23.8.13

तुम परसाई जी के शहर से हो..?

तुम परसाई जी के शहर से हो..?
न ...!
जबईपुर से हो न....?
हां....!
तो उनका ही शहर है न...!
न पत्थरों का है...!
हा हा समझा तुम उनके शहर के ही हो..
न...
उनके मुहल्ले का हूं.. राइट टाउन में ही रहते थे. उनके हाथ की गटागट वाली गोली भी खाई है. बचपने में. कालेज के दिनों में तो उनका कद समझ पाया था. सो बस उनके चरणों की तरफ़ बैठने की इच्छा हुआ करती थी.
   परसाई जी पर बतियाते बतियाते जबलपुर प्लेट फ़ार्म पर गाड़ी आ टिकी... चाय बोलो चाय गरम. के अलावा और भी कुहराम सुनाई पड़ा भाई.. आपका स्टेशन आ गया.. आप तो घर पहुंच जाओगे मुझे तो कटनी से   उत्कल पकड़नी है. राम जुहार के बाद सज्जन से बिदा ली अपन भी निकल लिये. आधे घंटे बाद बीना एक्सप्रेस भी  निकल गई होगी.
 शहर परसाई का ही तय है... पर केवल परसाई का.. न उनको उनके समय नकारने वालों का भी है. अक्सर ऐसा ही होता है... जीवन काल में किसी को जो नहीं भाता उसे बाद में खटकता है..
ओशो परसाई के बीच तत्समय जो शिखर वार्ताएं हुआ करती थीं एक सकारात्मक साहित्य के रूप में उसे देखा समझा जा सकता है. परसाई जी और ओशो के जन्मस्थली  बीच कोई खास अंतर न था . होशंगाबाद के आस-पास की पैदाईश दौनो महर्षियों की थी. दौनों का व्यक्तित्व  सम्मोहक और अपनी अपनी खासियतों से लबरेज़ कहा जा सकता है. कल्पना वश दौनों की विचारशैलियों का सम्मिश्रण करना भी चाहो तो भी नर्मदा के दौनो तीर का मिलना सम्भव नहीं. पर क्रांतिकारी दौनों ही थे . एक ने परा को नकारने की कोशिश की तो दूसरे ने वर्तमान पर तीक्ष्ण वार करने में कोई कोताही नहीं बरती. टार्च तो दौनों ने बांटे . हां तो परसाई जी ने जो भी देखा लिक्खा अपनी स्टाइल में ओशो ने कहा अपनी स्टाइल में. पर आपसी वैचारिक संवादों से साहित्य-सृजन हुआ यह सच है.
                      परसाई जी का व्यंग्य करने का तरीका देखिये  "तस्करी सामान की भी होती है – और आध्यात्मिक तस्करी भी होती है. कोई आदमी दाढ़ी बढ़ाकर एक चेले को लेकर अमेरिका जाए और कहे, “मेरी उम्र एक हज़ार साल है. मैं हज़ार सालों से हिमालय में तपस्या कर रहा था. ईश्वर से मेरी तीन बार बातचीत हो चुकी है.” विश्वासी पर साथ ही शंकालु अमेरिकी चेले से पूछेगा – क्या तुम्हारे गुरु सच बोलते हैं? क्या इनकी उम्र सचमुच हज़ार साल है? तब चेला कहेगा, “मैं निश्चित नहीं कह सकता, क्यों कि मैं तो इनके साथ सिर्फ़ पाँच सौ सालों से हूँ.” " यहां समकालीन परिस्थिति पर प्रस्तुत वक्तव्य सार्वकालिक नज़र आ रहा है.
हां तो मित्रो मेरी मिसफ़िट बातों के बीच एक हक़ीक़त बताए देता हूं कि -
                             "परसाई के बाद कईयों की खूब चल निकली कई ने परसाई को ओढ़ा कई ने सिराहने रखा बस बिछा न पाये.. बिछा तो उनको जीते जी दिया था जबलपुर वालों नें.. बस छाती पे मूंग न दल पाए वैसे तो मूंग भी दल लेते पर मूंग क्या उनके मुंह मसूर के लायक न थे.. खैर छोड़ो परसाई की छाती पे दलहन दलने के जुगाड़ करने वालों में कई देवलोक वासी हो गए प उनका क्या जो परसाई को ओढ़ रहे हैं या सिराने रखे हैं.. अब इन महानुभावों पे क्या लिखूं.. इनका स्मरण कर उनके पुण्य स्मरण को आभासी नहीं बनाना चाहता हूं. एक प्रोफ़ेसर हैं बुंदेलखंड के न हरदा गये न टिमरनी ऐसा लिखा परसाई पे कि जैसे बस आज़ के वेद व्यास  वे ही हैं. किधर से का जोड़ा उनकी किताब में बांचते ही माथा पीट लिया.. परसाई जी का डी एन ए टेस्ट करने पे आमादा नज़र आए वो किताब में. आप तो जानते हो कि "गंज और नाखून" संग साथ होवें तो कितनी विषम स्थिति होती है  जी हां उतनी  ही मुश्किल जितना एक अधज्ञानी को कलम पकड़ा देने से होता है.
      ये कहना गलत है की परसाई किसी कुंठा का शिकार थे ऐसा मुझे नही लग रहा . आपकी आप जानें.  आपको लगे तो लगे.  समकालीन स्थितियां क्या थीं तब कमसिन न होता तो बयां अवश्य कर पाता पर जितना श्रुत हुआ उस आधार पर कह सकता हूं कि न तो परसाई जी की जमीन ओशो ने अपने नाम कराई थी न ही परसाई जी ने ओशो की दूकान से उधारी पे टार्च वगैरा ले गये थे.  पाज़िटिव नज़रिये से देखा जाए तो चेष्टा दौनों की सकारात्मक ही रही   परसाई जी और ओशो ऐसे चित्रक थे जो अपने अपने कैनवस पर रंग भरने में अपने अपने तरीके से तल्लीन रहे. पर फ़क्कड़ होने की वज़ह से मुझे सबसे क़रीब परसाई जी ही लगते हैं. सचाई को नज़दीक से महसूस कर  लिखने वाले परसाई जी ने भोलाराम के जीव देख कर व्यवस्था को जो तमाचा जड़ा उसकी गूंज आज भी सुनाई देती है.  पर मुए सरकारी लोग आज भी जस के तस हैं..
    बड़े साब छोटे साब,  बड़े बाबू छोटे बाबू आधारित व्यवस्था को बदलने की कोशिश परसाई जी ने तब कर  डाली थी जब  व्यवस्था में लचर पचर तत्व प्रारम्भ ही हुए थे.. अब उफ़्फ़ अब तो अर्रा सी रही है व्यवस्था..
   श्री लाल शुक्ल के रागदरबारी वाले  लंगड़ को नकल मिली तब जब कि वो चुक गया... उधर दबाव इतना बढ़ गया कि आप व्यवस्था को सुधार नहीं सकते व्यवस्था सुधारने के लिए आपको दायां बांया देखना होगा . न देखा तो दुर्गा शक्ति की मानिंद दबा दिये जाओगे. मीडिया की अपनी मज़बूरी है उसे भी नये विषय चाहिये.. नहीं तो कल आप खुद कहोगे क्या वही पुरानी चटाई बिछा देता है मीडिया... हम लेखकों की अपनी मज़बूरी हैं कित्ता लिखें हमारा लिखा कित्ते लोग बांचते हैं.. जो पढ़ते हैं वो केवल टाइम पास करते हैं.. यानी केवल चल रही है गाड़ी सब के सब फ़िल्म सियासत और स्टेटस से हट के कुछ सोचने समझने के लिये तैयार ही नहीं हैं ऐसे दौर में परसाई जी जैसा व्यक्तित्व अधिक आवश्यक है...परसाई के साहित्य में तलाश कीजिये परसाई जी को जो केवल मेरे जबलईपुर का नहीं पूरे देश का है.. बिहार के भी जहां मिड डे मील वाले बच्चों के जीव तड़प रहे हैं एक अदद न्याय के लिये...           

21.8.13

हिंदुस्तानी मुसलमानों में दहेज का चलन : फ़िरदौस खान

[मेरी छोटी बहन  फ़िरदौस एक सामाजिक चिंतक एवम मेरी पसंदीदा लेखिका हैं. आज़ तक फ़िरदौस से मिलने का मौका मुझे नही मिला पर लगता है कि वो मेरे साथ है... राखी पर छोटी बहन को असीम स्नेह के साथ उनका आलेख प्रस्तुत है... firadous की लेखनी के तेवर उनके ब्लाग मौज़ूद है "मेरी-डायरी"  ]

हिंदुस्तानी मुसलमानों में दहेज का चलन तेज़ी से बढ़ रहा है. हालत यह है कि बेटे के लिए दुल्हन तलाशने वाले मुस्लिम अभिभावक लड़की के गुणों से ज़्यादा दहेज को तरजीह दे रहे हैं. एक तऱफ जहां बहुसंख्यक तबक़ा दहेज के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद कर रहा है, वहीं मुस्लिम समाज में दहेज का दानव महिलाओं को निग़ल रहा है. दहेज के लिए महिलाओं के साथ मारपीट करने, उन्हें घर से निकालने और जलाकर मारने तक के संगीन मामले सामने आ रहे हैं. बीती एक जुलाई को हरियाणा के कुरुक्षेत्र ज़िले के गांव गुआवा निवासी नसीमा की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई. करनाल ज़िले के गांव मुरादनगर निवासी नज़ीर की बेटी नसीमा का विवाह क़रीब छह साल पहले गांव गुआवा के सुल्तान के साथ हुआ था. 26 वर्षीय नसीमा की तीन बेटियां हुईं. उसके परिवार के लोगों का आरोप है कि नसीमा को दहेज के लिए परेशान किया जाता था. इतना ही नहीं, बेटियों को लेकर भी उसे दिन-रात ताने सुनने को मिलते थे. उनका यह भी कहना है कि उसके पति सुल्तान ने दहेज न मिलने की वजह से उसे फांसी दे दी. पुलिस ने सुल्तान के ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता की धारा 304 बी के तहत दहेज हत्या का मामला दर्ज किया है.

