रविवार, फ़रवरी 21

मां यह चादर वापस ले ले...!


माँ खादी की चादर ले ले
माँ, कभी स्कूल में टीचर जी ने मुझे सिखाई थी मां खादी की चादर दे दे मैं गांधी बन जाऊंगा।
उन दिनों यह कविता मुझे एक गणतंत्र दिवस कार्यक्रम में सुनानी थी। शायद मैं  चौथी अथवा पांचवी क्लास में पढ़ता था कुछ अच्छे से याद नहीं है। बहुत दिनों बाद पता चला कि मुझे गांधी एक सीमा के बाद गांधी नहीं बनना है। गांधी जी के शरीर में एक पवित्र आत्मा का निवास था यह कौन नहीं जानता। बहुत दिनों तक खादी और चादर में उलझा रहा। चरखा तकली हाफ खाकी पेंट  वाली सफेद बुशर्ट गांधी बहुत दिन तक दिमाग पर इसी तरह हावी थे अभी भी हैं।
     गांधी बनने के बाद बहुत दिनों तक मूर्ख बुद्धू बनकर शोषित होते रहना जिंदगी की गोया नियति बन गई हो।
  जलियांवाला बाग सुभाष चंद्र बोस सरदार भगत सिंह चंद्रशेखर आजाद यह सब तो बहुत बाद में मिले। उम्र की आधी शताब्दी बीत जाने के बाद उम्र के आखिरी पड़ाव में आकर यह सब मिल पाए हैं।
     अहिंसा परम धर्म है इसे अस्वीकृत नहीं करता कोई भी। सभी इसे परम धर्म की प्रतिष्ठा देते हैं और जिंदगी भर देते रहेंगे यह सनातनी परंपरा है ।
    परंतु हर दुर्योधनों को याद रखना पड़ेगा कि -" पार्थ सारथी कृष्ण यदि अंतिम समझौता अर्थात कुल 5 गांव के आधार पर युद्ध रोकने का अनुरोध करें और दुर्योधनों के साथ सहमति ना बन सके तो युद्ध अवश्य ही होगा।"
    याद रख दुर्योधन षड्यंत्र से मुझे फर्क नहीं पड़ेगा मैं जो अर्जुन हूं अरिंजय कृष्ण का साथ मिलते ही कुरुक्षेत्र अवश्य जाऊंगा।
   सुधि पाठकों, समझ गए ना कि क्या कह रहा हूं। अब गांधी के अलावा बाकी सब से मिल चुका हूं। सब ने सब कुछ समझा दिया है सत्य असत्य सत्य के साथ प्रयोग भी समझ चुका हूं।
     इंद्रजीत नेमिनाथ ने कृष्ण को अवश्य समझाया होगा अहिंसा का अमृत रस हमारी संस्कृति में नेमिनाथ जी के पूर्व से भी राजा मांधाता ने स्थापित कर दी थी। संपूर्ण 24 तीर्थंकर यही तो समझाते रहे हैं। हमने कभी नहीं सोचा की सत्ता का रास्ता बंदूक की नली से जाता है हम तो सत्ता का रास्ता वसुधैव कुटुंबकम की स्थापना के लिए अश्मित के जरिए तलाशते रहे। बुद्ध ने भी यही तो किया था। बोधिसत्व बनो और बुद्ध तक की जैसे की यात्रा करो रोज जन्मो रोज मारो हर नए जन्म में नया चिंतन लेकर आओ अंततः बुद्ध बन जाओ। युद्ध नहीं करना है मत करो। पर युद्ध ना करने से अगर लाखों भारतीय मारे जाते हैं तो युद्ध ना करना हिंसा ही है। तुम विश्व को समाप्त करने के लिए विषाणु भेजते हो हम दुनिया को बचाने के लिए टीके भेज रहे हैं कभी सोचा है तुम अपनी मूल प्रवृत्ति के इर्द-गिर्द हो।
  तुम बाएं बाजू चलते रहो मैं दाएं बाजू चलता रहूंगा। तुम चिड़िया चूहे गिलहरी खरगोश मारते रहो हम चिडियों से चीटियों तक चुग्गा चुगाते रहेंगे ।
     आओ ना तुम भी दाएं बाजू आ जाओ । 


शनिवार, फ़रवरी 20

धर्म को रिलीज़न मत कहो , डिक्शनरी में बदलाव ज़रूरी है !

