गुरुवार, सितंबर 6

पैरेरल यूनिवर्स हो सकते हैं ? -गिरीश बिल्लोरे मुकुल

पैरेलल यूनिवर्स की परिकल्पना और उस यूनिवर्स में पहुंचने के तौर-तरीके के संबंध में जो बात विजुअल मीडिया पर मौजूद है उस पर चर्चा करना चाहता हूं पैरेलल यूनिवर्स के संबंध में साफ कर देना चाहता हूं कि पैरेलल यूनिवर्स किसी भी स्थिति में मौजूद तो है असंख्य पैरेलल यूनिवर्स मौजूद है न की हमारे सौरमंडल से जुड़ा हुआ कोई एक मात्र सौरमंडल लेकिन एक सौरमंडल से दूसरे सौरमंडल में प्रवेश के कोई शॉर्टकट रास्ता है यह समझने के लिए ब्लैक होल थ्योरी को बेहद महत्वपूर्ण माना गया है ।
मेरे हिसाब से पैरेलल यूनिवर्स में प्रवेश का तरीका केवल यांत्रिक होगा किंतु प्रोफ़ेसर हॉकिंस को अनदेखा करना भी गलत ही है इसका कारण है कि जो चुंबकीय रास्ते ब्लैक होल में तैयार होते हैं वह किधर जाते हैं यह एक सोचने का बिंदु है ।
मुझे लगता है और मैं महसूस भी करता हूं कि एक सौर मंडल दूसरे सौरमंडल से किसी तरह के ब्लैक होल से अवश्य ही जुड़ा होगा ब्लैक होल हमारे उस तक जाने का एक माध्यम होना असंभव है । अगर ऐसा है तो कभी भी उस माध्यम से किसी का आगमन होना किसी ने भी महसूस नहीं किया ना ही विश्व के किसी भी रडार, उपग्रहों ने ब्लैक होल के जरिए पृथ्वी पर प्रवेश करने वाले बाहरी प्राणियों वस्तुओं का आगमन रिकार्ड बिल्कुल नहीं किया । ऐसे कोई प्रमाण भी मौजूद नहीं है जिससे ब्लैक होल के जरिए धरती पर आने की पुष्टि हो सकी है ।
जहां तक नासा की रिसर्च का सवाल है नासा ने भी ऐसा कोई भी तथ्य आज तक जारी नहीं किया जिससे यह साबित हो कि ब्लैक होल के जरिए कोई यात्रा करते हुए हमारे यूनिवर्स में अथवा हमारी पृथ्वी पर अथवा सौरमंडल के किसी ग्रह में आया हो ।
जहां तक प्रश्न उठता है हमारी सौर मंडल में आने का तो बात स्पष्ट है की यांत्रिक तरीके से सामान्य यात्रा के जरिए हम कहीं जा सकते हैं अथवा कोई हम तक आ सकता है यात्रा के जो प्राकृतिक नियम है उसके बगैर अभी यह कहना मुश्किल है कि अन्य किसी सौरमंडल में हम किसी होल या ब्लैक होल के जरिए प्रवेश करें अब प्रश्न यह भी उठ रहा है कि क्या एक और समानांतर पृथ्वी है जहां समानांतर युग चल रहा है और उसका विकास आज की तरह है या हमारा एक दूसरा अनुरूप वहां पर मौजूद है । तो अवश्य ऐसे कई ग्रह हो सकते हैं जहाँ जीवन हो पर यह तथ्य केवल फंतासी है कि हमारे ग्रह की तरह कोई ग्रह है जहां हमारी जीवंत प्रकृतियाँ हैं ।
ऐसा सोचना गलत है यह मान्य है कि एक पृथ्वी हो सकती है जिसमें जीवन हो और वह किसी अन्य सौरमंडल का हिस्सा हो लेकिन यह सत्य नहीं है कि एक जो आप लेख पढ़ रहे हैं वह लेख किसी अन्य लेखक जो मेरा प्रतिरूप हो और उसे पढ़ने वाला आप का प्रतिरूप हो यह केवल काल्पनिक और गुमराह करने वाला तथ्य है जैसा कि YouTube के वीडियोज़ पर डाला गया है ।
जिसे कई लोग उसे सत्य भी मान भी चुके हैं।
सुधि पाठको इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि समानांतर सौर्य मंडल है । मैं तो उसके आगे भी कहता हूं कि हमारे समानांतर घई सौरमंडल है या यह भी अंतरिक्ष में केवल हमारा सौरमंडल ही मौजूद है बल्कि अंतरिक्ष में हजारों-हजार सौरमंडल की मौजूदगी से इनकार भी नहीं किया जा सकता अतः शोध के बिना अफवाह है कि- आप का प्रतिरूप किसी अन्य अंतरिक्ष से पृथ्वी के समतुल्य ग्रह पर मौजूद है बल्कि यह कल्पना अवश्य की जा सकती है कि उस अंतरिक्ष में हमारे जैसा संयोगवश कोई व्यक्ति घटना अथवा परिस्थिति मौजूद हो कई बार हमें किसी और को देखकर अपने मित्र का स्मरण हो आता है अपने परिचित का स्मरण हो आता है क्योंकि बहुत सारी बातें उस व्यक्ति ने आपके निकट परिचित रिश्तेदार के समान होती हैं और यह भी सत्य है कि दुनिया में एक जैसे कई व्यक्ति हो सकते हैं कम से कम एक तो तय है ।
( *गिरीश बिल्लोरे मुकुल* सोशल मीडिया एवम ब्लॉग रायटर हैं । )