हरियाणा के करनाल ज़िले के गांव जैनपुर के मुस्लिम परिवार की सुनीता के साथ की गई दरिंदगी को देखकर रूह कांप उठती है. उसका निकाह 23 फ़रवरी, 2003 को हरियाणा के ही जींद ज़िले के गांव शंबो निवासी शेर सिंह के साथ हुआ था. उसने अपनी ज़िंदगी को लेकर कई इंद्रधनुषी सपने देखे थे, लेकिन उसके पति शेर सिंह की दहेज की मांग ने उसके सारे सपने बिखेर दिए. उसका पति बार-बार उससे अपने मायके से मोटरसाइकिल लाने की मांग करता. इस बात को लेकर उनके बीच लड़ाई-झगड़े होते. उसके पिता की इतनी हैसियत नहीं थी कि वह दहेज में अपनी बेटी को मोटरसाइकिल दे सकें. सुनीता की एक बेटी हुई, जिसका नाम सोनिया रखा गया. उसने सोचा कि औलाद होने के बाद शायद शेर सिंह सुधर जाए, लेकिन दहेज की मांग को लेकर उसने पत्नी को और ज़्यादा प्रताड़ित करना शुरू कर दिया. 5 नवंबर, 2005 को शाम तक़रीबन सात बजे जब सुनीता खाना बना रही थी, तब शेर सिंह आया और उससे मोटरसाइकिल की बात करने लगा. सुनीता ने मायके से मोटरसाइकिल लाने से इंकार कर दिया. इस पर शेर सिंह ने जलती लालटेन उस पर फेंक दी, जिससे उसके कपड़ों में आग लग गई. वह बुरी तरह झुलस चुकी थी. उसे अस्पताल में दाख़िल कराया गया. शेर सिंह के ख़िलाफ़ पत्नी की हत्या की कोशिश के आरोप में धारा-307 के तहत मामला दर्ज किया गया. जींद के अतिरिक्त ज़िला न्यायाधीश जे एस जांग़डा ने 8 अगस्त, 2007 को शेर सिंह को पांच साल की सज़ा सुनाई. सुनीता को इंसाफ़ तो मिल गया, लेकिन उसके पूरे जिस्म पर आग से झुलस जाने के दाग़ हैं, जो उसके ज़ख़्म को ताज़ा बनाए रखते हैं. ऐसे मामले आए दिन सामने आ रहे हैं. इंडियन स्कूल ऑफ़ वुमेंस स्टडीज एंड डेवलपमेंट के सर्वे के मुताबिक़, शादी के सात साल के भीतर मुस्लिम महिलाओं की अप्राकृतिक मौतें सबसे ज़्यादा गुजरात में हुईं. उनमें से ज़्यादातर महिलाओं की मौत का कारण दहेज उत्पीड़न रहा.

क़ाबिले-ग़ौर है कि दहेज की वजह से लड़कियों को पैतृक संपत्ति के हिस्से से भी अलग रखा जा रहा है. इसके लिए तर्क दिया जा रहा है कि उनके विवाह और दहेज में काफ़ी रक़म ख़र्च की गई है, इसलिए अब जायदाद में उनका कोई हिस्सा नहीं रह जाता. ख़ास बात यह भी है कि लड़की के मेहर की रक़म तय करते वक़्त सैकड़ों साल पुरानी रिवायतों का वास्ता दिया जाता है, जबकि दहेज लेने के लिए शरीयत को ताख़ पर रखकर बेशर्मी से मुंह खोला जाता है. हालत यह है कि शादी की बातचीत शुरू होने के साथ ही लड़की के परिजनों की जेब कटनी शुरू हो जाती है. जब लड़के वाले लड़की के घर जाते हैं तो सबसे पहले यह देखा जाता है कि नाश्ते में कितनी प्लेटें रखी गई हैं यानी कितने तरह की मिठाई, सूखे मेवे और फल रखे गए हैं. इतना ही नहीं, दावतें भी मुर्ग़े की ही चल रही हैं यानी चिकन बिरयानी, चिकन क़ोरमा वग़ैरह. फ़िलहाल 15 से लेकर 20 प्लेटें रखना आम हो गया है और यह सिलसिला शादी तक जारी रहता है. शादी में दहेज के तौर पर ज़ेवरात, फ़र्नीचर, टीवी, फ्रिज, वाशिंग मशीन, क़ीमती कपड़े और ताम्बे-पीतल के भारी बर्तन दिए जा रहे हैं. इसके बावजूद दहेज में कारें और मोटरसाइकिलें भी मांगी जा रही हैं, भले ही लड़के की इतनी हैसियत न हो कि वह इन वाहनों के तेल का ख़र्च भी उठा सके. जो अभिभावक अपनी बेटी को दहेज देने की हैसियत नहीं रखते, उनकी बेटियां कुंवारी बैठी हैं. मुरादाबाद की किश्वरी जीवन के 47 बसंत देख चुकी हैं, लेकिन अभी तक उनकी हथेलियों पर सुहाग की मेहंदी नहीं सजी. वह कहती हैं कि मुसलमानों में लड़के वाले ही रिश्ता लेकर आते हैं, इसलिए उनके अभिभावक रिश्ते का इंतज़ार करते रहे. वे बेहद ग़रीब हैं, इसलिए रिश्तेदार भी बाहर से ही दुल्हनें लाए. अगर उनके अभिभावक दहेज देने की हैसियत रखते, तो शायद आज वह अपनी ससुराल में होतीं और उनका अपना घर-परिवार होता. उनके अब्बू कई साल पहले अल्लाह को प्यारे हो गए. घर में तीन शादीशुदा भाई, उनकी बीवियां और उनके बच्चे हैं. सबकी अपनी ख़ुशहाल ज़िंदगी है. किश्वरी दिन भर बीड़ियां बनाती हैं और घर का कामकाज करती हैं. अब बस यही उनकी ज़िंदगी है. उनकी अम्मी को हर वक़्त यही फ़िक्र सताती है कि उनके बाद बेटी का क्या होगा? यह अकेली किश्वरी का क़िस्सा नहीं है. मुस्लिम समाज में ऐसी हज़ारों लड़कियां हैं, जिनकी खु़शियां दहेज रूपी लालच निग़ल चुका है.

राजस्थान के बाड़मेर निवासी आमना के शौहर की मौत के बाद 15 नवंबर, 2009 को उसका दूसरा निकाह बीकानेर के शादीशुदा उस्मान के साथ हुआ था, जिसके पहली पत्नी से तीन बच्चे भी हैं. आमना का कहना है कि उसके अभिभावकों ने दहेज के तौर पर उस्मान को 10 तोला सोना, एक किलो चांदी के ज़ेवर, कपड़े और घरेलू सामान दिया था. निकाह के कुछ दिनों बाद ही उसके शौहर और उसकी दूसरी बीवी ज़ेबुन्निसा कम दहेज के लिए उसे तंग करने लगे. यहां तक कि उसके साथ मारपीट भी की जाने लगी. वे उससे एक स्कॉर्पियो गाड़ी और दो लाख रुपये मांग रहे थे. आमना कहती हैं कि उनके अभिभावक इतनी महंगी गाड़ी और इतनी बड़ी रक़म देने के क़ाबिल नहीं हैं. आख़िर ज़ुल्मो-सितम से तंग आकर आमना को पुलिस की शरण लेनी पड़ी. राजस्थान के गोटन की रहने वाली गुड्डी का क़रीब तीन साल पहले सद्दाम से निकाह हुआ था. शादी के वक़्त दहेज भी दिया गया था. इसके बावजूद शौहर और ससुराल के अन्य सदस्य दहेज के लिए उसे तंग करने लगे. उसके साथ मारपीट की जाती. जब उसने और दहेज लाने से इंकार कर दिया तो 18 अक्टूबर, 2009 को ससुराल वालों ने मारपीट कर उसे घर से निकाल दिया. अब वह अपने मायके में है. मुस्लिम समाज में आमना और गुड्डी जैसी हज़ारों महिलाएं हैं, जिनका परिवार दहेज की मांग की वजह से उजड़ चुका है. यूनिसेफ़ के सहयोग से जनवादी महिला समिति द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक़, दहेज के बढ़ रहे मामलों की वजह से मध्य प्रदेश में 60 फ़ीसद, गुजरात में 50 फ़ीसद और आंध्र प्रदेश में 40 फ़ीसद लड़कियों ने माना कि दहेज के बिना उनकी शादी होना मुश्किल हो गया है. दिल्ली की छात्रा परवीन का कहना है कि दहेज बहुत ज़रूरी है, क्योंकि लड़की जितना ज़्यादा दहेज लेकर जाती है, ससुराल में उसे उतनी ही ज़्यादा इज्ज़त मिलती है. वह कहती हैं कि उसके परिवार की माली हालत अच्छी नहीं है और अभिभावक उसे ज़्यादा दहेज नहीं दे पाएंगे, इसलिए वह खु़द ही नौकरी करके अपने दहेज के लिए रक़म इकट्ठा करना चाहती है. ऐसी लड़कियों की भी कमी नहीं है, जो दहेज लेना चाहती हैं. इन लड़कियों का मानना है कि इस तरह उन्हें उनकी पुश्तैनी जायदाद से कुछ हिस्सा मिल जाता है. उनका कहना है कि इस्लाम में बेटियों को उनके पिता की जायदाद में से कुछ हिस्सा देने की बात कही गई है, लेकिन कितने अभिभावक ऐसा करते हैं? अगर दहेज के बहाने लड़कियों को कुछ मिल जाता है तो इसमें ग़लत क्या है? मगर जो माता-पिता ग़रीब हैं, वे अपनी बेटियों के लिए दहेज कहां से लाएंगे, इसका जवाब इन लड़कियों के पास नहीं है.

