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अप्रैल, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

वेब कास्टिंग के लिये आप तीन बजे से तैयार रहें मिसफ़िट पर एक चटके के साथ

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  जी आप सही समझ रहे हैं मिसफ़िट पर आज़ आप देख सकेंगे  लाइव वेबकास्टिंग दोपहर तीन बजे से 

दिल्ली ब्लागर्स मीट : प्रेस कान्फ़्रेंस लाइव जबलपुर एवम इंदौर से

गिरीश बिल्लोरे मुकुल द्वारा जबलपुर से सुनने के लिये चटका लगाएं                                   " लाइव " पर ____________________________________________ अर्चना चावजी इंदौर से               

दिल्ली पहुंच कर अन्ना ने चूलें सरकार की हिला दीं थीं ब्लागर ब्लागरा भी ..

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                                                            हां तो भाईयो और ब्लागर भग्नियो जो ( मानें ) दिल्ली पहुंच कर अन्ना ने  चूलें सरकार की  हिला दीं थीं ब्लागर ब्लागरा क्या करेंगे.. जी सम्मेलन की घोषणा होते ही कितने सीनों पे नागिन फ़िलम छाप धुन पै  सांप लोट रए हैं सबरे ब्लागरन को पता है.पर जे जान लो भैया रवींद्र परताप जी  और अगरवाल साब  ने पूरे देस और बिदेस से ज़हर निकालने वाले सपेरे बुलाय लिये. जिनका काम है  ज़हर से  "ज़हर-रोधी" बनाना . सांप भैये  आप तो जिसकी आस्तीन में रहते हो रहो सीनों पे न लोटो वरना ज़हर से हाथ धो लोगे.    खास खबर ये है कि  अविनाश  जी  और पता नहीं कौन कौन  दिल्ली चलो का हल्ला महीनों से  नुक्कड़  पे आके मचाए पड़े थे उधर भाई   रवीन्द्र प्रभात की किताबें  लिखने की   मौन  साधना अलग जारी थी. बस्स इस आह्वान का असर दिखा अंदर की बात तो जे है भैया कि अन्ना हज़ारे तक दिल्ली आ गये और बस हिला दीं चूलें सरकार की ऐसा माना जा रहा है... और खास खबर ये है कि लारा मेमसाब पर इस आह्वान का असर कुछ ज़ियादा ही हुआ उनने कसम खाई कि 29 अप्रैल 2011 से पूरे देश में ब्लागर्स के

नाव गाड़ी का रिश्ता

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पाकिस्तान में मिली ये तस्वीर नाव गाड़ी का रिश्ता  बयां कर रही है. यही  हक़ीकत है पाकिस्तान की हमेशा नाव  पर  गाड़ी होती है. नाव जो हमेशा डूबती-उतराती नज़र आती है.पर चल रही है परम आत्माओं के सहारे जो विश्व के हर हिस्से को हिला देने की जुगत में तत्पर.   अब तो जागो पाक़िस्तान ... विश्व को बता दो तुम भी नेक नियत देश हो... तुम्हारे दामन के दाग धोने के लिये इससे बेहतर वक़्त कब आएगा. तब जब विश्व एक बड़े सामाझिक परिवर्तन के लिये तत्त्पर है.  एक रपट किसलय जी के सेलफ़ोन से 

तुमने किसका गीत ये गाया ,अपने सुर में आज़ पिरोकर किसका ओढ़ लबादा आये- कहो कहां से आये होकर !

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सागर पाखी अपने पर को  फ़ैला कर मापें जब सागर, तब जानो सागर नन्हा है-  आतुर वे भरने को गागर ! लघु विशाल का भेद निरर्थक  देखो तो साहिल पे  जाकर. इनसे भी ज़्यादा है मापा- जलचर ने अंतस तक सागर !! *********************************** तुमने किसका गीत ये गाया ,अपने सुर में आज़ पिरोकर किसका ओढ़ लबादा आये-    कहो कहां से आये    होकर ! बंद करो खोने का रोना- मिथ्या गीत नहीं सुनना है- नित नूतन कुछ कुछ पाया है, हमने जग में खुद को खोकर !! अपना उदर भरा करते हो इस उस के मुख छीन निवाला अपनी ठिठुरन मिटा रहे क्यों- मेरे तन से  छीन दुशाला . चिंगारी से डरने वालो क्या मशाल लोगे हाथों में- हमको देखो जल जल हमने रोज़ राह में किया उज़ाला !! ***********************************

