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सा'ब चौअन्नी मैको हम निकाल हैं...!!

  संगमरमर की चट्टानों ,   को शिल्पी मूर्ती में बदल देता   ,   सोचता शायद यही बदलाव उसकी जिन्दगी में बदलाव लाएगा. किन्तु रात दारू की दूकान उसे खींच लेती बिना किसी भूमिका के क़दम बढ जाते उसी दूकान की ओर  जिसे आम तौर पर कलारी कहा जाता है. कुछ हो न हो सुरूर राजा सा एहसास दिला ही देता है. ये वो जगह है जहाँ उन दिनों स्कूल कम ही जाते थे यहाँ के बच्चे . अब जाते हैं तो केवल मिड-डे-मील पाकर आपस आ जाते हैं . मास्टर जो पहले गुरु पदधारी होते थे जैसे माडल स्कूल वाले  बी०के 0   बाजपेई ,   श्रीयुत ईश्वरी प्रसाद तिवारी ,     मेरे निर्मल चंद जैन ,   मन्नू सिंह चौहान ,   आदि-आदि ,   अब गुरुपद किसी को भी नहीं मिलता बेचारे कर्मी हो गये हैं. शहपुरा स्कूल वाले  फतेचंद जैन  मास्साब   ,   सुमन बहन जी रजक मास्साब ,   सब ने खूब दुलारा   ,   फटकारा और मारा भी पर सच कहूं इनमें गुरु पद का गांभीर्य था     अब जब में किसी स्कूल में जाता हूँ जीप देखकर वे बेचारे शिक्षा कर्मी टाइप के मास्साब  बेवज़ह अपनी गलती छिपाने की कवायद मी जुट जाते. जी हाँ वे ही अब रोटी दाल का हिसाब बनाने और सरपंच सचिव की गुलामी करते सहज ही नज़र