गुरुवार, सितंबर 21

दीपावली मुबारक हो

बात पिछली दीपावली की है । भूल गया थापर इस बार दीपावली की धूमधाम शुरू होते ही याद आ गई। त्योहार की धूमधाम भरी तैयारियों में पिछले साल श्रीमती गुप्ता ने ढेरों पकवान बनाए सोचा मोहल्ले में गज़ब का प्रभाव जमा देंगी।  बात ही बात में गुप्ता जी को ऐसा पटाया की यंत्रवत श्री गुप्ता ने हर वो सुविधा मुहैय्या कराई जो एक वैभवशाली दंपत्ति को को आत्म प्रदर्शन के लिए ज़रूरी थी। माडलजैसी दिखने के लिए श्रीमती गुप्ता ने साड़ी ख़रीदी और गुप्ता जी को कोई तकलीफ न हुई।
घर को सजाया सँवारा गयाबच्चों के लिए नए कपड़े बने । कुल मिलाकर यह कि दीपावली की रात पूरी सोसायटी में गुप्ता परिवार की रात होनी तय थी । चमकेंगी तो गुप्ता मैडम, घर सजेगा तो हमारे गुप्ता जी का, सलोने लगेंगे तो गुप्ता जी के बच्चे, यानी ये दीवाली केवल गुप्ता जी की होगी ये तय था ।
समय घड़ी के काँटों पे सवार दिवाली की रात तक पहुँचासभी ने तयशुदा मुहूर्त पे पूजा पाठ की । उधर सारे घरों में गुप्ता जी के बच्चे प्रसाद आत्मप्रदर्शन के उद्देश्य से पैकेट बांटने निकल पड़े । जहाँ भी वे गए सब जगह वाह वाह के सुर सुन कर बच्चे अभिभूत थे किंतु भोले बच्चे इन परिवारों के अंतर्मन में धधकती ज्वाला को न देख सके।
ईर्ष्यावश सुनीति ने सोचा बहुत उड़ रही है प्रोतिमा गुप्ता, क्यों न मैं उसके भेजे प्रसाद-बॉक्स दूसरे बॉक्स में पैक कर उसे वापस भेज दूँ, यही सोचा बाकी महिलाओं ने और नई पैकिंग में पकवान वापस रवाना कर दिए श्रीमती गुप्ता के घर। यह कोई संगठित कोशिश न ही बदले की भावना बल्कि एक स्वाभाविक आंतरिक प्रतिक्रया थी, जो सार्व-भौमिक सी होती है। आज़कल आम है। कोई माने या न माने सच यही है जितनी नकारात्मक कुंठा इस युग में है उतनी किसी युग में न तो थी और न ही होगी । इस युग का यही सत्य है।
 दूसरे दिन श्रीमती गुप्ता ने जब डब्बे खोले तो उनके आँसू निकल पड़े जी में आया कि सभी से जाकर झगड़ आऐं किंतु पति से कहने लगीं, ”अजी सुनो चलो ग्वारीघाट गरीबों के साथ दिवाली मना आएँ।
इस साल- देखते हैं क्या होता है। मिसेज़ गुप्ता मुहल्लेवालों के साथ दीपावली मनाती हैं या ग्वारीघाट के गरीबों की उन्हें दुबारा याद आती है।