"धर्म की परिभाषा को आधिकारिक रूप से समझने  की ज़रूरत" 
         गिरीश बिल्लोरे मुकुल  
 girishbillore@gmail.com   

   भारत को धार्मिक होना चाहिए या आध्यात्मिक..? यह सवाल बहुत लोग करते हैं !
  इन समस्त सवालों से पहले धर्म शब्द की परिभाषा तय होनी चाहिए । डिक्शनरी में तो सम्प्रदाय को धर्म कहा जाता है ।
     परंतु एक तथ्य यह भी है कि भारत में मौजूद व्यापक विश्लेषण के साथ साथ धर्म की परिभाषा को उसके स्वरूप के माध्यम से  समझने के बावजूद ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में उसे रिलीजन ही लिखा है ! धर्म की परिभाषा महर्षि गौतम ने दी है.. जो धारण करने योग्य हो वह धर्म है !  

   क्या इस परिभाषा को समग्र रूप से स्वीकृति नहीं मिलनी चाहिए? अवश्य मिलनी चाहिए क्योंकि यह परिभाषा सुनिश्चित करने के लिए सुव्यवस्थित  तथा स्थापित  सत्य एवं तथ्य है।
  मूल रूप से धर्म की परिभाषा  का और अधिक गहराई से  अध्ययन कर विश्लेषण किया जाए तो ज्ञात होता है कि
[  ] भौतिक रूप से प्राप्त शरीर और उसको संचालित करने वाली ऊर्जा जिसे प्राण कहा जा सकता है के द्वारा...
[  ] धारण करने योग्य को ही धारण किया जाता है। उदाहरणार्थ नित्य प्रातः उठना प्राणी का भौतिक धर्म है, परंतु यह ऐसी प्रक्रिया है जो शरीर के सोने और जागने की अवधि को सुनिश्चित करती है। जागते ही शरीर के अंदर जीवंत भाव धरती से उस पर अपने पैर रखने के लिए अनुमति चाहते हैं तथा उसे प्रणाम करते हैं । शरीर को भौतिक रूप से एक धर्म का निर्वहन करना है वह धर्म है दैनंदिन कर्म रहना।
[  ] पिता,माता, गुरु, भाई, बहन , पत्नी, अधिकारी, सिपाही, सेवक, आदि के रूप में जो धारण करने योग्य हो को धर्म कहा जाना मेरा नैरेटिव है ।
[  ] और  सनातन प्रक्रिया है सामान्य  रूप से जब हम में वाणी समझ भाव का विकास नहीं हुआ था तब भी हम शरीर को सुलाते थे और जगाते भी रहे होंगे...! फिर हम जागृत अवस्था में आहार के लिए भटकते भी होंगे आहार हासिल करने के लिए शरीर कुछ कार्य अवश्य करता होगा। यहां आहार की उम्मीद करना कामना है और आहार के लिए श्रम करना पुरुषार्थ है। यह व्यवस्था ही रही थी, जब हमारा धर्म कामना और अर्जन पर केंद्रित रहा ।
[  ] आदि काल से अब तक यानी सनातन जारी यह व्यवस्था शनै: शनै: विकास के बावजूद हमारी व्यवस्था और हमारे डीएनए में मौजूद है। हम रात को सोना नहीं भूलते और सुबह जागना नहीं भूलते विशेष परिस्थितियों को छोड़कर शरीर अपना धर्म निभाता है । फिर धीरे-धीरे विकास के साथ शारीरिक संरचना में सूक्ष्म शरीर का एहसास मनुष्य ने किया अर्थात मनुष्य सोचने लगा और फिर उसी सोच के आधार नियमों को धारित या उन से विरत रहने लगा । सनातन यानी प्रारंभ से ही तय हो गया कि क्या धारित करना है और किसे धारित नहीं है।
धारित करने और ना करने का मूलभूत कारण जीवन क्रम को सुव्यवस्थित स्थापित करना था।

