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ढाई आखर “अन्ना” का पढ़ा वो पण्डित होय !!

साभार : आई बी एन ख़बर पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआं,पण्डित भया न कोय ढाई आखर “अन्ना” का पढ़ा वो पण्डित होय !! वो जिसने बदली फ़िज़ा यहां की उसी के सज़दे में सर झुका ये तू कितने सर अब क़लम करेगा, ये जो कटा तो वो इक उठा है *********************** तेरी हक़ीक़त   तेरी तिज़ारत   तेरी सियासत, तुझे मुबारक़-- नज़र में तेरी हैं हम जो तिनके,तो देख ले अब हमारी ताक़त !! कि पत्ता-पत्ता हवा चली है.. तू जा निकल जा बदन छिपा के !!                           वो जिसने बदली फ़िज़ा यहां की उसी के सज़दे में सर झुका ये *********************** थी तेरी साज़िश कि टुकड़े-टुकड़े हुआ था भारत, वही जुड़ा है तेरे तिलिस्मी भरम से बचके, हक़ीक़तों की तरफ़ मुड़ा है....!!                          अब आगे आके तू सर झुक़ा ले..या आख़िरी तू रज़ा बता दे ..? *********************** ये जो हक़ीक़त का कारवां हैं,तेरी मुसीबत का आसमां है कि अपनी सूरत संवार आके, हमारे हाथों में आईना है..!                         अग़रचे तुझमें नहीं है हिम्मत,तो घर चला जा..या मुंह छिपा ले ! ***********

लोकतंत्र को आलोक-तंत्र बनाने की कवायद

लोकतंत्र को   आलोक-तंत्र बनाने की कवायद   करता. भारत पैंसठ साल का    बुड्ढा..    हो गया.. अपनी पुरानी यादों में खो गया.......!! दीवारों पर कांपते हाथों से लिख रहा था   " आलोक-तंत्र" लोग भी आये आगे   बूढ़े का मज़ाक  उड़ा कर भागे..!! कुछ खड़े रहे मूक दर्शक बन ..! कुछ गा रहे थे बस हम ही हम..!!   कोलाहल तेज़ हुआ फ़िर बेतहाशा   हर ओर नज़र छाने लगी निराशा ! सबकी अलग थलग थी भाषा- कांप रही थी बच्चों की जिग्यासा !! कल क्या होगा.. सोच रहे थे बच्चे   एक बूड़ा़ बोला :-"भागो किसी लंगड़े की पीठ पे लद के ही " जान बचाओ.. छिप छिपाकर..   हमें नहीं चाहिये न्याय ,  क्या करेंगें स्विस का पैसा लेकर   फ़हराने दो उनको तिरंगा ये है उनका संवैधानिक अधिकार... रामदेव..अन्ना... सब कर रहे शब्दों का व्यापार.. अरे छोड़ो न यार फ़िज़ूल में मत करो वक्त बरबाद.. गूंगे फ़रियादीयो कैसे बोलोगे बहरी व्यवस्था की भी तो कोई मज़बूरी है वो कानों से देखेगी...!! सदन में चीत्कारेंते हैं.. हमारे लिये हां..ये वही लोग हैं जो सड़क पर दुत्कारतें हैं... पूरे तो होने दो पांच साल बदल देना इस बरगद की छाल... अभी चलो घर चल

बवाल के स्वरों में सुनिये गीत " कुछ झन झन झन था"

लुकमान चाचा  बवाल हिंदवी यानी एक सम्पूर्ण कलाकार यानी एकदम पूरा का पूरा बवाल जब मंच पर आये तो समझिये लोग एक पल भी ऐसे बवाल से दूर न होने की क़सम खा लेते हैं. विनोबा-भावे ने  जबलपुर को सैंत में न दिया ये नाम एक बानगी तो देखिये.... लाल और बवाल ब्लाग से साभार   ब वाल एक ऐसे उस्ताद का शागिर्द है जिनने उर्दू -कव्वाली कव्वाली से उर्दू का एकाधिकार समाप्त किया.हिंदी कविताओं गीतों को प्रवेश दिलाया था कवाली-शैली की गायकी में. बवाल के गुरु स्वर्गीय लुकमा न जो गंधर्व से कम न थे. हम लोगों में  गज़ब की दीवानगी थी चच्चा के लिये...देर रात तक उनको सुनना उनकी महफ़िल सजाना एक ज़ुनून था.. फ़िल्मी हल्के फ़ुल्के संगीत से निज़ात दिलाती चचा की महफ़िल की बात कैसे बयां करूं गूंगा हो गया हूं..गुड़ मुंह में लिये    आप सोच रहें हैं न कौन लुकमान कैसा लुकमान कहाँ  का लुकमान जी हाँ इन सभी सवालों का ज़वाब उस दौर में लुकमान ने दे दिया था जब  उनने पहली बार भरत-चरित गाया. और हाँ तब भी तब भी जब गाया होगा ''माटी की गागरिया '' या  मस्त चला इस मस्ती से थोड़ी-थोड़ी मस्ती ले लो     ( आगे देखिये

ललित जी डर के आगे जीत है भई ..!!

