गुरुवार, अप्रैल 8

नक्सली हिंसा : वामधारा की देन..!

   वामधारा सिंचित नक्सलबाड़ी वार से रक्तपात भारत को बचाने चरम प्रयासों की ज़रूरत : गिरीश मुकुल

     यह एक चरमपंथी विचार है । चरम सदा ही पतन का प्रारंभ होता है। अक्सर आप जब शिखर पर चढ़ने का प्रयास करते हैं तब आपका उद्देश्य होता है.... स्वयं को श्रेष्ठ साबित कर देना। इसका अर्थ यह है कि आप चाहते हैं-" आप उन सब से अलग नज़र आएं जो भीड़ का हिस्सा नहीं है ।
    वामधारा चरमपंथी धारा है। यह एक ऐसी विचारधारा है जिसका प्रारंभ ही कुंठा से होता है।
     कोई भी व्यक्ति जो कुंठित है अर्थात पीडा और क्रोध के सम्मिश्रण युक्त व्यवहार करता है या कुंठित है वह सामान्य रूप से हिंसा के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति बनता है। अर्थात पीड़ा और क्रोध हिंसा  सृजन का प्रमुख घटक है।
      अब आप यह कहेंगे कि-" कृष्ण ही नहीं महाभारत के लिए उत्प्रेरित क्यों किया क्या वे पीड़ा युक्त क्रोध यानी कुंठा से ग्रसित थे..!"
     नहीं कृष्ण कुंठा से ग्रसित नहीं थे। कृष्ण ने युद्ध टालने के बहुत से प्रयास किए उनका अंतिम कथन यह था की कुल 5 गांव पांडवों को दे दिए जाएं ।
      कुंठित तो दुर्योधन था जिसने इतना भी नहीं स्वीकारा । जिसका परिणाम आप सब जानते हैं ।
      नक्सलवाद  दुर्योधनी विचार प्रक्रिया का परिणाम है । वामधारा का अर्थ भी यही है।
        25 मई 1967 में चारू मजूमदार और कनू सान्याल  ने जिस गांव से इस आंदोलन की शुरुआत की थी वह गांव था नक्सलबाड़ी।    
           नक्सलबाड़ी ग्राम की स्थानीय समस्या को किसानों के अधिकार चैतन्य के कारण उनका शक्ति प्रदर्शन भी एक सीमा तक उचित मानने योग्य माना जा सकता है जहां तक आंदोलन जान लेवा न हो । किंतु उनकी इस विजय के उपरांत तत-समकालीन व्यवस्था को इस बिंदु को अपने चिंतन में शामिल करना था ताकि ऐसी हत्यारी परिस्थितियां निर्मित ना हो । यह सत्य है कि न्यायालयीन आदेश का भी कोई पक्षकार पालन ना करें यह सर्वथा अनुचित है असवैधानिक है पर इसका विकल्प हत्या नहीं हो सकता।
    खैर 1967 के बाद बहुतेरे कैलेंडर बदल गए हैं 2021 में 3-4 मार्च को ऐसी कौन सी जरूरत आ पड़ी थी कि- 700 नक्सलियों ने 24 निर्दोष पुलिस कर्मियों को मौत के घाट उतार दिया। सच पूछिए तो जरूरत बिल्कुल नहीं थी। न आदिवासी मजदूर किसान जमीदार या सूदखोर के चंगुल में थे नाही ऐसी कोई विषम परिस्थिति थी परंतु 1967 से 1970 तक आयातित विचारधाराओं के सहारे यह कांसेप्ट जरूर पुख्ता हो गया कि-" हम सरकार के समानांतर सरकार चला सकते हैं। छत्तीसगढ़ बंगाल बिहार उड़ीसा और झारखंड आंध्र प्रदेश का कुछ हिस्सा सन 1970-71 व्याप्त हो गया । कहते हैं कि 11 प्रदेशों के 90 से अधिक जिले  इस  समस्या से प्रभावित रहे हैं ।
समानांतर सरकार व्यवस्था और न्याय व्यवस्था
   सामान्यतः लोग यह नहीं जानते की समस्या के आधार में क्या है ?   
    साहित्यकारों ने तो लिखना पढ़ना ही छोड़ दिया। तथाकथित असभ्य संस्कृति का विकास और विस्तार का आधार वामधारा ही है।
