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कौन है किलर झपाटा किधर गया किलर झपाटा

              हिन्दी ब्लागिंग के   स्वर्णकाल कहे गए दौर में एक ऐसा चरित्र भी सक्रिय  था  जिसकी हर किसी से कहा-सुनी खुले आप हो जाया करती थी जिसका नाम है " किलर-झपाटा " ।            किलर झपाटे  के झापड़ कब किसे पड़ जाएँ किसी को जानकारी नहीं होती थी । ऐसा नहीं कि किलर झपाटा किसी से भी उलझता था पर उलझता अवश्य ही था । किसी भी ब्लाग लेखक से खूता मोल तब तक न लिया जाता था जब तक उसे लगता था कि उसका लेखन सार्थक है ज़रा भी बेसऊर  लेखन दिखा तो भाई टिपिया आते थे मातृ-भगनी अलंकरण से भी पीछे नहीं रहते ।           किलर झपाटा के बहाने बता दूँ कि उस दौर में खोमचे बाजी शिखर पर थी टांग खिंचाई , आलेख की प्रतिक्रिया स्वरूप प्रति लेखन देख कर लगता था कि नेट पर नेटिया साहित्य समाज में एक महान  क्रान्ति को जनने (जन्म देने ) वाला है ।   हिन्दी में  ब्लागिंग में दो सूत्र  बड़े अहम  थे एक - इग्नोर करो ... दूसरा - मौज लीजिये ..... जो इन अहम सूत्रों में से किसी एक का भी पालन करते  थे हमेशा  खुश रहते थे ...... जिसने अपनी अपनी चलाई उसका रूमाल महफूज बाबा के रूमाल की तरह सदा गीला ही रहता था ।   चलि