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ठाकुर सा’ब का कुत्ता........ जो आदमी की मौत मरा

फ़ोटो साभार " इधर से "                 साले कुत्ते की मौत मरेगा.. ! , उसे तो कुत्ते की मौत मरना चाहिये... अक्सर ये कोसन-मंत्र का उच्चारण रोजिन्ना सुनाई देता है. पर अगरचे कोसने वाले लोग हमारे ठाकुर सा ’ ब से मिले होते तो   साले कुत्ते की मौत मरेगा.. ! , उसे तो कुत्ते की मौत मरना चाहिये..किंतु   ठाकुर सा ’ ब के कुत्ते की मौत नहीं.कारण साफ़ है कि ठाकुर सा ’ ब का कुत्ता कुत्ता न होकर उनका पारिवारिक सदस्य बन चुका था.  वज़ह ठाकुर साब न थे वरन ठकुराइन जी की पारखी आंखें थीं . ये अलहदा बात है कि ठाकुर सा ’ ब को चुनने में उनकी आंखें धोका खा गईं थीं पर इसका दोष     ठकुराइन जी का न था ... ठाकुर सा ’ ब का चुनाव पारिवारिक इंतखाब था वोटें इन्ही सु.प्र. ठाकुर को मिलीं. चलिये ठाकुर साब को छोड़िये कुत्ते पर आते हैं..          " यूं तो वो देसी कुतिया एवम सरकारी अफ़सर के विदेशी कुत्ते के मिलन का परिणाम यानी अर्ध्ददेशी नस्ल का  किंतु  उसे जैकी नाम देकर उसका अंग्रेज़ीकरण किया जाना श्रीमति ठाकुर का ही काम रहा होगा वरना एक मेव स्वामी होने का एहसास उनको कैसे होता. ठाकुर सा ’ ब को वे

भूमंडलीकरण के भयावह दौर और गदहे-गदही के संकट

भूमंडलीकरण के भयावह दौर में गधों की स्थिति बेहद नाज़ुक एवम चिंतनीय हो चुकी है . इस बात को लेकर समाज शास्त्री बेहद चिंतित हैं. उनको चिंतित होना भी चाहिये समाजशास्त्री चिंतित न होंगे तो संसद को चिंतित होना चाहिये. लोग भी अज़ीब हैं हर बात की ज़वाबदेही का ठीकरा सरकार के मत्थे फ़ोड़ने पे आमादा होने लगते हैं. मित्रो  -" ये... अच्छी बात नहीं..है..!" सरकार का काम है देखना देखना और देखते रहना.. और फ़िर कभी खुद कभी प्रवक्ता के ज़रिये जनता के समक्ष यह निवेदित करना-"हमें देखना था , हमने देखा, हमें देखना है तो हम देख रहे हैं ".. यानी सारे काम देखने दिखाने में निपटाने का हुनर सरकार नामक संस्था में होता है. जी आप गलत समझे मैं सरकार अंकल की बात नहीं कर रहा हूं.. मै सरकार यानी गवर्नमेंट की बात कर रहा हूं. हो सकता है सरकार अंकल ऐसा कथन कहते हों पर यहां उनको बेवज़ह न घसीटा जाये. भई अब कोई बीच में बोले मेरी अभिव्यक्ति में बाधा न डाले.. रेडी एक दो तीन ......... हां, तो अब पढिये अर्र तुम फ़िर..! बैठो.... चुपचाप..  तुमाए काम की बात लिख रहा हूं..तुम हो कि जबरन .. चलो बैठो..     

यहां चंदा मांगना मना है !