    एक अध्ययन से पता चलता है कि आज 18 राज्यों के 218 जिलों जिनमें 460 थाने इस हिंसक संस्कृति के प्रभाव में हैं। इस विस्तार के लिए वाम धारा ने इन्हें पर्याप्त बौद्धिक खाद पानी दिया हुआ है जिसके प्रमाण आए दिन आप पढ़ते सुनते हैं परंतु अब इन सूचनाओं से आम आदमी को कोई लेना देना नहीं।
नक्सलवाद का विस्तार करने के लिए जिन चार महत्वपूर्ण बिंदुओं की जरूरत होती है उनमें :-
[  ]  अंतरराज्यीय सीमा पर स्थित क्षेत्र सबसे महत्वपूर्ण होते हैं
[  ] दुर्गम क्षेत्र भी नक्सलवाद को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभाते हैं
[  ] आदिवासी जनसंख्या इनका मुख्य चारागाह है।
[  ] सरकार से हमेशा नाराज रहने वाली तथाकथित आयातित विचारधारा के पैरोंकारों से इन्हें खासी मदद मिलती है।
           इस समस्या पर 1970 आते-आते तक तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी गंभीरता से ध्यान देना शुरू ही किया था कि बांग्लादेश की समस्या ने घेर लिया। पर यह भी जानकारी मिलती है कि इंदिरा जी इस समस्या को हल करना चाहती थीं ।
      1970 से 1980 वाली दशक में नक्सल समस्या प्रभावित इलाकों में घटनाएं कम अवश्य हुई थी पर अचानक क्या हुआ के 1990 से 2004 तक नक्सलवादी हिंसा में उतार चढ़ाव देखा गया । 2004 से 2012 तक अचानक नक्सली हिंसा में वृद्धि हुई थी किंतु कोविड-19 आते हिंसा के आंकड़ों में कमियां आने लगी। व्यवस्था के विरुद्ध आतंक फैलाना राष्ट्र के भीतर की समस्या नहीं मानी जा सकती। उनसे हम क्या माने..?
"लाल समस्या आंतरिक नहीं है..!"
     यह समस्या कश्मीर समस्या से कम तो नहीं है। नक्सली समस्या में वह सारे तत्व मौजूद हैं जो अमित्र एवम कुंठित राष्ट्रों द्वारा दूसरे राष्ट्र में फैलाए जाते हैं । माओवाद का विस्तार प्रजातांत्रिक व्यवस्था के विरुद्ध  है। खासतौर पर जब भी चुनाव होते हैं तब नक्सलवादी गतिविधियां अपेक्षाकृत तेजी से विस्तार पाती हैं।
     आयातित विचारक अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए बुज़ुरूआ और सर्वहारा का वर्गीकरण हमेशा जीवंत रखना चाहते हैं। अगर वर्गीकरण न भी हो तो वर्ग बनाना इनकी प्राथमिक नीति होती हैं ।
  छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश आंध्र प्रदेश महाराष्ट्र की बॉर्डर पर हिडमा नामक कमांडर (जो अपने साथ 800 गुमराह महिलाओं पुरुषों की जमात के साथ चलता है) सक्रिय नजर आता है . छत्तीसगढ़ के पुलिस चीफ का कहना है कि बीजापुर सुकमा की घटना में 700 नक्सलवादियों ने हमला किया था।
हमने पहले ही स्पष्ट किया है कि- "वामधारा अक्सर वर्ग संघर्ष पैदा करने में सक्रिय रहती है। आपने देखा होगा कि विश्वविद्यालय के कैंपस से लेकर थिएटर और आयातित विचारधारा पर केंद्रित साहित्य अगर वर्ग संघर्ष ना हो तो भी वर्गीकरण करके दो वर्गों में परस्पर वैमनस्यता और अस्थिरता पैदा करते हैं। बेशक अर्बन नक्सली गतिविधि कहा जाना गलत नहीं है।"
इसका उदाहरण सीएए विरोधी आंदोलन में स्पष्ट रूप से नजर आया है। कुछ तथाकथित प्रगतिशील विचारकों के आर्टिकलस #पहल  नामक एक मैगजीन में देखे गए।