दहेज को लेकर मुसलमान एकमत नहीं हैं. जहां कुछ मुसलमान दहेज को ग़ैर इस्लामी क़रार देते हैं, वहीं कुछ मुसलमान दहेज को जायज़ मानते हैं. उनका तर्क है कि हज़रत मुहम्मद साहब ने भी तो अपनी बेटी फ़ातिमा को दहेज दिया था. ख़ास बात यह है कि दहेज की हिमायत करने वाले मुसलमान भूल जाते हैं कि पैग़ंबर ने अपनी बेटी को विवाह में बेशक़ीमती चीज़ें नहीं दी थीं. इसलिए उन चीज़ों की दहेज से तुलना नहीं की जा सकती, क्योंकि उनकी मांग नहीं की गई थी. अब तो लड़के वाले मुंह खोलकर दहेज मांगते हैं और लड़की के अभिभावक अपनी बेटी का घर बसाने के लिए हैसियत से बढ़कर दहेज देते हैं, भले ही इसके लिए उन्हें कितनी ही परेशानियों का सामना क्यों न करना पड़े. अमरोहा के परवेज़ आलम बताते हैं कि उन्होंने अपनी पुश्तैनी जायदाद में मिले घर के आधे हिस्से को बेचकर बड़ी बेटी की शादी कर दी थी, लेकिन यह देखकर दिल रो प़डता है कि वह अब भी सुखी नहीं है. उसके ससुराल वाले दहेज की मांग करते हैं. अगर बाक़ी बचा घर बेचकर उसे दहेज दे दूं तो अपने अन्य बच्चों को लेकर कहां जाऊंगा. छोटी बेटी के भी हाथ पीले करने हैं, कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं. अगर अल्लाह बेटियां दे तो उनके नसीब भी अच्छे करे और उनके माता-पिता को दौलत भी दे, साथ ही दहेज के लालचियों को तौफ़ीक़ दे कि वे ऐसी नाजायज़ मांगें न रखें. हैरत की बात यह भी है कि बात-बात पर फ़तवे जारी करने वाले मज़हब के नुमाइंदों को समाज में फैल रही दहेज जैसी बुराइयां दिखाई नहीं देतीं. शायद उनका मक़सद सिर्फ़ बेतुके फ़तवे जारी कर सुर्ख़ियां बटोरना या फिर मुस्लिम महिलाओं के दायरों को और मज़बूत करना होता है. इस बात में कोई दो राय नहीं कि पिछले काफ़ी अरसे से आ रहे ज़्यादातर फ़तवे महज़ मनोरंजन का साधन साबित हो रहे हैं, वह चाहे मिस्र में जारी मुस्लिम महिलाओं द्वारा कुंवारे पुरुष सहकर्मियों को अपना दूध पिलाने का फ़तवा हो या फिर महिलाओं के नौकरी करने के ख़िलाफ़ जारी फ़तवा. अफ़सोस इस बात का है कि मज़हब की नुमाइंदगी करने वाले लोग समाज से जुड़ी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लेते. हालांकि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने मुस्लिम समाज में बढ़ती दहेज की कुप्रथा पर चिंता ज़ाहिर करते हुए इसे रोकने के लिए मुहिम शुरू करने की बात कही थी. बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य ज़फ़रयाब जिलानी के मुताबिक़, मुस्लिम समाज में शादियों में फ़िज़ूलख़र्ची रोकने के लिए इस बात पर भी सहमति जताई गई थी कि निकाह सिर्फ़ मस्जिदों में ही कराया जाए और लड़के वाले अपनी हैसियत के हिसाब से वलीमें करें. साथ ही इस बात का भी ख़्याल रखा जाए कि लड़की वालों पर ख़र्च का ज़्यादा बोझ न पड़े, जिससे ग़रीब परिवारों की लड़कियों की शादी आसानी से हो सके. इस्लाह-ए-मुआशिरा (समाज सुधार) की मुहिम पर चर्चा के दौरान बोर्ड की बैठक में यह भी कहा गया कि निकाह पढ़ाने से पहले उलेमा वहां मौजूद लोगों को बताएं कि निकाह का सुन्नत तरीक़ा क्या है और इस्लाम में यह कहा गया है कि सबसे अच्छा निकाह वही है, जिसमें सबसे कम ख़र्च हो. साथ ही इस मामले में मस्जिदों के इमामों को भी प्रशिक्षित किए जाने पर ज़ोर दिया गया था.

हरियाणा ख़िदमत सभा के मुख्य संयोजक मोहम्मद रफ़ीक़ चौहान का कहना है कि दहेज लेना ग़ैर इस्लामी है. यह एक सामाजिक बुराई है, जो धीरे-धीरे समाज को खोखला कर रही है. अभिभावकों को चाहिए कि वे दहेज मांगने वाले परिवार में अपनी बेटी की शादी न करें और ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ पुलिस में शिकायत दर्ज कराएं, क्योंकि लालच की कोई सीमा नहीं होती. साथ ही वे ऐसे व्यक्ति के साथ भी अपनी बेटी की शादी न करें, जिसकी पत्नी की दहेज की वजह से मौत हुई हो या उसे तलाक़ दे दिया गया हो. तभी इस बुराई को बढ़ने से रोका जा सकता है. सरकार ने क़ानून बनाया है, पीड़ितों को उसका इस्तेमाल करना चाहिए.

बहरहाल, मुस्लिम समाज में बढ़ती दहेज की कुप्रथा रोकने के लिए कारगर क़दम उठाने की ज़रूरत है. इस मामले में मस्जिदों के इमाम अहम किरदार अदा कर सकते हैं. वे नमाज़ के बाद लोगों से दहेज न लेने की अपील करें और उन्हें बताएं कि यह कुप्रथा किस तरह समाज के लिए नासूर बनती जा रही है. इसके अलावा महिलाओं को भी जागरूक करने की ज़रूरत है, क्योंकि देखने में आया है कि दहेज का लालच पुरुषों से ज़्यादा महिलाओं को होता है. अफ़सोस की बात यह भी है कि मुस्लिम समाज अनेक फ़िरक़ों में बंट गया है. अमूमन सभी तबक़े ख़ुद को असली मुसलमान साबित करने में जुटे रहते हैं और मौजूदा समस्याओं पर उनका ध्यान नहीं जाता है. जब तक सामाजिक बुराइयों पर खुलकर चर्चा नहीं होगी, तब तक उनके उन्मूलन के लिए भी माहौल तैयार नहीं किया जा सकता है. इसलिए यह बेहद ज़रूरी है कि समाज में फैली दहेज प्रथा जैसी बुराइयों के विरुद्ध विभिन्न मंचों से ज़ोरदार आवाज़ उठाई जाए.
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स्टार-व्यूज़-एजेंसी,

मेरे लफ़्ज़ ही मेरी पहचान हैं

मेरे अल्फ़ाज़, मेरे जज़्बात और मेरे ख्यालात की तर्जुमानी करते हैं...क्योंकि मेरे लफ़्ज़ ही मेरी पहचान हैं...फ़िरदौस ख़ान
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17.8.13

वर्जनाओं के विरुद्ध एकजुट : सोच और शरीर



लाइफ़-स्टाइल में बदलाव से ज़िंदगियों में सबसे पहले आधार-भूत परिवर्तन की आहट के साथ कुछ ऐसे बदलावों की आहट सुनाई दे रही है जिससे सामाजिक व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन अवश्यंभावी है. कभी लगता था मुझे भी कि सामाजिक-तानेबाने के परम्परागत स्वरूप को आसानी से बदल न सकेगा . किंतु पिछले दस बरसों में जिस तेजी से सामाजिक सोच में बदलाव आ रहे हैं उससे तो लग रहा कि बदलाव बेहद निकट हैं शायद अगले पांच बरस में... कदाचित उससे भी पहले .कारण यह कि अब "जीवन को कैसे जियें ?" सवाल नहीं हैं अब तो सवाल यह है कि जीवन का प्रबंधन कैसे किया जाए. कैसे जियें के सवाल का हल सामाजिक-वर्जनाओं को ध्यान रखते हुए खोजा जाता है जबकि जीवन के प्रबंधन के लिये वर्जनाओं का ध्यान रखा जाना तार्किक नज़रिये से आवश्यक नहीं की श्रेणी में रखा जाता है.जीवन के जीने के तौर तरीके में आ रहे बदलाव का सबसे पहला असर पारिवारिक व्यवस्थापर खास कर यौन संबंधों पड़ता नज़र आ रहा है. बेशक विवाह नर-मादा के व्यक्तिगत अधिकार का विषय है पर अब पुरुष अथवा महिला के जीवन की व्यस्तताओं के चलते उभरतीं दैहिक (अनाधिकृत?) आकांक्षाओं के प्रबंधन का अधिकार भी मांगा जावेगा कहना कोई बड़ी बात नहीं. वास्तव में ऐसी स्थिति को मज़बूरी का नाम दिया जा रहा है.फ़िलहाल तो लव-स्टोरी को हेट स्टोरी में बदलते देर नहीं लगती पर अब मुझे जहां तक आने वाले कल का आभास हो रहा है वो ऐसा समय होगा जो " दैहिक (अनाधिकृत?) आकांक्षाओं के प्रबंधन" को एक अधिकार के रूप में स्वीकारेगा. दूसरा पक्ष ऐसे अधिकार की मांग के प्रति सकारात्मक रुख अपनाएगा. उसका मूल कारण "सर्वथा दूरियां एवम व्यस्तता जो अर्थोपार्जक कारण जनित होगी"
यह कोई भविष्यवक़्तव्य नहीं है.. वरन तेजी से आ रहे बदलाव से परिलक्षित हो रही स्थिति का अनुमान है. जिसे कोई बल-पूर्वक नहीं रोक सकता.
सामाजिक व्यवस्था द्वारा जनित परम्परागत वर्जनाओं के विरुद्ध सोच और शरीर का खड़ा होना भारतीय परिवेश में महानगरों, के बाद नगरों से ग्राम्य जीवन तक असर डाल सकता है.
आप हम भौंचक इस विकास को देखते रह जाएंगें. सेक्स एक बायोलाजिकल ज़रूरत है उसी तरह अपने पारिवारिक "समुच्चय में रहना" सामाजिक ज़रूरत है. आर्थिक कार्य का दबाव सबसे पहले इन्ही बातों को प्रभावित करेगा. तब दम्पत्ति बायोलाजिकल ज़रूरत को पूरा करते हुए पारिवारिक समुच्चय को भी बनाए रखने के लिये एक समझौता वादी नीति अपनाएंगें. हमारा समाज संस्कृति की बलात रक्षा करते हुए भी असफ़ल हो सकता है ऐसा नहीं है कि इसके उदाहरण अभी मौज़ूद नहीं हैं.बस लोग इस से मुंह फ़ेर रहे हैं.
पाश्चात्य व्यवस्था इस क़दर हावी होती नज़र आ रही है कि किसी को भी इस आसन्न ब्लैक होल से बचा पाना सम्भव नज़र नहीं आ रहा. हो सकता है मैं चाहता हूं कि मेरा पूरा आलेख झूठा साबित हो जाए जी हां परंतु ऐसा तब होगा जबकि जीवनों में स्थायित्व का प्रवेश हो ... ट्रक ड्रायवरों सा यायावर जीवन जीते लोग (महिला-पुरुष) फ़्रायड को तभी झुठलाएंगे जबकि उनका आत्म-बल सामाजिक-आध्यात्मिक चिंतन से परिपक्व हो पर ऐसा है ही नहीं. लोग न तो आध्यात्मिक सूत्रों को छू ही पाते हैं और न ही सामाजिक व्यवस्था में सन्निहित वर्जनाओं को. आध्यात्म एवम सामाजिक व्यवस्था के तहत बहुल सेक्स अवसरों के उपभोग को रोकने नैतिकता का ज्ञान कराते हुए संयम का पाठ पढ़ाया जाता है ताकि एक और सामाजिक नैतिकता बनी रहे दूसरी ओर यौन जनित बीमारियों का संकट भी जीवनों से दूर रहे, जबकि विज्ञान कंडोम के प्रयोग से एस.टी.डी.(सेक्सुअली-ट्रांसमीटेड-डिसीज़) को रोकने का परामर्श मात्र देता है.
आपको अंदाज़ा भी नहीं होगा कि दो दशक पहले बच्चे ये न जानते थे कि माता-पिता नामक युग्म उनकी उत्पत्ति का कारण है. किंतु अब सात-आठ बरस की उम्र का बच्चा सब कुछ जान चुका है. यह भी कि नर क्या है..? मादा किसे कहते हैं.. ? जब वे प्यार करते हैं तब “जन्म”-की घटना होती है. दूसरे शब्दों में कहें तो वे शारिरिक संपर्क को प्यार मानते हैं. अब तो खुलेआम फिल्मों में चैनल्स में और तो और सेल फोन में सेक्स जिस तरह परोसा जा रहा है उसका स्वाद बच्चे और बूढ़े यहां तक कि महिलाएं भी चख रही है। यह सब चंद्र मोहन जैन का किया धरा है। कालांतर में जो स्वयंभू भगवान हुए फिर जमा नहीं तो ओशो हो गए। विवाह संस्था को मटिया मीट करने वाले प्रोफेसर चंद्र मोहन उर्फ आचार्य रजनीश जी को इस बात का इल्म ना था उनका रास्ता एड्स और अन्य बहुत सारी एसटीडी यानी सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज को खुला आमंत्रण है। यह आलेख लिखते समय मुझे कुछ एहसास हो रहा है कि प्रगतिशील लेखन में गाली गुफ्तार अश्लील भाषा भद्दी बातों का उल्लेख किया जाता है। देर सबेर आप देखना फिल्मों टीवी सीरियल अथवा इंटरनेट पर यह यह सब परोसा जाएगा। मोबाइल फोन भी विकास करेगा और नई तकनीकी संभवत है हर पॉकेट के अंदर यौन कुंठा वाला बम रखने में सक्षम होगी।
सामाजिक व्यवस्था पाप-पुण्य की स्थितियों का खुलासा करतीं हैं तथा भय का दर्शन कराते हुए संयम का आदेश देतीं हैं वहीं दूसरी ओर अत्यधिक अधिकाराकांक्षा तर्क के आधार पर जीवन जीने वाले इस आदेश को पिछड़ेपन का सिंबाल मानते हुए नकार रहे हैं .. देखें क्या होता है वैसे सभी चिंतक मानस मेरी अनुभूति से अंशत: ही सही सहमत होंगे..........

