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*अनकही* 🦋women's day special

🦋 *अनकही* 🦋 *वह कहता था* *वह सुनती थी*  *जारी था एक खेल*  *कहने सुनने का*   *खेल में थी दो पर्चियाँ* *एक में लिखा था ‘कहो’* *एक में लिखा था ‘सुनो’*   *अब यह नियति थी* शरद कोकास  *या महज़ संयोग* *उसके हाथ लगती रही*  *वही पर्ची* *जिस पर लिखा था ‘सुनो’* *वह सुनती रही*   *उसने  सुने आदेश* *उसने सुने उपदेश* *बन्दिशें उसके लिए थीं* *उसके लिए थीं वर्जनाए* *वह जानती थी*  *कहना सुनना नहीं हैं* *केवल हिंदी की क्रियाएं*   *राजा ने कहा ज़हर पियो* *वह मीरा हो गई* *ऋषि ने कहा पत्थर बनो* *वह अहिल्या हो गई* *प्रभु ने कहा घर से निकल जाओ* *वह सीता हो गई* *चिता से निकली चीख* *किन्हीं कानों ने नहीं सुनी* *वह सती हो गई*   *घुटती रही उसकी फरियाद* *अटके रहे उसके शब्द*  *सिले रहे उसके होंठ* *रुन्धा रहा उसका गला*   *उसके हाथ कभी नहीं लगी* *वह पर्ची* *जिस पर लिखा था - ‘ कहो* ’ ◆◆◆◆◆◆◆   More Poetry By Sharad Kokas