रविवार, सितंबर 2

काश आज तुम होते कृष्ण


भारत का भगवान जिसने बचपन को भरपूर जिया उनके जन्मपर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं*
💐💐💐💐
दुनियाँ भर के ऐसे पिता माता जो निर्णय थोपते तो लगता है उनके बच्चे बच्चे नहीं *प्रजा* हैं और वे *सम्राट एवम साम्राज्ञी* !
कल जब वे आए तो लगा .. आज एक नए राजा रानी आए हैं । बालमनोविज्ञान को घर की किसी सन्दूक में बंद करके उस पर अलीगढ़ी ताला मारके आने वाले ये राजा रानी मुझसे बताने लगे कि वे अपनी बेटी के लिए सब कुछ करने तैयार हैं । बेटी को रंगकर्म सीखना है । आइये इन राजा रानी और मेरे बीच हुए संवाद को देख लेते हैं -
मैं : आइये बैठिए
राजा :- हमारी बेटी को अभिनय सीखना है हमें अमुक जी ने आपकी संस्था के लिए सजेस्ट किया है
रानी :- बेटी को एक सीरियल में काम मिलेगा ऐसा बंदोबस्त हुआ है 5-6 माह बाद उसका स्क्रीन टेस्ट होगा ।
मैं :- बेटी कहाँ है ?
रानी :- स्कूल गई है ।
मैं :- ले आइये
राजा :- वहीं से कोचिंग जाएगी
मैं :- क्यों स्कूल में पढ़ाई नहीं कराते क्या ?रानी :- गणित में कमज़ोर प्रतीत होती है ।
मैं :- और विषय
राजा :- हमने सोचा सारे विषय की कोचिंग करा दें
मैं :- तो स्कूल की फीस नाहक दे रहे हो स्कूल छुड़वा दीजिये !
राजा :- (खुद को बचाने की गरज से) सर, इनको समझाया था पर ये तो ये ही हैं
इस बीच पहली बार सर शब्द सुनकर लगा गोया....आसमान का परिंदा थक कर नीचे पेड़ की शाखा की ओर आ रहा है !
रानी :- जी सर ये असंभव है , स्कूल छुड़ाना प्रैक्टिकली कैसे संभव है !
मैं :- तो फिर ट्यूशन छुड़वाई जा सकती है ?
रानी :- परन्तु क्यों ?
मैं :- वो इस लिए कि आपकी बेटी के पास समय कम है 6 माह में नाट्यकर्म सीखना है उसे 3 बजे तक स्कूल फिर ट्यूशन साढ़े चार तक और तुरंत 15 मिनिट में बालभवन पहुंचना जहां उसे कुछ सीखना है ।
राजा :- सर वो कर लेगी !
मैं :- आपकी बेटी से पूछा आपने ?
रानी - उससे क्या पूछना
राजा रानी जानतें हैं प्रजा की हक़ीक़त वे क्यों पूछेंगे । जन्म दिया, स्कूल ट्यूशन खाना वाना, सारा इन्वेस्टमेंट उनका तो बेटी से पूछताछ क्यों ? किसी ने क्या खूब कहा है कि - सत्ता को महल के बाहर की ध्वनियाँ कम ही सुनाई देती हैं । सत्ता शासक और प्रजा के बीच ऐसा ही रिश्ता
होता है । तभी तो कहा जाता है :- *जस राजा तस प्रजा*
साफ साफ समझ आ गया था कि माता पिता अब साम्राज्ञी-सम्राट बन चुके हैं । वे सर्वज्ञ हैं ऑलमाइटी हैं । कमाते हैं प्रजा पर खर्च करते हैं । धन के साथ अपने सपनों की खाद डाल कर बच्चों की फसल को बढ़ाते हैं सौदा करने के लिए प्रोडक्ट को मार्केट के हिसाब से ग्रूमिंग की अपॉरचुनिटी देनी हैं उनको । सेलेबल बनाके छोड़ेंगे । अभी तो फ़िलहाल हमने उनको सलाह दी कि हम आपकी बेटी के योग्य नहीं हम उसे निरन्तर काम में झौंकने में आपका साथ न दे सकेंगे । क्योंकि हम यहां बच्चों के लिए काम करतें हैं *आपकी बेटी रोबोट* है । रोबोट के साथ हमारे बच्चे असहज महसूस करेंगे । प्लीज़ आप इसे मुंबई के किसी संस्थान में भेज दें ।
फ़िलहाल तो हमने उनको निराश कर दिया है । पर एक बात यह अवश्य ही कही है कि बेटी से मिलवा दीजिये फिर देखता हूँ । कल फिर आएंगे वे बेटी के साथ मयूझे इंतज़ार रहेगा ।
*गिरीश बिल्लोरे मुकुल*