  साथ ही आपको याद होगा कि चिकन नेक पर अपना हक जमाने के लिए किस तरह से इसी आंदोलन में उत्प्रेरित एवं उत्तेजित किया जा रहा था।
   गंभीरता से सोचें तो माओवाद का उद्देश्य पशुपति से तिरुपति तक खूनी संघर्ष लक्ष्य की प्राप्ति करना है।
     मार्क्स लेनिन  स्टालिन माओ यह वह ब्रांड नेम है जिनके विचारों को वर्गीकरण को आधार बनाकर विस्तार दिया जा रहा है। पर्यावरण कार्यकर्ता मानव अधिकार कार्यकर्ता के लबादों में यह विचारधारा बकायदा गोबर के कंडे में राख के अंदर छिपी हुई आग की तरह जिंदा रहती है।
       तो इसका समाधान क्या है...?
वर्तमान संदर्भ में इसका एकमात्र समाधान उसी भाषा में जवाब देना है जिस भाषा में इन्हें जवाब समझ में आता है फिर भी कुछ समाधान सुलझाने की कोशिश करना मेरा साहित्यकार होने का दायित्व है :-
[  ] गृहमंत्री की की बॉडी लैंग्वेज में अभी तो स्पष्ठ कठोरता नज़र आ रही है । पर यह कब होगा देखने वाली बात है ।
[  ]  कठोर सैन्य कार्रवाई-  क्योंकि यह हमारे देश के नागरिक हैं किंतु उनके मस्तिष्क में इनके विदेशी आकाओं और कमांड देने वाली ताकतों के प्रति अटूट सम्मान है नज़र आता है इनका सीधा रिश्ता भारतीय एकात्मता को प्रभावित करने वालों से है।
[  ] विश्व बिरादरी और मानव अधिकारों की पैरोंकारी करने वाले लोगों को मात्र सूचना देकर आर्मी के एयर सर्विलांस पर इन्हें रखा जाना चाहिए और आवश्यकता पड़ते ही पूरी दृढ़ता के साथ बल प्रयोग करना चाहिए ।
[  ] स्थानीय समुदाय पर इन का सर्वाधिक प्रभाव होता है तथा इनकी अदालतें चलती है उस पर व्यवस्था की पैनी निगाह होनी चाहिए ।
[  ] इंटर स्टेट बॉर्डर्स (सीमाओं) पर  अत्याधुनिक सर्विलांस सिस्टम स्थापित करना आवश्यक है।
[  ] अर्बन नक्सलियों पर चाहे कितना भी विरोध हो सरकारी तौर पर शीघ्र ही जानकारी एकत्र कर ली जानी चाहिए ।
[  ] जन सामान्य को इनके दुष्कृत्यों की जानकारी देने का दायित्व मीडिया साहित्यकार कवियों और लेखकों नाटककारों चित्रकारों का होना चाहिए क्योंकि समाज यानी जनता  को भी राष्ट्र धर्म का पालन करना जरूरी है।
         अभी तो देखना है कि सरकारी हिसाब से नक्सलियों की हिंसक प्रवृत्तियों को कब तक स्थानीय राष्ट्रीय समस्या की श्रेणी से हटाकर कब तक वैदेशिक हस्तक्षेप माना जावेगा ।
सलवा जुडूम एक प्रक्रिया थी शांति स्थापित करने की इसका खुलकर विरोध किया गया। इस आंदोलन की असफलता के लिए जो भी प्रयास किए गए वह सोची समझी रणनीति थी ऐसा प्रतीत होता है।
     बीबीसी वेब पोर्टल ने कहा है कि-"शनिवार को जो मुठभेड़ हुई, वह हिड़मा के गांव पुवर्ती के पास ही है. 90 के दशक में माओवादी संगठन से जुड़े माडवी हिड़मा ऊर्फ संतोष ऊर्फ इंदमूल ऊर्फ पोड़ियाम भीमा उर्फ मनीष के बारे में कहा जाता है कि 2010 में ताड़मेटला में 76 जवानों की हत्या के बाद उसे संगठन में महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दी गई. इसके बाद झीरम घाटी का मास्टर माइंड भी इसी हिड़मा को बताया गया. इस पर 35 लाख रुपये का इनाम है." 
     इसी बीबीसी एवम अन्य कई मीडिया  ने सलवा जुडूम को आदिवासी विरोधी कहा  था ।  मीडियाा की भूमिका येे थी ( 5 /6/15 की बीबीसी की रपट) )

