शनिवार, मार्च 28

रवीश कुमार की समस्या :रामायण का प्रसारण


Ravish Kumar नामक व्यक्ति को दूरदर्शन पर रामायण का प्रसारण फिर से एक बार जनता की मांग पर किया। पता नहीं रवीश जी के पेट में अजीब अजीब सी हरकतें होने लगी जैसी अपच में होती है और दोपहर होते-होते तक मामला वोमिटिंग तक पहुंच गया। कोरोना वायरस वहीं से आया है, जहां से इन भाई साहब को विचारों की खेती करने के लिए बीच मिलते हैं। तकनीकी भी वहीं से मिलती है खेती करने की। यह श्रीमान मात्र 45 साल की उम्र के हैं 74 में इनका जन्म हुआ है परंतु मैग्सेसे अवार्ड पाने के बाद पता नहीं इतने हल्के हो गए हैं कि इन्हें किसी भी व्यक्ति का समुदाय का चिंतन का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इनका किसी से कोई भी राजनैतिक रिश्ता अच्छा या बुरा हो सकता है, उससे हमें कोई लेना-देना नहीं हमें लेना देना इस बात से है कि आज से जनता की मांग पर श्री राम के जीवन पर आधारित रामायण का प्रसारण क्या हुआ भाई साहब आज दोपहर की नींद सोए नहीं। और सोते भी कैसे रक्ष संस्कृति के संवाहक के रूप में इनकी कदाचित जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि ये उसका विरोध करें। विरोध इनकी मूल प्रकृति में है। बिहार मोतिहारी के जन्मे दिल्ली यूनिवर्सिटी से पढ़ लिख कर रोटी कमाने के लायक हो गए और एक खास प्रकार के चिंतन के ध्वजवाहक भी हो गई। वास्तव में राम और रामराज के मर्म को इन्हें समझने में बड़ी कठिनाई हो रही है। घर से बैठे-बैठे फेसबुक पर लाइव होकर भाई ने बताया कि भारत बिल्कुल भी तैयार नहीं है चीन जनित महामारी से निपटने के लिए . मुझे ऐसा लगा कि शायद भाई सही कह रहा हो? तफ्सील से हमने भी तस्दीक शुरू कर दी , हमें पता चला हर आईएएस हर आईपीएस हर वह व्यक्ति जो राजनीतिक प्रतिद्वंदी है इस मुद्दे पर मानवता के साथ है जितना बन पड़ रहा है कर रहे हैं। रवीश कुमार का कहना है कि भारत सरकार ने आज तक अगर महामारी फैल जाती है तो कोई व्यवस्था नहीं कर रखी है . मुझे लगता है बिल्कुल सही कहा इन्होंने भारत सरकार और समस्त राज्यों की सरकारें अपने संसाधनों का बेहतर से बेहतर उपयोग करने में सक्षम है और करती भी हैं। परंतु क्या कभी भाई ने अथवा इनके चैनल ने दिन भर चलने वाले एक विज्ञापन का भी सहयोग दिया है किसी भी सरकार को शायद कभी नहीं। रविश एक कुटिल बुद्धिमान हैं इन्होंने मिशन विरोध के चलते यह भी नहीं सोचा कि कभी इन्होंने चिकित्सकीय व्यवस्था को मजबूत करने के लिए किसी भी सरकार को सलाह दी अब तक मैंने इनके जितने प्रोग्राम देखें संभवत है ऐसा कभी इन्होंने नहीं किया। अगर कोई प्रोग्राम होगा भी तो उसके लिए मैं क्षमा चाहता हूं हो सकता है कि पूरे दिन इनके चैनल को ना देखा हो। सुधि पाठकों को बता देना चाहता हूं कि भारत में राम मर्यादा पुरुषोत्तम राम होने के कारण पूजनीय एवं आदर्श है। कवियों ने उन्हें मर्यादित राजा की उपाधि से नवाज़ते हुए श्रेष्ठ कहां है। तुलसीदास ने राम के चरित्र को लोक नायक के रूप में प्रस्तुत किया है। पत्रकार है इतना तो जानते ही होंगे। राम एक ऐसे राजा के रूप में कथानक के माध्यम से जाने जाते हैं जो ईश्वर की तरह पवित्र और सर्वमान्य थे। और अगर अपने आदर्श के जीवन चरित्र पर आधारित किसी नाटक को जनता देखना चाहती है जो उसका व्यक्तिगत अधिकार भी है भाई को आपत्ति क्यों होने लगी। बहुत सारी चैनल है जिनमें धार्मिक सीरियल आ रहे हैं उन पर भाई साहब की टिप्पणी क्यों नहीं आई। कोरोनावायरस के विस्तार को लेकर इतनी ही चिंता इनके मन में है तो यह मास्क बांधकर किसी पीड़ित मानवता की सेवा में क्यों नहीं निकल गई आखिर भारत के नागरिक तो है। इनके चिंतन में कहीं ना कहीं किसी को किया हुआ कमिटमेंट नजर आ रहा है। कहां रामायण का प्रदर्शन और कहां करुणा वायरस। आज शाम और सुबह तकनीकी कारणों से मेरा टेलीविजन सेट खराब था मेरी पत्नी और बेटी का मूड भी खराब हो गया। क्या इन पढ़ी लिखी जनता को आप समझाऐंगे..? भाई जी जनता का अधिकार और आपकी अभिव्यक्ति का अधिकार सिंक्रोनाइज नहीं है जनता जो चाहती है उसी आप पढ़ नहीं पाएंगे आप जो भी व्यक्त करते हैं उसे वह निभा नहीं पाएगी। रवीश के लिए यूं तो मेरे दिमाग में हजारों सवाल परंतु विषय को चबा चबा कर गन्ने की बेदम हुई बचत की माफिक उगलने वालों से हम बात नहीं कर सकते हमारा भी तो कोई स्वाभिमान है। अरे कम से कम मिर्जा गालिब को ही पढ़ रहे थे भारत का सांस्कृतिक दर्शन समझने के लिए मेरे परम पूज्य मिर्जा गालिब काफी है। बहुत प्रेरणा करो भारतीय आइकॉन से जिन्हें विवेकानंद कहा जाता है जिन्हें रामकृष्ण परमहंस कहा जाता है जिन्हें गांधी कहा जाता है जिन्हें रजनीश कहा जाता है जिन्हें कबीर कहा जाता है बस तुम रसखान को पढ़ लो कबीर को समझ लो सब कुछ साफ हो जाएगा अभी तो तुम्हारी उम्र बहुत कम है मुझसे लगभग 11 बरस बाद पैदा हुए यह उम्र अनुशीलन चिंतन और संस्कृति को समझने की है पता नहीं कहां से तुम्हें तकलीफ होती है ताली बजाने पर। छठ मैया की पूजा करते तुम्हें हमने भी देखा है इस देश में भी देखा है क्या वह पाखंड था आज के प्रसारण को देखकर तो लगा शुद्ध पाखंड था। उम्र के लिहाज से मुझसे बहुत छोटे हो और मैं भी परसाई की जमीन मैं जन्मा रजनीश परसाई सभी का सम्मान करते हुए जहां-जहां असहमति है असहमत रहता भी हूं परंतु वोमिटिंग नहीं करता। यह अलग बात है पेट के लिए तुम्हें किसी एजेंडे को आगे बढ़ाना है बढ़ाते रहो परंतु एक बात ध्यान रखो अगर आज रामायण का पुनः प्रसारण हुआ है तो वह जनता की मांग पर हुआ है, उस समय तुम 12 या 13 वर्ष उम्र के किशोर रहे थे न..? क्या किसी से सुना होगा सड़कों पर सन्नाटा रहता था अतिथियों को पानी भी तब मिलता था जब सीरियल खत्म हो जाए। आज जरूरत है कि जनता सड़कों पर ना दिखे और अगर इस सीरियल से यह फायदा मिल रहा है तो अपच वाली बात क्या? प्रिय रवीश इतना ज़हर मत बोलो कि लोग यह भूल जाए कि तुम वाकई में गलत प्रजाति में जन्मे हो। कभी तो सद्भावना रख लिया करो कभी तो समरस बनने की कोशिश किया करो यह सब बहुत दूर तक नहीं चलेगा अध्यात्म से जुड़ जाओ शायद भारतीय तो हो पर अच्छे और सच्चे भारतीय बन जाओगे । यह आलेख तुम्हें भेज रहा हूं निश्चित तौर पर तुम्हारा यह कहना होगा कि मैं अमुक या तमुक विचारधारा से संबद्ध तो यह गलत है पहले ही स्पष्ट कर दूं कि मुझे दाएं बाएं से कोई लेना देना नहीं है तो ऐसे आरोप लगाना भी मत भूलकर भी नहीं । अन्य प्राप्त होने वाले पुरस्कार और सम्मान के लिए अग्रिम शुभकामनाएं

