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विश्व कवि मुक्तिबोध का स्मरण

गजानन माधव 'मुक्तिबोध', मुक्तिबोध की रचनाएँ कविता कोश में ,भूरी-भूरि खाक धूलि तो अंतर जाल पर उपलब्ध हैं उससे हटके मेरी नज़र में गजानन माधव "मुक्तिबोध" सदकवियों, विचारकों सामान्य-पाठकों , शोधार्थियों के लिए अनवरत ज़रूरी है.   मुझे जो रचनाएं  बेहद पसंद है वे ये रहीं जो विकी से साभार लीं जाकर सुधि पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है, मुक्ति बोध का य चित्र जबलपुर में शशिन जी ने उतारा था भूल ग़लती / गजानन माधव मुक्तिबोध पता नहीं... / गजानन माधव मुक्तिबोध ब्रह्मराक्षस / गजानन माधव मुक्तिबोध दिमाग़ी गुहान्धकार का ओरांगउटांग! / गजानन माधव मुक्तिबोध लकड़ी का रावण / गजानन माधव मुक्तिबोध चांद का मुँह टेढ़ा है. / गजानन माधव मुक्तिबोध डूबता चांद कब डूबेगा / गजानन माधव मुक्तिबोध एक भूतपूर्व विद्रोही का आत्म-कथन / गजानन माधव मुक्तिबोध मुझे पुकारती हुई पुकार / गजानन माधव मुक्तिबोध मुझे क़दम-क़दम पर / गजानन माधव मुक्तिबोध मुझे याद आते हैं / गजानन माधव मुक्तिबोध मुझे मालूम नहीं / गजानन माधव मुक्तिबोध मेरे लोग / गजानन माधव मुक्तिबोध मेरे सहचर मित्र /

स्वर्गीय केशव पाठक

मुक्तिबोध की ब्रह्मराक्षस का शिष्य , कथा को आज के सन्दर्भों में समझाने की कोशिश करना ज़रूरी सा होगया है । मुक्तिबोध ने अपनी कहानी में साफ़ तौर पर लिखा था की यदि कोई ज्ञान को पाने के बाद उस ज्ञान का संचयन,विस्तारण, और सद-शिष्य को नहीं सौंपता उसे मुक्ति का अधिकार नहीं मिलता । मुक्ति का अधिकारक्या है ज्ञान से इसका क्या सम्बन्ध है,मुक्ति का भय क्या ज्ञान के विकास और प्रवाह के लिए ज़रूरीहै । जी , सत्य है यदि ज्ञान को प्रवाहित न किया जाए , तो कालचिंतन के लिए और कोई आधार ही न होगा कोई काल विमर्श भी क्यों करेगा। रहा सवाल मुक्ति का तो इसे "जन्म-मृत्यु" के बीच के समय की अवधि से हट के देखें तो प्रेत वो होता है जिसने अपने जीवन के पीछे कई सवाल छोड़ दिये और वे सवाल उस व्यक्ति के नाम का पीछा कर रहेंहो । मुक्तिबोध ने यहाँ संकेत दिया कि भूत-प्रेत को मानें न मानें इस बात को ज़रूर मानें कि "आपके बाद भी आपके पीछे " ऐसे सवाल न दौडें जो आपको निर्मुक्त न होने दें !जबलपुर की माटी में केशव पाठक,और भवानी प्रसाद मिश्र में मिश्र जी को अंतर्जाल पर डालने वालों की कमीं नहीं है किंतु केशवपाठ