  स्वयं धर्म यानी जीवन की व्यवस्था को चलाने के लिए क्या धारण करना है क्या धारण नहीं करना है के बारे में आत्म विमर्श या अगर वह समूह में रहने लगा होगा तो सामूहिक विमर्श अवश्य किया होगा। मनुष्य ने तब ही तय कर लिया होगा कि क्या खाना है क्या नहीं खाना है कैसे रहना है स्वयं की अथवा अपने समूह की रक्षा किस प्रविधि से करना है समूह में आपसी व्यवहार कैसे  करना है ?
    एक लंबी मंत्रणा के बाद तय किया होगा। धर्म का प्रारंभ यहीं से होता है।
    आप एक कुत्ता पालते हैं अथवा अन्य कोई पशु पालते हैं आपका उनके लालन-पालन का उद्देश्य सर्वथा धर्म सम्मत होता है। अगर उस पालतू पशु को आप घर में छोड़कर जाते हैं तो आप चिंतित रहते हैं कि उसे भोजन कराना है अब आप उस पशु के लिए कमिटेड हैं और आप  निश्चित समय सीमा में लौटते हैं ऐसी व्यवस्था करते हैं कि आपके पालतू पशु को समय पर भोजन मिल जाए । और आप इसके लिए प्रतिबद्ध है स्वामी के रूप में यही आपका धर्म है। जब आप पशु के लिए इतना कमिटेड है तो आप अपनी पत्नी और संतानों के लिए भी कमिटेड होंगे ही पति के रुप में आपका यह कमिटमेंट आपका धर्म है।
    अपने कमिटमेंटस को पूरा करने के लिए आपके यत्न प्रयत्न अर्थ का उपार्जन अब करने लगे हैं पहले हम-आप जब आदिमानव थे तब आप क्या करते रहे होंगे ?
तभी आप अगर ऐसी व्यवस्था में रह रहे होंगे तो भी अपने धर्म का निर्वाह जरूर कर रहे थे। क्योंकि तब आपका धर्म था जन की संख्या में वृद्धि करना।  उसके लिए आपके पुरुषार्थ का द्वितीय तत्व काम यानी कामना यानी उम्मीद जो आवश्यकता अनुसार  जुटानी होती थीं पर अपना श्रम और सामर्थ्य लगाते थे।
ईश्वर अथवा ब्रह्म की कल्पना ईश उपनिषद में कुछ इस तरह से की है
"पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् , पूर्ण मुदच्यते, ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय, पूर्ण मेवा वशिष्यते।।
    !!ॐ शांति: शांति: शांतिः !!
  ब्रह्म जो अदृश्य है, वह अनंत और पूर्ण है। उसी पूर्ण यानी ब्रह्म से पूर्ण जगत की  उत्पत्ति होती है। यह दृश्यमान जगत भी अनंत है। उस अनंत से विश्व विस्तारित हुआ है। और यही विस्तार अनंत के होने का प्रमाण है।
    अलौकिक ब्रह्म की कल्पना यानी निर्गुण ब्रह्म की कल्पना से सगुण ब्रह्म की कल्पना सनातन इसलिए करता है ताकि उस क्रिया का अभ्यास किया जा सके जिसे साधना अथवा अनुष्ठान और सीधे शब्द में कहीं तो योग कहते हैं।
   योग ध्यान सगुण ब्रह्म से निर्गुण ब्रह्म तक पहुंचने का सरपट मार्ग है।  यह किसी परम ब्रह्म परमात्मा का आदेश नहीं है क्योंकि ब्रह्म में निहित तत्व ऊर्जा के अतिरिक्त कुछ नहीं है। ब्रह्म निरंकार है। अनंत है इस अनंत में ऊर्जा का अकूत भंडार है।
   निर्गुण ब्रह्म की पूजा बहुत सारे लोग करते हैं और यह दावा करते हैं कि वे ब्रह्म के संदेशवाहक हैं । वास्तव में यह एक भौतिक क्रिया है ब्रह्म को एक ओर स्वयं आकार हीन मानना जाता है वही लोग यह कहते हैं कि ईश्वर ने मुझे यह कहने के लिए जमीन पर भेजा है कि दुनिया के नीति नियमों का संचालन करने के लिए नियमों का निर्धारण करो । वास्तव में ऐसा कुछ नहीं है अगर यह सत्य है तो आप और हम रोज ब्रह्म से साक्षात्कार करते हैं हजारों हजार विचार मस्तिष्क में संचालित होते हैं  तो  क्या हम स्वयं को ईश्वर का संदेशवाहक मान लें.  !
  अब हमें यहां यह समझ विकसित करनी होगी कि धर्म शब्द का अर्थ उसके  अंतर्निहित तथ्यों से ही होता है न कि उसका कोई समानार्थी शब्द के रूप में स्वीकृत किया जाए ।  दुनिया भर के शब्दकोषों में धर्म को धर्म Dharm ही लिखा जाना चाहिए।
रिलीजन क्या है
रिलीजन का अर्थ होता है-  मत मतों  का निर्माण किया जा सकता है । यह एक तरह से डॉक्ट्रिन या प्रवृत्ति सिद्धांत पर आधारित आज्ञाओं का समुच्चय होता है। जो स्वानुभूत तथ्यों पर आधारित है ।
    परिवार संचालन की व्यवस्था, आचार संहिताएं, गुरु के आदेश मठ मंदिर अथवा पानी उपासना गृह द्वारा जारी विद्वानों के मार्गदर्शी सिद्धांत जो देश काल परिस्थिति के अनुकूल जारी किए जाते हैं के आधार पर जीवनचर्या  का निर्वाह करने की प्रक्रिया को रिलीजन पंथ या मत कहा जा सकता है धर्म तो केवल सनातन है । 