शुक्रवार, मार्च 27

*मध्यवर्ग की आवाज सुनने के लिए धन्यवाद*

भारत सरकार ने मध्यमवर्ग की आवाज जिस तेजी से सुनी उसे लगा कि सरकार ने उम्मीद से अधिक कर दिया । जिस तरह से बैंकों की रेपो रेट में गिरावट बैंक की लिक्विडिटी बढ़ाई है तो सीआरआर का 1 परसेंट कम हो जाना भी अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है इससे सीधा लाभ मध्यमवर्ग को मिलना सुनिश्चित है।
वर्तमान परिदृश्य में सारे प्रश्न हल हो चुके हैं किंतु ई एम आई में प्रीमियम का स्थगन स्पष्ट नहीं है। दिन भर मित्रों से चर्चा के बाद सबके मन में एक ही आशंका है कि क्या बैंक स्थगित प्रीमियम एक साथ वसूलेंगी अथवा लोन की अवधि बढ़ेगी? बढ़ी हुई अवधि में ब्याज की स्थिति क्या होगी यह भी आरबीआई के द्वारा स्पष्ट नहीं किया गया है? यद्यपि यह 2 सवाल के संदर्भ में विश्वास कि सरकार और रिजर्व बैंक इस पर शीघ्र ही स्पष्ट हो जावेगी।
मित्रों मध्यवर्ती आवाज इतना जल्दी कभी नहीं सुनी गई जितना की आज सुनी गई है इसके लिए रिजर्व बैंक और भारत सरकार को साधुवाद देना ही होगा।
ऐसे समय में इंश्योरेंस कंपनियों के लिए भी सरकार को पृथक से इस आशय के स्पष्ट आदेश जारी करने होंगे जिसमें यह स्पष्ट कर दिया जाए कि उनके प्रीमियम भी स्थगित हों तथा जोखिम को 3 माह तक कवर की जा सके।
यद्यपि यह एकदम पृथक मामला है अतः उम्मीद है कि सरकार बीमा कंपनियों सरकारी जीवन बीमा निगम के साथ संवाद विस्थापित कर सकेगी।
अब जहां तक किसी परिस्थिति वश भारत कोरोना वायरस के संक्रमण पर नियंत्रण नहीं कर पाता है तब सरकार की स्थिति भी बेहद कमजोर हो जावेगी। वैसे यह स्थिति पूरे विश्व में समान रूप से इस समाज रह सकती है अतः इससे ज्यादा घबराने की जरूरत नहीं।
सरकार ने अपना फर्ज निभाया है अब आम जनता को क्या करना चाहिए ?
यह सवाल स्वभाविक है, आप 3 माह की प्रीमियम अगर सुरक्षित रख देते हैं तो वह एक बचत के रूप में आपके खाते में पर देश की बचत के रूप में बैंकों में जमा रहेंगे। अर्थात हमें केवल बहुत जरूरी खर्चों के लिए उक्त राशि को उपयोग में लाना है। ताकि सिस्टम से राशि बाहर ना हो। सरकार ने यह सुविधा इस उद्देश्य रिजर्व बैंक के माध्यम से दिलवाई है ताकि उसका लाभ मध्यमवर्ग की कर्मचारियों और व्यापारियों को सीधा सीधा मिल जावे।
आपके हाथ में कैश है किंतु दुरुपयोग के लिए तो बिल्कुल नहीं। अगर आप इस कैश को अपने बैंक खाते में रखते हैं, तो यह बचत आपके लिए महत्वपूर्ण और सुखदाई होगी।
ऐसा नहीं है कि सरकार बाजार को जीवंत रखने के लिए कोई कदम नहीं उठाने वाली है। क्रय शक्ति आपके हाथ में होगी परंतु आवश्यकता के अनुरूप आपको वह करना होगा। यहां पुरानी भारतीय परंपराओं और व्यवस्था का अनुसरण करते रहना जरूरी है।
मेरा यह मानना है कि मध्यवर्ग का सर्वाधिक योगदान होता है अर्थव्यवस्था के संचालन में, साथ ही उत्पादकता में भी मध्यवर्ग महत्वपूर्ण है।
ऐसी स्थिति में आपको अपनी भूमिका स्पष्ट कर देनी चाहिए, अन्यथा अगर विषम परिस्थिति हुई तो आप अगले 3 माह में भी अपने आप को सुरक्षित नहीं रख पाएंगे। अगले तीन माह की स्थिति निर्भर करती है संक्रमण कि हम कितना जल्द काबू पाते हैं।
इसके लिए सोशल डिस्टेंसिंग को मेंटेन रखना फिलहाल तो बेहद जरूरी है, विश्व स्वास्थ्य संगठन इस मुद्दे पर बहुत ही स्पष्ट और साफ है, उसने भारत द्वारा उठाए गए कदम को सटीक माना है। जो जहां है वह वहां रहे यह व्यवस्था का प्रश्न है। जिसे राज्य सरकारें स्थानीय निकाय, जन सहयोग के के जरिए हल किया जाएगा।
आपको करना क्या है...?
आपको बहुत कुछ अधिक नहीं करना है, केवल उन व्यक्तियों को संसाधन उपलब्ध कराने के लिए सरकार को मदद करनी है। ठीक उसी प्रकार जैसे सिख मतावलंबी गुरुद्वारे के लंगर का संचालन करते हैं। अगर 100 मिडिल क्लास परिवार 10 रोटियां और उसके अनुकूल दाल या सब्जी एकत्र कर प्रशासन द्वारा निर्धारित सुविधा केंद्रों को उपलब्ध कराते हैं तो आप बहुत बड़ा सहयोग कर रहे होते हैं।
आवास व्यवस्था के लिए अगर आप अपने घर से एक कंबल या चादर या बिस्तर जो आपके घर में सहज उपलब्ध है दान कर देते हैं तो प्रशासन को आवास की समस्या हल करने में कोई देर नहीं लगेगी।
इस तरह बूंद बूंद से समस्याओं का सूखा सागर भरा जा सकता है। अगर इतना भी नहीं तो आप घर बैठे 100 से 500 रुपए तक का दान सीधे जिले में स्थित रेड क्रॉस सोसाइटी को दे सकते हैं। वह भी बिना जाए। घर से भी बाहर निकलने की जरूरत नहीं है आप ऑनलाइन भुगतान की सुविधा व्यवस्था का लाभ उठा सकते हैं।
सरकार जब मध्यमवर्ग की आवाज को एक बार में सुन सकती है तो हम बिना देर किए सरकार के प्रति इतना प्रतिकार तो कर सकते हैं।
मैं देख रहा हूं सोशल मीडिया पर दानदाताओं के रूप में अपेक्षा अधिक की जा रही है सवाल कई बार किया कि भाई अभी तक आपने क्या किया है इस पर कोई उत्तर नहीं मिल रहा। विधायकों सांसदों मंदिरों व्यापारियों वृहद उद्योगों उद्योगपतियों ने बहुत कुछ करना शुरू कर दिया है इस पर टीका टिप्पणी भी हो रही है जो अलग बात है परंतु सबके मन में उस समाज के प्रति संवेदनाएं जाग रहे हैं जिसमें ऊपर लिखे वर्ग स्वयं शामिल है। मजदूरों गरीबों से एक भी पैसा लेने की जरूरत बिल्कुल नहीं है हम 60% से अधिक मध्यमवर्गीय लोग अपने संसाधन से छोटा सा काम आसानी से कर सकते हैं। वरना हम भिक्षुक के रूप में नजर आएंगे।
अगले आर्टिकल तक मुझे उम्मीद है बहुत सारा पैसा रेडक्रॉस सोसायटी या सरकार द्वारा बताए गए खातों में भेजी जा सकती है क्योंकि अभी इसकी बहुत जरूरत है।