एक दर्ज़न हथियारबंद सुरक्षाकर्मियों से घिरे रहने वाले चैतराम अट्टामी को आज भी लगता है कि सुप्रीम कोर्ट एक न एक दिन यह मान लेगी कि सलवा जुडूम सही आंदोलन था.

दंतेवाड़ा के कसौली कैंप में बैठे अट्टामी अपनी मुट्ठियां भींचे कहते हैं, “अगर सलवा जुडूम ग़लत था तो मान कर चलिये कि भारत की आज़ादी की लड़ाई भी ग़लत थी.”

अट्टामी दस साल पहले बस्तर में शुरु हुए सलवा जुडूम आंदोलन के ज़िंदा बचे हुए शीर्ष नेताओं में से एक हैं.

छत्तीसगढ़ में माओवादियों के खिलाफ सरकार के संरक्षण में शुरु हुए सलवा जुडूम यानी कथित शांति यात्रा के दस साल पूरे हो गए हैं.

माओवाद का पक्षधर बहुत बड़ा बौद्धिक व्यवसायियों समूह हो रहा है जो प्रदेश के महानगरों में सक्रिय है। यह समूह उन सवालों पर मौन है जिसमें मानवता के संदर्भ में सवाल पूछे जाते हैं। सच तो यह है कि कुछ लोग अपनी किताबें भी बंद कर रहे हैं।


मंगलवार, अप्रैल 6

ध्वज तिरंगा लौहित किले पे अनमना है ।

            यह कविता राष्ट्र द्रोहियों की दुरभि संधि को उजागर कर रही है 26 जनवरी से लेकर 3-4 अप्रैल 2021 तक की घटनाओं की निकटता को प्रस्तुत कर रही है। देखना है शाहीन बाग पर अश्रुपात करने वाली कलमों की #पहल क्या होगी ..?
व्योम पे देखो ज़रा क्या तम घना है ?
रुको देखूँ शायद ये मन की वेदना है ।।
रक्त वीरों का सड़क को रंग रहा है -
ध्वज तिरंगा लौहित किले पे अनमना है ।
आज ग़र कौटिल्य मिल जाये कदाचित
कहूँगा जन्म लो चाणक्य मेरी याचना है ।
बंदूक से सत्ता के पथ खोजे जा रहें हैं-
जनतंत्र मेरे वतन का अब अनमना है ।।
आयातित बकरियों, का चरोखर देश ये
कर्मयोगी बोलिये, अब क्या बोलना है ?
आज़ाद मुक्ति मांगते बेशर्म होकर -
मुक्ति की ये मांग कैसी, और कैसी चेतना है ?
आज़ फिर सुकमा की ज़मीं को रंगा उनने
दुष्टों का संहार कर दो भला अब क्या सोचना है ।।
       

सोमवार, मार्च 29

फागुन के गुन प्रेमी जाने

*होली पर हार्दिक शुभकामनाएं*
फागुन के गुन प्रेमी जाने, 
बेसुध तन अरु मन बौराना ।
या जोगी पहचाने फागुन, 
हर गोपी संग दिखते कान्हा ।। 

रात गये नजदीक जुनहैया, 
दूर प्रिया इत मन अकुलाना ।
सोचे जोगीरा शशिधर आए, 
भक्ति - भांग पिये मस्ताना ।। 

प्रेम रसीला, भक्ति अमिय सी, 
लख टेसू न फूला समाना ।
डाल झुकीं तरुणी के तन सी, 
आम का बाग गया बौराना ।। 

जीवन के दो पंथ निराले, 
कृष्ण भक्ति अरु प्रिय को पाना ।
दोनों ही मस्ती के पथ हैं, 
नित होवे है आना जाना...!! 