सुभद्राकुमारी चौहान जी को नमन




सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी
,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी
,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में
, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कानपूर के नाना की
, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम
, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह
, नाना के सँग खेली थी,
बरछी ढाल
, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार
,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार
,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार
,
सैन्य घेरना
, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।
महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में
,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में
,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में
,
सुभट बुंदेलों की विरुदावलि सी वह आयी झांसी में
,
चित्रा ने अर्जुन को पाया
, शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य
, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई
,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई
,
रानी विधवा हुई
, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।
निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया
,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया
,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया
,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय विनय नहीं सुनती है
, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया
,
डलहौज़ी ने पैर पसारे
, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।
रानी दासी बनी
, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी दिल्ली की
, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठुर में
, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर
, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध
, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।
बंगाले
, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोयीं रिनवासों में
, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार
,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार
,
'नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटियों में भी विषम वेदना
, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान
,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान
,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी
, 
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग
, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी
,
झाँसी चेती
, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ
, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपूर
, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम
,
नाना धुंधूपंत
, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी
, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़
, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में
,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा
, आगे बड़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली
, हुया द्वन्द्ध असमानों में।
ज़ख्मी होकर वाकर भागा
, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई
, कर सौ मील निरंतर पार, 
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार
,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार
,
विजयी रानी आगे चल दी
, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली
, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था
, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी
,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।
पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया
, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार
,
किन्तु सामने नाला आया
, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा
, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार,
रानी एक
, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी
,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी
,
मिला तेज से तेज
, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी
, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी
,
दिखा गई पथ
, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी
,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी
,
होवे चुप इतिहास
, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय
, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।
तेरा स्मारक तू ही होगी
, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।



13.8.13

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी :फ़िरदौस ख़ान


फ़िरदौस ख़ान

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी… यानी जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है. जन्म स्थान या अपने देश को मातृभूमि कहा जाता है. भारत और नेपाल में भूमि को मां के रूप में माना जाता है. यूरोपीय देशों में मातृभूमि को पितृ भूमि कहते हैं. दुनिया के कई देशों में मातृ भूमि को गृह भूमि भी कहा जाता है. इंसान ही नहीं, पशु-पक्षियों और पशुओं को भी अपनी जगह से प्यार होता है, फिर इंसान की तो बात ही क्या है. हम ख़ुशनसीब हैं कि आज हम आज़ाद देश में रह रहे हैं. देश को ग़ुलामी की ज़ंजीरों से आज़ाद कराने के लिए हमारे पूर्वजों ने बहुत क़ुर्बानियां दी हैं. उस वक़्त देश प्रेम के गीतों ने लोगों में जोश भरने का काम किया. बच्चों से लेकर नौजवानों, महिलाओं और बुज़ुर्गों तक की ज़ुबान पर देश प्रेम के जज़्बे से सराबोर गीत किसी मंत्र की तरह रहते थे. क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल की नज़्म ने तो अवाम में फ़िरंगियों की बंदूक़ों और तोपों का सामने करने की हिम्मत पैदा कर दी थी.

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-क़ातिल में है
वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है...

देश प्रेम के गीतों का ज़िक्र मोहम्मद अल्लामा इक़बाल के बिना अधूरा है. उनके गीत सारे जहां से अच्छा के बग़ैर हमारा कोई भी राष्ट्रीय पर्व पूरा नहीं होता. हर मौक़े पर यह गीत गाया और बजाया जाता है. देश प्रेम के जज़्बे से सराबोर यह गीत दिलों में जोश भर देता है.

सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिस्तां हमारा
यूनान, मिस्र, रोमा, सब मिट गए जहां से
अब तक मगर है बाक़ी, नामो-निशां हमारा...

जयशंकर प्रसाद का गीत यह अरुण देश हमारा, भारत के नैसर्गिक सौंदर्य का बहुत ही मनोहरी तरीक़े से चित्रण करता है.
अरुण यह मधुमय देश हमारा
जा पहुंच अनजान क्षितिज को
मिलता एक सहारा...

हिंदी फ़िल्मों में भी देश प्रेम के गीतों ने लोगों में राष्ट्र प्रेम की गंगा प्रवाहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. आज़ादी से पहले इन गीतों ने हिंदुस्तानियों में ग़ुलामी की जंज़ीरों को तोड़कर मुल्क को आज़ाद कराने का जज़्बा पैदा किया और आज़ादी के बाद देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय एकता की भावना का संचार करने में अहम किरदार अदा किया है. फ़िल्मों का ज़िक्र किया जाए तो देश प्रेम के गीत रचने में कवि प्रदीप आगे रहे. उन्होंने 1962 की भारत-चीन जंग के शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए ऐ मेरे वतन के लोगों ज़रा आंख में भर लो पानी, गीत लिखा. लता मंगेशकर द्वारा गाये इस गीत का तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की मौजूदगी में 26 जनवरी, 1963 को दिल्ली के रामलीला मैदान में सीधा प्रसारण किया गया. गीत सुनकर जवाहरलाल नेहरू की आंखें भर आई थीं. 1943 बनी फिल्म क़िस्मत के गीत दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है, ने उन्हें अमर कर दिया. इस गीत से ग़ुस्साई तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उनकी गिरफ्तारी के आदेश दिए थे, जिसकी वजह से प्रदीप को भूमिगत होना पड़ा था. उनके लिखे फिल्म जागृति (1954) के गीत आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की और दे दी हमें आज़ादी बिना खडग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल, आज भी लोग गुनगुना उठते हैं. शकील बदायूंनी का लिखा फ़िल्म सन ऑफ इंडिया का गीत नन्हा मुन्ना राही हूं देश का सिपाही हूं, बच्चों में बेहद लोकप्रिय है. कैफ़ी आज़मी के लिखे और मोहम्मद रफ़ी के गाये फ़िल्म हक़ीक़त के गीत कर चले हम फिदा जान-ओ-तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों, को सुनकर आंखें नम हो जाती हैं और शहीदों के लिए दिल श्रद्धा से भर जाता है. फिल्म लीडर का शकील बदायूंनी का लिखा और मोहम्मद रफ़ी का गाया और नौशाद के संगीत से सजा गीत अपनी आज़ादी को हम हरगिज़ मिटा सकते नहीं, सर कटा सकते हैं, लेकिन सर झुका सकते नहीं, बेहद लोकप्रिय हुआ. प्रेम धवन द्वारा रचित फ़िल्म हम हिंदुस्तानी का गीत छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी, नये दौर में लिखेंगे, मिलकर नई कहानी, आज भी इतना ही मीठा लगता है. उनका फिल्म क़ाबुली वाला का गीत भी रोम-रोम में देश प्रेम का जज़्बा भर देता है.

ऐ मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमन, तुझ पे दिल क़ुर्बान
तू ही मेरी आरज़ू, तू ही मेरी आबरू, तू ही मेरी जान...

राजेंद्र कृष्ण द्वारा रचित फिल्म सिकंदर-ए-आज़म का गीत भारत देश के गौरवशाली इतिहास का मनोहारी बखान करता है.
जहां डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा
वो भारत देश है मेरा, वो भारत देश है मेरा
जहां सत्य अहिंसा और धर्म का पग-पग लगता डेरा
वो भारत देश है मेरा, वो भारत देश है मेरा...

इसी तरह गुलशन बावरा द्वारा रचित फिल्म उपकार का गीत देश के प्राकृतिक खनिजों के भंडारों और खेतीबा़डी और जनमानस से जुड़ी भावनाओं को बख़ूबी प्रदर्शित करता है.
मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती
मेरी देश की धरती
बैलों के गले में जब घुंघरू
जीवन का राग सुनाते हैं
ग़म कोसों दूर हो जाता है
जब ख़ुशियों के कमल मुस्काते हैं...