मंगलवार, फ़रवरी 16

गीत सरस्वती पूजन

ज्ञान की अविरल प्रवाहिनी
नमन है हे वीणा वादिनी ।।
गीत स्वर ध्वनि सब अपूरण-
बिन तेरे माँ हंस वाहिनी ।।
मन के कागज़ पे लिखूँ क्या
कृपा का यदि व्योम न हो ?
कंठ  को माधुर्य कैसे मिले -
शारदा का आह्वान न हो ।।
हर कला अरु विधाओं की
मातु तुम प्रतिपादिनी ।।
*सरस्वती पूजन के अवसर पर शत-शत नमन*
गिरीश बिल्लोरे मुकुल

सोमवार, फ़रवरी 8

नक़ारने के निराले अंदाज


सत्य को नकारने के अपने-अपने निराले अंदाज हुआ करते हैं। और इन दिनों यह बीमारी तेजी से लोक व्यापी होती जा रही है। इसके पीछे कुछ अस्तुरे हैं जिनको न्यू मीडिया के वेरिएण्टस कह सकते हैं..!

    न्यू मीडिया यानी सोशल मीडिया टि्वटर फेसबुक व्हाट्सएप आदि आदि ब्लॉग्स, माइक्रो ब्लॉगिंग,  ऑडियो और पॉडकास्ट वीडियो ब्लॉगिंग।
  इन सब का प्रयोग पॉजिटिव होगा यह मान के इन्हें विकसित किया जाता रहा है। परंतु प्रचुर मात्रा में उपलब्ध संसाधनों का दुरुपयोग प्रचुरता से ही किया जाता है यह स्वयं सिद्ध सिद्धांत है।
जब इंटरनेट नहीं था तब इनकी जरूरत भी नहीं थी और जब इंटरनेट आया तो इनके बिना जीवन की कल्पना भी मुश्किल है। नार्थ कोरिया में जनता को यह नहीं मालूम कि इंटरनेट का विश्व में किस तरह इस्तेमाल हो रहा है। चीन में भी लगभग ऐसा ही कुछ माहौल है। परंतु वहां सोसाइटी पर मनोरंजन के लिए किसी तरह का नकारात्मक प्रतिबंध नहीं है। परंतु इस बात का खास ध्यान रखा जाता है कि-"सत्य उजागर न हो..!"
   पश्चिमी देश दक्षिण एशिया के देश इंटरनेट सर्विसेज का भरपूर लाभ उठा रहे हैं।
और इस बीच ग्लोबल विलेज एक ऐसा वर्चुअल विलेज बन गया है जहां सत्य पर असत्य थी हावी है। कोविड-19 के पहले हम मित्रों आपस में बात कर रहे थे। और इस संवाद का केंद्र बिंदु था टीवी मीडिया पर होने वाली अराजक अशिष्ट बहसें...!
          तभी एक मित्र ने अचानक कहा-"अभी सोशल मीडिया को तो वाइब्रेंट होने दीजिए..! फिर देखिए कमाल लगता है तीसरा विश्व युद्ध सोशल मीडिया पर लड़ा जाएगा जिसकी भूमिका टेलीविजन तैयार कर रहा है..!"
   19-20 मार्च 2020 से अस्त व्यस्त हुआ भारतीय जीवन इंटरनेट पर अधिक वक्त गुजारने लगा । आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए इंटरनेट कंपनियों एप्स निर्माताओं को जनता के रुझान का ट्रेंड समझ में आने लगा। बस यही से नैरेटिव  प्रसारित करने उसे माइंड सेट के साथ सिंक्रोनाइज करने तथा स्थाई तो देने वाली स्ट्रैटेजी विकसित की जाने लगी ।  ग्लोबल वर्चुअल विलेज मार्केटिंग का एक जबरदस्त तरीका बन गया।
    अब तो सत्य भी सहजता से नकारा जाता है। ग्लोबल पोजीशन प्राप्त कर चुके बहुत सारे मीडिया हाउस भी इस व्यापार में कूद गए। पॉलीटिशियंस थिंकर्स ग्लोबल लीडर्स की तुलना  सेलिब्रिटीज़ से की जाने लगी । कल ही एक व्यक्ति ने सरेआम टेलीविजन पर  प्रधानमंत्री के फॉलोअर्स की तुलना एक सिंगर से करते हुए सिंगर को श्रेष्ठ साबित कर दिया। किसी को नकारने की हद इससे ज्यादा और क्या हो सकती है..?
   और जिस अंदाज से नकारा जा रहा है उस पर रश्क हो जाता है।