सावधान ओशो को भी हाईजैक कर रहे हैं आयातित विचारधारा के लोग

आज एक मित्र ने आखिरकार ओशो को नक्सलवाद का पैरोकार बताने वाली पोस्ट डाली है भाई साहब ने उस पोस्ट का क्रिया कर्म उसके शीर्षक को बदल कर प्रस्तुत कर दिया बौद्धिक विपन्नता किस दर्जे तक पहुंच गई है इसका अंदाज आप स्वयं बताएं और जाने किस समाज का एक खास वर्ग कितना कुंठित सोचता है फिलहाल मैं इस पोस्ट को हूबहू यहां प्रकाशित कर रहा हूं ।
लेकिन इस प्रकाशन के पहले अपनी बात कह देना चाहता हूं की ओशो का यह प्रवचन जो मेरे गले पूरा-पूरा तो नहीं उतरा कुछ बिंदुओं पर सहमति है किंतु उन्होंने यह कहा कि 5000 साल से कोई क्रांति ही नहीं हुई है मैं नहीं मानता कि 5000 साल से इस विश्व विराट में कोई क्रांति नहीं हुई आजादी के लिए हुआ संघर्ष क्रांति ना थी तो क्या था निश्चित तौर पर ओशो को अपने इस भाषण में इस बात का स्मरण आ रहा होगा ठीक एक जगह ओशो यह कहते हैं की नक्सलाइट हमारी शत्रु नहीं है ओशो जब प्रेम का पाठ पढ़ाते हैं तो लगता है की प्रेम की संपूर्ण परिभाषा ओशो में उतर आई है लेकिन जब नक्सलाइट समस्या को डिस्क्राइब करते हैं तो लगा कि नहीं यहां उसने कोई गलती की है समझने की यह समझाने की ऐसा कैसे हो सकता है कि नक्सलाइट समाज के दुश्मन ना हो नक्सलाइट समाज के दुश्मन है यह लगता है कि ऐसा माना जाता था की किसी समस्या के कारण अधिकारों के लिए जद्दोजहद के कारण कुछ कम पढ़े लिखे लोग जिन्हें आयातित विचारधारा ने बंदूक उठाने पर मजबूर कर दिया नए समाज विरोधी रास्ता अख्तियार किया मित्रों आप सब समझदार हैं जिसका परिणाम क्या हुआ जेएनयू से लेकर भीमा गांव तक का सफर यूं ही तो नहीं किया है इन लोगों ने समाज विरोधी हैं हिंसक है भारत की व्यवस्था प्रजातांत्रिक है उसे मजबूती देने के लिए आगे तो आते अपनी बात कहने के सरल सुगम शांतिपूर्ण रास्ते तो अपनाते फिर भला कैसे उनके अधिकारों का हनन होता आज के दौर में हम देखते हैं कि ब्यूरोक्रेट्स भी टॉप ब्यूरोक्रेट्स भी वह पुराना चोला उतार कर जिसमें वह साहब कहे जाते थे जन सेवक के रूप में सामान्यतः पब्लिक के सामने खड़े होते हैं ।
इतना ही नहीं भारतीय न्याय व्यवस्था जो मूलतः है हंबल है जनापेक्षि है  उस पर भरोसा है विश्वास है कि न्याय अवश्य मिलेगा मिलता भी है आपने देखा भी है समझा भी है संविधान के दायरे में जो भी बात होती है  उसकी उपेक्षा कर एक तीसरा रास्ता अपनाने वाले लोग समझने कि भारतीय संवैधानिक व्यवस्था अपेक्षाकृत अधिक सुदृढ़ एवं प्रतिबद्धताओं से भरी पड़ी है अब जरूरत नहीं है बंदूक उठाने की जरूरत तो तब भी ना थी जब नक्सलवाद की शुरुआत हुई क्या जरूरत थी बंदूक की जगह उनका अध्ययन बढ़ाते उन्हें सुयोग्य बनाते उनमें एक समरसता का भाव पैदा करते तो क्या बुरा था यह प्रयोग तो कर लिया होता जेएनयू जैसी घटनाएं तो नहीं होती वह दौर मजदूरों के हित में बात करने का दौर था बात की भी गई सुना भी गया तब की व्यवस्था में संकीर्णता नहीं थी व्यापक सोच थी और विकास अनुक्रम में देश को इस तरह गुमराह किया है कि नक्सलवादी आंदोलन हिंसा का पर्याय बन चुका है बस्तर या कश्मीर से जुड़ चुका आंदोलन अलगाववाद की खतरे की घंटी है ।
