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फास्ट एरा बनाम फेसबुक, टिवटर और व्हाट्सएप : डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

समीक्षक का काम टिप्पणी करना होता है। उसकी समझ से वह जो भी कर रहा है , ठीक ही है। मैं यह कत्तई नहीं मान सकता , क्योंकि टिप्पणियाँ कई तरह की होती हैं। कुछेक लोग उसे पसन्द करते हैं , बहुतेरे नकार देते हैं। पसन्द और नापसन्द करना यह समीक्षकों की टिप्पणियाँ पढ़ने वालों पर निर्भर हैं। बहरहाल कुछ भी हो आजकल स्वतंत्र पत्रकार बनकर टिप्पणियाँ करने वालों की संख्या में वृद्धि हुई हैं , जिनमें कुछ नए हैं तो बहुत से वरिष्ठ (उम्र के लिहाज से) होते हैं। 21 वीं सदी फास्ट एरा कही जाती है , इस जमाने में सतही लेखन को बड़े चाव से पढ़ा जाता हैं। बेहतर यह है कि वही लिखा जाये जो पाठको को पसन्द हो! आकरण अपनी विद्वता कर परिचय देना सर्वथा उपयुक्त नहीं हैं। चार दशक से ऊपर की अवधि में मैने भी सामयिकी लिखने में अनेकों बार रूचि दिखाई , परिणाम यह होता रहा कि पाठकों के पत्र आ जाते थे , वे लोग स्पष्ट कहते थे कि मैं अपनी मौलिकता न खोऊँ। तात्पर्य यह कि वही लिखूँ जिसे हर वर्ग का पाठक सहज ग्रहण कर ले। जब जब लेखक साहित्यकार बनने की कोशिश करता है , वह नकार दिया जाता है। जिसे साहित्य ही पढ़ना होगा , वह अखबार/पोर्टल क्यों सब्