बुधवार, सितंबर 20

सरित-प्रवाह और समय प्रवाह

सुधि पाठक
            सुप्रभात एवं शारदेय नवरात्री के पूजा-पर्व पर पर आपकी आध्यात्मिक उन्नति की कामना के आह्वान के साथ अपनी बात रखना चाहता हूँ .  
           नदियों के किनारे विकसित सभ्यता का अर्थ समृद्ध जीवन ही है . आज प्रात: काल से मैं अपनी नई ज़िंदगी की शुरुआत करने जा रहा हूँ. ज़िंदगी अपनी 54 वर्ष के बाद बदलेगी मुझे यकीन नहीं हो रहा . हमारा नज़रिया होता है कि नदी अपने साथ समय की तरह बहाकर बहुत कुछ ले जाती है परन्तु हम बहुत देर समझ सोच पाते हैं कि नदियाँ अपने साथ बहुत कुछ लेकर भी आतीं हैं . और अपने किनारों को बांटतीं हुईं  निकल भी जातीं हैं . ठीक वैसे तरह  सरिता के प्रवाह सा समय भी बहुत कुछ लेकर आता और लेकर  जाता है. इस लेकर आने और लेकर जाने के व्यवसाय में नहीं से अधिक लाभ स्थानीय रूप से होता है.
     हम सभी समय-सरिता के इस पार या उस पार रहा करतें हैं . जहां हम आत्म चिंतन के ज़रिये इस प्रवाह के साथ कुछ न कुछ  चाहते न चाहते बह जाने देतें हैं. कुछ नया जो बहकर आता है उसे आत्मसात कर लेतें हैं. 29 नवम्बर 1962 को मेरा जन्म हुआ था. जीवन का हिसाब किताब जन्म से ही रखना चाहिए  सो रख रहा हूँ.
     54 वर्ष की आयु में आकर पता चला कि अभी तक जो हासिल हुआ या कहूं हासिल किया उसे शून्य ही मानता हूँ. क्योंकि हमेशा सोचता रहा नदी की तरह समय ने भी मुझमें से बहुत कुछ बहा लिया है. सोच ठीक थी पर जो समय-सरिता  में बहा उसका शोक मनाते मनाते जो समय-सरिता ने दिया उसे संजो न पा सका . करते कराते उम्र की आधी सदी बीत गई.
    जो कुछ भी बहा के लेगी समय सरिता वो मेरा न था और अब जो पास में है या जो प्रवाह से मुझे मिला तथा मेरे पास सुरक्षित है वो मेरा है इस बात को समझने के लिए 54 साल लगना एक अलहदा बात है. इस पर कभी और बात होगी. आज शारदेय नवरात्री के पूजा पर्व शुरू हो चुकें हैं . इन 9 दिनों में कुछ चमत्कार अवश्य होगा. क्योंकि अब मेरा नज़रिया बदल गया है.