बताईये दबंग कौन..? " जबलपुरिया दबंगई -" हजूर जापान की सुनामी से विचलित होकर आप कुछ अधिक व्यग्र नज़र आ रहे हैं. हम तो फ़गुआहट से प्रभावित अपने मत दाताओं यानी माननीय सुधि पाठकों भावना की कदर करते हुए चाह रहे थे कि वार्ता कुण्ठा जन्य परिस्थियों की वज़ह से अवरुद्ध न हो. आपने हमारी सद भावना को सर्वथा ग़लत दिशा दी...! आप भी क्या कर सकते हैं विजया-सेवनोपरांत ऐसा ही लिखा जाता है. "विजया को ऐसो नशा हो गये लबरा मौन पत्नि से पूछे पति:-"हम आपके कौन..?" ललित जी डर के आगे जीत है भई ..!! मुझे "मूंछ उमेठन चुनौती से भय नहीं याद रखिये यह भी कि खरा आदमीं हूं कुम्हड़े का फ़ूल नहीं जो तर्जनी देख के डर जाऊं ! जब से होश सम्हाला है जूझता ही आया हूं किंतु आपकी पीडा मैं समझ सकता हूं आप ने आक्रोशवश जो भी लिखा उसे नज़र अंदाज़ करते हुए मैं सम्पूर्ण स्थितियों से पर्दा उठा देना चाहता हूं ताकि आप जैसे मित्र से मेरा जुड़ाव सतत रहे १. ब्लाग4वार्ता एक स्नेह का अबोला अनुबंध है २. ब्लाग4वार्ता को मेरे-आपके अलावा कई और मित्रों खासकर मेरे और आपके लिये आदरणीया संगीता पुरी जी , के स्

एक साथी एक सपना ...!!

एक साथी एक सपना साथ ले हौसले संग भीड़ से संवाद के । ००००० हम चलें हैं हम चलेगे रोक सकते हों तो रोको हथेली से तीर थामा क्या मिलेगा मीत सोचो । शब्द के ये सहज अनुनाद .. से .....!! ०००००० मन को तापस बना देने, लेके इक तारा चलूँ । फर्क क्या होगा जो मैं जीता या हारा चलूँ ......? चकित हों शायद मेरे संवाद ... से ......!! ०००००० चलो अपनी एक अंगुल वेदना हम भूल जाएं. वो दु:खी है,संवेदना का, गीत उसको सुना आएं कोई टूटे न कभी संताप से ......!!

पारे की उछाल :बवाल हुये लाल

जी आज अखबारों ने बताया कि पारा 45 डिग्री को छू रहा है . ब्लॉगर मित्र मियाँ बवाल सवा नौ बजे पधारे कहने लगे गिरीश भाई बाहर तो खूब गरम है "आल इज़ नॉट वैल"..... गरमी से बेहाल हुए " लाल ” को लस्सी पिला के पाडकास्ट रिकार्ड किया पेश ए ख़िदमत है :- मज़ेदार बात चीत इसे इधर भी सुना जाये Powered by Podbean.com

मन का पंछी / यू ट्यूब पर सुनिए

Man ka Panchhi मन का पंछी यू  ट्यूब पर सुनिए  मन का पंछी खोजता ऊँचाइयाँ, और ऊँची और ऊँची उड़ानों में व्यस्त हैं। चेतना संवेदना, आवेश के संत्रास में, गुमशुदा हैं- चीखों में अनुनाद में। फ़लसफ़ों का किला भी तो ध्वस्त है। मन का पंछी. . . कब झुका कैसे झुका अज्ञात है, हृदय केवल प्रीत का निष्णात है। सुफ़ीयाना, इश्क में अल मस्त है- मन का पंछी. . . बाँध सकते हो तो बाँधो, रोकना चाहो तो रोको, बँधा पंछी रुका पानी, मृत मिलेगा मीत सोचो उसका साहस और जीवन इस तरह ही व्यक्त है।।

