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पाडकास्ट : जैसे तुम सोच रहे साथी

श्रीमति रचना बजाज के सौंजन्य से प्राप्त श्री विनोद श्रीवास्तव जी की एक रचना -- सुनिए  उ नकी  ही आवाज में --- जैसे तुम सोच रहे साथी  जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम, जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम। पिंजरे जैसी इस दुनिया में, पंछी जैसा ही रहना है, भर पेट मिले दाना-पानी,लेकिन मन ही मन दहना है। जैसे तुम सोच रहे साथी, वैसे संवाद नहीं हैं हम, जैसे तुम सोच रहे साथी, वैसे आजाद नहीं हैं हम। आगे बढ़नें की कोशिश में ,रिश्ते-नाते सब छूट गये, तन को जितना गढ़ना चाहा,मन से उतना ही टूट गये। जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आबाद नहीं हैं हम, जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम। पलकों ने लौटाये सपने, आंखे बोली अब मत आना, आना ही तो सच में आना,आकर फिर लौट नहीं जाना। जितना तुम सोच रहे साथी,उतना बरबाद नहीं हैं हम, जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम। आओ भी साथ चलें हम-तुम,मिल-जुल कर ढूंढें राह नई, संघर्ष भरा पथ है तो क्या, है संग हमारे चाह नई। जैसी तुम सो