गुरुवार, मार्च 26

विश्व रंगकर्म दिवस 2020 : संस्कारधानी जबलपुर में रंगकर्म यात्रा

उन्नति तिवारी सुभद्रा जी की भूमिका में 

सुप्रभात मित्रों आज विश्व रंगमंच दिवस विश्व रंगमंच दिवस पर संस्कारधानी जबलपुर के रंगमंच से जुड़े सभी रंग कर्मियों को नमन करता हूं
मित्रों भारतीय रंगकर्म भरतमुनि की परंपराओं का वर्तमान स्वरूप है। भारतीय रंगकर्म की लोकप्रियता का मूल आधार है उसका बहु आयामी स्वरूप। ऐतिहासिक समसामयिक पौराणिक राजनीतिक सामाजिक धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों पर रंगकर्म की प्रयोग सर्वाधिक दक्षिण एशिया के भारतीय उपमहाद्वीप में ही किए गए। यह एक बहुत बड़ा माध्यम बना। सिनेमा ने इसे रिप्लेस कर दिया लेकिन गर्व है संस्कारधानी पर जिसने रंगकर्म को यथावत जीवित रखा जीवित ही नहीं रखा बल्कि उसमें संवर्धन और परिवर्धन के निरंतर प्रयोग किए गए। अब तो संसाधनों से संपन्न है हमारा थिएटर।
अगर मिर्जा साहब के एक शेर पर पैरोडी बनाने को कहा जाए तो मैं कहूंगा
हैं और भी दुनिया में थिएटर बहुत अच्छे
कहते हैं कि जबलपुर का अंदाज ए बयां और ।।
   जी हां जबलपुर थिएटर का एकमात्र बहुत बड़ा विश्वविद्यालय है चल रहा है नहीं दौड़ रहा है काला घोड़ा नाट्य उत्सव ले लीजिए अगर जबलपुर की मौजूदगी वहां नहीं होती है तो शायद वे असहज महसूस करते हैं सुना है मैंने पुष्टि आप कीजिए कैसा होता है निश्चित होता ही होगा दर्शकों को अभाव महसूस।
मुझे पता नहीं क्यों थिएटर ने आकृष्ट किया। थिएटर में मैं सक्रिय रुप से घुस जाना नहीं चाहता था पर एक बार हिम्मत की। तस्लीमा नसरीन की लज्जा पर कुछ लिखने की लिखा भी कि मुझसे मेरे छोटे भाई सोनू पाहुजा ने कहा - भैया मैंने लज्जा पर लिखा है सोनू को यह नहीं मालूम था कि मैं भी लिख रहा हूं। दिमाग में दो बात चल रही थी एक यह कि सोनू थिएटर का अनुभवी है दूसरा यह कि मुझसे छोटा है अब अपनी स्क्रिप्ट रहने दो सोनू को सपोर्ट करते हैं !
   मैंने अपनी अंदर की बात सुनी और वैसा ही किया जैसा अंतस में गूंज रहा था। सोनू ने अच्छी स्क्रिप्ट तैयार की थी । अच्छा लगा वैसा ही अच्छा लगा जैसे मेरे बड़े भैया मेरे किसी काम को देख कर खुश होते हैं। थिएटर के इतिहास से स्वर्गीय धर्मदास जायसवाल मेरे काका श्री उमेश नारायण बिल्लोरे तथा उनके इष्ट मित्रों के जरिए हल्का सा जुड़ा हुआ था बचपन में। पर आज 10 साल के बच्चे को उस समय इतना ज्ञान ना था। पर युवा होते होते आकाशवाणी में रेडियो रूपक के ऑडिशन में जाने का मौका मिला। कवि के रूप में जो आकाशवाणी वालों से जान पहचान हो गई थी तब आकाशवाणी का कार्यालय रसल चौक के पास हुआ करता था। फेल हो गया वॉइस टेस्ट में पर दुख नहीं हुआ मालूम था रेडियो नाटक के लिए प्रशिक्षित नहीं हूं और ना ही योग्य। और फिर आकाशवाणी से मुझे काव्य पाठ के लिए नियमित बुलाया तो जाता ही है?
   हां दिमाग में एक बात जरूर आ गई कि बच्चों के लिए ऐसे प्रशिक्षण की जरूरत अवश्य है। कुछ दिनों बाद विवेक पांडे ने और अरुण पांडे जी ने विवेचना के बैनर के साथ बच्चों के थिएटर का प्रयोग किया। अच्छा लगा बहुत नेचुरल बच्चे जिस तरह से मेहनत करते नजर आए मुझे नहीं लगता कि इतनी मेहनत कोई करता होगा। नाटक पूरी तरह तो याद नहीं है परंतु हां राजा का बाजा मृच्छकटिकम् जैसे नाटक उस वर्कशॉप में तैयार किए गए थे और उनके प्रदर्शन के दिन बच्चों में बहुत उत्साह था। अब इसकी पुष्टि हो चुकी थी की थिएटर के विकास के लिए बच्चों के थिएटर  के विकास की जरूरत है।
  सच मानिए, मुझ में बिल्कुल भी थिएटर देखने का शऊर नहीं है निहायती पागल हूं जानते हैं आपने यह क्या कह रहा हूं ? आपको लग रहा होगा कि थियेटर मैं बार-बार उठने की आदत होगी मुझे नहीं ऐसा नहीं है मैं नाटक के हर एक कैरेक्टर में घुस जाना चाहता हूं। कई बार मनचले आंसू रुकते ही नहीं भाग लेते हैं कब तक रुमाल गीला करता रहूंगा अब आप ही बताइए ना ।  इसका अर्थ जानते हैं- गंभीर नाटक दिल पर सीधे अटैक करते हैं रुला देते हैं मेरे साथ तो कम से कम ऐसा ही हुआ है।
      पिछले वर्ष भी मैंने बताया था कि भोपाल के रंगकर्मी श्री के जी त्रिवेदी Kg Trivedi कहते हैं कि जबलपुर का थिएटर प्रदेश के अन्य क्षेत्रों से मजबूत है . तो दूसरी ओर काला घोड़ा नाट्य फेस्टिवल जबलपुर की अपनी अमिट छाप है इसकी पुष्टि कई बार हो चुकी है।मराठी थिएटर पारसी थियेटर बंगाली थिएटर अपनी अपनी अलग अलग छवि प्रस्तुत करते हैं परंतु संस्कारधानी के नाटक की अपनी पहचान है लोग स्वीकारते हैं और कहते भी हैं .