फोटो साभार गूगल से अगर किसी को आपत्ति हो तो कृपया ईमेल कीजिए

शनिवार, फ़रवरी 6

किसान आंदोलन का आयतन

चिंता मत कीजिए किसान आंदोलन को लेकर । हठ का अर्थ क्या होता है यह आप बेहतर तरीके से समझ सकते हैं, शायद अब तक समझ भी चुके होंगे। अगर आप आंदोलन के स्तर की ओर जाएं तो आप पाएंगे की प्रारंभिक दिनों में यह आंदोलन कैनेडियन सपोर्ट से चलता रहा। 
इससे इंकार इसलिए कोई नहीं कर सकता क्योंकि 26 जनवरी तक उन्होंनेे जो तथा वह उनकी द्वारा कर लिया गया। तिरंगे के साथ  पंथ का झंडा लगाकर  सरकार को कुछ ऐसा करने आंदोलनकारियों के मुख्य रणनीतिकार का मुख्य उद्देश्य था कि - भारत सरकार ऐसा कोई कठोर कदम उठा ले जोो गणतंत्र के लिए एक धब्बा बन जाए और उसे ना केवल भारतीय बल्कि विश्व स्तर पर प्रचारित किया जा सके। 
लेेेेकिन उस दिन अर्थात 26 जनवरी 2021 को दिल्ली पुलिस के जवानों ने अद्भुत धैर्य रखा और अपने आप को चोटिल भी करवा लिया  लेकिन  प्रतिक्रिया स्वरूप  कोई भी ऐसी कार्यवाही नहीं की जिससे कि रणनीतिकार सफल हो जाएं।
  अंततोगत्वा स्थिति यह बनी की अब किस तरह की टूल का इस्तेमाल किया जाए?
मेरी राय में आप उस दृश्य की कल्पना कीजिए जो वीडियो के रूप में मौजूद है। एक इनोसेंट आंदोलन कर्ता ने तिरंगा उस जवान को दिया जो खंंबेे हुआ था  । 
और उसने  बेरहमी  और बेइज्जती से भारतीय  तिरंगे को  तथा फिर निशान साहिब का पवित्र ध्वज फहरा दिया । 
  चिंतन कीजिए कि 26 जनवरी वाली भीड़ में निसंदेह खालिस्तान समर्थक मौजूद थे। ऑस्ट्रेलिया कनाडा से भारत आए थे हो सकता है कि वह अभी भी अर्थात 6 फरवरी तक आंदोलन में अप्रत्यक्ष रूप से भागीदार हैं। मित्रों इस पर चिंतन कीजिए और तय कीजिए कि अब आप क्या सोचते हैं ?
यह सर्वथा  हठधर्मिता है। जिस तरह से आंदोलन के साथ अनुषांगिक घटनाएं हो रही हैं  उससे जो संदेश निकल कर आ रहा है कि देश में तोड़फोड़ की राजनीति आंदोलनकारियों को संवाद हीनता के मार्ग पर ले जा रही है । और इस बात को शेष भारतीय जनता समझ चुकी है। 