चैत बैसाख की गर्म दोपहरिया – 
सोच के मन लागा घबराना ।
छोर मिले न ओर मिले, 
चिंतितमन किस पथ पे जाना ? 

मन से व्याकुल तन से आकुल
राधारमण का कौन ठिकाना ।
बेसुध बैठ गई सखि मैं तो-
देख मेरा सखि तापस बाना ।।

गोकुल छोड़ गए जब से तुम
छूटा हमारा भी पानी-दाना ।
प्राण की राधा झुलसी झुलसी
तुरतई अब किसन को होगा आना ।।

💐💐💐💐💐💐
*गिरीश बिल्लोरे मुकुल*

बुधवार, मार्च 24

पॉक्सो एक्ट की जानकारी सर्वव्यापी हो''- रिजु बाफना आई ए एस


 बच्चों के लिए पॉक्सो अधिनियम के अंतर्गत महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा चलाए जा रहे प्रचारात्मक अभियानों को अंतर्विभागीय समन्वय से प्रभावशाली बनाया जा सकता है। आज ऐसे ही प्रयासों की नितांत आवश्यकता है। तदाशय के विचार जिला पंचायत की मुख्य कार्यपालन अधिकारी रिजु बाफना ने व्यक्त किये।

होटल कल्चुरी में आयोजित शिक्षा विभाग के प्राचार्योंबाल विकास परियोजना अधिकारियों एवं स्वयं सेवी संस्थाओं के प्रतिनिधियों के लिये महिला बाल विकास द्वारा आयोजित पॉक्सो एक्ट पर केन्द्रित कार्यशाला में व्यक्त किए।

जिला विधिक प्राधिकरण के सदस्य सचिव ए.डी.जे. शरद भामकर ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि 'जन्म-प्रमाण-पत्र एवं आयु प्रमाण पत्र के संबंध में प्रत्येक अॅथारिटी को सजगता बरतनी चाहिए तथा इस एक्ट में अंतर्निहित प्रावधानों जैसे वैधानिक कार्यवाही प्रक्रिया और प्रभावित को सहायता प्राप्त करने हेतु सरकारी अमले को विशेष रूप से आम जनता को जानकारी देना अत्यावश्यक है।

शिक्षा विभाग की ओर से जिला शिक्षा अधिकारी घनश्याम सोनी ने इस बात पर सहमति दी कि निकट भविष्य में महिला बाल विकास विभाग एवं शिक्षा विभाग मिलकर बच्चों के बीच इस अधिनियम की जानकारी उपलब्ध कराने के लिए प्रत्येक स्कूल में मासिक सत्रों का प्रावधान करेंगे। कार्यक्रम की आवश्यकता एवं उपयोगिता पर श्री संजय अब्राहम सहा. संचालक द्वारा भी विचार व्यक्त किया गया।

इस अवसर पर बचपन बचाओ अभियान के प्रतिनिधियोंप्रांतीय समन्वयक सलमान मंसूरी  तथा बबन प्रकाश ने तकनीकी सत्र में पॉक्सो एक्ट की महत्ताप्रावधान एवं प्रक्रियाओं की जानकारी दी। साथ ही चाइल्ड लाइन ने लैंगिक अपराध से प्रभावित बच्चों के लिए विस्तार से जानकारी दी। जिला कार्यक्रम अधिकारी ने आमंत्रित अतिथियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित किया तथा कार्यक्रम का संचालन गिरीश बिल्लौरे ने किया।