    सीमित साधनों में बाल भवन Balbhavan Jabalpur  जो कर सकता है वह कर रहा है. संस्थान की अपनी मजबूरियां जो भी कुछ दिया है यकीनन जरूरत थी जिसकी . और वह इसलिए क्योंकि भाई संजय गर्ग ने कभी कहा था- आप 4 महीने बच्चों को तथाकथित पर्सनालिटी डेवलपमेंट कोर्स में भेज दो अथवा एक थियेटर वर्कशाप में भेज दो, अच्छा रिजल्ट थिएटर से ही मिलेगा। थिएटर में विविध विधाओं के प्रशिक्षण के चलते बच्चों में मल्टीपल टैलेंट जल्द ही उभर आता है।
इस विषय पर सबके अपने अपने विचार होते हैं तो आइए कुछ विचार यहां शेयर करना चाहूंगा
निर्देशक एक्टर श्री वसंत काशीकर ने कहा- विश्वरंगमंच दिवस पर मेरा संदेश इस संक्रमण काल में समूची मानव जाति  ,धर्म,राजनीति,जातपात,मज़हब  से  उठकर एकजुट होकर जिये। हम पुनः अपनी जड़ों को तलाशें,हम रंकर्मी अपने नाट्यप्रदर्शन एवम अपने व्यवहार से ये  संदेश प्रत्येक दर्शक के साथ ही  सारे देशवासियों के बीच सम्प्रेषित करने का संकल्प ले।
किस-किस का नाम का उल्लेख किया जाए  समझ में नहीं आ रहा परंतु हर एक समूह अपनी अपनी विचारधाराओं धाराओं तथा तालमेल की वजह से रंगकर्म कर रहा है अच्छा लगा . अब तो पूजा केवट मनीषा तिवारी जैसी बेटियों की निर्देशन में हाथ अजमाने लगी हैं । अगर कोरोना वाला यह माहौल नहीं होता तो अब तक सबसे ज्यादा शोरगुल थिएटर वाली कक्षा में ही होता। बहुत छोटे-छोटे बच्चे थिएटर में आ रहे हैं हां एक प्रयोग और जिसका जिक्र करना बहुत जरूरी है नाट्यलोक ने म्यूजिक पिट को कंटेंट के साथ शामिल करने की जोखिम उठाई है। संजय सफल भी हैं वे इसमें, सफलता की वजह है डॉ शिप्रा और उनकी टीम बहुत मेहनती हैं। रवींद्र तरुण अक्षय शुभम देखते ही देखते पता नहीं कितने बड़े हो गए इनके ज्ञान को सेल्यूट करता हूं यह अलग बात है कि पूजा और अक्षय एमपीएसडी में के छात्र रहे हैं । बाकी तो एकलव्य की तरह सीखते रहे ऐसा नहीं है कि उन्हें गुरु नहीं मिले बस एक पाठशाला जो जानकी रमन में लगती है दूसरी जो चंचल बाई कॉलेज में बरसों से लग रही है तीसरी परसाई भवन में जिसका जैसा कमिटमेंट हो वह वैसा सीख रहा है कर रहा है इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं पर हां बच्चों से आग्रह अवश्य करूंगा कि तुम्हारी धारा या विचारधारा जो भी हो तुम्हारा थिएटर के प्रति निष्ठावान होना जरूरी है। थिएटर कभी भी घमंड और वैमनस्यता का आधार नहीं हो सकता आत्मप्रदर्शन का भी नहीं थिएटर में स्टारडम नहीं होता 2 मिनट के अभिनय में ही प्रतिभा को परख लिया जाता है। यहां मूर्खता होगी कि स्वयं को आप यह सिद्ध करते रहो कि आप महान कलाकार हो । आपकी महानता आप की श्रेष्ठता आपकी अभिनय क्षमता आपकी अभिनय और थिएटर के प्रति प्रतिबद्धता को साबित करने के लिए आप खुद आगे ना आए हम हैं ना आप को बढ़ावा देने वाले । खुले शब्दों में कहूं तो कान खोल कर सुन लो मेरे बच्चों तुम्हारी श्रेष्ठता का मूल्यांकन तुम्हारी क्षमता करेगी जब आत्म प्रशंसा करते हो तो ऐसा लगता है जैसे तुम अपने अस्तित्व को बचाने की कोशिश कर रहे हो। एक ऐसे समंदर में डूब रहे हो जहां से तुम बच नहीं पा रहे और यही तुम्हारी रंगकर्म का अवसान हो जाता है।
 रंगकर्म किसी विचारधारा से जुड़ा नहीं होना चाहिए यह भी एक जरूरी बात थी जो आपसे कह दी। रंगकर्म का एबीसीडी सीखने के बाद एक्स वाई जेड का अभिनय करना छोड़ना होगा। यहां यह भी स्पष्ट कर दूं कायिक  कैमरों यानी  आंखों के सामने थिएटर होता है जहां हजारों लोग उसे देखते हैं और तुरंत रिएक्ट कर देते हैं जबकि यांत्रिक कैमरे के सामने फिल्में होती हैं जिसमें आपकी प्रतिभा में कृत्रिम तौर पर बदलाव भी संभव है रंगकर्मी अधिक मेहनती होता है फिल्मी कलाकार के सापेक्ष
पर जानते हो बहुत सारी फिल्में आधी अधूरी देखकर सिनेमा हॉल से कई बार बाहर  निकला हूं पर नाटक देख कर भाव से भरा हुआ ही लौटा हूं। ध्यान रखिए रंगकर्म सबसे प्रभावशाली विधा है । रंगकर्म सच में आपका खून पसीने के रूप में बहाता है । कठिन साधना है इसलिए करने योग्य है सरल कार्य (फ़िल्म तो ) अभिषेक बच्चन भी कर लेता है।
  विश्व रंगमंच दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं बधाई और आपकी प्रतिबद्धता के प्रति मेरा सिर झुका हुआ है उनके  सम्मान में जो कमिटेड हैं।
बच्चों से अनुरोध है अपनी जमीन पर बने रहना क्योंकि जड़े जमीन के जितना अंदर जाती हैं उतना ही तुम्हारा तना मजबूत होगा और मजबूत बनोगे वरना बहुरूपिया नजर आओगे ना कि रंगकर्मी