इसके अलावा फ़िल्म अब दिल्ली दूर नहीं, अमन, अमर शहीद, अपना घर, अपना देश, अनोखा, आंखें, आदमी और इंसान, आंदोलन, आर्मी, इंसानियत, ऊंची हवेली, एक ही रास्ता, क्लर्क, क्रांति, कुंदन, गोल्ड मेडल, गंगा जमुना, गंगा तेरा पानी अमृत, गंगा मान रही बलिदान, गंवार, चंद्रशेखर आज़ाद, चलो सिपाही चलो, चार दिल चार रास्ते, छोटे बाबू, जय चित्तौ़ड, जय भारत, जल परी, जियो और जीने दो, जिस देश में गंगा बहती है, जीवन संग्राम, जुर्म और सज़ा, जौहर इन कश्मीर, जौहर महमूद इन गोवा, ठाकुर दिलेर सिंह, डाकू और महात्मा, तलाक़, तू़फान और दीया, दीदी, दीप जलता रहे, देशप्रेमी, धर्मपुत्र, धरती की गोद में, धूल का फूल, नई इमारत, नई मां, नवरंग, नया दौर, नया संसार, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, प्यासा, परदेस, पूरब और पश्चिम, प्रेम पुजारी, पैग़ाम, फरिश्ता और क़ातिल, अंगारे, फ़ौजी, बड़ा भाई, बंदिनी, बाज़ार, बालक, बापू की अमर कहानी, बैजू बावरा, भारत के शहीद, मदर इंडिया, माटी मेरे देश की, मां बाप, मासूम, मेरा देश मेरा धर्म, जीने दो, रानी रूपमति, लंबे हाथ, शहीद, आबरू, वीर छत्रसाल, दुर्गादास, शहीदे-आज़म भगत सिंह, समाज को बदल डालो, सम्राट पृथ्वीराज चौहान, हम एक हैं, कर्मा, हिमालय से ऊंचा, नाम और बॉर्डर आदि फिल्मों के देश प्रेम के गीत भी लोगों में जोश भरते हैं. मगर अफ़सोस कि अमूमन ये गीत स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस या फिर गांधी जयंती जैसे मौक़ों पर ही सुनने को मिलते हैं, ख़ासकर ऑल इंडिया रेडियो पर.

बहरहाल, यह हमारे देश की ख़ासियत है कि जब राष्ट्रीय पर्व स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवय या इसी तरह के अन्य दिवस आते हैं तो रेडियो पर देश प्रेम के गीत सुनाई देने लगते हैं. बाक़ी दिनों में इन गीतों को सहेजकर रख दिया जाता है. शहीदों की याद और देश प्रेम को कुछ विशेष दिनों तक ही सीमित करके रख दिया गया है. इन्हीं ख़ास दिनों में शहीदों को याद करके उनके प्रति अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है. कवि जगदम्बा प्रसाद मिश्र हितैषी के शब्दों में यही कहा जा सकता है-
शहीदों की चिताओं लगेंगे हर बरस मेले
वतन पे मरने वालों का यही बाक़ी निशां होगा…



10.8.13

कहो न कि मैं भी चोर हूँ


वरुण जी के ब्लॉग से साभार 
किसी  के   खिलाफ   क्यों हैं  आप …… कभी सोचा आपने ?
      न आपने कभी भी न सोचा होगा सोचने के लिए खुद का अपना चिन्तन ज़रूरी है. आपकी सोच तो केवल सूचना आधारित है तो आप स्वयं कितना  सोचेंगे और  क्या सोचेंगे ?
मैं नहीं कहता काबुल में केवल घोड़े मिलते हैं पर आप अवश्य कहते हैं क्योंकि आपने जो सूचना प्राप्त की उसके मुताबिक़ यही सत्य है मित्र।
  अक्सर  व्यवस्था को गरियाने वाले लोग मुझे मिले हैं जब मेरे मोहल्ले में सड़क न थी तब नगर निगम को लोगों ने इतना कोसा इतना कोसा कि सतफेरी बीवी सौतन को भी न कोसती हो किन्तु सड़क बनाते ही हमारे सभी नागरिक सरेआम पूरे अधिकार से घरेलू कूडा करकट सड़क पे डाल रहे है। किसी को कोई आत्मिक दर्द नहीं।  उधर किसी गली से खबर आई की सार्वजनिक नल से  नल की टौंटी चुरा   के घर में रखने वालो की कमी नहीं अरे हाँ सरकारी बल्व ट्यूब लाइट के चोर चहुँओर बसे है. इतना ही नहीं लोग  गरीबी रेखा के साथ रहना पसंद करते हैं गोया गरीबी रेखा , गरीबी रेखा  न होकर अभिनेत्री रेखा हो। यानी कैसे भी हो लाभ होता रहे।

 
    अस्पतालों से मुफ्त की दवाएँ हासिल करना , मुफ्त में आयोजनों के पास हासिल करने की ज़द्दो-ज़हद करने वाले इस व्यवस्था-विरोधी समाज से ही आतें हैं।  बिजली चोरी तो बड़े बड़ों का शगल बन गया है. कुल मिला समूचे-समाज पर "कनक-शक्ति"(चोरों का देवता) का आशीर्वाद बना रहता है.
  आप ही बताएं  अब जिस समाज पर ऐसे देवता का  आशीर्वाद बना हो उस की व्यवस्था कैसी होगी ?  नकारात्मकता फैलाने वाले लोग हर जगह हैं  वास्तविकता ये नहीं है कि समूची व्यवस्था आज गर्त में जा गिरी है बल्कि अच्छाइयों को लिखा और  दिखाया नहीं जा रहा है। आप किसी को बिना सोचे समझे चोर कहें तो आप वास्तव में केवल नकारात्मकता आधारित सूचनाओ के शिकार हैं।  मौलिक चिन्तन नज़र  नहीं आता  है आप में  तब जब की आप किसी के भी खिलाफ कुछ भी बोलने लगते हैं आप शुचिता पूर्ण चिन्तक बने
सकारात्मकता बोयें।
नक़्शे पा आज़कल नहीं बनते
आप क्यों राह पे नहीं चलते ?
उड़ रहे लोग हवा में देखो
या अपाहिज हैं जो नहीं चलते ?