चंद्रशेखर जी का वक्तव्य

लोहिया जी चंद्रशेखर जी उन भारतीयों के आदर्श हैं जो मानवता के सबसे बड़े सरोकारी कहे जाते हैं। भारत की संसदीय व्यवस्था में इस व्यक्तित्व ने लगभग मोहित कर लिया था । उन दिनों हम डी एन जैन कालेज में स्नातक डिग्री लेने के छात्र थे नेतागिरी का वायरस भी घुस चुका था । घर के लोग नाखुश रहते थे । ज़ायज़ बात है पर युवावस्था में हम सियासत समाज विचारधारा आदि को समझ रहे थे । सब समझते थे कि हम नेतागिरी में सरोपा धंस गए हैं । 1980-81 की बात है । कालेज में ऊटपटांग हरकतों के लिए मशहूर थे मुकेश राठौर । समाजवादी विचारधारा को मानते थे लोहिया जी चंद्रशेखर जी उनके आदर्श थे । पर हम अलहदा सोचते थे । 
     आपात काल के बाद चंद्रशेखर जी जबलपुर आए तो उनके सम्मान में हमारी यूनियन ने दादा को बुलाया । डी एन जैन कॉलेज के ओपन एयर थियेटर का लोकार्पण चन्द्रशेखर जी ने ही जिया था । 
    उनके भाषण में भूमंडलीकरण भविष्य के भारत की स्थिति, बेरोजगारी पर खुलकर बोले । 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक का 21 महीने की अवधि में भारत में आपातकाल घोषित था। तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी जी के कहने पर भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन आपातकाल की घोषणा कर दी। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह सबसे विवादास्पद और अलोकतांत्रिक काल था।
     तभी आपातकाल के जेल के दिन याद करते हुए वे बोले-"हम और हमारे मित्र एक सूखे पेड़ को लेकर किस्म किस्म की चर्चा करते थे । एक दिन मित्र को बताया कि -"बारिश में यह पेड़ अवश्य पुनः पीकेगा ..!
 कैसे ये तो ठूँठ है...?
मैने कहा -"इसमें पनपने की इच्छा शक्ति है । जैसे हममें । हम भारतीय प्रजातंत्र के ठूँठ भी निर्बंध होंगे । हमें खुद को आस्था की बूंदों से सींचते रहना होगा । 21 माह तक का आपातकाल गोया प्रजातंत्र में ब्रिटिश राज का ट्रांसलेशन ही था ।  मित्र अवाक ताकता रहा । 
 मई-जून 1975 की बारिश में  दो तीन फुहारों के बाद कटा हुआ पेड़ हरियाने लगा । 
  चंद्रशेखर जी के मित्र सह क़ैदी ने कहा - "चन्द्रशेखर जी ये तो पनप रहा है ! 
पनपेगा क्यों नहीं..? भारतीय डेमोक्रेटिक सिस्टम की जड़ें मजबूत और गहरी जो हैं । 
21 मार्च 1977 को आपातकाल वापस हुआ । तब तक वो पेड़ भी फिर से जिंदा हो चुका था ।
उसी दिन एक कविता लिख गई जो उनको ही समर्पित क्ररता हूँ...
आस्था 
बोलती नहीं पनपती है 
दावा प्रदर्शन 
न कभी नहीं ...!
आस्था हरियाती है । 
मंद मंद मुस्काती है । 
आस्था राग-द्वेष से दूर 
हाँ बहुत दूर चली जाती है ।।
आस्था
विश्वास की गहरी जड़ों 
वाले कटे पेड़ों में
बारिश की बूंदों से 
मिल तरुणी में प्रेम सी
अंकुरित हो जाती है 
तब सबको नज़र आती है ।
सूखे ठूँठ में 
हल्की फुहार के प्यार के बाद
कहीं कभी देखो अंकुरण..!
जान लो यही तो है आस्था का प्रकरण ।।

     
     
 

शनिवार, मार्च 20

सपेरों का देश भारत


 तो अक्सर अजय भाई किताबें लेकर आते हैं..  पर आज मामला कुछ और था,  हमारा आपसी वादा था कि किसी दिन वह संवाद करने आएंगे। उन्होंने वादा निभाया और निश्चित समय पर आ भी गए।

विमर्श प्रारंभ हुआ फटी हुई जींस,  भारतीय संस्कृति,  और डासना मंदिर पर भी चर्चा हुई। इसी क्रम में जब अंग्रेजों ने भारत को सांप सपेरा का देश कहने के बिंदु पर चर्चा हो हुई तो बहुत मुखर होकर इस विचारक ने कहा-" यह तो भारतीय ज्ञान-विज्ञान की पराकाष्ठा है, कि एक गली-गली घूमने वाला व्यक्ति पिटारी में सांप को लेकर अपने साथ न केवल घूम रहा है बल्कि उसके साथ जीवन भी व्यतीत कर लेता है ।" 

   उन्होंने आगे कहा-" एक व्यक्ति स्टेथ स्कोप की तरह सांप को अपनी गले में लपेट कर घूमता है। उससे बड़ा परम ज्ञानी महा विज्ञानी और कौन हो सकता है..?"