बुधवार, मार्च 25

आपदाओं से जूझने हमें चिकित्सा व्यवस्था सुधारनी ही होगी

फिदेल कास्त्रो ने क्यूबा को फ्री शिक्षा और स्वास्थ्य की गारंटी दी थी. कृति हजार जनसंख्या पर 8 चिकित्सक क्यूबा में मौजूद है. जबकि भारत में प्रति हजार के विरुद्ध मात्र पॉइंट 008 चिकित्सक मौजूद है. क्यूबा और भारत की चिकित्सकीय व्यवस्था बेहद बड़े अंतराल के साथ है. बावजूद इसके भारत में उसका अपना आयुर्वेदिक सिस्टम भी संचालित है. आजादी के बाद से आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली पर एक लंबी अवधि तक कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया. जबकि इस चिकित्सा प्रणाली को संजीवनी देना इस पर रिसर्च जारी रखना सरकार का दायित्व था. ठीक उसी तरह शिक्षा व्यवस्था पर भी भारत की सोच बेहद लचर और उसके प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण महसूस नहीं किया गया है. लेकिन कम संसाधनों और अच्छी शिक्षा प्रणाली के महंगे होने के बावजूद भारतीय युवा खासतौर पर मध्यमवर्गीय परिवारों से निकला युवा अपने संघर्ष और आत्मशक्ति के बलबूते पर वह सब हासिल कर लेता है जो क्यूबा में वहां का युवा हासिल करता है. सुधि पाठकों आज से कुछ साल पहले जब मैं वैचारिक रूप से शिक्षा और स्वास्थ्य के संबंध में विचार कर रहा था तो मैंने पाया कि वास्तव में भारत को अगर बहुत तेजी से आगे बढ़ना है तो उसे अपनी शिक्षा प्रणाली को बेहद सहज और सब्सिडाइज करना ही होगा. परंतु आरक्षण और उपेक्षा जैसी व्यवस्था के कारण शैक्षणिक व्यवस्था चरमरा गई है. इंजीनियरिंग और तकनीकी शिक्षा के कई सारी केंद्र खुले परंतु अधिकांश अब पढ़ने वालों  की कमी जैसी स्थिति में है. कला साहित्य अर्थशास्त्र समाजशास्त्र साइकोलॉजी भाषा विज्ञान जैसे विषयों के प्रति भारतीय मध्यवर्ग की उपेक्षा के कारण की शिक्षा का स्तर अचानक गिरा है. निजी कंपनी के मैकेनिक बन कर रह जाते हैं इंजीनियर. जबकि चिकित्सकों की आवश्यकता है और आपूर्ति के मामले में शैक्षणिक व्यवस्था में ऐसा कोई सकारात्मक विचार 45 के बाद से अब तक जनसंख्या के सापेक्ष कोई खास परिवर्तन नहीं आया है. अपने उक्त आर्टिकल में मैंने यह भी लिखा था कि वास्तव में संपूर्ण विकास के लिए अन्य विषयों पर ना तो सरकार का ध्यान है ना ही अभिभावकों का. परंतु सक्षम एवं उच्च स्तरीय आय समूह के बच्चे विदेशों से इन विषयों पर शिक्षा विदेशों से प्राप्त कर सकते थे और मध्यवर्ग पूर्णतः है कुकुरमुत्तों जैसे खेतों में भी बने इंजीनियरिंग महाविद्यालयों ने पढ़ाई पूर्ण करते हैं. और अब भी पढ़ाई के सापेक्ष अधिकतम 25 से 30000 प्रतिमाह का पैकेज हासिल कर पा रहे हैं. अधिकांश बच्चे साइबर लेबर की तरह काम कर रहे हैं. यहां सरकार ने उन विषयों पर ध्यान ही नहीं दिया जो विषय निकट भविष्य में उपयोग में आने वाले थे. कुल मिलाकर विदेशों में वह कर साइबर लेबर की तरह काम करने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर इतना कुछ हासिल नहीं कर पाए जितना कि डॉलर से भारतीय अर्थव्यवस्था को लाभ पहुंचाया. वैसे यह एक अच्छी बात है परंतु इन साइबर लेबर के दिए अगर भारत में ही पहले बाजार उपलब्ध करा दिया जाता तो वे लेबर की तरह काम ना करके एक प्रोपराइटर की तरह काम करते. अब हम मूल प्रश्न पर आते हैं कि क्या भारत की चिकित्सा व्यवस्था फुल प्रूफ है ? तो दावे के साथ यह कहा जा सकता है कि भारत की चिकित्सा व्यवस्था फुलप्रूफ कदापि नहीं है.
 अपने पुराने लिख में सरकार को हमने आगाह कर दिया था कि अगर कोई महामारी फैलती है तो उसका नुकसान अगर हम उठाएंगे तो उसका मूल कारण हमारी चिकित्सा व्यवस्था में चिकित्सकों का अभाव ही होगा.
महामारी से जो स्थिति उत्पन्न हो सकती है वह आर्थिक व्यवस्था पर गहरा संकट है. अर्थशास्त्री और विचारक मानते हैं कि पूरे विश्व भर में कोरोना वायरस से फैली महामारी विश्व की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है. कोई चमत्कार ही है जो महामारी के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रख सकता है परिस्थितियां अनुकूल नजर नहीं आ रही है.
आज दिनांक 24 मार्च 2020 को भारत के प्रधानमंत्री ने संपूर्ण भारत में लॉक डाउन को 21 दिन के लिए और बढ़ा दिया है. यह निर्णय बेहद कठोर होगा परंतु बेहतर व्यवस्था और मानवता की रक्षा के लिए यह जरूरी है इसके अलावा कोई अच्छा विकल्प नजर नहीं आ रहा. इसका प्रभाव निश्चित तौर पर अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला है. लेकिन अगर यह नहीं होगा तो अर्थव्यवस्था पर जो प्रभाव पड़ेगा वह और भी भयंकर हो सकता है. विश्व की सरकारों के ऐसे निर्णय सराहनीय है क्योंकि अगर मानव शक्ति मौजूद रही तो अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सकता है. पाठको यहां समझने की जरूरत है कि हर एक राष्ट्र को स्वास्थ्य और शिक्षा पर अधिकतम खर्च करते रहना चाहिए. भारत सरकार की अर्थव्यवस्था शुरू से जीवन बीमा और बचत पर केंद्रित रही इसके अपने फायदे थे लेकिन सामान्य बीमा कंपनियां विकसित राष्ट्रों में जिस तरह से सक्रियता से काम करती हैं भारत वहां बहुत पीछे नजर आता है. हर सरकार को चाहे वह किसी छोटे राष्ट्र की सरकार हो यह भारत जैसे विकासशील राष्ट्र की सरकार हो उसका कोई भी दृष्टिकोण हो उसे भविष्य के प्रावधानों खासतौर पर युद्ध महामारी और प्राकृतिक आपदा से जूझने के लिए आवश्यक प्रावधान अब कर ही लेने होंगे. खासतौर पर चिकित्सकीय व्यवस्था फुलप्रूफ होनी चाहिए. शायद विश्व के राष्ट्र इस भाषा को समझ पाएंगे.
भारत को क्या करना चाहिए? इस प्रश्न के उत्तर में केवल यह कहना चाहूंगा कि जिस तरह से भारत जैसे विकासशील देश ने तरक्की का रास्ता अपनाया है ठीक उसी तरह सामाजिक मुद्दों पर नजर डालना बहुत जरूरी है. प्रत्येक जीवन को अधिकार है कि उसे प्राकृतिक मृत्यु का अधिकार सुनिश्चित कर देना चाहिए. आपदा युद्ध और महामारी जैसी स्थितियों से जूझने के लिए सदा तैयार होना चाहिए. इसके लिए शिक्षा और स्वास्थ्य पर ना केवल अधिक खर्च करना होगा बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए समान रूप से शिक्षा के अधिकार का सृजन जरूरी है.
सरकार को उसकी अर्थव्यवस्था में सपोर्ट करने वाले मध्यमवर्ग जिसका सहयोग सकल घरेलू उद्योग एवं बचत में 60 प्रतिशत से 70% तक की भागीदारी होती है के अधिकार सुनिश्चित करने होंगे.
मित्रों- इसके अतिरिक्त आयुष्मान योजना की लाभ की परिधि में लाने के लिए 10 करोड़ से अधिक और 50 करोड़ से कम आबादी को लाना ही होगा. परंतु सरकार की माली हालत यह आंकड़ा एकदम हासिल नहीं कर सकती. उसे 50 करोड़ की आबादी को आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत शामिल करने के लिए कम से कम 5 साल की कोई कार्य योजना प्रस्तावित की जानी चाहिए और उस पर काम भी करना चाहिए. कराधान व्यवस्था को यद्यपि पिछले 10 वर्षों में काफी लाभकारी बनाया गया है किंतु इस पर और काम करने की जरूरत है.
आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली को अनदेखा करना भारत को बहुत महंगा पड़ा है. मुझे प्रतिवर्ष कफ और कोल्ड के कारण अपनी वार्षिक आय का 7% वह करना होता था. इस वर्ष मुझे सर्दियों के समय आयुर्वेदिक इलाज के जरिए यह खर्च मात्र ₹500 के भीतर करने का मौका मिला. यहां व्यक्तिगत उदाहरण इसलिए दिया गया ताकि आयुर्वेदिक प्रणाली को सरकार को स्वीकार देना चाहिए और उसमें अनुसंधान को बढ़ावा देना  इलाज के लिए योग की तरह प्रोत्साहन देना जरूरी है.
सरकार को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हमारे इतिहास में एलेग्जेंडर यानी सिकंदर को बचाने वाला बेहद साधारण सा वैद्य था. अर्थात हमारी प्राचीन चिकित्सा व्यवस्था को प्रोत्साहन एवं उसके संवर्धन की अत्यंत जरूरत है. यदि हम कोरोना वायरस  पर समय रहते काबू ना पा सके तो मानिए कि हम स्वयं को माफ़ नहीं कर पाएंगे.