‘लोहस्तंभ’ - प्रशांत पोळ

दक्षिण दिल्ली से मेहरोली की दिशा में जाते समय दूर से ही हमें ‘क़ुतुब मीनार’ दिखने लगती हैं. २३८ फीट ऊँची यह मीनार लगभग २३ मंजिल की इमारत के बराबर हैं. पूरी दुनिया में ईटों से बनी हुई यह सबसे ऊँची वास्तु हैं. दुनियाभर के पर्यटक यह मीनार देखने के लिए भारत में आते हैं.
साधारणतः ९०० वर्ष पुरानी इस मीनार को यूनेस्को ने ‘विश्व धरोहर’ घोषित किया हैं. आज जहां यह मीनार खड़ी हैं, उसी स्थान पर दिल्ली के हिन्दू शासक पृथ्वीराज चौहान की राजधानी ‘ढिल्लिका’ थी. इस ढिल्लिका के ‘लालकोट’ इस किले नुमा गढ़ी को ध्वस्त कर, मोहम्मद घोरी के सेनापति ‘कुतुबुद्दीन ऐबक’ ने यह मीनार बनाना शुरू किया था. बाद में आगे चलकर इल्तुतमिश और मोहम्मद तुघलक ने यह काम पूरा किया. मीनार बनाते समय लालकोट में बने मंदिरों के अवशेषों का भी उपयोग किया गया हैं, यह साफ़ दिखता हैं.
किन्तु इस ‘ढिल्लिका’ के परिसर में इस क़ुतुब मीनार से भी बढकर एक विस्मयकारी स्तंभ अनेक शतकों से खड़ा हैं. क़ुतुब मीनार से कही ज्यादा इसका महत्व हैं. क़ुतुब मीनार से लगभग सौ – डेढ़ सौ फीट दूरी पर एक ‘लोहस्तंभ’ हैं. क़ुतुब मीनार से बहुत छोटा... केवल ७.३५ मीटर या २४.११ फीट ऊँचा. क़ुतुब मीनार के एक दहाई भर की ऊँचाई वाला..! लेकिन यह स्तंभ क़ुतुब मीनार से बहुत पुराना हैं. सन ४०० के आसपास बना हुआ. यह स्तंभ भारतीय ज्ञान का रहस्य हैं. इस लोहस्तंभ में ९८% लोहा हैं. इतना लोहा होने का अर्थ हैं, जंग लगने की शत प्रतिशत गारंटी..! लेकिन पिछले सोलह सौ - सत्रह सौ वर्ष निरंतर धूप और पानी में रहकर भी इसमें जंग नहीं लगा हैं. विज्ञान की दृष्टि से यह एक बड़ा आश्चर्य हैं. आज इक्कीसवी सदी में, अत्याधुनिक तकनिकी होने के बाद भी ९८% लोहा जिसमे हैं, ऐसे स्तंभ को बिना कोटिंग के जंग से बचाना संभव ही नहीं हैं.
फिर इस लोहस्तंभ में क्या ऐसी विशेषता हैं की यह स्तंभ आज भी जैसे था, वैसे ही खड़ा हैं..?
आई आई टी कानपुर के ‘मटेरियल्स एंड मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग’ विभाग के प्रमुख रह चुके प्रोफेसर आर. सुब्रमणियम ने इस पर बहुत अध्ययन किया हैं. इन्टरनेट पर भी उनके इस विषय से संबंधित अनेक पेपर्स पढने के लिए उपलब्ध हैं.
प्रोफेसर सुब्रमणियम के अनुसार लोह-फॉस्फोरस संयुग्म का उपयोग इसा पूर्व ४०० वर्ष, अर्थात सम्राट अशोक के कालखंड में बहुत होता था. और उसी पध्दति से इस लोहस्तंभ का निर्माण हुआ हैं. प्रोफ़ेसर सुब्रमणियम और उनके विद्यार्थियों ने अलग अलग प्रयोग कर के यह बात साबित कर के दिखाई हैं. उनके अनुसार लोहे को जंग निरोधी बनाना, आज की तकनिकी के सामने एक बड़ी चुनौती हैं. भवन निर्माण व्यवसाय, मशीनी उद्योग, ऑटोमोबाइल उद्योग आदि में ऐसे जंग रोधक लोहे की आवश्यकता हैं. उसके लिए इपोक्सी कोटिंग, केडोडिक प्रोटेक्शन पध्दति आदि का प्रयोग किया जाता हैं. लेकिन इस प्रकार की पध्दति लोहे को पूर्णतः जंग से मुक्त नहीं कर सकती. वह तो उसे कुछ समय के लिए जंग लगने से बचा सकती हैं. अगर लोहा पूर्णतः जंग निरोधक चाहिए हो तो उस लोहे में ही ऐसी क्षमता होनी चाहिए.
आज इक्कीसवी सदी में भी इस प्रकार का जंग निरोधी लोहा निर्मित नहीं हो पाया हैं. लेकिन भारत में इसा पूर्व से इस प्रकार का लोहा निर्माण होता था, जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण यह दिल्ली का लोहस्तंभ हैं. वास्तव में यह स्तंभ दिल्ली के लिए बना ही नहीं था. चन्द्रगुप्त मौर्य ने यह स्तंभ सन ४०० के आसपास मथुरा के विष्णु मन्दिर के बाहर लगाने के लिए बनवाया था. इस स्तंभ पर पहले गरुड़ की प्रतिमा अंकित थी, इसलिए इसे ‘गरुड़ स्तंभ’ नाम से भी जाना जाता हैं. यह स्तंभ विष्णु मंदिर के लिए बनाया गया था, इसका प्रमाण हैं, इस स्तंभ पर ब्राम्ही लिपि में कुरेदा गया एक संस्कृत श्लोक..! ‘चन्द्र’ नाम के राजा की