भारत की संप्रभुता के साथ छेड़छाड़ होती है और एक गुप्त एजेंडा जारी रहता है जिसमें एक कोशिश होती है कि भारत को कमजोर सांप और सपेरों के देश के रूप में साबित किया जाता है ऐसा करने से आपकी सियासी हसरतें तो पूरी हो सकती हैं लेकिन ध्यान रहे यह उन लोगों का अपमान है जो भारतीय अर्थव्यवस्था को उच्चतम स्थान पर ले जाने के लिए काम कर रहे हैं यह वह लोग हैं जो अपने घरों से हजारों हजार किलोमीटर दूर रहकर देश के लिए सम्मान और डॉलर दोनों कमा कर दे रहे हैं ध्यान रहे यह विकास इस देश का विकास ही नहीं है बल्कि यह समूची व्यवस्था का विकास है आप इसका विश्लेषण करेंगे कि देश का विकास और हो समूची व्यवस्था का विकास क्या है  अंतर आपको बता देना चाहता हूं देश का विकास जीडीपी नापा जोखा जा सकता है जबकि संपूर्ण व्यवस्था का विकास सामाजिक स्तर को बदलने का सूचक है  जिसे केवल वाइटल स्टेटिस्टिक्स के जरिए नापा जा सकता है ।
यहां ओशो ने जो कहा कि बदलाव स्वीकार करना चाहिए समाज में बदलाव स्वीकार किए हैं और उसी स्वीकारोक्ति के चलते भारत एक ऐसी मुकाम पर खड़ा हुआ है जहां से वह गर्व से अपना सिर ऊंचा उठा सकता है ।
 तो मित्रों देखिए ओशो ने क्या कहा है अपने प्रवचन में और इस प्रवचन से पूरी तरह सहमत होना ना तो मेरी मजबूरी थी मैं सहमत भी नहीं और ना ही आप वर्तमान संदर्भों में सहमत होंगे जबकि भीमा गांव में जेएनयू में भारत तेरे टुकड़े होंगे के नारे लगाए जा रहे हो फेडरल स्टेट की धज्जियां उड़ाने कुछ बुद्धिजीवी आगे आ रहे हो ऐसी स्थिति में किसी भी नक्सलवाद को स्वीकारना विघटनकारी अलगाववाद को स्वीकारना या पाकिस्तान की तरह अच्छे और बुरे टेररिज्म को परिभाषित करना स्वीकार योग्य नहीं अस्तु आप अपनी राय अवश्य दें कोशिश कर रहा हूं यह कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं है यह बताने की जरूरत इसलिए है कि यह भारतीय समाज से जुड़ा वह मुद्दा है जिससे आइंदा नस्लों का जीवन स्तर सुरक्षित रहेगा भारतीय परिवेश में डेमोक्रेसी के अलावा किसी भी चीज को स्वीकार नहीं किया जा सकता और ना ही हम ऐसे किसी प्रयास को स्वीकार करने की अनुमति एक लेखक के रूप में देंगे हमारी ड्यूटी है कि हम आपको सतर्क कर दें आपको लड़खड़ाने ना दे आप को संभाल ले हमारे विषय जब तक मानवता है तब तक सजीव है जीवंत हैं हमारी ड्यूटी है कि हम किसी भी स्थिति में हिंसा को अस्वीकार करें और भारत के महान ऐश्वर्य को पुनर्स्थापित करें बुरा लगेगा आयातित विचारों को कि मैं यह क्या कह रहा हूं भारतीय संस्कृति सामाजिक  समानता की दिशा में अपने कदम बढ़ा चुकी है व्यवस्था का भी भरपूर सहयोग मिल रहा है ऐसी स्थिति में हम नक्सलवाद की परिभाषा को ओशो के सहारे सिद्ध करने की बेवकूफी भरी कोशिश ना करें मित्रों अब देखें ओशो का वह भाषण जिसे सनसनीखेज शीर्षक के साथ मेरे मित्र ने लगाया है और मैं उस मित्र को क्षमा करता हूं लेकिन इस निर्देश के साथ कि कोई भी विचारधारा जो रक्त पात की ओर जाए हिंसा को बढ़ावा दें अमान्य है लग रहा है चाहे उसे आप कोई भी परिभाषा दें
*"नक्सल एक तीव्र रिएक्शन है, जो बिलकुल जरूरी था।*
इसलिए जितने हम जिम्मेवार हैं नक्सलाइट पैदा करने के लिए, उतने वे बेचारे जिम्मेवार नहीं हैं। वे तो बिलकुल निरीह हैं। उनको मैं जरा भी जिम्मा नहीं देता। मैं निंदा के लिए भी उनको पात्र नहीं मानता, क्योंकि निंदा उनकी करनी चाहिए जिनको रिसपोन्सिबिल, जिम्मेवार मानूं।
हम इररिसपोन्सिबिल हैं।
( यहाँ ओशो ने प्रतिक्रिया को भाषित करने के प्रयास किये  हैं पर इनके लिए कौन सा टूल उपयोगी होगा इस बात को प्रवचन में शामिल न किया ओशो ने । स्वाभाविक के संवाद में कोई बात छूट भी जाती है चलेगा प्रवचन है इसे प्रवचन ही मानूँगा ।)
हमने पांच हजार वर्ष से जरा भी क्रांति नहीं की है, जरा भी नहीं बदले हैं, एकदम मर गये हैं। तो इस मरे हुए मुल्क के साथ कुछ ऐसा होना अनिवार्य है। लेकिन वह शुभ नहीं है।