सोमवार, मार्च 16

"Don't Panic" - Aabhas-Shreyas Joshi

  ( This video recorded by Girish billore for district administration Jabalpur )
"Don't Panic" - Aabhas and Shreyas appeal on Corona Virus.
Famous singer Abhas and Shreyas Joshi came to Jabalpur to pay tribute To there grandmother late Shrimati Pushpa Joshi. Old old age film artist It was first Holi festival at Jabalpur after Har death. As per DM Jabalpur Mr Bharath Yadav's advice both artist appeal on prevention of coronavirus. Video attached herewith for further necessary action please use this video in Public Interest.

शुक्रवार, फ़रवरी 21

शक्ति आराधना के बिना शिव आराधना स्वीकारते नहीं

स्वर :- इशिता विश्वकर्मा

जीवन सृजन का कारण शिव है संरक्षक भी वही है संहार कर्ता तो है ही । इतना महान क्यों है...? सृजन का कारण शक्ति का सहयोग है इसलिए शिव बिना शक्ति की आराधना के अपनी आराध्या को स्वीकार नहीं करते। इसका आप मनन चिंतन कर सकते हैं फिलहाल मेरी यही अवधारणा है
जीवन में सब कुछ वेद उपनिषद पुराणों के अनुकूल घटता है । सनातन यही कहता है कि *एकsस्मिन ब्रह्मो :द्वितीयोनास्ति* शिवरात्रि इसी चिंतन का पर्व है । शिव शून्य है अगर शक्ति नहीं है साथ तो उनका कोई अस्तित्व नहीं । शिव अपनी पूर्णता अर्धनारीश्वर स्वरूप में रेखित करते हैं ।
*My friend asked me Tar bhai I dont know how to discover Lard Shiva*
मित्र से पूछा....
*आज घर जाकर पत्नि से पूछना तुम दिनभर में घर के कितने चक्कर लगाती हो लगभग 300 से अधिक की जानकारी मिलेगी । फिर अनुमान लगाना पता चलेगा वो 15 से 20 किलोमीटर वो चली 30 दिन में वो....450 से 600 किलोमीटर चलती है*
Yes
*तुम 2 किलोमीटर से अधिक नहीं चलते यानी महीने में केवल 60 या 65 किलोमीटर बस न ।*
सच है ऐसा ही है !
तब असाधारण कौन तुम या पत्नि ?
बेशक पत्नी ही है ।
जब वह जन्म देती है तो उसे कितना कष्ट होता है इसका अनुमान है आपको बच्चे तो होंगे तुम्हारे..?
अनुमान तो नहीं लगा सकता क्योंकि उसको हम महसूस नहीं कर पाते हैं पुरुष है ना पर सुना जरूर है...!