स्तुति करता हुआ यह श्लोक विष्णु मन्दिर के सामने के लोह स्तंभ का महत्व बताता हैं. चूँकि इस श्लोक में ‘चन्द्र’ नाम के राजा का उल्लेख हैं तथा चौथे शताब्दी में इसका निर्माण हुआ था, इसलिए यह माना गया की इसका निर्माण चन्द्रगुप्त मौर्य ने किया होगा. इस श्लोक की लेखन शैली गुप्त कालीन हैं. इस कारण से भी इस स्तंभ का निर्माण चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा ही हुआ होगा, इस मान्यता को बल मिलता हैं. मथुरा के निकट स्थित ‘विष्णुपद’ पहाड़ी पर बसे हुए विष्णु मंदिर के सामने रखने के लिए इस स्तंभ का निर्माण किया हैं इसकी पुष्टि उस संस्कृत श्लोक से भी होती हैं. (किन्तु अनेक इतिहासकार इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं हैं. उनके अनुसार इस स्तंभ का निर्माण इसा के पूर्व सन ९१२ में किया गया था.)
७ मीटर ऊँचाई वाला यह स्तंभ, ५० सेंटिमीटर (अर्थात लगभग पौने दो फीट) जमीन के नीचे हैं. नीचे ४१ सेंटीमीटर का व्यास हैं, जो बिलकुल ऊपर जाकर ३० सेंटीमीटर का रह जाता हैं. सन १९९७ तक इस को देखने के लिए आने वाले पर्यटक इसको पीछे से दोनो हाथ लगाकर पकड़ने का प्रयास करते थे. दोनों हाथों से अगर इसे पकड़ने में सफल हुए तो वांछित मनोकामना पूरी होती हैं, ऐसी मान्यता थी. लेकिन स्तंभ को पकड़ने के चक्कर में उसपर कुछ कुरेदना, ठोकना, नाम लिखना आदि बाते होने लगी, जो इस वैश्विक धरोहर को क्षति पहुचाने लगी. इसलिए इसकी सुरक्षा के लिए आर्चिओलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया ने इसके चारों और संरक्षक फेंसिंग लगा दिया. अब कोई भी इस स्तंभ को छू नहीं सकता.
यह एक मात्र लोहस्तंभ अब शेष हैं, ऐसा नहीं हैं. भारत में यह कला इसा के पूर्व ६०० – ७०० वर्ष से विकसित थी, इसके अनेक प्रमाण मिले हैं. सोनभद्र जिले का ‘राजा-नाल-का-टीला, मिर्जापुर जिले में मल्हार और पश्चिम बंगाल के पांडुराजार, धिबी, मंगलकोट आदि जिलों में सर्वोत्तम गुणवत्ता के लोहे के अवशेष प्राप्त हुए हैं. इससे यह साबित होता हैं की लोहे का, ऊँची गुणवत्ता का धातुकर्म भारत में ढाई-तीन हजार वर्ष पहले से मौजूद था. अत्यंत ऊँचे दर्जे का लोहा भारत में होता था, यह अनेक प्राचीन विदेशी प्रवासियों ने भी लिख रखा हैं.
अत्यंत प्राचीन काल से भारत में लोहा बनाने वाले विशिष्ट समूह / समाज हैं. उनमे से ‘आगरिया लुहार समाज’ आज भी आधुनिक यंत्र सामग्री को नकारते हुए जमीन के नीचे की खदानों से लोहे की मिट्टी निकालता हैं. इस मिट्टी से लोहे के पत्थर बीन कर उन पत्थरों पर प्रक्रिया करता हैं, और शुध्द लोहा तैयार करता हैं. लोहा बनाने की, आगरिया समाज की यह पारंपरिक पध्दति हैं.
‘आगरिया’ यह शब्द ‘आग’ इस शब्द से तैयार हुआ हैं. लोहे की भट्टी का काम याने आग का काम होता हैं. ‘आग’ में काम करने वाले इसलिए ‘आगरिया’. मध्यप्रदेश के मंडला, शहडोल, अनुपपुर और छत्तीसगढ़ के बिलासपुर और सरगुजा जिलों में यह समाज पाया जाता हैं, जो गोंड समाज का ही एक हिस्सा हैं. इस समाज की दो उपजातियां हैं - पथरिया और खुंटिया. लोहे की भट्टी तैयार करते समय ‘पत्थर’ का जो उपयोग करते हैं, उन्हें पथरियां कहा जाता हैं. और भट्टी तैयार करते समय ‘खूंटी’ का उपयोग करने वाले ‘खुंटिया’ कहलाते हैं. आज भी यह समाज लोहा तैयार करके उसके औजार और हथियार बनाने का व्यवसाय करता हैं.
भोपाल के एक दिग्दर्शक संगीत वर्मा ने आगरिया समाज पर एक वृत्तचित्र बनाया हैं. इसमें जंगल की मिट्टी से लोहे के पत्थर बीनने से लेकर लोहे के औजार बनाने तक का पूरा चित्रण किया गया हैं.
ढाई – तीन हजार वर्ष पूर्व की यह धातुशास्त्र की परंपरा इस आगरिया समाज ने संवाहक के रूप में जीवित रखी हैं. प्राचीन काल में जब इस परंपरा को राजाश्रय और लोकाश्रय था, तब धातुशास्त्र की इस कला का स्वरुप क्या रहा होगा, इस कल्पना मात्र से ही मन विस्मयचकित होता हैं..!