बाबा की उस सम्पत्ति की चर्चा करो जो मानव कल्याण के लिये बिखरी पड़ी है

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ये  विषय नही कि संस्थान के पास क्या है,उसका क्या होगा, उसे कौन संचालित करेगा.चर्चा तो इस बात की होनी चाहिये  कि बाबा ने कितने  जीवनो को पारस-मणि सा स्पर्श दिया और लोहे से सोने सा बना दिया...? किसी भी योगी  की आध्यात्मिक शक्ति को न देख पाना हमारे चिंतन की अपरिपक्कवता ही है. लोग मंदिर की भव्यता से ईश्वर की शक्ति को तौलते हैं . किसने कहा ईश्वर सिर्फ़ भव्य मंदिरों में ही मिलते हैं.भक्त के मन में भगवान का स्वरूप किसी "धनाड्य" सा होगा तभी भक्त प्रभावित होगा ऐसा सोचना भी मिथ्या है.सत्य साई बाबा के लोककल्याण की अवधारणा का समापन उनके शारीरिक अवसान के बाद भी जारी रहेगा.क्योंकि बाबा का देह त्याग एक लीला मात्र है. वे आध्यात्मिक रूप से आत्माओं में सृष्टि के अनंत विस्तार तक रहेंगें.      बाबा को आप  सतही अपनी आंखों से देखना है न कि सतही खबरों के ज़रिये तभी तो बाबा की उस सम्पत्ति की चर्चा कर सकोगे  जो मानव कल्याण के लिये बिखरी पड़ी है. जो हुआ है. बाबा के आश्रम की चिंता तुम मत करो बस चिंतन करो 

बस एक बार बाबा की विभूती चखो तो समझ जाओगे तुम क्या हो बाबा क्या हैं

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आज़ से ३१ वर्ष एक माह पूर्व की वो सुबह हां याद आया  मार्च १९८० के एक गुरुवार  एक सुबह यानी  चार से पांच के बीच का वक़्त था , जाग तो चुका था मैं साढ़े तीन बजे से , लग भी रहा था कि लगा कि आज़ का दिन बहुत अदभुत है. था भी, मुझे नहीं मालूम था कि आज़ क्या कुछ घटने  वाला है. गंजीपुरा के साहू मोहल्ले वाली गली में अचानक एक समूह गान की आवाज़ गूंजती है बाहर दरवाजा खोल के देखता हूं बाबा के भक्तों की टोली  अपनी प्रभात फ़ेरी में  नगर-संकीर्तन करती हुई निकलती है. श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा.. जैसे कई भजन पूरे पथ संचलन में.  गाते जा रहे थे भक्त गण .. साई कौन है ? इस पड़ताल में लग गया मैं. मार्च अस्सी की मेट्रिक की परीक्षा के बाद पड़ताल करना शुरु किया. वैसे मेरे कई मित्र जैसे अविजय उपाध्याय, शेषाद्रि अय्यर, जितेंद्र जोशी (आभास-जोशी के चाचा मेरे मौसेरे भाई), मुकुंद राव नायडू ,सत्य साई सेवा समिति की  बाल विकास के विद्यार्थी थे.बाबा के बारे में इतना जानता था कि वे मेरे नाना जी के आध्यात्मिक गुरु हैं. उनके घर से समिति के काम चला करते थे.  करंजिया के श्रृंखला बद्ध  आलेखों ने मेरे  क