     विज्ञान के इस दौर में सांप के साथ रहना सच में असंभव है। सांप सपेरों के देश में जीवों का मनोविज्ञान और उसके साथ रहने का विज्ञान का किसी और देश में असंभव है ।

    मित्रों, हम सांप के साथ रहने के लिए भी योग्य है जो बिल्कुल विपरीत प्रकृति का है। आपको यह बात अच्छी लगी तो दोस्तों में शेयर अवश्य कीजिए इस देश की परंपराओं का सतत सम्मान कीजिए।

शनिवार, मार्च 6

मातृशक्ति दुर्गावती को नमन

महिला दिवस के पूर्व माँ दुर्गावती का स्मरण
💐💐💐💐
पग में लोहा बांध के
मस्तक  कील सजाय 
करधन बाँकैं अस्तर सबै
संग  कटार छिपाए ।।
सरमन हौदा चढ़ गई
सुत बांधे माँ पीठ ।
मरहुँ पै झुखिबो नहीं
जा गौंड वंश की रीत ।
दक्कन के राजा कहें
नहिं आवा सुल्तान ?
कहे विदूषक नाच कै
पकड़े दुर्गा नै कान ।।
तपोभूमि जाबालि की
तँह रेवा को खण्ड ।
शिव दीन्हें आसीरबचन
दीनहुँ सुराज अखंड ।।
रानी के समराज में-
सुख वैभव चहुँ ओर ।
स्वर्ण मणि धनधान्य से
हर घर कोष अछोर ।।
फाग बरेदी ढिमरयाई कौ
गांवन गांवन  शोर ।
न चोरी को भय कहूँ
खुले द्वार चहुँ ओर ।।
सुबह सुबह लमटेर से
गुंजित रेवा के तीर ।
कहुँ रेवा शांत सरल
कहुँ माँ व्यग्र अधीर ।।
रेवा की अनुरागिनी 
दुर्गा नित दें सुख दान।
ज्ञानीजन के पूजे पगा
कर ग्राम भूमि धन दान ।।
चौंसठ जोगिन धाम को दुर्गा सदा सहाय ।
भाई आधार सिंह नित सत्कर्म सुझाय ।।
बरगी के चानक्य नै
गोंडन राज बिठाए ।
बामन गोंडन के प्रेम से
दुनिया झुलसी जाय ।।
ग्यारा सदी में सूर्य सम
मदन शाह को राज ।
बावन गढ़ वनवाय कै
बने मदन महाराज ।। 

ग्राम्य कवि गावन लगे
इक थो बहादुर बाज़ ।
दुर्गा नै पर कांट कय 
छीनो मालव को राज ।।
मातु नरमदा के तीर तट
सुत संगराम दलपत भये 
गोंडवंश के बीर ।।
शेरशाह सूरी सहित मुगल में भड़कन लागी पीर ।।
खान मियाना ललचा गयो
गढ़ मंडला चढ़ धाय । 
रानी की रणनीति ने
लीन्हों बंदी बनाय ।।
सुन सखि ऐसी दुर्गावती 
देवी दुर्गा को रूप ।
चेहरा कोउ न लख सकै
कोउ कामी नर नै भूप ।।
रानी के समराज में
नहिं जात पात को भेद ।
बाम्हन कायथ गोंड सब लगें 
एक जात इक देश ।।
रानी नै होती अगर, दक्कन तलक 
होत मुगलिया राज ।
जैसे हम सब आज हैं 
वैसे होते न आज ।।
तबहुँ कहै कविराय मुकुल
दुर्गा को प्रतिपल पूजो ।
नारी-महिमा गान सम
गान नहिं कोई दूजो ।।