5.8.13

किशोर कुमार अदभुत व्यक्तित्व : {साभार भारतकोश}

साभार : जागरण जंक्शन 
 किशोर कुमार का जन्म 4 अगस्त, 1929 ई. को खंडवा, मध्य प्रदेश में एक बंगाली परिवार में हुआ था। किशोर कुमार एक विलक्षण शख़्सियत रहे हैं। हिन्दी सिनेमा की ओर उनका बहुत बड़ा योगदान है। किशोर कुमार के पिता कुंजीलाल खंडवा शहर के जाने माने वक़ील थे। किशोर चार भाई बहनों में सबसे छोटे थे। सबसे छोटा होने के नाते किशोर कुमार को सबका प्‍यार मिला। इसी चाहत ने किशोर को इतना हंसमुख बना दिया था कि हर हाल में मुस्कुराना उनके जीवन का अंदाज बन गया। उनके सबसे बड़े भाई अशोक कुमार मुंबई में एक अभिनेता के रूप में स्थापित हो चुके थे और उनके एक और भाई अनूप कुमार भी फ़िल्मों में काम कर रहे थे।
किशोर कुमार बचपन से ही एक संगीतकार बनना चाहते थे, वह अपने पिता की तरह वक़ील नहीं बनना चाहते थे। किशोर कुमार ने 81 फ़िल्मों में अभिनय किया और 18 फ़िल्मों का निर्देशन भी किया। फ़िल्म ‘पड़ोसन’ में उन्होंने जिस मस्त मौला आदमी के किरदार को निभाया वही किरदार वे ज़िंदगी भर अपनी असली ज़िंदगी में निभाते रहे। हिन्दी सिनेमा में इलैक्ट्रिक संगीत लाने का श्रेय किशोर कुमार को जाता है।
अभिनेता के रूप में शुरुआत
किशोर कुमार के. एल. सहगल के गानों से बहुत प्रभावित थे, और उनकी ही तरह गायक बनना चाहते थे। किशोर कुमार के भाई अशोक कुमार की चाहत थी कि किशोर कुमार नायक के रूप में हिन्दी फ़िल्मों के हीरो के रूप में जाने जाएं, लेकिन किशोर कुमार को अदाकारी की बजाय पा‌र्श्व गायक बनने की चाहत थी। किशोर कुमार ने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा कभी किसी से नहीं ली थी। किशोर कुमार की शुरुआत एक अभिनेता के रूप में फ़िल्म ‘शिकारी’ (1946) से हुई। इस फ़िल्म में उनके बड़े भाई अशोक कुमार ने प्रमुख भूमिका की थी। किशोर कुमार ने 1951 में फणी मजूमदार द्वारा निर्मित फ़िल्म ‘आंदोलन’ में हीरो के रूप में काम किया मगर फ़िल्म फ्लॉप हो गई। 1954 में किशोर कुमार ने बिमल राय की ‘नौकरी’ में एक बेरोज़गार युवक की संवेदनशील भूमिका कर अपनी अभिनय प्रतिभा से भी परिचित किया। इसके बाद 1955 में बनी ‘बाप रे बाप’, 1956 में ‘नई दिल्ली’, 1957 में ‘मि. मेरी’ और ‘आशा’, और 1958 में बनी ‘चलती का नाम गाड़ी’ जिस में किशोर कुमार ने अपने दोनों भाईयों अशोक कुमार और अनूप कुमार के साथ काम किया और उनकी अभिनेत्री मधुबाला थी।
गायकी की शुरुआत
किशोर कुमार को पहली बार गाने का मौक़ा 1948 में बनी फ़िल्म ‘ज़िद्दी’ में मिला। फ़िल्म ‘ज़िद्दी’ में किशोर कुमार ने देव आनंद के लिए गाना गाया था। ‘जिद्दी’ की सफलता के बावज़ूद उन्हें न तो पहचान मिली और न कोई ख़ास काम मिला। किशोर कुमार ने गायकी का एक नया अंदाज बनाया जो उस समय के नामचीन गायक रफ़ी, मुकेश और सहगल से काफ़ी अलग था। किशोर कुमार सन् 1969 में निर्माता निर्देशक शक्ति सामंत की फ़िल्म ‘आराधना’ के ज़रिये गायकी के दुनिया में सबसे सफल गायक बन गये। किशोर कुमार को शुरू में एस डी बर्मन और अन्य संगीतकारों ने अधिक गंभीरता से नहीं लिया और उनसे हल्के स्तर के गीत गवाए गए, लेकिन किशोर कुमार ने 1957 में बनी फ़िल्म “फंटूस” में ‘दुखी मन मेरे’ गीत को गाकर अपनी ऐसी धाक जमाई कि जाने माने संगीतकारों को किशोर कुमार की प्रतिभा का लोहा मानना पड़ा। किशोर कुमार को इसके बाद एस डी बर्मन ने अपने संगीत निर्देशन में कई गीत गाने का मौक़ा दिया।
आर डी बर्मन के संगीत निर्देशन में
आर डी बर्मन के संगीत निर्देशन में किशोर कुमार ने मुनीम जी, टैक्सी ड्राइवर, फंटूश, नौ दो ग्यारह, पेइंग गेस्ट, गाईड, ज्वेल थीफ़, प्रेमपुजारी, तेरे मेरे सपने जैसी फ़िल्मों में अपनी जादुई आवाज़ से फ़िल्मी संगीत के दीवानों को अपना दीवाना बना लिया। एक अनुमान के मुताबिक किशोर कुमार ने वर्ष 1940 से वर्ष 1980 के बीच के अपने करियर के दौरान क़रीब 574 से अधिक गाने गाए।
अन्य भाषाओं में गीत
किशोर कुमार ने हिन्दी के साथ ही तमिल, मराठी, असमी, गुजराती, कन्नड़, भोजपुरी, मलयालम और उड़िया फ़िल्मों के लिए भी गीत गाए।
फ़िल्म फेयर पुरस्कार
किशोर कुमार को आठ फ़िल्म फेयर अवार्ड मिले हैं। किशोर कुमार को पहला फ़िल्म फेयर अवार्ड 1969 में ‘अराधना’ फ़िल्म के गीत ‘रूप तेरा मस्ताना प्यार मेरा दीवाना’ के लिए दिया गया था। किशोर कुमार की ख़ासियत यह थी कि उन्होंने देव आनंद से लेकर राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन के लिए अपनी आवाज़ दी और इन सभी अभिनेताओं पर उनकी आवाज़ ऐसी रची बसी मानो किशोर ख़ुद उनके अंदर मौजूद हों।
वैवाहिक जीवन
किशोर कुमार की पहली शादी रुमा देवी के से हुई थी, लेकिन जल्दी ही शादी टूट गई और इस के बाद उन्होंने मधुबाला के साथ विवाह किया। उस दौर में दिलीप कुमार जैसे सफल और शोहरत की बुलंदियों पर पहुँचे अभिनेता जहाँ मधुबाला जैसी रूप सुंदरी का दिल नहीं जीत पाए वही मधुबाला किशोर कुमार की दूसरी पत्नी बनी। 1961 में बनी फ़िल्म ‘झुमरु’ में दोनों एक साथ आए। यह फ़िल्म किशोर कुमार ने ही बनाई थी और उन्होंने ख़ुद ही इसका निर्देशन किया था। इस के बाद दोनों ने 1962 में बनी फ़िल्म ‘हाफ टिकट’ में एक साथ काम किया जिस में किशोर कुमार ने यादगार कॉमेडी कर अपनी एक अलग छवि पेश की। 1976 में उन्होंने योगिता बाली से शादी की मगर इन दोनों का यह साथ मात्र कुछ महीनों का ही रहा। इसके बाद योगिता बाली ने मिथुन चक्रवर्ती से शादी कर ली। 1980 में किशोर कुमार ने चौथी शादी लीना चंद्रावरकर से की जो उम्र में उनके बेटे अमित से दो साल बड़ी थीं।
हिन्दी सिनेमा जगत में प्रचलित किस्से
किशोर कुमार की आवाज़ की पुरानी के साथ-साथ नई पीढ़ी भी दीवानी है। किशोर जितने उम्दा कलाकार थे, उतने ही रोचक इंसान भी थे। उनके कई किस्से हिन्दी सिनेमा जगत में प्रचलित हैं।
रशोकि रमाकु
किशोर कुमार को अटपटी बातों को अपने चटपटे अंदाज में कहने का फ़ितूर था। ख़ासकर गीतों की पंक्ति को दाएँ से बाएँ गाने में किशोर कुमार ने महारत हासिल कर ली थी। नाम पूछने पर वह कहते थे- रशोकि रमाकु।
तीन नायकों को बनाया महानायक
किशोर कुमार ने हिन्दी सिनेमा के तीन नायकों को महानायक का दर्जा दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। उनकी आवाज़ के जादू से देव आनंद सदाबहार हीरो कहलाए। राजेश खन्ना को सुपर सितारा कहा जाने लगा और अमिताभ बच्चन महानायक हो गए।
मनोरंजन कर
किशोर कुमार ने बारह साल की उम्र तक गीत-संगीत में महारत हासिल कर ली थी। किशोर कुमार रेडियो पर गाने सुनकर उनकी धुन पर थिरकते थे। किशोर कुमार फ़िल्मी गानों की किताब जमा कर उन्हें कंठस्थ करके गाते थे। घर आने वाले मेहमानों को किशोर कुमार अभिनय सहित गाने सुनाते तो ‘मनोरंजन-कर’ के रूप में कुछ इनाम भी माँग लेते थे।
बाथरूम गायक
एक दिन अशोक कुमार के घर अचानक संगीतकार सचिन देव वर्मन पहुँच गए। बैठक में उन्होंने गाने की आवाज़ सुनी तो दादा मुनि से पूछा, ‘कौन गा रहा है?’ अशोक कुमार ने जवाब दिया- ‘मेरा छोटा भाई है’। जब तक गाना नहीं गाता, उसका नहाना पूरा नहीं होता।’ सचिन-दा ने बाद में किशोर कुमार को जीनियस गायक बना दिया।
दो बार आवाज़ उधार ली
मोहम्मद रफ़ी ने पहली बार किशोर कुमार को अपनी आवाज़ फ़िल्म ‘रागिनी’ में गीत ‘मन मोरा बावरा’ के लिए उधार दी। दूसरी बार शंकर-जयकिशन की फ़िल्म ‘शरारत’ में रफ़ी ने किशोर के लिए- ‘अजब है दास्ताँ तेरी ये ज़िंदगी’ गीत गाया।
महमूद से लिया बदला
महमूद ने फ़िल्म ‘प्यार किए जा’ में कॉमेडियन किशोर कुमार, शशि कपूर और ओमप्रकाश से ज़्यादा पैसे वसूले थे। किशोर को यह बात अखर गई। किशोर कुमार ने इसका बदला महमूद से फ़िल्म ‘पड़ोसन’ में दुगुना पैसा लेकर लिया।
खंडवे वाले की राम-राम
किशोर कुमार ने जब-जब स्टेज-शो किए, हमेशा हाथ जोड़कर सबसे पहले संबोधन करते थे- ‘मेरे दादा-दादियों।’ मेरे नाना-नानियों। मेरे भाई-बहनों, तुम सबको खंडवे वाले किशोर कुमार का राम-राम। नमस्कार।
हरफनमौला
किशोर कुमार का बचपन तो खंडवा में बीता, लेकिन जब वे किशोर हुए तो इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़ने आए। हर सोमवार सुबह खंडवा से मीटरगेज की छुक-छुक रेलगाड़ी में इंदौर आते और शनिवार शाम लौट जाते। सफर में वे हर स्टेशन पर डिब्बा बदल लेते और मुसाफ़िरों को नए-नए गाने सुनाकर मनोरंजन करते थे।
खंडवा की दूध जलेबी
किशोर कुमार ज़िंदगीभर कस्बाई चरित्र के भोले मानस बने रहे। मुंबई की भीड़-भाड़, पार्टियाँ और ग्लैमर के चेहरों में वे कभी शामिल नहीं हो पाए। इसलिए उनकी आख़िरी इच्छा थी कि खंडवा में ही उनका अंतिम संस्कार किया जाए। इस इच्छा को पूरा किया गया, वे कहा करते थे- ‘फ़िल्मों से संन्यास लेने के बाद वे खंडवा में ही बस जाएँगे और रोजाना दूध-जलेबी खाएँगे।
प्रिय गायक
लता मंगेशकर को किशोर कुमार गायकों में सबसे ज़्यादा अच्छे लगते थे। लता जी ने कहा कि किशोर कुमार हर तरह के गीत गा लेते थे और उन्हें ये मालूम था कि कौन सा गाना किस अंदाज़ में गाना है। किशोर कुमार लता जी की बहन आशा भोंसले के भी सबसे पसंदीदा गायक थे और उनका मानना है कि किशोर अपने गाने दिल और दिमाग़ दोनों से ही गाते थे। आज भी उनकी सुनहरी आवाज़ लाखों संगीत के दीवानों के दिल में बसी हुई है और उसका जादू हमारे दिलों दिमाग़ पर छाया हुआ है।
मृत्यु
वर्ष 1987 में किशोर कुमार ने मुंबई की भागम-दौड़ वाली ज़िंदगी से उब कर यह फैसला किया कि वह फ़िल्मों से संन्यास लेने के बाद वापस अपने गाँव खंडवा जाकर रहेंगे। लेकिन उनका यह सपना भी अधूरा ही रह गया। 13 अक्टूबर 1987 को उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वह पूरी दुनिया से विदा हो गये।भले ही वो आज हमारे बीच नहीं है। लेकिन अपनी सुरमयी आवाज़ और बेहतरीन अदायकी से वो हमेशा हमारे बीच रहेंगे।

