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आज बसंत की रात गमन की बात न करना :गोपालदास नीरज़

वसंत का श्रृंगारी स्वरूप कवि मन को प्रभावित न करे ..!-असंभव है.. हर कवि-मन  कई कई भावों बगीचे से गुज़रता प्रकृति से रस बटोरता आ कर अपने लिखने वाले टेबल पे रखी डायरी के खाली पन्ने पर अपनी तरंग में डूब कर लिख लेता है गीत..नज़्म...ग़ज़ल.. यानी.कविता  उकेरता है शब्द-चित्र . जो दिखाई भी देतें हैं सुना भी जाता है उनको .. अरे हां.. गाया भी तो जाता है.. गीत सुरों पे सवार हो कर व्योम के विस्तार पर विचरण करता है .. बरसों बरस.. दूर तक़ देर तलक... इसी क्रम में नीरज जी की एक रचना अपने सुर में पेश कर रही हूं..   आज बसंत की रात गमन की बात न करना धूल बिछाए फूल-बिछौना बगिया पहने चांदी-सोना बलिया फेंके जादू-टोना महक उठे सब पात हवन की बात न करना आज बसंत की रात……. बौराई अमवा की डाली गदराई गेंहू की बाली सरसों खड़ी बजाये ताली झूम रहे जलजात शमन की बात न करना आज बसंत की रात…….. खिड़की खोल चंद्रमा झांके चुनरी खींच सितारे टाँके मना करूँ शोर मचा के कोयलिया अनखात गहन की बात न करना आज बसंत की रात……. निंदिया बैरन सुधि बिसराई सेज निगोड़ी करे ढिठाई ताना मारे सौत जुन्हाई

पाडकास्ट : जैसे तुम सोच रहे साथी

श्रीमति रचना बजाज के सौंजन्य से प्राप्त श्री विनोद श्रीवास्तव जी की एक रचना -- सुनिए  उ नकी  ही आवाज में --- जैसे तुम सोच रहे साथी  जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम, जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम। पिंजरे जैसी इस दुनिया में, पंछी जैसा ही रहना है, भर पेट मिले दाना-पानी,लेकिन मन ही मन दहना है। जैसे तुम सोच रहे साथी, वैसे संवाद नहीं हैं हम, जैसे तुम सोच रहे साथी, वैसे आजाद नहीं हैं हम। आगे बढ़नें की कोशिश में ,रिश्ते-नाते सब छूट गये, तन को जितना गढ़ना चाहा,मन से उतना ही टूट गये। जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आबाद नहीं हैं हम, जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम। पलकों ने लौटाये सपने, आंखे बोली अब मत आना, आना ही तो सच में आना,आकर फिर लौट नहीं जाना। जितना तुम सोच रहे साथी,उतना बरबाद नहीं हैं हम, जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम। आओ भी साथ चलें हम-तुम,मिल-जुल कर ढूंढें राह नई, संघर्ष भरा पथ है तो क्या, है संग हमारे चाह नई। जैसी तुम सो

मेरी कविता - मेरी आवाज

पिछले दिनों बेटे ने ये करवाया मुझसे .....कहता है कभी खुद का भी पढ़ो....तो ये पॉडकस्ट उसी का नतीजा है...अब सुनिये..... मेरी कविता -- मेरी आवाज में

आधा लाख लोग पढ़ चुके होंगे मिसफ़िट को इस धनतेरस...तक

ब्लाजगत को नमन न्यू-मीडिया ने गोया एक अनोखी क्रांति को जन्म दिया है.  क्रांति जिसके सकारात्मक और नकारात्मक दौनों पहलू हैं. मिसफ़िट को मैने साल भर से अधिक समय पूर्व ज्वाइन किया. गिरीष जी का आमंत्रण पाडकास्टिंग की वज़ह से था मेरे लिये. अचानक वेबकास्टिंग का प्रयोग हुआ मैने भी अपना खाता खोला वेबकास्टिंग में. सच कितना तेज़ बदलाव जीवंत संपर्क सहज अभिव्यक्ति और ढेरों पाठक नित नऎ आलेख, जानकारियां एक क्लिक मात्र से वाक़ई कमाल है. इन दिनों मिसफ़िट अपने तरीके से सृजन-यात्रा के एक नये मुक़ाम पर पहुंच रहा है.. अगले कुछ घण्टों में पाठक संख्या 49,834 से बड़कर आधा लाख हो जाएगी ये तय है. पर इसमें सबसे बड़ा अवदान आपके स्नेह का ही तो है.         मिसफ़िट :सीधीबात को आपका प्रोत्साहन एवम स्नेह इसी प्रका मिलेगा हमें उम्मीद है  आप सभी के प्यार और प्रोत्साहन के लिए आभार .......अब तक बहुत अच्छा समय बीता ,अनुभव भी अच्छा रहा बहुत कुछ सीखा,.....खोया भी और पाया भी....कोशिश रहेगी कि हर पल कुछ नया करूँ........

