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जनतांत्रिक-चैतन्यता बनाम हमारे अधिकार और कर्तव्य

                 यही सही वक़्त  है जब कि हमें जनतांत्रिक संवेदनाओं का सटीक विश्लेशण कर उसे समझने की कोशिश करनी चाहिये. भारतीय गणतांत्रिक व्यवस्था में जहां एक ओर आदर्शों की भरमार है वहीं  सेंधमारी की के रास्तों की गुंजाइश भी है. जिनको अनदेखा करने  की हमारी आदत को नक़ारा नहीं जा सकता. हम हमेशा बहुत कम सोच रहे होते हैं. केवल जनतंत्र की कतिपय प्रक्रियाओं को ही जनतंत्र मान लेते हैं. जबकि हमें जनतंत्र के मूल तत्वों को समझना है उसके प्रति संवेदित होना है. अब वही समय आ चुका ज हमें आत्म-चिंतन करना है                     हम, हमारे जनतंत्र किस रास्ते  ले जा रहें हैं इस मसले पर हम कभी भी गम्भीर नहीं हुए. हमारे पास चिंता के विषय बहुतेरे हैं जबकि हमें चिंतन के विषय दिखाई नहीं दे रहे अथवा हम इसे देखना नहीं चाहते. हमारी जनतांत्रिक संवेदनाएं समाप्त प्राय: नहीं तो सुप्त अवश्य हैं.वरना दामिनी की शहादत पर बेलगाम बातें न होंतीं. हम जनतंत्र के प्रति असंवेदित नहीं पर सजग नहीं हैं. न ही हमने इस बिंदु पर अपनी संतानों को ही कुछ समझाइश ही दी है. हम केवल चुनाव तक जनतंत्र  के प्रति संवेदित हैं ऐसी मेरी व्य

विमर्श

संदेह को सत्य समझ के न्यायाधीश बनने का पाठ हमारी . "पुलिस " को अघोषित रूप से मिला है भारत / राज्य सरकार को चाहिए की वे ,सामाजिक आचरण के अनुपालन कराने के लिए ,पुलिस को दायित्व नहीं देना चाहिए . इस तरह के मामले ,चाहे सही भी हों विषेशज्ञ से परामर्श के पूर्व सार्वजनिक न किएँ ,जाएँ , एक और आरुशी के मामले में पुलिस की भूमिका , के अतिरिक्त देखा जा रहा है पुलिस सर्व विदित है . सामान्य रूप से पुलिस की इस छवि का जन मानस में अंकन हो जाना समाज के लिए देश के लिए चिंतनीय है , सामाजिक - मुद्दों के लिए बने कानूनों के अनुपालन के लिए पुलिस को न सौंपा जाए बल्कि पुलिस इन मामलों के निपटारे के लिए विशेष रूप से स्थापित संस्थाओं को सौंपा जाए । संदेह को सत्य समझ के न्यायाधीश बनने का पाठ हमारी पुलिस को अघोषित रूप से मिला है भारत / राज्य सरकार को चाहिए की वे सामाजिक आचरण के अनुपालन कराने के लिए पुलिस को दायित्व नहीं देना चाहिए . इस तरह के मामले