डा० उमाशंकर नगायच कृत ग्रंथ : महर्षि दयानंद का समाज दर्शन

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कृति समीक्षा - महर्षि दयानंद का समाज दर्शन  प्रस्तुति :-गिरीश बिल्लोरे मुकुल  1. आज बाजारीकरण के प्रभावों से आक्रान्त जनमानस भौतिक विज्ञानों की दिशा में ही चिन्तन के लिए समय दे पा रहा है। सृष्टि के मूल सिद्धान्तों और युगों के अन्तराल के बाद स्थापित मानव संस्कृति, सभ्यता एवं समाज व्यवस्था के सम्बन्ध में चिन्तन घटता दृष्टि गोचर हो रहा है। समाज में संतुलित विकास के लिए दोनो ही दिशाओ में समान रूप से बढ़ना आवश्यक है। एक को छोडकर किसी दूसरे की ओर बढने से जीवन में पूर्णत्व की प्राप्ति नहीं होगी। आदरणीय डॉ. उमाशंकर नगायच द्वारा आई.टी. की चकाचौंध के इस युग में समाज में मूल्यों के घटते महत्व के कारण पनप रही अप्रतिमानता की समाप्ति के लिए भारतीय सभ्यता के मूलाधार ‘वेदों’ को जनसामान्य तक पहुँचाने वाले मनीषी महर्षि दयानन्द के समाज दर्शन की विवेचना अपने शोध ग्रन्थ में की है। उनका यह कार्य अनूठा, अद्भुत और अतुलनीय है। 2. शोधग्रंथ में वैदिक संस्कृति व धर्म के उद्धारक महर्षि दयानंद सरस्वती के बहुआयामी व्यक्तित्व, उदार कृतित्व, जीवन के प्रति उनके व्यापक और सर्वग्राही दृष्टिकोण का रोचक ढंग से वर्णन क

बवाल के स्वरों में सुनिये गीत " कुछ झन झन झन था"

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लुकमान चाचा  बवाल हिंदवी यानी एक सम्पूर्ण कलाकार यानी एकदम पूरा का पूरा बवाल जब मंच पर आये तो समझिये लोग एक पल भी ऐसे बवाल से दूर न होने की क़सम खा लेते हैं. विनोबा-भावे ने  जबलपुर को सैंत में न दिया ये नाम एक बानगी तो देखिये.... लाल और बवाल ब्लाग से साभार   ब वाल एक ऐसे उस्ताद का शागिर्द है जिनने उर्दू -कव्वाली कव्वाली से उर्दू का एकाधिकार समाप्त किया.हिंदी कविताओं गीतों को प्रवेश दिलाया था कवाली-शैली की गायकी में. बवाल के गुरु स्वर्गीय लुकमा न जो गंधर्व से कम न थे. हम लोगों में  गज़ब की दीवानगी थी चच्चा के लिये...देर रात तक उनको सुनना उनकी महफ़िल सजाना एक ज़ुनून था.. फ़िल्मी हल्के फ़ुल्के संगीत से निज़ात दिलाती चचा की महफ़िल की बात कैसे बयां करूं गूंगा हो गया हूं..गुड़ मुंह में लिये    आप सोच रहें हैं न कौन लुकमान कैसा लुकमान कहाँ  का लुकमान जी हाँ इन सभी सवालों का ज़वाब उस दौर में लुकमान ने दे दिया था जब  उनने पहली बार भरत-चरित गाया. और हाँ तब भी तब भी जब गाया होगा ''माटी की गागरिया '' या  मस्त चला इस मस्ती से थोड़ी-थोड़ी मस्ती ले लो     ( आगे देखिये

नोट कमाएं : अभी ज़रा ज़रा फ़िर ज़्यादा

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दीप अकेला -- अज्ञेय जी की एक रचना

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आज एक कविता "अज्ञेय" जी की--- जो प्राप्त हुई है  सिद्धेश्वर जी के सौंजन्य से... सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' उपनाम: अज्ञेय जन्म: ७ मार्च   १९११ कुशीनगर ,  देवरिया ,  उत्तर प्रदेश ,  भारत मृत्यु: ४ अप्रैल   १९८७ दिल्ली ,  भारत कार्यक्षेत्र: कवि, लेखक राष्ट्रीयता: भारतीय भाषा : हिन्दी काल: आधुनिक काल विधा : कहानी ,  कविता ,  उपन्यास ,  निबंध विषय: सामाजिक ,  यथार्थवादी साहित्यिक आन्दोलन : नई कविता , प्रयोगवाद प्रमुख कृति(याँ): आँगन के पार द्वार ,  कितनी नावों में कितनी बार हस्ताक्षर: विकीपीडिया से साभार  दीप अकेला - अज्ञेय यह दीप अकेला स्नेह भरा है गर्व भरा मदमाता पर इसको भी पंक्ति को दे दो यह जन है : गाता गीत जिन्हें फिर और कौन गायेगा पनडुब्बा : ये मोती सच्चे फिर कौन कृति लायेगा? यह समिधा : ऐसी आग हठीला बिरला सुलगायेगा यह अद्वितीय : यह मेरा : यह मैं स्वयं विसर्जित : यह दीप अकेला स्नेह भरा है गर्व भरा मदमाता पर इस को भी पंक्ति दे दो यह मधु है : स्वयं काल की मौना का युगसंचय यह गोरसः जीवन-कामधेनु का अमृत-प