और उसको अगर हमने क्रांति समझा तो खतरा है।
रिएक्शनरी हमेशा उल्टा होता है और आप जो कर रहे हैं उससे उल्टा करता है। रिएक्शनरी वहीं होता है, जहां हमारा समाज होता है। सिर्फ उल्टा होता है। वह शीर्षासन करता है। हम जो यहां कर रहे हैं, वह उसका उल्टा करने लगता है।

जिस जगह आप हैं, उससे गहरा वह कभी नहीं जा सकता है, क्योंकि आपका वह रिएक्शन है। अगर आपने मुझे गाली दी और मैं भी तुरंत गाली देता हूं तो आपकी और मेरी गाली एक ही तल पर होनेवाली है, क्योंकि उसी तरह मैं भी गाली दे रहा हूं तो मैं भी गहरा नहीं हो सकता, गहरा हुआ नहीं जा सकता। गहरे होने के लिए भारत में नक्सलाइट कुछ नहीं कर पायेगा।
(एक सत्य है असहमति की गुंजाइश उस काल के परिपेक्ष्य में न होगी आज है जब भारत तेरे टुकड़े होंगे कि गूंज सुनाई देती है ।)
नक्सलाइट सिर्फ सिम्पटमैटिक हैं - सिम्पटम, बीमारी के लक्षण हैं।
बीमारी पूरी हो गयी है और अब नहीं बदलते तो यह होगा। यानी यह भी बहुत है, यह भी मेरी दृष्टि में।
लेकिन अगर तुम नहीं बदलते हो और इसके सिवाय तुम कोई रास्ता नहीं छोड़ते हो, अगर क्रांति नहीं आती तो यह प्रतिक्रिया ही आयेगी।
(ओशो यहां जटिल हैं कदाचित कंफ्यूज भी ।)
अब दो विकल्प खड़े होते हैं मुल्क के सामने--या तो क्रांति के लिए तुम एक फिलॉसफ़िक रूट, वैचारिक आयाम की बात करो और क्रांति को एक व्यवस्था दो और क्रांति को एक सिस्टम दो और क्रांति को एक क्रिएटेड फोर्स बनाओ।
(तत्समय के लिए समीचीन बात आज के माहौल के सर्वथा विपरीत है रहा क्रांति के सिस्टम को विकसित करने का ओशो किससे अपेक्षा कर रहें हैं । क्रांति के स्वरूप को सिस्टमेटिक कैसे किया जाता है इसकी प्रविधि क्या है ढांचा कैसा हो ? इस सवालों पर भी ओशो मौन थे । )
अगर नहीं बनाते हो तो अब यह होगा यानी नक्सलाइट जो हैं वे हमारी वर्तमान समाज-व्यवस्था के दूसरे हिस्से हैं। ये दोनों जाने चाहिए। सोसायटी भी जानी चाहिए और उसका रिएक्शन भी जाना चाहिए, क्योंकि यह बेवकूफी ही थी सोसायटी का साथ देना।
(मान लिया कि एक सिस्टम क्रांति के लिए तैयार होना था न हुआ तो क्या मुद्दे बदलना था नक्सलियों को यदि हां तो क्यों )
ये जो घटनाएं हैं, ये इसी के पार्ट एंड पार्सल, सहज परिणाम हैं।
आमतौर से ऐसा लगता है कि नक्सलाइट दुश्मन हैं। मैं नहीं मानता कि वे दुश्मन हैं। वे इसी सोसायटी के हिस्से हैं, इसी सोसायटी ने उसे पैदा कर दिया है। इसने गाली दी है तो उसने दुगुनी गाली दी है, बस इतना फर्क पड़ा है। मगर यह माइंड, चित्त इसी से जुड़ा हुआ है। यह सोसायटी गयी तो वह भी गया। अगर यह नहीं गयी, तो वह भी जानेवाला नहीं है। यह बढ़ता चला जाएगा।
(सोसायटी को ज़िम्मेदार ठहराया है बात सही है परंतु आज स्थिति वैसी नहीं फिर भी बंदूकों का मोह क्यों नहीं छोड़ते नक्सली )
अब मेरा कहना यह है कि क्रांतिकारी के सामने दो सवाल हैं।
ठीक विचार करनेवाले के सामने दो सवाल हैं।
वह यह कि या तो सोसाइटी में क्रांति आये - सृजनात्मक रूप में - और नहीं आ पाती है तो नक्सलाइट विकल्प रह जायेगा। और वह कोई सुखद विकल्प नहीं है। वह सुखद भी नहीं है, गहरा भी नहीं है, जरा भी गहरा नहीं है।

वह उसी तल पर है, जहां हमारा समाज है। वह सिर्फ रिएक्शन कर रहा है, वह जरूरी है। यह मैं नहीं कहता कि बुरा है तो गैर-जरूरी है। बुरा है, नहीं हो, ऐसी हमें व्यवस्था करनी चाहिए। और वह व्यवस्था हम तभी कर पायेंगे जब हम पूरी सोसाइटी को बदलेंगे।
नक्सलाइट को हम रोक नहीं पायेंगे, उनको रोकने का सवाल ही नहीं है।
पूरी सोसाइटी उसे पैदा कर रही है, इसका जड़ होना उसको पैदा कर रहा है, इसके न बदलने की आकांक्षा उसको पैदा कर रही है, इसका पुराना ढांचा उसको पैदा कर रहा है, यह ढांचा पूरी तरह गया तो इसके साथ नक्सलाइट गया।
नक्सलाइट एक संकेत है, जो बता रहा है कि सोसाइटी इस जगह पहुंच गयी कि अगर क्रांति नहीं होती तो यह होगा। और अब यह सोसाइटी को समझ लेना चाहिए। वह पुराना ढांचा तो नहीं बचेगा।
या तो क्रांति आयेगी या यह ढांचा जायेगा।
ये दो चीजें आ सकती हैं और अगर आप मर्जी से लायें तो क्रांति आयेगी, अगर आप सोचकर लायें तो क्रांति आयेगी, विचार करके लाएं तो क्रांति आयेगी और अगर आप क्रांति न लायें, इसके लिए जिद में रहें कि नहीं आने देंगे तो यह विचारहीन प्रतिक्रिया आयेगी।
-ओशो
भारत : समस्याएं व समाधान
प्रवचन नं. 1 से संकलित

बुधवार, अगस्त 29

अचार की एक फांक : हरेश कुमार की वाल से

 

गुरुकुल घरोंदा के एक आचार्य थे। वे जनसंघ के टिकट पर सांसद बन गए, तो उन्होंने सरकारी आवास नहीं लिया। वे दिल्ली के बाजार सीताराम, दिल्ली-6 के आर्य समाज मंदिर में ही रहते थे । वहां से संसद तक पैदल जाया करते थे कार्रवाई में भाग लेने।

वे ऐसे पहले सांसद थे, जो हर सवाल पूछने से पहले संसद में एक वेद मंत्र बोला करते थे। वे सब वेदमंत्र संसद की कार्रवाई के रिकॉर्ड में देखे जा सकते हैं। उन्होंने एक बार संसद का घेराव भी किया था, गोहत्या पर बंदी के लिए ।