तो सुनो ये सब वही सह सकता है जिसमें धैर्य क्षमता और प्रबंधन के गुण हों ।
सच है पर इसका लार्ड शिवा से क्या रिश्ता ? उसने पूछा ।
उत्तर ये था हमारा-..रिश्ता है तुमको ऊर्जा कौन देता है और फिर उस ऊर्जा का स्तर मेंटेन कौन रखता है ?
    जन्मते ही मां फिर बहन और माँ फिर पत्नी ।
उसने कहा... हाँ सच है !
तो लार्ड शिवा की शक्ति का स्रोत नारी ही है ।
पर वो तो अदृश्य हैं ?
न बिल्कुल नहीं हम हैं उनका स्वरूप हर प्राणी में होता है । हम शिवांश हैं ।
    हम व्यवस्थापक हैं उपार्जन के उत्तरदायी भी हैं । तो भारतीय सन्दर्भ में नारी हमारी शक्ति है....यानि हमारा युग्म सरल शब्दों में स्त्री पुरूष संयुक्त स्वरूप का अस्तित्व भौतिक रूप में लार्ड शिवा है । अब इसमें शिव को डिस्कवर करने की ज़रूरत क्या ?
बायोलॉजिकल वो अलग है भावात्मक रूप से एक अंतर है कि *नारी आल टाइम केयरिंग है यानि सबकी चिंता करती है ।
    तुम्हारी पत्नी तुम्हारी मां भी है । सदा करुणा भाव से तुम्हारे बारे में चिंतन करती है ।
अगर कोई नारी आपकी बायोलॉजीकल मदर न भी हो तो वो सबकी केयर करती है । उसे एक खास नज़रिए से मत देखो।
     इंडस वैली सिविलाइजेशन की खुदाई में कुछ देवियों की मूर्तियां मिलीं और एक शिव लिंग जो शिव का प्रतिमान है । के वैदिक काल में भी यही था यज्ञादि कर्म वामा के बग़ैर महत्वहीन थे ।
    गार्गी मैत्रेयी जैसी हज़ारों देवीयों को रेखांकित किया गया है सनातन शास्त्रों में ।
कुल मिला कर अगर शिव को डिस्कवर करना है आत्म अनुशीलन करो और  शक्ति-स्रोत को डिस्कवर करो माँ के अस्तित्व को प्रधान स्वीकृति दो । फिर देखना शिव स्वयम तुम्हारे चिंतन में आ बैठेंगे ।
          मित्र के साथ हुए इस संवाद में उसका एक सवाल आया -"तुम कहते हो हमेशा नारी को ईश्वर ने वो दिया जो पुरुष को कभी नहीं मिलता ?
*शिव ने जो नारी को सहज दिया वो पुरुषों को घोर तपस्या के बाद भी न मिल पाएगा... यह सत्य है नारी को सार्वकालिक मातृत्व भाव दिया है ब्रह्म ने । जो उसके साथ हर पल रहता है... और तुमको भी एक अति पावन भाव दिया है शमशान वैराग्य वह भी अधिकतम 10 मिनिट का वो भी केवल तब तक जब तक तुम चिता के सामने होते हो .. है न..?*
समय अवधि की तुलना में सर्वाधिक किसे दिया ब्रह्म ने सिर्फ नारी को न ?
हाँ सच है ...!
💐💐💐💐💐💐
*सुधि पाठको आज केवल इतना ही पर ध्यान रहे यह शिव पूजन ही नहीं शक्ति के साथ शिव पूजन का पर्व है इसे प्रतिदिन दोहराना होगा*
【आज का आलेख का स्रोत मित्रों से कुछ दिन पूर्व हुए संवाद का प्रतिफल है ।】

शनिवार, फ़रवरी 8

हम कब निकलेंगे कंफर्ट जोन से...?