शरद कोकास एक जिद्दी व्यक्ति

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साभार : शब्दों का सफ़र से " शरद कोकास " ----एक सराहनीय और मिलाजुला प्रयास....... शरद कोकास एक जिद्दी व्यक्ति का नाम है.जी हाँ वह शरद कोकास एक जिद्दी जो की  कविता कोष में इस तरह से शामिल है गुनगुनी धूप में बैठकर / शरद कोकास   (कविता-संग्रह) पुरातत्ववेत्ता / शरद कोकास   (लम्बी कविता) बीता हुआ दिन / शरद कोकास प्रकृति के दफ़्तर में / शरद कोकास कोयल चुप है / शरद कोकास अर्थी सजाने वाले / शरद कोकास बदबू / शरद कोकास हैलमेट / शरद कोकास इज़्ज़तदार / शरद कोकास झील से प्यार करते हुए–1 / शरद कोकास   झील से प्यार करते हुए–2 / शरद कोकास बच्चा अपने सपनों में राक्षस नहीं होता / शरद कोकास ईश्वर यहीं कहीं प्रवेश करता है / शरद कोकास / शरद कोकास / शरद कोकास   शरद कोकास यानी  जबलपुर आने का तीन बरस से वादा करके न आ आए .... सोचा था की सुनेंगे उनको पर वे इस बार भी न आये जबलपुर  खैर अर्चना  जी ने उनके सफल प्रयास का पोड कास्ट बना दिया मुझे बहुत उम्दा लगा    आभार अर्चना जी    

दादी की पोथी ..

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आज पुरानी पुस्तकों के बीच दादी की पोथी हाथ लगी....मूल्य लिखा है ५/- और नाम है "रामायन मनका-१०८"... बस और कुछ नहीं .....सोचा आज हनुमान जयंती है, तो इसे ही सब तक पहुँचाया जाए...   और महावीर के चरणों में समर्पित ये हन हनुमतये नम: ___________ हन हनुमंत दुष्ट दलन को लाज़ रखो निर्बल जन मन को ! कुंठित दुष्ट क्रूर अग्यानी- सुन कापैं तुम्हरी जस बानी..! जो नारकी दिये दु:ख मोही- राम की सौं मत तज़ियो सो ही . मो सम भाग हीन तुम नाथा- तुम संग जीत गयहुं जुग सा..!! अब सुनिए-- रामायन मनका-१०८

अंगुली पुराण भाग दो

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   आप ने यहां देखा    गोया कृष्ण जीं ने गोवर्धन पर्वत को अंगुली पे क्या उठाया हमने उनकी तर्ज़ पर हर चीज़ को अंगुली पे उठाना चालू कर दिया है । मेरे बारे मे आप कम ही जानते हैं ...! किन्तु जब अंगुली करने की बात हो तो आप सबसे पहले आगे आ जायेंगें कोई पूछे तो झट आप फ़रमाएंगे "बस मौज ले रहा था ?" अंगुली करने की वृत्ति पर अनुसंधान करना और ब्रह्म की खोज करना दोनों ही मामलों में बस एक ही आवाज़ गूंजती है "नयाति -नयाति" अर्थात "नेति-नेति" सो अब जान लीजिये जिसे जो भी सीखना है सीख सकता है बड़ी आसानी से ...! ..........................................................................   ..... बहरहाल अंगुली का इस्तेमाल करो खूब जम के करो कोई गलत नहीं है पर ज़रा देख समझ के  कहीं ग़लत जगह चली गई तो अंगुली को खामियाज़ा भुगतना पड़ सकता है ....फ़िर मत कहना -"बताना तो था !!" वरना  बाबा  बाल ठाकरे  ने क्या कहा था भारत के रत्न को की बाट जोहते  सचिन  भैया को अब आगे :- भास्कर से साभार   ब्लागर  अ जित गुप्ता   बोलीं कि  हम तो अंगुली पर नचाना ही जानते हैं। जरूरत पड़े तो अं