एक बार इंदिरा जी ने किसी मीटिंग में उन स्वामी जी को पांच सितारा होटल में बुलाया। वहां जब लंच चलने लगा तो सभी लोग बुफे काउंटर की ओर चल दिये। स्वामी ही वहां नहीं गए । उन्होंने अपनी जेब से लपेटी हुई बाजरे की सूखी दो रोटी निकाली और बुफे काउंटर से दूर जमीन पर बैठकर खाने लगे। 

इंदिरा जी ने कहा - "आप क्या करते हैं ? क्या यहां खाना नहीं मिलता ? ये सभी पांच सितारा व्यवस्थाएं आप सांसदों के लिए ही तो की गई है।"

तो वे बोले - "मैं संन्यासी हूं। सुबह भिक्षा में किसी ने यही रोटियां दी थी । मैं सरकारी धन से रोटी भला कैसे खा सकता हूं।"

इंदिरा जी का धन्यवाद देते हुए होटल में उन्होंने इंदिरा से एक गिलास पानी और आम के अचार की एक फांक ली थी।जिसका भुगतान भी उन्होंने इंदिरा जी के मना करने के बावजूद किया था !

जानते हैं यह महान सांसद और संन्यासी कौन थे?

ये थे संन्यासी स्वामी रामेश्वरानंद जी। कट्टर आर्य समाजी। परम गौ भक्त । अद्वितीय व्यक्तित्व के स्वामी जी ।
स्वामी जी हरियाणा के करनाल से सांसद थे । 
ऐसे अनेकों साधक हुए इस देव भूमि भारत पर , लेकिन हम नेहरू-गांधी के आगे देख नही पाए । शायद हमें पढ़ाया भी नहीं गया । कभी मौका लगे तो आप भी अवश्य जानिए ऐसे व्यक्तित्वों को। भारत को तपस्वियों का देश ऐसे ही नहीं कहा जाता ।

मंगलवार, अगस्त 28

स्वर्ग की बातें झूठी बातें


स्वर्ग की बातें झूठी बातें,इल्म तो है मस्ताने को
हम क्यों जाएं पागलखाने पागल को समझाने को
जब भी हम खुद से मिलते हैं,खुद को जाना करते हैं
हम खुद से ही फिर सीखेंगे,क्यों आए समझाने को
कितने पंथ कितनी राहें,कितने दर्शन कितनी सोच
हम तो हैं कबीर के अनुचर,गीत हमें भी गाने दो
अपनी गठरी खुद ही रख लो,हमको मत दो बोझा ये
हम खुद अपना कमा ही लेंगे,खुद को भी अजमाने दो
ईश्वर अल्लाह परमपिता सब से मिलना है हमको
किसने सौंपा तुमको जिम्मा इन सब से मिलवाने को
*गिरीश बिल्लोरे मुकुल*

रविवार, अगस्त 26

अनकिया सभी पूरा हो : श्री अशोक चक्रधर

मॉरीशस में सम्पन्न विश्व हिंदी सम्मेलन पर चुटीली रिपोर्ट श्री एम एल गुप्ता आदित्य जी के ई-सन्देश से प्राप्त हुई । 
चौं रे चंपू! लौटि आयौ मॉरीसस ते?
दिल्ली लौट आया पर सम्मेलन से नहीं लौटपाया हूं। वहां 

