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ठेस : रेणु

         कुछ न लिखने का मन कर रहा है.. कई कहानियों को नेट पर देख कर लगा कि कितने महान कथाकार थे वे जिनकी अभिव्यक्ति में सहज और सरल प्रवाह देखा जा सकता है. आज़ भी अक्सर उभर उभर कर कहतीं है ये कहानियां कि वाकई साहित्य के ये पुरोधा सैंत में कहलाए "पुरोधा "  आज़ रेणु की लिखी मेरी प्रिय कहानी "ठेस" पोस्ट के रूप में दे रहा हूं                  खेती-बारी के समय , गाँव के किसान सिरचन की गिनती नहीं करते. लोग उसको बेकार ही नहीं , ' बेगार ' समझते हैं. इसलिए , खेत-खलिहान की मजदूरी के लिए कोई नहीं बुलाने जाता है सिरचन को. क्या होगा , उसको बुलाकर ? दूसरे मजदूर खेत पहुँच कर एक-तिहाई काम कर चुकेंगे , तब कहीं सिरचन राय हाथ में खुरपी डुलाता दिखाई पड़ेगा- पगडण्डी पर तौल तौल कर पाँव रखता हुआ , धीरे-धीरे. मुफ्त में मजदूरी देनी हो तो और बात है. .. आज सिरचन को मुफ्तखोर , कामचोर या चटोर कह ले कोई. एक समय था , जबकि उसकी मड़ैया के पास बड़े-बड़े बाबू लोगो की सवारियाँ बंधी रहती थीं. उसे लोग पूछते ही नहीं थे , उसकी खुशामद भी करते थे. "..अरे , सिरचन भाई! अब तो तुम्हारे ही हाथ