      लगातार मैंने इस प्रश्न को लेकर मित्रों से संवाद कर रहा हूं  कि अधिनियम में कौन सी ऐसी कमी है जिस पर आंदोलन इतना लंबा खींचा जा सकता है। मित्रों का मानना है कि-  मासूमियत का आधिक्य और पैसों की उपलब्धता इस आंदोलन को लंबा बना रही है ताकि किसी तरह से ही सही आंदोलन जिसमें वास्तविक कृषक की मौजूदगी अपेक्षाकृत कम है को ख्याति प्राप्त हो।
उन मुद्दों पर जो पूर्व में डिस्कस हो चुके हैं तथा सरकार ने उन पर रिव्यू करने का आश्वासन दिया है । ढिठाई तो इतनी की संवाद स्थापित ही नहीं करेंगे !
अगर संवाद ही नहीं करना चाहते तो फासीवादी हो आंदोलन कुल मिलाकर पैरासाइट बन चुका है अस्थिरता के पैरोंकारियों का ।
भारतीय गणतंत्र पर्व पर दो महान ध्वजाओं का अपमान हुआ । एक तिरंगा दूसरा निशान साहिब ।
अगर किसी ने भी भारत से जनतंत्र का समापन कराने का प्रयास घोर साम्यवाद के आगमन की आहट होगा। शेष आप सब समझदार है । 
संवाद के लिए  एक फोन काल की दूरी पर प्रधानमंत्री का ऐलान वह वाक्य था जिसने मानो आंदोलन को स्तब्ध कर दिया था। किंतु लोगों का कृत्रिम समर्थन  आंदोलन की लिए संजीवनी बूटी बन गया। रणनीतिकारों का दबाव और आंदोलन को विश्व प्रसिद्ध बनाने  के लिए पैसेे देकर ट्वीट करने वाली तथाकथित हस्तियों के समर्थन हासिल किए गए । 
इससे दो बात सामने आ रहे हैं एक आंदोलन का प्रायोजित होना दूसरा भारत में ऐसा वातावरण निर्मित करना जिससे भारतीय लोकतंत्र को बदनाम किया जा सके।
   अब आप समझ ही गए होंगे कि एक्सट्रीम लेफ्ट खास तौर पर अर्बन नक्सल वादियों का इसमें कितना योगदान है और न्यू यॉर्क टाइम्स जैसे पत्र के माध्यम से अपनी विचारधारा और नैरेटिव किस तरह से विकसित किया जा रहा है। यहांं एक तथ्य और विचारणीय है कि ट्वीट करने वाली रेहाना ग्रेटा और मियां खलीफा को सर्च इंजन में ऊपर लानेे का फंडा भी इसमें अंतर्निहित है ।
   चलिए अब चिंतन का वक्त है । हम अभी भी अगर आप सत्य की पड़ताल नहीं कर पाए हैं तो आर्टिकल की पढ़ने के बाद जरूर कीजिए । 
   ( समस्त फ़ोटो गूगल से साभार )