- प्रशांत पोळ

सोमवार, सितंबर 18

पोते को मिलेंगे 130 करोड़ : एडवोकेट आनंद अधिकारी

ऊपर वाला जब देता है तो छप्पर फाड़ के देता है इस बात का खुलासा किया ज़ी बिजनेस के एक फोनइन कार्यक्रम में ।  एक आदमी 1990 को कोमा मै चला गया उसके बेटे ने उसकी बहुत सेवा की और उसके बेटे की मौत के बाद उस आदमी के पोते ने बहुत सेवा की। अकस्मात 2017 मे कोमा वाला आदमी होश मे आ गया वह आपने पोते को होश मे आने के बाद कहता है कि मेरे पास ज्यादा कुछ तो नहीं था पर 1990 में मैंने MRF Company के 20000 Share लिए थे वो तू ले ले उसके पोते ने 2017 में Zee Business से फोन करके उसकी आज की असली  पता की तो उसके होश ही उड गए आप भी सुनिए इस वीडियो क्लिप में जो हमने
 ज़ी बिजनेस से साभार प्राप्त5 की है ।
नोट :- यह समाचार एडवोकेट आनंद अधिकारी ने एक वाट्सएप समूह में पोस्ट की है । 
video


शुक्रवार, सितंबर 15

बामियान से बुद्ध को मिटा

सोचता था आज न लिखूं..... 
पर क्यों न लिखूं.. ? 
लिखना ज़रूरी है .. वरना नींद न आएगी.. 
आज नहीं तो कल सो सकता हूँ . अदद चार घंटे तो सोना है.. फिर क्या था बैठ गया लिखने . किसी माई के लाल ने न रोका... 
मित्रो अक्सर मुझे यही सिचुएशन हैरान कर देती है . तीन बज जाते हैं कभी तो रात तीन बजे तक  ज़ारी होता है लखना... यानी देखना फिर लिखना ... क्या देखता हूँ ... देखता हूँ.. विचारों के साथ तैरतें हैं दृश्य ... फिर लिखता रात भर उन पर आओ एक मुक्त कविता देता हूँ ... 

हाँ लिखता हूँ  
कविता लिखना गुनाह नहीं है .. 
अगर तुम घायल होते  हो   !
मुझे परवाह नहीं है. 
बामियान से बुद्ध को मिटा 
रोहिंग्या के बारे में सोचते हो .. 
रो तो मैं भी रहा हूँ .. बुद्ध पर .. 
चीखते रोहिंग्या लोगों पर ..
गलत लिखा क्या .. ?
गलत लिखता नहीं 
गलत तुम समझते हो ..
क्यों डरते हो इलाहाबाद के 
प्रयागराज होने पर लिखा है न वही प्रयाग था.. 
तो होने दो प्रयाग को प्रयाग ..
क्या फर्क पड़ता है 
रोटी कहो ब्रेड कहो .
पेट तो सबका भरता है 
सच कहूं  
मैं निर्विकार ब्रह्म से मिलता हूँ 
एकांत में तब कविता उभरती है 
और जब साकार ब्रह्म से बात करता हूँ तो 
गीत अपनी अपनी धुन सहित आते हैं..
ज़ेहन में . 
मंटो आते हैं तो रेशमां भी आतीं हैं 
पता नहीं मेरे  मामा किसी 
मुस्लिम दोस्त के पाकिस्तान जाने पर क्यों 
उसे तलाशते .. थे ..!
जब उनने जाना कि दोस्त दुनिया में नहीं है 
तो उसके नाम का तर्पण करते थे ,,?
क्यों .. न खुदा के घर से कोई नोटिस मिला 
उनको न भगवान ने कोई परवाना भेजा .. 
पर हाँ 
मुझे एक एहसास मिला 
जो गुरुदेव ने कहा - "प्रेम ही संसार की नींव है"
तुम नफरत न बोना ... 
नफरत से न सम्प्रदाय बचेंगे न धर्म 
बचेगी कुंठा ... और होंगे युद्ध .. 
बच्चे जो भगवान हैं.. 
बच्चे जो फ़रिश्ते हैं .. 
उनके जिस्म मिलेंगे ... सडकों पर 
कविता लिखना गुनाह नहीं है .. 
अगर तुम घायल होते  हो   !
मुझे परवाह नहीं है... 



