मेरे नातेदार हैं.." यानी अर्जुन में तब अदभुत अपनत्व भाव हिलोरें ले रहा था..तब कृष्ण ने अर्जुन को सव्यसाची सम्बोधित कर गीता का उपदेश दिया.अर्जुन से मां  की

विश्व की हर मां को मेरा विनत प्रणाम

सव्यसाची स्व. मां         यूं तो तीसरी हिंदी दर्ज़े तक पढ़ी थीं मेरी मां जिनको हम सब सव्यसाची कहते हैं क्यों कहा हमने उनको सव्यसाची क्या वे अर्जुन थीं.. कृष्ण ने उसे ही तो सव्यसाची कहा था..? न वे अर्जुन न थीं.  तो क्या वे धनुर्धारी थीं जो कि दाएं हाथ से भी धनुष चला सकतीं थीं..?  न मां ये तो न थीं हमारी मां थीं सबसे अच्छी थीं मां हमारी..!  जी जैसी सबकी मां सबसे अच्छी होतीं हैं कभी दूर देश से अपनी मां को याद किया तो गांव में बसी मां आपको सबसे अच्छी लगती है न हां ठीक उतनी ही सबसे अच्छी मां थीं .. हां सवाल जहां के तहां है हमने उनको सव्यसाची   क्यों कहा..! तो याद कीजिये कृष्ण ने उस पवित्र अर्जुन को "सव्यसाची" तब कहा था जब उसने कहा -"प्रभू, इनमें मेरा शत्रु कोई नहीं कोई चाचा है.. कोई मामा है, कोई बाल सखा है सब किसी न किसी नाते से मेरे नातेदार हैं.." यानी अर्जुन में तब अदभुत अपनत्व भाव हिलोरें ले रहा था..तब कृष्ण ने अर्जुन को सव्यसाची सम्बोधित कर गीता का उपदेश दिया.अर्जुन से मां  की तुलना नहीं करना चाहता मैं क्या   कोई भी "मां" के आगे भगवान

छिपाती थी बुखारों को जो मेहमां कोई आ जाए : मातृ दिवस पर एक गीत

मां सव्यसाची स्वर्गीया प्रमिला देवी ही क्यों कर सुलगती है वही क्यों कर झुलसती है ? रात - दिन काम कर खटती , फ़िर भी नित हुलसती है . न खुल के रो सके न हंस सके पल -- पल पे बंदिश है   हमारे देश की नारी , लिहाफ़ों में सुबगती है !                                                                                       वही तुम हो कि जिसने नाम उसको आग दे डाला वही हम हैं कि जिनने उसको हर इक काम दे डाला सदा शीतल ही रहती है भीतर से सुलगती वो ..! कभी पूछो ज़रा खुद से वही क्यों कर झुलसती है .? मुझे है याद मेरी मां ने मरते दम सम्हाला है . ये घर , ये द्वार , ये बैठक और ये जो देवाला है ! छिपाती थी बुखारों को जो मेहमां कोई आ जाए कभी इक बार सोचा था कि " मां " ही क्यों झुलसती है ? तपी वो और कुंदन की चमक हम सबको पहना दी पास उसके न थे - गहने मेरी मां , खुद ही गहना थी ! तापसी थी मेरी मां , नेह की सरिता थी वो अविरल उसी की याद मे