शुक्रवार, फ़रवरी 5

रामराज साम्यवाद और भारत

मौलिक अधिकारों और स्वतंत्रता के बीच एक चेतना है जो दर्शन का मूलाधार है । चेतना वर्ग विहीनता का आधार है । चेतना की पृष्ठभूमि के घनत्व में जो चिंतन होता है वह स्वाधिकार  के साथ समष्टि के अधिकारों की मौजूदगी का आभास कराता है । 
      किसी पर कुछ भी मत लादो पंथ वर्ग में मत बांधों । जो जैसा है उसे वैसा ही रहने दो उसके अधिकारों पर अतिक्रमण मत कौए की तुलना कोयल से मत करो । कोयल को काग के अनुकरण एवम अनुशरण की सलाह देना चाहते तो निरे मूर्ख हो। गाय का दूध बकरी के दूध का समानार्थी हो सकता है विकल्प भी है पर वो गाय के स्तन से निकला गाय का दूध नहीं है । उसे जो है वह रहने दो । अगर बलात बदलाव करोगे तो मूर्खता होगी । कुल मिलाकर किसी को बदलने की ज़रुरत क्या है। अतएव दर्शन का मूल तत्व  है कि मानव जीवन आत्मोन्नति के लिए है । 
       वामपंथ कहता है पदार्थ श्रेष्ठ है, सनातन की व्याख्या है... पुरुषार्थ से अर्जित पदार्थ के साथ उपभोक्ता को आत्मोन्नति का अभ्यास करना ही होगा । वाम ईश्वर की सत्ता को अस्वीकार करता है । दैहिक संपृक्ति के साथ आत्मज्ञान के सहारे  सनातन ईश्वर से अंतिम मिलन का पथ  स्वीकार करने की सलाह देता है । सनातन अवधारणाओं पर  विमर्श एवम अभ्यास को मार्ग सुझाता है । 
   सनातन धर्म में देह एवम भावात्मकता का विश्लेषक  बना देता है। जवकि  वामपंथ या अन्य सम्प्रदाय -"सामाजिक क़ानून बनाते नज़र आते हैं ।" क़ानून बनाना राजा का धर्म है । राजा जो जन गण का प्रशासनिक प्रबन्धन कर्ता है । राजा एक शक्ति है वो भारत में  प्रजातंत्र में   निहित है । उसे बनाने दो । बाज़ारों को बाज़ार की तरह काम करने दो उससे घृणा मत करो कयोंकि वाज़ार दैहिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पुरुषार्थ के रास्ते खोलता है। जो वस्तु को  अत्यधिक मूल्यवान मत बनाओ ।  Cost enhancement करना  अत्यधिक लाभ कमाने की पृवृत्ति को स्थापित करने की कोशिश है । 
      उपरोक्त की तर्ज पर मूल्य का क्षरण भी मत करो वरना अनाधिकृत उपभोग वृत्ति को समर्थन मिलेगा, साथ ही उत्पादक सबसे पहले श्रम की कीमतों को गिराएगा । श्रमिकों के अधिकार अतिक्रमित होंगे । एक श्रमिक के साथ उसका परिवार उच्च स्तर पर नहीं जा सकेगा । हो सकता है श्रमिक आधी रोटी खाने पर मजबूर हो जाए। 
   कोविड-19 महाविनाश की असफल कोशिश थी । उसके सर्वाधिक प्रभाव काल में चीन की जीडीपी में उछाल आया है । 
   कार्ल मार्क्स ने सर्वजन हिताय का तत्व मूल रूप अपने चिंतन में रखा था । लेनिन औऱ स्टालिन ने इसे भटका दिया । कार्ल मार्क्स का लक्ष्य था मज़दूरों को सामर्थ्य देना । पर सम्पति पर अधिकार से वंचित कर देना। यह एक सीमा तक ठीक था । पर भारत के संदर्भ में फिट नहीं था । रामायण काल जिसमें  राजा मांधाता से लेकर राम के वंशजों तक का काल देखें तो वह कालावधि प्रजातांत्रिक-मोनार्की की कालावधि है । प्रजा का महत्व अधिक रहा है। इसी कारण गांधी जी ने -रामराज की अवधारणा को श्रेष्ठ माना यद्यपि प्रयोग वादी होने एवम सोवियत विचारधारा के कारण उनकी बात सैकेंडरी रही। 
     यहां मेरा मानना है कि-"साम्यवाद की अवधारणा भारत के अनुकूल नहीं है ।" 
             भारतीय सामाजिक आर्थिक विकास का मॉडल रामराज ही है । क्योंकि यह मॉडल  पदार्थ के उपयोग उपभोग  एवम आत्मोन्नति की ओर समानता से देखता है। 
          पर आज़ाद भारत के संविधान में ही धर्म को रिलीज़न यानी सम्प्रदाय कह कर जिस प्रकार से भ्रमित किया गया उसके परिणाम से आप हम सब परिचित हैं । सनातन धर्म ही धर्म है शेष सब पंथ या सम्प्रदाय कहे जाने चाहिए। डिक्शनरीयों में धर्म शब्द को उसकी प्रकृति अनुसार परिभाषित  कर धर्म ही लिखना चाहिये । 
   उपरोक्त बिंदु ओर जरा सा विषयांतर होना पड़ा पर ज़रूरी था।
( शेष फिर कभी )