2.8.13

घीसू-माधौ आज़ तक ज़िंदा हैं लुटते पिटते

                                   
   यूं तो दुनिया बेहद रंगीन खुशमिज़ाज़ लोगों का बाज़ार है पर करीब़ से देखिये उफ़्फ़ कितनी बेनूर भयानक बदमिज़ाज़ सब अपने अपने हाथौ मे अपनी अपनी ढफ़ली लिये गलियों चौबारों में बजाए जा रहे हैं. किसका राग कौन सुन रहा है किसी को भी पता नहीं. पता हो भी कैसे ? सुबह अखबार आया तो बांचा फ़िर लगे पूरे दिन सियासी बतकहाव करने. फ़लां मंत्री ने ये किया ढिकां संतरी ने वो किया. खुद का पाज़ामा देखते नहीं कि नाड़े की एक डोर लटक के बदहवास लापरवाह होने का ऐलान किये जा रहा है. ससुरा दिल्ली से भोपाल तक की सियासत पे बात करते करते जीभ भी नहीं थकती मुओं की गोया सियासी लोग इनकी सुन रहे होंगे . यक़ीन मानिये चौबीस घंटे में लोग आठ घंटे सरकार को गरियाने, सल्लू मियां कैटरीना के ब्रेक-अप जैसी बकवास में बिताते हैं. शहर तो शहर गांव के गांव चंडू खाने हो गये हैं. जिस देश के लोग आठ घण्टे के बकवासी हों उस देश में डालर और टमाटर सबके दाम बढ़ने तय हैं.
  हमारा किराने वाला पुराना खिलाड़ी है कांग्रेसी को देख पक्का कांग्रेसी भाजपाई को देख पक्का भाजपाई हो जाता है. यूं तो उसके ग्राहकों में आधे से ज़्यादा सरकारी आदमी हैं पर निज़ी तौर पर सबके अपने अपने विचार बिंदू हैं. माधौ कांग्रेस का पक्का समर्थक बस किराने वाला दादू उसे देख मनमोहन जी की ऐसी तारीफ़ करता है  कि कल्लू खुश इत्ता खुश कि एक किलो शक्कर तौलने दादू ने कित्ते बांट रखा उसे परवा नहीं होती. माधौ की बीवी गुसयाती है-दिन भर टुन्न रहते हो ले आए न आठ सौ ग्राम शक्कर
उधर घीसू मोदी से उम्मीद लगाए बैठे हैं कि प्रभू रामराज लाएंगे किराने की दुक़ान पे घीसू की बड़ी तारीफ़ करता है दादू किराने वाला  घीसू भैया अगर मोदी जी............
  मोदी जी सुनते ही घीसू के मुख से आज़ादी के बाद से देश की दुर्गति का हिसाब-किताब पेश होता है. फ़िर उसे दो-हज़ार की उधारी अढ़ाई हज़ार बता के दादू हिसाब चुकता करवाए तो भी भाई को होश नही रहता.
                                कुल मिला कर घीसू-माधौ आज़ तक ज़िंदा हैं लुटते पिटते लापरवाह जी रहे है.. इनकी अपनी कोई  सोच नही है इनके सर सियासत का इश्क़ इस क़दर हावी है कि समय बे समय सियासी बहस मुसाहिबे में मुखरित हो जाते हैं । इलेक्शन क़रीब है देखिये इन वाकवीरों की वाणी से हर सीट का नफ़ा-नुकसान निकलेगा । सच  कहूं आप मानेगें मेरा कहा तो सुनिए सच यही है कि - ये घीसूओं माधवों का हिन्दुस्तान है. एक बेतरतीब मंज़र पैदा करते ये लोग कभी कभार  सल्लू की कार से कुचले जाते हैं वरना इनको सामाजिक-आर्थिक  गैर बराबरी रोज़िन्ना कुचलती है।  
                             आप हम सब अपने अपने एक  एक सिगमेंट का निर्माण करते हैं अपने इर्द गिर्द उसी में जीना चाहते हैं।  घीसूओं माधवों का अपना सिगमेंट है.आपके हमारे सिगमेंट से बड़ा है.  ध्यान रहे जब इनके हाथ मुट्ठियां बन  बगावत के लिए तन जाएँगी तब सर्वत्र अराज़कता हिंसा होगी इस तथ्य  को हम आप नकार नहीं सकते। नक्सलवाद इसी का उदाहरण है.  घीसूओं माधवों के  सिगमेंट में  खोने का भय नहीं है।  वह  खोयेगा क्या  है.……।  समझ रहे हैं न।               
           इस सचाई को आप देख-सुन और समझ सकते है.………कहीं भी कभी भी. ।      





30.7.13

कौन टाइप के हो समीर भाई

                                   
जनम दिन मुबारक हो समीर भाई 
 
 कौन टाइप के हो समीर भाई , हमाए जनम के ठीक चार महीने पहले यानी 29 जुलाई 1963 को दुनियां मेँ तुम  आए. को जाने कब बडे भये हमें न ई पता इत्तो जानत हैं की   हमाइ तुमाइ पहचान  कालेज के दौर में भइ थी. तब तुम  सदर से जबलपुर की नपाई शुरू  कर दिन भर में कित्ता जबलपुर नाप जोख लेत हते ..  हम तो भैया बस अंजाद (अंदाज़) लगाते रह जाते की अधारताल से आबे  वारे  दोस्त बताते -''यार, लाल से तो अब्भई अधारताल मे मिले बो रांझी जाएंगे . तब भैया आपके पास लेम्ब्रेटा रही है न । हमें का मालूम हतो कै हमाई तुमाई मुलाक़ात बीस साल बाद ब्लॉगर के रूप में भई है वरना तुमाई लम्ब्रेटा की फोटू नंबर के साथ हेंचवा लेते नितिन पोपट भैया से .तुम कौन टाइप हो तुमई  हेंचवा लेते । 
        एक बात और हमाओ तुमाओ जबलपुर अब बदल गयो भैज्जा सिटी काफी हाउस में सदर में गंजीपुरा वारे काफी हाउस में अब कोऊ ऐसी चर्चा                 
सुनो तुमाए सदर वालो कॉफ़ी-हाउस भौतई बदल गओ है  नई  होय आज कल के एक बीता कमर बारे मौड़ा-मोड़ी आत हैं काफी पीयत हैं फुर्र से बाइक लैखें मौड़ा जा बाजू मौड़ी बा बाजू निकल जात है. बाप कमाई पे ऐश करत हैं खुद कमाएँ तो जाने तब हम ओरे चन्दा कर खें काफी पियत हते आप कमाई भी कर लेट हते पर अब देखो बाप कमा कमा के जेबकट बनो जात रहो है मौड़ा - मौड़ी। …….  अब जाने दो भैया मरहई खों। …  आप जानतइ हो एक बात नई जा है की अब मानस भवन बिल्लकुल बदल गओ है । पर इतै वारे बिलकुल नईं बदले मालवी-चौक से हल्के रगड़ा किमाम १२० वारे पान लगवाए एक उतइ मसक लओ बाक़ी जेब में रक्खे । रफ़ी स्मॄति वारो प्रोग्राम देखत सुनत गए .. पान  खात खात पिच्च पिच्च ठठरी बंधों ने मानस-भवन आडीटोरियम की दीवारन की तो ....... दई... बस दो प्रोग्राम हो पाए हैं होली तक देखने पीक से इत्तो माडर्न आर्ट बना हैं ………  के कि खुद महान चित्रकारन की आत्माएं  इतै कार्यशाला करत नज़र आहैं... बड्डॆ सच्ची बात है.. पिकासो आहैं सदारत के लाने  । 
अंग्रेज़ गये अग्रेज़ी छोड़ गए
इन भुट्टॆ वालों के पास 
  हमने सुनी  है कि -  तुम जा साल सुई नईं आ रए.. नै आओ जबलपुर में रखो का है.. हम भी इतै हफ़्ता-खांड में आत हैं . तुम्हैं मालूम हो गओ हूहै कै कानपुर वारे फ़ुरसतिया भैया इतई हैं   . राजेश डूबे जी खूब कार्टून पेले पड़े हैं  फेस बुक पे ।    
       किसलय जी हरियाए से हैं  महेन भैया मज़े में कहाए । बबाल की न पूछियो - तुम तो जानत हो बडॊ़ अलाल अपनो बबाल ।  संजू नै तो कसम खा लई है कि बे अपने बिल से तब निकल हैं जब समीर दादा आंहैं । अरे एक बात बताने हती- गढा़ ओव्हर ब्रिज़ पे दुकान बज़ार खुल गओ है. आज़कल भुट्टा बिक रये हैं. हमें दस रुपैया को एक मिलो नगर निगम वारों को मुफ़त में मिलत है ऐंसी हमने सुनी है.. सच्ची का है भूट्टा बारो जाने कि खुद भुट्टा जाने नगर निगम के करमचारी से हम काय पूछैं.. ? 

पहाड के जा तरफ़ सबरे जैसे हथे औंसई हैं बदल तो तुम गये दो साल हो गये न आए न राम-जुहार भई … कौन टाईप के अदमी हो समीर भाई ? 
         जौन  टाईप के अदमी हो रहे आओ आने  तो हों आ जाने आज तो जनम दिन की बधाई लै लो दद्दा । .  

28.7.13

महिलाओं एवम बच्चों के विरुद्ध अपराधों की रोकथाम के लिये समन्वित कोशिशें आवश्यक जस्टिस के. के. लाहौटी

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री के.के. लाहोटी ने कहा कि महिलाओं और बच्चों के प्रति बढ़ते अपराध की रोकथाम का दायित्व पूरे समाज का है ।
समाज में नागरिक, शासन तंत्र और न्यायपालिका सभी शामिल है ।
  पहला दायित्व है अपराध करने की मनोभावना पर पूर्ण अंकुश लगे और यदि अपराध होता है तो अपराधी को शीघ्र कठोर दण्ड मिले ।  पीड़ित को त्वरित राहत पहुंचायी जाय ।

       मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री लाहोटी शनिवार को जबलपुर के तरंग प्रेक्षागृह में मध्य प्रदेश राज्यविधिक सेवा प्राधिकरण और मध्य प्रदेश पुलिस (महिला अपराध)जबलपुर जोन के संयुक्त तत्वावधान में महिला एवं बच्चों के अधिकारों की संरक्षा और उनके प्रति बढ़ते अपराधों की रोकथाम में न्यायपालिका,पुलिस और प्रशासन के दायित्व विषय पर आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला को मुख्य अतिथि कीआसंदी से संबोधित कर रहे थे ।  कार्यशाला की अध्यक्षता पुलिस महानिदेशक श्री नंदन दुबे ने की ।
मचासीन अतिथि 

       संभागायुक्त जबलपुर संभाग दीपक खाण्डेकर, प्रमुख सचिव महिला बाल विकास बी.आर. नायडू, कार्यशाला में 15 जिलों के कलेक्टर्स, पुलिस अधीक्षक तथा पुलिस, प्रशासन, राजस्व, महिला एवं बालविकास, जिला न्यायालयों के न्यायाधीशगण और संबंधित विभागों के अधिकारी मौजूद थे ।

       मुख्य न्यायाधीश श्री लाहोटी ने कहा कि महिला और बच्चों के प्रति संवेदनशील व्यवहार, सम्मानभाव और उन्हें सुरक्षित माहौल का उच्च नैतिक गुण तथा परम्परा भारतीय समाज में रही है ।  लेकिनकिन्हीं कारणों से धीरे-धीरे इसमें कमी आयी है ।  समाज को इस ओर ध्यान देना होगा ।

