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तो क्या अब तक का प्रजातंत्र सामंतशाही जैसा था ..?

आम जीवन का पावर की तरफ़ पहला क़दम ही तो है साभार : ndtv  के इस पन्ने से बेशक कल आम-जीवन और खास जीवन में कोई फ़र्क न होगा तो क्या अब तक का प्रजातंत्र सामंतशाही जैसा था .. ? यह सवाल  केज़रीवाल वाले प्रजातांत्रिक मोड तक आते ही तेज़ी से ज़ेहनों में गूंजने लगा है.   ऐसे सवाल उठने तय थे अभी तो बहुत से सवाल हैं जिनका उठना सम्भव ही नहीं तयशुदा भी है  . मसलन क्या वाक़ई हम आज़ादी से दूर हैं.. क्या सियासी एवम ब्योरोक्रेटिक सिस्टम के साथ आम आज़ादी एक आभासी आज़ादी से इतर कुछ भी न थी . ..? अथवा पावर में आते ही आम आज़ादी से परहेज़ होने लगता है.. !!       वास्तव में प्रजातांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ़ जाते हुए नज़र आने वाले ये सवाल इस लिये उठ रहे हैं क्योंकि कहीं न कहीं आम-जीवन ये महसूस करने लगा था कि -"डेमोक्रेटिक-सिस्टम" में उसका हस्तक्षेप पांच बरस में बस एक बार ही हो सकता है. पांचवे बरस आते आते भोला-भाला आम-जीवन अपने आप को कुछ तय न कर पाने की स्थिति में पाता है. और तब जो भी कुछ तात्कालिक वातवरण आम जीवन के पक्ष में बनता है यक़ीनन आम जीवन उसी के साथ होता है.     पर भारतीय प्रज़ातांत्रिक व्यवस्थ