साभार नवभारत टाइम्स                        पिछले कई बरस से एक आदत लोगों में बदस्तूर देखी जा रही है. लोग हर कहीं चंदाखोरी ( बिलकुल हरामखोरी की तरह ) के लिये निकल पड़ते हैं. शाम तक जेब में उनके कुछ न कुछ ज़रूर होता है. भारत के छोटे-छोटे गांवों तक में इसे आसानी से देखा जा सकता है.                 कुछ दिन पहले एक फ़ोन मिला हम पारिवारिक कारण से अपने कस्बा नुमा शहर से बाहर थे ट्रेन में होने की वज़ह से सिर्फ़ हमारे बीच मात्र हलो हैल्लो का आदान-प्रदान हो पा रहा था. श्रीमान जी बार बार इस गरज़ से फ़ोन दागे जा रहे थे कि शायद बात हो जावे .. क़रीबन बीसेक मिस्ड काल थे. डोढी के जलपान-गृह में रुके तो  फ़ुल सिगनल मिले तो हम ने उस व्यक्ति को कालबैक किया. हमें लग रहा था कि शायद बहुत ज़रूरी बात हो  सो सबसे पेश्तर हम उन्हीं को लगाए उधर से आवाज़ आई -भैया, आते हैं रुकिये.. भैया.!  भैया..!! जे लो कोई बोल रहा है ? कौन है रे..? पता नईं कौन है..  ला इधर दे.. नाम भी नईं बताते ससुरे.......! हल्लो......  जी गिरीश बोल रहा हूं.. नाम फ़ीड नहीं है क्या.. बताएं आपके बीस मिस्ड काल हैं..                   

अक़्ल हर चीज़ को, इक ज़ुर्म बना देती है !

बापू आसाराम   के बाद   समाज शास्त्री   आशीष नंदी भाई सा ’ ब   के विचारों के आते ही खलबली मचती देख भाई कल्लू पेलवान को न जाने क्या हुआ  बोलने लगा : सरकार भी गज़ब है कई बार बोला कि भई मूं पे टेक्स लगा दो सुनतई नहीं..   हमने पूछा :- कहां बोला तुमने कल्लू भाई कल्लू     :- पिछले हफ़्ते मिनिस्टर सा ’ ब का पी.ए. मिला था , मुन्नापान भंडार में ..उनई को बोला रहा. कसम से बड़े भाई हम सही बोलते हैं. हैं न ?             कल्लू को मालूम है कि काम किधर से कराना है कई लोग इत्ता भी नहीं जानते. कल्लू की बात सरकार तलक पहुंच गई होती तो पक्क़े में वक़्तव्यों के ज़रिये राजकोष में अकूत बढ़ोत्तरी होती.            इस विषय पर हमने कल्लू से बात होने के बाद  रिसर्च की तो पता चला पर्यावरण में वायु के साथ " वक्तव्य वायरस " का संक्रमण विस्तार ले रहा है.   आजकल बड़े बड़े लोग "वक्तव्य वायरस" की वज़ह से बकनू-बाय नामक बीमारी के शिक़ार हो रहे हैं.  इस बीमारी के  शिकार मीडिया के अत्यंत करीब रहने वाले सभा समारोह में भीड़ को देख कर आपा खोने वाले, खबरीले चैनल के कैमरों से घिरे व्यक्ति

फ़ुर्षोत्तम-जीव

किस   किस   को   सोचिए   किस   किस   को   रोइए आराम   बड़ी   चीज   है  , मुंह   ढँक   के   सोइए  ....!! " जीवन   के   सम्पूर्ण   सत्य   को   अर्थों   में   संजोए   इन   पंक्ति   के   निर्माता   को   मेरा   विनत   प्रणाम  ...!!'' साभार http://manojiofs.blogspot.in/2011/11/blog-post_26.html साभार नभाटा  आपको नहीं लगता कि जो लोग फुर्सत में रहने के आदि हैं वे परम पिता परमेश्वर का सानिध्य सहज ही पाए हुए होते हैं। ईश्वर से साक्षात्कार के लिए चाहिए तपस्या जैसी क्रिया उसके लिए ज़रूरी है वक़्त आज किसके पास है वक़्त पूरा समय प्रात: जागने से सोने तक जीवन भर हमारा दिमाग,शरीर,और दिल जाने किस गुन्ताड़े में बिजी होता है। परमपिता परमेश्वर से साक्षात्कार का समय किसके पास है...? लेकिन कुछ लोगों के पास समय विपुल मात्रा में उपलब्ध होता है समाधिष्ठ होने का । इस के लिए आपको एक पौराणिक कथा सुनाता हूँ ध्यान से सुनिए एकदा -नहीं वन्स अपान अ टाइम न ऐसे भी नहीं हाँ ऐसे "कुछ दिनों पहले की ही बात है नए युग के सूत जी वन में अपने सद शिष्यों को जीवन के सार से परिचित करा रहे थे नेट