       मुख्य न्यायाधीश श्री लाहोटी ने कहा कि महिलाओं और बच्चों के प्रति बढ़ते अपराधों के मद्देनजरसर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देश जारी किये हैं ।  जिनका मध्य प्रदेश में पालन सुनिश्चित किया जा रहा है।  नियमों, कानूनों में सुधार किया गया है ।  उन्हें और सख्त भी बनाया गया है । न्यायालय नेमहिला-बच्चों के प्रति अपराध प्रकरणों का निराकरण करने में शीघ्रता लायी है ।
द्वितीय सत्र 

       मुख्य न्यायाधीश ने मध्य प्रदेश की पुलिस की सराहना करते हुए कहा कि पुलिस ने ऐसे प्रकरणों परअपेक्षित अनुसंधान आदि कार्रवाई को समय-सीमा में पूरा कर न्यायालय को त्वरित न्याय प्रदान करने मेंसहयोग प्रदान किया है । जिससे न्यायालय महिलाओं के प्रति अपराधिक प्रकरणों का निराकरण दो माह सेकम समय में करने में सक्षम हुए हैं ।  मुख्य न्यायाधीश श्री लाहोटी ने बताया  मुख्य न्यायाधीश श्री लाहोटी ने कहा कि राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के द्वारा भी इस दिशा में विशेषप्रयास किये जा रहे है ।  सर्वोच्च न्यायालय के बचपन बचाओ तथा महिला संरक्षण के निर्देशों तहत कार्यकिया जा रहा है ।  राज्य व्यापी वृहद लोक अदालत में बड़ी संख्या में प्रकरणों का निराकरण सुनिश्चितकराया गया ।  जो कि प्रदेश के लिये एक मिशाल रहा ।  श्री लोहाटी ने कहा ऐसे प्रयास निरन्तर जारी रहनेचाहिये ।  तभी पुलिस, न्यायपालिका और शासन तंत्र पर महिलाओं और बच्चों का विश्वास सुरक्षा औरआदर भाव सुदृढ़ होगा ।  बच्चों और महिलाओं को पुलिस थाने आने और अपनी परेशानी बताने में भयनहीं लगेगा ।

       मुख्य न्यायाधीश श्री लाहोटी ने कहा कि अमेरिका में बच्चों को भरपूर आदर-सम्मान प्राप्त होता है ।बच्चों के मामले देखने वाले पुलिस अधिकारी का व्यवहार बच्चों के प्रति बहुत अच्छा तथा संवेदनाओं से भरा रहता है । अमेरिका में यदि 911 नंबर डायल हुआ है तो तुरन्त पुलिस बिना देर किये जहां से फोन किया गया है उस स्थान पर पहुंचती है तथा पूंछताछ करती है कि कहीं किसी बच्चे को कोई परेशानी तो नहींहै ।  उन्होंने कहा कि महिला एवं बच्चों के अपनी सुरक्षा के प्रति ऐसा ही दृढ़ विश्वास पैदा करना हमारादायित्व है ।

       इस अवसर पर पुलिस महानिदेशक नंदन दुबे ने अपने उद्बोधन में कहा महिलाओं और बच्चों केअधिकारों की संरक्षा व उनके प्रति बढ़ते अपराधों की रोकथाम में न्यायपालिका पुलिस एवं प्रशासन कादायित्व महत्वपूर्ण विषय है । यह समाज के भीतर के अपने लोगों से संबंधित है ।  उन्होंने कहा आवश्यकहै समाज समझे उन्हें क्या सुधार करना है ।  श्री दुबे ने कहा इस विषय पर समाज की संवेदनशीलताआवश्यक है ।  उन्होंने कहा हमें अपने सोच के तरीकों में बदलाव आवश्यक है ।  पुलिस महानिदेशक नेकहा बहू-ससुराल पहुंच जाये तो उसे विदेशी न समझा जाये ।  उसे अपनी बेटी की तरह व्यवहार कियाजाये, न कि अत्याचार । श्री दुबे ने बच्चों से भीख मंगवाना और महिलाओं से वैश्यावृत्ति कराने विषय परअपनी बात रखते हुए कहा यह गलत और अनैतिक है ।  हमारे शास्त्रों में नारी को पूज्यनीय माना गया है । उन्होंने सामाजिक बदलाव की आवश्यकता पर बल दिया ।  दतिया और उमरिया जिले में विदेशी महिलाओं के साथ घटित घटना की चर्चा करते हुए कहा कम समय में पीड़ित को न्याय मिलने को अच्छी शुरुआत निरूपित किया.

       इसी अवसर पर प्रमुख सचिव महिला बाल विकास बी.आर. नायडू ने कहा महिला एवं बच्चों केअधिकारों के कानून एक महत्वपूर्ण विषय है, इसे समझने व जानने की आवश्यकता है ।  उन्होंने कहा आज यह कार्यशाला आयोजित की गई है, इसे प्रदेश के अन्य संभागों और जिलों में की जायेगी । श्री नायडू ने कहा इसमें स्वयंसेवी संगठनों को जोड़ना होगा ।  उन्होंने कहा जनजागरूकता कार्यक्रमों के लिए राशि की कमी नहीं है ।श्री नायडू ने यह भी कहा कि- सरकार निचले स्तर तक ऐसे संसाधन पहुंचाने के लिये वचनबद्ध है ताकि कानूनों का अधिकतम लाभ पीढितों  को प्राप्त हो सके. 
              महिला एवम बाल विकास विभाग के मैदानी अमले तक कानूनो की जानकारी देने विभाग कृत संकल्पित है. ऐसी कार्यशालाओ का आयोजन जिला एवम खण्ड स्तर तक किया जावेगा। 
      द्वितीय सत्र में भी प्रमुख सचिव महिला बाल विकास बी.आर. नायडू की सक्रीय भागीदारी उल्लेखनीय रही. 

       सदस्य सचिव मध्य प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण अनुराग श्रीवास्तव ने इस मौके पर कहामहिला एवं बच्चों के अधिकारों के संरक्षण पर आधारित यह कार्यशाला आयोजित की गई है, उक्त कार्यशालामध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधिपति एवं कार्यपालक अध्यक्ष मध्य प्रदेश राज्यविधिक सेवा प्राधिकरण जबलपुर के मार्गदर्शन पर आयोजित है ।  आपकी प्रेरणा से इसी तरह के कार्यक्रमकिये जायेंगे ।
              मृत्युदण्ड के आठ प्रकरणों में चार प्रकरणों में अपील उच्च न्यायालय द्वारा निराकृत की जा चुकी है ।  शेष शीघ्र निराकरण कीस्थिति में है ।  यह महिलाओं और बच्चों के प्रति संवेदनशीलता में हुयी वृद्धि तथा जागरूकता का प्रतीक है कानूनो में नये परिवर्तन आये है, कार्यशाला मे इन्ही बदलाव के साथ न्यायपालिका,पुलिस और प्रशासन के दायित्व  पर चर्चा करना कार्यशाला का महत्वपूर्ण बिंदू है.

       कार्यशाला में पुलिस महानिरीक्षक (महिला अपराध) जबलपुर जोन प्रज्ञा ऋचा श्रीवास्तव ने इस मौकेपर कहा प्रदेश में महिलाओं और बच्चों के प्रति बढ़ते अपराधों की रोकथाम के लिए अपने तरह का यहपहला विशेष प्रयास है ।  उन्होंने कहा इस कार्यशाला में 15 जिलों के अधिकारियों को समग्र प्रशिक्षण दियाजायेगा । सुश्री श्रीवास्तव ने कहा इस कार्यशाला में महत्वपूर्ण बात यह है कि जागरूकता और प्रशिक्षणकार्यक्रम में न्यायपालिका का विशेष एवं महत्वपूर्ण सहयोग मिला ।

कार्यशाला में कलेक्टर्स, पुलिस अधीक्षकों के साथ चयनित अनुविभागीय दण्डाधिकारी,तहसीलदार, नायब तहसीलदार, प्रशासनिक अधिकारी, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के जिला चिकित्साअधिकारी एवं ब्लाक मेडिकल आफीसर, महिला एवं बाल विकास विभाग अंतर्गत जिला महिला एवं बालविकास अधिकारी और एक ब्लाक स्तरीय अधिकारी महिला सशक्तिकरण अधिकारी, पुलिस विभाग केअधिकारीगण शामिल हए ।

       कार्यशाला में जबलपुर, नरसिंहपुर, कटनी, सिवनी, छिंदवाड़ा, बालाघाट, मंडला, डिंडौरी, रीवा, सतना,सीधी, सिंगरौली, शहडोल, उमरिया और अनूपपुर जिलों के अधिकारी शामिल हुए । कार्यशाला का आयोजनमहिलाओं और बच्चों को समाज में बेहतर सुरक्षित वातावरण प्रदान करने की दिशा में अनूठे प्रयास कीशुरूआत है। कोशिश हैं उन्हें अच्छे माहौल के साथ सुरक्षा और त्वरित न्याय मिले।

       कार्यशाला में बताया गया कि लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, घरेलू हिंसा सेसंरक्षण, महिला अपराधों के रोकथाम को प्रभावी बनायें कानून में बदलाव लाकर उन्हें अधिक प्रभावीबनाया गया है। विवेचना में गुणात्मक सुधार आयेगा। म.प्र. शासन के निर्देशानुसार अधिक गुणवत्तायुक्त त्वरित प्रयास होंगे।  कार्यशाला में पूरे दिवस महिला एवं बच्चों से संबंधित अपराध होने पर सी.आर.पी.सी. और आई.पी.सी. में हुए परिवर्तन की जानकारी दी गई ।
---------------- झलकियां-------------
  • कार्यशाला में लिये निर्णय अनुसार  न्यायविदों के प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में घरेलू हिंसा-प्रतिरक्षण अधिनियम  एवम प्रक्रिया विषय को शामिल किया जाएगा
  • पुलिस विभाग एवम महिला बाल विकास विभाग भी सतत प्रशिक्षण के पक्षधर नज़र आए. 
  • पुलिस महिला बाल विकास एवम सेवा प्रदाताओं की मध्य  समन्वय की की कमीं को स्वीकारते हुए समन्वय बढ़ाने पर जोर दिया गया. 
  • जस्टिस लाहौटी ने मीडिय़ा को सकारात्मक प्रयासों को उभारने की सलाह दी. 

                   (समाचार सहयोग :- उपसंचालक सूचना एवं प्रकाशन विभाग मध्य-प्रदेश भोपाल ) 

Wow.....New

Is everything predestined ? Dr. Salil Samadhia

आध्यात्मिक जगत के बड़े से बड़े प्रश्नों में एक है  - क्या सब कुछ पूर्व निर्धारित है ?  (Is everything predestined ? ) यदि हां , तॊ...