तीन-चार दिन इतना काम किया किअब लौटकर एक ख़ालीपन सा लग रहा है। करनेको कुछ काम चाहिए।
एक काम करपूरी बात बता!
उद्घाटन सत्रअटल जी की स्मृति में दो मिनिटके मौन से प्रारंभ हुआ। दो हज़ार से अधिक प्रतिभागियों के साथ दोनों देशों के शीर्षस्थ नेताओंकी उपस्थिति श्रद्धावनत थी और हिंदी कोआश्वस्त कर रही थी। ‘डोडो और मोर’ की लघुएनीमेशन फ़िल्म को ख़ूब सराहना मिली। औरफिर अटल जी के प्रति श्रद्धांजलि का एक लंबासत्र हुआ। ‘हिंदी विश्व और भारतीय संस्कृति’ सेजुड़े चार समानांतर सत्र हुए। चार सत्र दूसरे दिनहुए। ‘हिंदी प्रौद्योगिकी का भविष्य’ विषय परविचार-गोष्ठी हुई। प्रतिभागी विभिन्न सभागारों मेंजमे रहे। भारतीय सांस्कृतिक कार्यक्रमों कोतिलांजलि दे दी गईलेकिन रात में देश-विदेश केकवियों ने अटल जी को काव्यांजलि दी। तीसरेदिन समापन समारोह हुआ। देशी-विदेशी विद्वानसम्मानित हुए। सत्रों की अनुशंसाएं प्रस्तुत कीगईं। भविष्य के लिए निकष को भारत का प्रवेश द्वार बताया गया। 
कछू बात तौ हमनैं अखबारन में पढ़ लईं। तूकोई खास बात बता! 
--एक ख़ास बात ये कि जिस होटल में हमें टिकाया गया, उसी में दो दशक पहले अटल जी ठहरे थे। इस बार यहां सुषमा जी ठहरी थीं। उनके निर्देशनमें पूरा सम्मेलन उसी कक्ष के पास वाले कक्ष सेसंचालित हो रहा था। वहां की खिड़कियों सेबंदरगाह के दूसरी ओर पुराना आप्रवासी भवनदिखता है। बंदरगाह पहले एक प्राकृतिक खाड़ीथा। यहीं जहाज आए। जहाजी उतरे। यह प्राकृतिक खाड़ी न होती तो इस छोटे से द्वीप पर बड़े जहाज न आ पाते और इस द्वीप का उपयोग एक सभ्य समाज को बसाने के लिए न हो पाता।मॉरीशसवासियों के प्रतापी भारतवंशी पुरखों केउद्यम से यहां गन्ने की खेती हुई। गन्ने ने सोना बरसा दिया। समृद्धि आने लगी और सन साठ में आज़ादी मिलने के बाद यह देश भारतवंशियों के हाथ में आ गया। विदेशी रहे, पर वर्चस्व भारतवंशियों का और उनकी भाषा का हुआ।उन्होंने हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं कोजीवित रखा। चचाअब चुनौती है हिंदी-भोजपुरीको बचाए रखने की।
चौंअब लोग हिंदी नायं बोलैं का?
पिछले दस-पंद्रह साल में मॉरीशस बदल गया है। मैंने दस साल बाद यह जो मॉरीशस देखा, इसकी नई पीढ़ी में एक अलग तरह का स्वाभिमान है। अभी तक हम इसे कहते आ रहे हैं, गिरमिटिया देश। गिरमिटिया देश वे देश हैंजिनमें भारत से गए मजदूरों के श्रम की बुनियाद पर सम्पन्न देशों नेअपने मुनाफ़े के महल बना लिए। मॉरीशस के अलावा त्रिनिडाड-टोबैगो, सूरीनाम, गुयाना, फीजी और नेटाल (दक्षिण अफ्रीकाआदि देशों में जोमज़दूर आते थेउन्हें गिरमिटिया मज़दूर कहा जाता रहा है। यह मजदूर एग्रीमेंट के तहत भेजेजाते थे। एग्रीमेंट का अपभ्रंश गिरमिटिया हो गया। मैंने मॉरीशस के एक नवयुवक से पूछा कि गिरमिटिया सम्बोधन आपको ठीक लगता है? युवक ने कहा, न तो ठीक लगता है, न बुरा लगता है। हमारे पुरखे भी स्वयं को गिरमिटिया कहते आ रहे हैं तो हमने भी एक स्तर पर स्वीकार करलिया। उन्होंने संघर्ष कियाकुर्बानियां दींहमआभारी हैं उनकेलेकिन हम तो आज़ाद मॉरीशसमें पैदा हुए। फिर हमें क्यों कहा जाए गिरमिटिया,क्यों कहा जाए प्रवासी! हम मॉरीशसवासी हैं, मॉरीशियन हैं। हमें एक स्वायत्त देश का नागरिक मानकर मॉरीशियन कहा जाना चाहिए। बात सही है चचायह स्वाभिमान और अपने देश के प्रतिप्यार का मामला है। लोकतांत्रिक ढांचे पर खड़ाकोई भी देश आकार या क्षमता के कारण छोटा या बड़ा नहीं होता। वह एक सम्प्रभु देश होता है। यहतो मॉरीशस का बड़प्पन है कि वे स्वयं को भाषाऔर संस्कृति के साम्य के कारण छोटा भारतकहते हैं। बहरहालकहा जा सकता है किसम्मेलन सफल रहा। उसके परिणाम अच्छे रहे। यह पूरा सम्मेलन अटल जी को समर्पित था।उनके प्रति श्रद्धावनत था और भविष्य के लिएकार्यावनत। श्रेष्ठ नागरिकों से बसा हुआ एक सभ्यऔर सुंदर देश है मॉरीशस। धार्मिककार्मिक औरचार्मिक देश है। 
घूमा-फिरी करी कै नायं? 