काट लूं साले कुत्तों को और खबर बन जाऊं

खजाना पर देर छापे आलेख का पुनर्प्रकाशन       उस दिन शहर के अखबार समाचार पत्रों में रंगा था समाचार मेरे विरुद्ध जन शिकायतों को लेकर हंगामा, श्रीमान क के नेतृत्व में आला अधिकारीयों को ज्ञापन सौंपा गया ?नाम सहित छपे इस समाचार से मैं हताशा से भर गए  उन बेईमान मकसद परस्तों को अपने आप में कोस रहा था  किंतु कुछ न कर सका राज़ दंड के भय से बेचारगी का जीवन ही मेरी नियति है. एक दिन मैं एक पत्रकार मित्र से मिला और पेपर दिखाते हुए उससे निवेदन किया -भाई,संजय इस समाचार में केवल अमुक जी का व्यक्तिगत स्वार्थ आपको समझ नहीं आया ? आया भाई साहब किंतु , मैं क्या करुँ पापी पेट रोटी का सवाल है जो गोल-गोल तभी फूलतीं हैं जब मैं अपने घर तनखा लेकर आता हूँ…..! तो ठीक है ऐसा करो भइयाजी,मेरी इन-इन उपलब्धियों को प्रकाशित कर दो अपने लीडिंग अखबार में ! ये कहकर मैने  अपनी उपलब्धियों को गिनाया जिनको  सार्वजनिक करने से कल तक शर्माते था . उनकी बात सुन कर संजय ने कहा  भैयाजी,आपको इन सब काम का वेतन मिलता है ,कोई अनोखी बात कहो जो तुमने सरकारी नौकर होकर कभी की हो ? मैं -अनोखी बात…….? संजय ने पूछा -अरे हाँ, जिस बात को ल

बन्दर और चश्मा

साँस जो ली जाती है चाहे अनचाहे जीने के लि ऐ जी हाँ इन्हीं साँसों के साथ अंतस मे मिल जाती है विषैली हवाओं में पल रहे विषाणु उगा देते हैं शरीर में रोग इसे विकास कहते हैं जो जितना करीब है पर्यावरण से उतना सुरक्षित है कम-अस-कम बीमार देह लेकर नहीं मरता पूरी उम्र मिलती है उसे मान के सीने से चिपका बंदरिया का बेटा कल मैंने उसे चूसते देखा है "मुनगे की फली " बेटी ने कहा :-"पापा,आज पिज्जा खाना है...!" मैंने कहा :-"ज़रूर पर बताओ बन्दर का बेटा, क्या खा रहा है ? " झट जबाब मिला:-"मुनगा " आप को पसंद नहीं है॥? न तो आपने मुझे चश्मा लगाए देखा है न ? हाँ,पापा देखा है.....!पर ये सवाल क्यों..........? मेरे अगले सवाल पे हंस पडी बिटिया ''बन्दर,को कभी चश्मा लगाऐ देखा बेटे...?'' पापा.ये कैसा सवाल है बेटे,जो प्रकृति के जितना पास है उतना ही सुरक्षित है । इसका अर्थ बिटिया कब समझेगी इस सच से बेखबर चल पङता हूँ , बाज़ार से पिज्जा लेने [ कविता:मुकुल/चित्र:प्रीती]

तुमको सोने का हार दिला दूँ

सुनो प्रिया मैं गाँव गया था भईयाजी के साथ गया था बनके मैं सौगात गया था घर को हम दौनों ने मिलकर दो भागों मैं बाँट लिया था अपना हिस्सा छाँट लिया था पटवारी को गाँव बुलाकर सौ-सौ हथकंडे आजमाकर खेत बराबर बांटे हमने पुस्तैनी पीतल के बरतन आपस मैं ही छांटे हमने फ़िर खवास से ख़बर बताई होगी खेत घर सबकी बिकवाई अगले दिन सब बेच बांच के हम लौटे इतिहास ताप के हाथों में नोट हमारे सपन भरे से नयन तुम्हारे प्लाट कार सब आ जाएगी मुनिया भी परिणी जाएगी सिंटू की फीस की ख़ातिर अब तंगी कैसे आएगी ? अपने छोटे छोटे सपने बाबूजी की मेहनत से पूरे पतला खाके मोटा पहना माँ ने कभी न पहना गहना चलो घर में मैं खुशियाँ ला दूँ तुमको सोने का हार दिला दूँ =>गिरीश बिल्लोरे मुकुल [निवेदन:इस कविता के साथ लगी फोटो पर जिस किसी को भी आपत्ति सत्व के कारण हो तो कृपया तत्काल बताइए ताकी वैकल्पिक व्यवस्था की जावे सादर:मुकुल ]

"गिद्ध रहें न रहें गिद्धियत शेष रहेगी...!!"