गुरुवार, फ़रवरी 4

अगर कुंठित है तो क्या आप आध्यात्मिक हैं? कदापि नहीं,


अगर कुंठित है तो क्या आप आध्यात्मिक हैं? कदापि नहीं, धर्म अध्यात्म दर्शन सब कुछ वस्तु वाद को प्रवर्तित नहीं करता। ना ही वस्तु वाद से सनातन का कोई लेना देना है। सनातन इस बात की अनुमति देता है कि- हम आप वसुधैव कुटुंबकम की विराट कांसेप्ट को अंतर्निहित करें। किसी का भी गलत स्केच बनाना यानी उसको गलत तरीके से पोट्रेट करना मलिनता की निशानी है। 
कार्ल मार्क्स बहुत बड़े विद्वान थे। हम सब जानते हैं। सर्वहारा के लिए बहुत बड़ा चिंतन सामने लेकर आए। उनके सिद्धांतों से ठीक वैसे ही विरक्ति आ सकती थी जैसा कि गीता के  अध्याय को पढ़कर आती है । 
परंतु उनका चिंतन रियलिस्टिक साइंटिफिक मैटेरियल को लेकर आगे बढ़ता है। कार्ल मार्क्स कहते हैं कि दुनिया में साम्य की स्थापना हो। 
 सर्वहारा यानी मजदूर वर्ग सुखी हो। यहां तक सबको स्वीकार्य है कार्ल मार्क्स लेकिन उनके बाद अनुयाईयों ने खूनी संघर्ष शुरू कर दिया और स्टालिन तक आते-आते लाल झंडे का रंग गहराता चला गया। *जब सत्ता का स्वाद जीभ पर लग जाता है तब वसुधैव कुटुंबकम अर्थात हम सब की परिकल्पना उसी घातक स्वरूप में बदल जाती है जहां से कार्ल मार्क्स बचा कर ले जाना चाहते थे*
 यह जर्मन की व्यवस्था थी मोनार्की ने जर्मन को कार्ल मार्क्स जैसा महायोगी दिया किंतु वे भौतिकवाद के प्रवर्तक बन गए जबकि वे सब को सुखी देखना चाहते थे। इसके विपरीत सनातन परंपरा में राम ने विश्व विजय प्राप्त की पूरे विश्व के लगभग पूर्व एशिया मध्य एशिया अफ्रीका यहां तक कि लंका से आगे तक राम का साम्राज्य विस्तारित हुआ। राम ने  विश्व में राम राज्य की स्थापना की। जिसके अवशेष जावा सुमात्रा मलय कंबोडिया कंपू चिया म्यानमार तक आज भी मिलते हैं। राम ने वैचारिक और बौद्धिक समृद्धि विश्व बनाने की सफल कोशिश की थी। उसके कुछ हजार साल बाद महायोगी कृष्ण आए थे हम सब जानते हैं। कृष्ण ने कौरवों को अपना विरोधी अंतिम सांस तक नहीं माना। कृष्ण तो बाल्यकाल से ही अन्याय के विरोध में खड़े थे। उनका अंतिम प्रस्ताव था केवल 5 गांव परंतु विद्वान मित्रों का मित्र बलशाली दुर्योधन इस पर भी तैयार ना था। अंततोगत्वा कृष्ण ने समझौता ना करते हुए जिसका जो अधिकार था उसको सौंप दिया। 
  संपूर्ण युद्ध केवल 18 दिन चला श्री कृष्ण ने बड़े परकोटे वाली द्वारका नगरी बना ली और आराम से शेष जीवन सामान्य बिताने लगे। 
 मैंने यहां 3 चरित्र उल्लेखित किया है कार्ल मार्क्स श्री राम और श्री कृष्ण कार्ल मार्क्स को छोड़कर राम और कृष्ण समाज के लिए कुंठित नजरिया ना रख कर वसुधैव कुटुंबकम की अलख जगाई।
 255 साल पूर्व कार्ल मार्क्स का सिद्धांत प्रकाश में आया। और अब तक विश्व को उसके अनुचर दुख दे रहे हैं। क्योंकि यथार्थ पदार्थ वादी चिंतन से ईश्वर तत्व को ना मानने वाले लोगों ने जिस बर्बरता पूर्ण ढंग से सोवियत संघ चाइना कंबोडिया लाओस जैसे  देशों में रक्तपात  किया है तथा उनको निशाना बनाया है। उस दौर का एहसास करते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
अब आप सोच रहे होंगे कि यह आलेख क्यों लिखा गया..?

इसके पीछे 3 मकसद है-
*01. पूजा पाठ कर लेना अनुष्ठान कर लेना मात्र सनातन का ऐसा नहीं है बल्कि संपूर्ण आचार विचार में परिवर्तन करना उद्देश्य होना चाहिए।*
*02. जब तक हम पदार्थ वादी चिंतन को श्रेष्ठ मानते रहेंगे तब तक ना तो हम खुद का विकास कर सकते और ना ही सामाजिक संरचना को समझ सकते हैं। सामाजिक संरचना को समझने का अर्थ है सब के प्रति सहृदयता और असहमति का सम्मान। राम और कृष्ण का जीवन इसी दार्शनिक बिंदु पर एकात्मता का संदेश देता है। और निहित स्वार्थों के चलते व्यवस्था को क्षतिग्रस्त भी नहीं करता*
*03. जब जब भी हम सब का कांसेप्ट क्षतिग्रस्त हुआ है तब तब समाज में कुंठाएं जन्म लेती हैं। और ऐसी कुंठा किसी को अपमानित करने और उसे गलत ढंग से पोट्रेट करने की कोशिश में बदल जाती है।