घूमा-फिरी की बात तो घूमने वाले लोग जानें कि कितने घूमे, कितने फिरे। पर हम तो रहे घिरे। निरंतर किसी  किसी काम में। पहले दिन उद्घाटन सत्र के बाद श्रद्धांजलि सभा हुई। मुझे सुषमा जी ने संचालन सौंप दिया। तीन हज़ार की उपस्थिति में कौन नहीं होगा जो बोलना न चाहेगा और वह भी सारे के सारे हिंदी के बोलने वाले लोग बैठे हों तब। संयम के साथ ढाई घंटे श्रद्धांजलि सभा चली और विदेशी विद्वानों को अधिक समय दिया गया। उसके तत्काल बाद अपना सत्र था, प्रौद्योगिकी का। वह तीन घंटे चला। उसके अगले दिन निकष और इमली पर विचार गोष्ठी होनी थी, उसकी तैयारियों में लगे। थोड़ी अव्यवस्था तो जरूर थी, घोषणा किसी स्थान की हुई। सत्र कहीं हुए। इसमें वक्ता और श्रोता सभी भटकते रहे। बहरहाल, पहला सत्र रिजीजू जी की अध्यक्षता में हुआ था। उन्होंने बड़ी रुचि से निकष और कंठस्थ को देखा, सुना। चचा अब ज़रूरी ये है कि योजनाओं को मंत्रीगण समझें और उनको व्यवहार में लाया जाना देखें। इस मामले में यह सम्मेलन मुझे उपलब्धि नजर आता है, क्योंकि संगोष्ठी में विदेश राज्य मंत्री एम. जे. अकबर बैठे थे। उन्होंनेप्रौद्योगिकी से जुड़े हुए पच्चीस विद्वानों को सुना और उसके प्रति अपनी गंभीरता दिखाई।
मंत्री का कल्लिंगे?
जब तक सरकार के मंत्रीगण नहीं समझेंगे कि प्रौद्योगिकी हिंदी के विकास के लिए सर्वाधिक ज़रूरी है, तब तक योजनाएं फाइलों में रहेंगी। आधे-अधूरे प्रयत्नों के साथ उत्पाद बनाए जाएंगे जो जनता तक नहीं जाएंगे। इस बार निकष का प्रारूप तीन हज़ार के सभागार में दिखाया गया कि वह हिंदी सीखने, परीक्षा देने और प्रमाण-पत्र प्राप्त करने वाला वैश्विक द्वार होगा। जिसमें उनकी सुननेबोलने, लिखने और पढ़ने की ऑनलाइनकक्षाएं दी जाएंगी, परीक्षाएं ली जाएंगी, प्रमाण-पत्र दिए जाएंगे। इन सबके बाद काव्यांजलि हुई। रात के बारह बज गए। लौटते ही अगले दिन के लिए अपने सत्र की अनुशंसाएं तैयार करनी थीं।विचार-गोष्ठी में भी अनेक अनुशंसाएं प्राप्त हुईं।पता नहीं ऊर्जा कहां से आती है, जो आपसे काम कराती है। काम डॉविजय कुमार मल्होत्रा ने भीरात भर किया। वर्धा विश्वविद्यालय की ओर से भी कागज़ आए। समापन समारोह के प्रारंभ में आठसत्रों का लेखा-जोखा बताने के लिए आठ कोज़िम्मेदारी दी गई थी। प्रत्येक के लिए समय दियागया तीन मिनिट का। अब भला तीन-तीन घंटों केसत्रों का ब्यौरा तीन-तीन मिनिट में कैसे दिया जासकता था। मेरे सत्र के काग़ज़ों का पुलिंदा मेरे हाथ में था। पहले वक्ता प्रोगिरीश्वर मिश्र का एकमिनिट तो मंचस्थ लोगों को संबोधित करने में हीनिकल गया। अपने सत्र की रपट वे बहुत अच्छीतरह बता रहे थे। तीन मिनिट पूरे होते हीसंचालिका महोदया ने डायस पर पर्ची रख दी।अच्छा हुआ उन्होंने वह पर्ची देखी ही नहींयादेखकर अनदेखी कर दी। डेढ़-दो मिनिट औरलेकर अपनी बात गरिमापूर्वक पूरी कर दी। अबमेरी बारी थी। डायस पर जाते ही मेरे हाथ से
अच्छा हुआ उन्होंने वहपर्ची देखी ही नहींया देखकरअनदेखी कर दी। डेढ़-दो मिनिट औरलेकर अपनी बा गरिमापूर्वक पूरीकर दी। अब मेरी बारी थी। डायसपर जाते ही मेरे हाथ से काग़ज़ों कापुलिंदा गिर गया। काग़ज़ बिखर गए।सभागार में सबके सामने मैंने कागज़ उठाए और माइक पर मेरा पहला वाक्य लगभग ऐसा थाउठाते समयये काग़ज़ मुझसे कह रहे थे कि अगर तुम हमारा सहारा लोगे तो तीन मिनिट में अपनी बात पूरी  करपाओगे। हमें डायस के माइक केनीचे दबा दो’ और चचा मैंने अपनेकाग़ज़ डायस पर रखे माइक के नीचेदबा दिये। स्मृति और अपने आईपैड पर लिखे नोट्स के सहारे मैंनेअनुशंसाएं सुना दीं अपनी बातसमाप् करने के लिए मैं एक कवितासुनाने को था कि अचानक पर्ची गई। मैंने अपनी सुनास पर कोमलब्रेक लगाए।
 मेरे कुर्सी पर लौटने तक शायद सुषमा जी ने संचालिका को पांच मिनिट का इशारा कर दिया। उसके बाद किसी को पर्ची नहीं भेजी गई। बने तसल्ली से अपनेअपने सत्र की अनुशंसाएं पढ़ीं फिर देशी-विदेशी विद्वानों को सम्मानित कियागया। सी-डैक द्वारा बनाई हुईनिकष’ फिल्म दिखा गई। वहां केकार्यकारी राष्ट्रपति का मार्मिकभाषण हुआ। धन्यवाद दिए गए।
अपनी कबता हमें तौ सुनाय दै!
सुनिए!
अनुपालन को प्यासी बैठीं
जाने कितनी अनुशंसाएं,
आड़े आती हैं शंकाएं
पीड़ित करतीं आशंकाएं।

है कौन पूर्णता का दावा
जो दावे से कर पाता है,
कितना भी कर डाले लेकिन
अनकिया बहुत रह जाता है।

चिन्हित करने के बावजूद
मंज़िल आगे बढ़ जाती है,
गति का लेखा पीछे आकर
गुपचुप-गुपचुप पढ़ जाती है।

मंज़िल हो जाय परास्त, अगर
गतिमान प्रगति का चक्का हो,
अनकिया सभी पूरा हो, यदि
संकल्प हमारा पक्का हो।

तीन बजे भोजन हुआ। पांच बजे बस आ गई। नौ बजे की फ्लाइट से वापसी हो गई। आपसे मिलना था, सो आ गया, वरना अभी परवर्ती काम बाकी थे। दूसरे सत्रों का ब्यौरा भी तैयार कर रहा हूं।