टुकड़े-टुकड़े दिन बीता..

मीना कुमारी  ( 1 अगस्त ,  1932  -  31 मार्च ,  1972 )  भारत  की एक मशहूर अभिनेत्री थीं। इन्हें खासकर दुखांत फ़िल्म में उनकी यादगार भूमिकाओं के लिये याद किया जाता है।  1952  में प्रदर्शित हुई फिल्म  बैजू बावरा  से वे काफी वे काफी मशहूर हुईं। मीना कुमारी का असली नाम  माहजबीं बानो  था और ये  बंबई  में पैदा हुई थीं । उनके पिता अली बक्श भी फिल्मों में और  पारसी रंगमंच  के एक मँजे हुये कलाकार थे और उन्होंने कुछ फिल्मों में  संगीतकार  का भी काम किया था। उनकी माँ प्रभावती देवी (बाद में इकबाल बानो),भी एक मशहूर नृत्यांगना और अदाकारा थी जिनका ताल्लुक  टैगोर  परिवार से था । माहजबीं ने पहली बार किसी फिल्म के लिये छह साल की उम्र में काम किया था। उनका नाम मीना कुमारी  विजय भट्ट  की खासी लोकप्रिय फिल्म  बैजू बावरा  पड़ा। मीना कुमारी की प्रारंभिक फिल्में ज्यादातर पौराणिक कथाओं पर आधारित थे। मीना कुमारी के आने के साथ  भारतीय सिनेमा  में नयी अभिनेत्रियों का एक खास दौर शुरु हुआ था जिसमें  नरगिस , निम्मी, सुचित्रा सेन और  नूतन  शामिल थीं। 1953  तक मीना कुमारी की तीन सफल फिल्में आ चुकी थीं जिनमें :

हर जन्मदिन एक नई शुरुआत...

ये आजकल के बच्चे भी बहुत मन मानी करते हैं ..सुनते नहीं है जल्दी ..हाँ..हाँ कह कर बात को टाल देते हैं पर उन्हें नहीं पता कि ..माँ इतनी आसानी से हार नहीं मानती ...... आज करना ही पड़ा----सुनिये केवल राम जी के  विचार उनके जन्मदिन पर उनकी ही आवाज में ...

जलाओ दिए - गोपालदास नीरज जी की एक रचना.

जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना       जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना   अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए । नई ज्योति के धर नए पंख झिलमि ल , उड़े मर्त्य मिट्टी गगन स्वर्ग छू ल े , लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐस ी , निशा की गली में तिमिर राह भूल े , खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगम ग ,  ऊषा जा न पा ए ,  निशा आ ना पाए जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना   अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।   सृजन है अधूरा अगर विश्‍व भर मे ं , कहीं भी किसी द्वार पर है उदास ी , मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेग ी , कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यास ी , चलेगा सदा नाश का खेल यूँ ह ी , भले ही दिवाली यहाँ रोज आ ए जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना   अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।   मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ जग मे ं , नहीं मिट सका है धरा का अँधेर ा , उतर क्यों न आयें नखत सब नयन क े , नहीं कर सकेंगे ह्रदय में उजेर ा , कटेंगे तभी यह अँधरे घिरे अ ब , स्वयं धर मनुज दीप का रूप आ ए जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना   अँधेरा धरा पर कहीं रह न जा ए।               नीरज जी की अन्य रचनाएं कविताकोष से साभार  ·          आसावरी / गोपालदास "नीरज"