sachin sharma ने कहा 80 लाख थे, 10 हजार रह गए!भईया इनकी जनरेशन की अब कोई ज़रूरत नहीं हैं । आदम जात में इनकी प्रवृत्ति ज़िंदा रहेगी ही । मौत बनते राजमार्ग! भी सच है राज के रास्ते चलते लोगों की आत्म-सम्मान,संवेदना,ईमान,सब कुछ मर जाता है । ज़िंदा रहती है केवल लिप्सा । लाशों के ढेर पर "राज" निति की बुनियाद इक एतिहासिक सत्य है। इब्ने-इन्साँ ने खूब कहा - " अपनी ज़ुबां से कुछ न कहेंगे चुप ही रहेंगे आशिक़ लोग, तुम से तो इतना हो सकता है पूछो हाल बेचारों का " SUYOG PATHAK ने गया उदय प्रकश जी का गीत स्वयम में ब्रह्म का एहसास दिलाता है।

*KHAZANA*: "भेडाघाट के बच्चे"

"भेडाघाट के बच्चे" अभी भी ५ रूपए के लिए धुआं धार में कूद जाते हैं । आप सिक्का फैंकिए वे उठा के लाते हैं.....?

एक लघु कथा सा दृश्य

वो मुझे मेरे किये धरे कार्यों की गलतियाँ गिनाता , सबके सामने खुले आम मुझे ज़लील करता हुआ अपने को मेरा भाग्य विधाता साबित करता है......! सच मुझे ईश्वर ने जीते जी अपने मरने का दु:ख सह सकने की ताकत न दी होती तो मैं उस बेचारे मूर्ख को भी आइना दिखा देता और होता ये कि -"मुझे नौकरी से हाथ धोना पङता , मेरे का बच्चों का स्कूल छूट जाता , मैं कोर्ट कचहरी के चक्कर में उलझ जाता । धीमे-धीमे मेरे करीब आता न्याय .... और ज़लालत से मिलाती निजात । लेकिन तब तक मैं दुनियाँ से बीस बरस पीछे चला जाता और आगे होती चाटूकारों की फौज सो मैं चुप हूँ ......... लेकिन उसको आइना तो दिखाना ही है... जो मुझे आइना दिखाता है ! कितनी वाहियाद जिन्दगी जीते हैं ये लोग जो सिरमौर होते हैं जो कितनी गंदी सोच लेकर पैदा किया होगा इनके माँ-बाप ने , बकौल मित्र प्रशांत कौरव :-"ये लोग शरीरों की रगड़ का रिज़ल्ट हैं।" ये कुछ तनाव के कारण पैदा हुए लोग है ..... जो कभी भी तनाव बोने में पीछे नहीं हैं। इनको तो जमा होना था तानाशाह के इर्द गिर्द ....? देखिए हर कोई अपनी बाजीगरी के चक्कर में दूसरे की दुर्गति करता नज़र आ रहा है । ऊपर

सर्वज्ञता का अहंकार

प्रेमिका और पत्नी

प्रिया बसी है सांस में मादक नयन कमान छब मन भाई,आपकी रूप भयो बलवान। सौतन से प्रिय मिल गए,बचन भूल के सात बिरहन को बैरी लगे,क्या दिन अरु का रात प्रेमिल मंद फुहार से, टूट गयो बैराग, सात बचन भी बिसर गए,मदन दिलाए हार । एक गीत नित प्रीत का,रचे कवि मन रोज, प्रेम आधारी विश्व की , करते जोगी खोज । । तन मै जागी बासना,मन जोगी समुझाए- चरण राम के रत रहो , जनम सफल हों जाए । । दधि मथ माखन काढ़ते,जे परगति के वीर, बाक-बिलासी सब भए,लड़ें बिना शमशीर . बांयें दाएं हाथ का , जुद्ध परस्पर होड़ पूंजी पति के सामने,खड़े जुगल कर जोड़

इस सप्ताह वसंत के अवसर पर मेरी भेंट स्वीकारिए

पूर्णिमा वर्मन ने अनुभूति में सूचीबद्ध कर लिया है है उनका आभारी हूँ । अनुभूति अभिव्यक्ति वेब की बेहतरीन पत्रिकाएँ है इस बार के अंक में भी हें मेरी उपस्थिति इस तरह दोहों में- डॉ. गोपाल बाबू शर्मा राजनारायण चौधरी गिरीश बिल्लोरे मुकुल बस एक चटका लगाने की देर है॥ नीचे चटका लगा के मुझ से मिलिए गिरीश बिल्लोरे ''मुकुल''