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मेरा संसार :ब्लॉग कहानी भाग 02

छवि-साभार : शैली खत्री के ब्लॉग बार -बार देखो से समय चक्र ने रुकना कहाँ सीखा यदि समय रुक जाना सीख लेता तो कितना अजीब सा दृश्य होता . प्रथम प्रीत का मुलायम सा एहसास मेरे जीवन में आज भी कभी उभर आता है . मधुबाला सी अनिद्य सुन्दरी जीवन में प्रवेश करती है . चंचला सुनयनी मेरी प्रिया का वो नाम न लूंगा जो है उसे क्षद्म ही रखना उसका सम्मान है . चलिए सुविधा के लिए उसे "मधुबाला" नाम दे दिया जाए .दब्बू प्रकृति का मैं किसी मित्र के अपमानजनक संबोधन से क्षुब्ध कालेज की लायब्रेरी में किताब में मुंह छिपाए अपने आप को पढ़ाकू साबित कर रहा था. तभी मधु जो मेरे पीछे बैठी मेरे एक एक मूवमेंट पर बारीकी से निगाह रख रही थी बोल पड़ी : ' क्या हुआ ?.... रो क्यों रहे हो ?' ' कुछ तो नहीं ?' नहीं , दीपक से कोई कहा सुनी हो गई ? नहीं तो .........! विस्मित मैं उससे छुटकारा पाने की गरज से क्लास अटैंड करने का बहाना करके निकल गया. मधु मेरा पीछा करते-हुए सीडियों से उतर रही थी , कर मधु ने अपने जन्म दिन का न्योता दिया . और मे