गूगल से साभार 

पिछले दिनों में भी चर्चा हो रही थी मडिया जी में संचालित जैन छात्रावास की। मेरे जैन मित्र ने बताया केवल व्यवसाई के रूप में हम पहचाने जाते थे। लेकिन धीरे-धीरे। हमें ऐसा लगा कि हम प्रतिभाओं का हनन कर रहे हैं। और हमारे समाज ने पिसनहारी की मडिया के सामने एक संस्थान शुरू कर दिया।
  मुझे मालूम था भालदारपुरा निवासी एडवोकेट अजीत जैन जो एक  स्कूल चलाते थे के ऊपर जैन समाज द्वारा सौंपा गया।
परिजनों अधिकांश जैन अधिकारी जो पीएसी में सिलेक्ट होते हैं। यूपीएससी में भी। अगर वे जबलपुर के हैं तो निश्चित तौर पर वे इस संस्थान की छाया से निकले हैं।
मेरे कई सारे विभागीय अधिकारी नायब तहसीलदार, तहसीलदार डिप्टी कलेक्टर आदि के पदों पर इस समाज के लोगों का मौजूद होना जैन समाज द्वारा संचालित ऐसे संस्थानों की वजह से ही है।
यह समाज संकल्पित रहता है। और कमिटेड लोग जो काम करते हैं वह कार्य लक्ष्य तक अवश्य पहुंचता है।
आदिवासी क्षेत्रों में। रात्रि भ्रमण के दौरान मुझे। बैगा आदिवासियों की बैठक के बारे में जानकारी मिली? तो मैंने उनके प्रतिनिधि से अनुमति चाही। मन बहुत  प्रभावित हुआ। न केवल पूरा गांव बहुत सारे लोग उस बैठक में आए हुए थे। उनका कोई आपसी मसला था। जिसका निपटारा सहजदा थे उन्होंने कर लिया।
और एक हम हैं जो दिन में भी अपनी आंखों की सपनों को पूरा होता नहीं देख सकते। 
 हमारा चिंतन हमारे कंफर्ट जोन को डिस्टर्ब किए बिना मामला बन जाने की तरफ ज्यादा होता है। हम रिस्क नहीं लेते ।
 जब वैश्वीकरण ने भारत के लिए दरवाजे खोलें तो हमारी युवा शक्ति ने हमें बता दिया कि हम आपके पीछे नहीं। अपना रास्ता खुद तय करेंगे। बहुत सारी साइबर कंपनियों ने हमारे जुझारू और जीवट बच्चों को अपने साथ जोड़ा है।
  पिछले दिनों साइबर फील्ड में काम कम होने से रिक्रूटमेंट में भी कमी आई है। परंतु हमारा कंफर्ट जोन वही है ना?
हमारे बुद्धिमान अभिभावक। अपने बच्चों को। दूसरे फील्ड में भेजने। की रिस्क नहीं उठाना चाहते। उठाऐं भी क्यों कंफर्ट जोन मैं बनी रहने का सपना जो हमारी आंखों में पल रहा है।
 मल्टीनेशनल  कंपनियां केवल हमारी श्रमशील संतानों के श्रम और योग्यता का दोहन मात्र कर रहीं हैं।
सरकारें बेफिक्र क्योंकि उन्हें मल्टी नेशंस मैं एक रिस्पांसिबिलिटी से बचा लिया।
*और वह रिस्पांसिबिलिटी है युवाओं के लिए रोजगार*
वास्तव में हमारे बच्चे किस स्थिति का सामना कर रहे हैं ? शायद आप नहीं जानते जानते होंगे तो सामाजिक स्तर मेंटेन करने के लिए मोहन बैठे होंगे।
विश्व में भारतीयों के प्रति सम्मान है और वह इसलिए सम्मान है और  इसलिए कि भारतीय युवा मेहनती कुशल कुशाग्र है।
 अवसर भी विदेशों में । और आपके पास स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने के लिए। ये शब्द ही हैं कि मेरी संतानें  विदेशों में हैं ।
बच्चे विकास के लिए विदेश जाते हैं बरसों से चल रहा है। विकास और रोजगार के लिए प्रवास बहुत जरूरी है हमारे ऋषि मुनियों ने सदियों पहले कह दिया था ।  इससे इंकार भी नहीं किया जा सकता। पर क्या कभी आपने सोचा कि आप भी आपकी पत्नी अकेले में बच्चों को याद करके रोते क्यों है?
दोष आपका ही है यह खालीपन ये ख़लिश आपकी उम्र को कम कर रही है।
क्योंकि आप अपने बच्चे को रोबोट बनाया है। सुबह-सुबह, उसका बचपन छीन कर रिक्शे वाले ऑटो वाले के हवाले कर दिया। थका मानदार दोपहर 2:00 बजे बच्चा जब स्कूल से लौटता है। उसके कुछ घंटे बाद  उसे कोचिंग क्लास में जाना होता है।
एक अभिभावक से मैंने पूछा आप अपने बच्चों पर कितना खर्च करते हैं?
अभिभावक ने बताया कि वह अपने एक बेटे पर जो पांचवी क्लास में है सालाना ₹200000 खर्च करता हूं। आप तो कुछ ऐसा कीजिए कि ये बच्चा हमारी बात सुनने लगे। क्योंकि मेरी एक और बेटी है जिस पर मैं इतना ही खर्च करता हूं। उस पर गलत असर जाएगा।
अभिभावक बेहद तनाव में आ गया उसकी पत्नी की आंखों में आंसू थे !
अभिभावक की पत्नी ने कहा - सर हम चाहते हैं कि बच्चा एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटी में भी अव्वल रहे।
अगले दिन बच्चों के साथ आने का कहकर मैंने उन्हें विदा किया।
अगले दिन वे अपने दोनों बच्चों के साथ मेरे पास आए। बच्चे बहुत अधिक घबराए डरे और शंका ग्रस्त थे ।
    उन्हें लगा कि कहीं उन्हें यहां भी ना आना पड़े। मैंने बच्चों के सामने ही अभिभावक से पूछा- गुप्ता जी आपने क्या बनाना चाहते हैं?
गुप्ता जी की श्रीमती ने बताया- ज्ञान के जेठ के बच्चे संगीत और चित्रकला में माहिर है और उनके बच्चे कमजोर हैं।
बातों बातों में यह भी पता चला कि उन बच्चों को 24 घंटे में से मात्र। रात 11:00 से सुबह 5:00 तक का आराम का वक्त मिलता है। बाकी समय भी रोबोट की तरह माता पिता के सपनों को पूरा करने में खपा देते हैं।
सच कहूँ दिल भर आया।
और साफ तौर पर मैंने उन्हें यह कहा- आप तब आइए जब आप इन्हें इनकी आंखों से इनके सपने देखने की अनुमति दे सकें। वरना आपके लिए मेरे संस्थान में तो कोई जगह नहीं है। बात कसैली थी, मुझे भी दुख हो रहा था यह कहते हुए। पर जरूरी थी।
कह दी जो कह दी।
तकरीबन 20 दिन बाद बच्चे बड़े उत्साह से आए। अब उनके मानस पर किसी भी तरह का दबाव ना था। गुप्ता जी के बच्चों को एडमिशन देकर मुझे भी बहुत अच्छा लग रहा था।
सुधी पाठकों ध्यान रहे शिक्षक या गुरु ज्ञान दे सकता है। रोबोट नहीं सुधार सकता। इसलिए मैंने उन बच्चों को वापस किया था। जब गार्जियंस एवं उनके बच्चों के मनसे रोबोट वाला भाव समाप्त हो गया। तब भी बच्चे एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटी के लिए पात्र हो गए।
मेरे लिए भी यह घटना आत्म प्रेरणा की घटना थी। अभिभावकों ने बहुत बड़ी रिस्क ली थी, उन्होंने बच्चों को कोचिंग से निजात दिलाई और फिर हमारे संस्थान में आ गए। गुप्ता जी ट्रांसफरेबल जॉब वाले व्यक्ति थे। उन्हें ट्रांसफर पर जाना पड़ा। पर वह जाते वक्त यह बताना नहीं भूले के उनके बच्चों के रिजल्ट में  सकारात्मक सुधार हुआ है।
चाइल्ड साइकोलॉजी से आप को अच्छी तरह वाकिफ रहना पड़ेगा। अपनी आंखों वाली सपने अपने बच्चों को बलपूर्वक मत दिखाइए श्रीमान।
हां तो हमने पहले चर्चा की थी हमारे बच्चे विदेशों में कार्यरत हैं। बड़ा गर्व होता है यह कहने पर । नादिरा बब्बर का एक नाटक टेक केयर है। इस नाटक में विदेश में रहने वाली बच्चों के अभिभावकों की  पीड़ा को इतनी प्रभावी ढंग से प्रदर्शित किया गया। कि आपका रूमाल सहजता से सूखने वाला नहीं।
केवल इंजीनियर बने हैं हमारे परिवारों के बच्चे थोड़ी बहुत छोटी सी संख्या  में चिकित्सक बन सकिंग हैं।
हमारा समाज एडवोकेट के लिए नेगेटिव नजरिया रखता है। बहुत कम बच्चे होंगे जो वकालत करते हैं और अगर करते हैं तो हमारा बेचारा समाज उनके साथ शादी संबंधित तक करने में नुक्ताचीनी करता है।
बीकॉम करने वाले को तो। बड़ी गंदी नजर से देखा जाता है। मैं भुक्तभोगी हूं इसलिए दावे से कह रहा हूं। मुझे मालूम है यह लेख आप पढ़ लेंगे। तारीफ कर देंगे वाह क्या लिखते हैं आप और वह भी तब जब मैं मिलूंगा आपसे वरना आप कंफर्ट जोन में रहेंगे यह तय है। और ऐसा ही होगा इस आलेख के साथ भी। थैंक यू वेरी मच आपके कंफर्ट जोन में खलल डालने के लिए क्षमा चाहता हूं।
पोस्ट बहुत कड़वी भाषा में लिखी है। पर जब ध्यान से यूनुस भाई की तरह समझेंगे। तो सब समझ जाएंगे -
दुनिया के दाँव पेंच में कच्चा लगा मुझे
मासूम था वो इतना फरिश्ता लगा मुझे

चुभती थी उसकी बात मुझे सबके सामने
तन्हाई में जो सोचा तो अच्छा लगा मुझे

🙏🏻🌹यूनुस अदीब🌹🙏🏻