  
   

सजल उन्नति और शाम्भवी ने रिकार्ड बनाए


जबलपुर में गायत्री परिवार 2015 से वाइस ऑफ प्रज्ञा संगीत स्पर्धाओं का वार्षिक आयोजन कर रही है । विगत वर्ष 2016 में मास्टर नयन सोनी मास्टर जैन और इशिता ने पुरस्कार प्राप्त किये थे । इस बार भी मुझे शुक्रवार 15 सितंबर 2017 सुखद लगा जब ग्रुप A शाम्भवी पंड्या विशेष पुरस्कार मोमेंटो प्रमाण पत्र एवम म्यूज़िक सिस्टम । ग्रुप A प्रथम पुरस्कार सजल सोनी :- मोमेंटो प्रमाण पत्र एवम लैपटॉप । ग्रुप B तृतीय पुरस्कार  :- उन्नति तिवारी , मोमेंटो प्रमाण पत्र एवम एंड्रायड फोन । सब कुछ के अलावा जनसमूह का प्यार । बधाई बच्चों आभार
@⁨Dr Shipra Sullere⁩ ( Sangeet Guru )
Congratulations #Ishita_Vishvkarma D/o #Anjani_Vishvakarma  #Smt_Tejal   for superb guest  performance in #Voice_Of_Pragya Tejal Vishwakarma Vishwakarma

बुधवार, सितंबर 13

हलीमा बिंते याकूब भारतीय मूल की राष्ट्रपति

सिंगापुर संसद स्पीकर रहीं  हलीमा बिंते याकूब का जन्म 23 अगस्त 1954 में हुआ सिंगापुर की पहली महिला राष्ट्रपति बन गई हैं। 13 सितम्बर 2017 को उनको निर्वाचन अधिकारी ने राष्ट्रपति घोषित कर दिया. अगर आप इस बात से न चौके हों तो अब जो आपको ज्ञात होगा कि उनके डी एन ए में भारतीयता मौजूद है अवश्य चौंक सकते हैं . वे एक भारतीय मुस्लिम की बेटी हैं जो चौकीदारी का काम किया करते थे, जब उनके पिता  का नि:धन हुआ तो वे केवल 8 वर्ष की थीं.
सिंगापुर एक अजब देश इस लिए है क्योंकि उसका विस्तार भारत की मायानगरी मुंबई से कम है . 16 सितंबर 1963 को मलायासिंगापुरसबा एवं सरवाक का औपचारिक रूप से विलय कर दिया गया और मलेशिया का गठन हुआ किन्तु दो बरस बाद ही यानी 9 अगस्त 1965 को मलेशिया से सिंगापुर अलग एवं एक स्वतंत्र राष्ट्र बन गया. कारण यह था कि अंग्रेज़ सरकार  साम्यवादी व्यवस्था के पूर्णत: खिलाफ थी. तथा वे सिंगापुर में उग्र साम्यवाद के विस्तार के खिलाफ थे.   
सिंगापुर में निर्वाचित राष्ट्रपति के कार्यकाल पूरा होने पर उनको पद मुक्त होना पड़ता है . परन्तु राष्ट्रपति का पद किसी भी स्थिति में रिक्त कभी नहीं होता . ऐसी स्थिति में वहां भारतीय मूल के श्री जे. वाई. पिल्लै राष्ट्रपति चुने जाते हैं . ऐसा अब तक 60 बार हो चुका है.
भारत में नौकरियों में आरक्षण होता है पर सिंगापुर में राष्ट्रपति का पद आरक्षित होता है. मोहतरमा हलीमा ने निर्वाचन पत्र लेते हुए कहा कि वे समूचे सिंगापुर की राष्ट्रपति हैं न कि अल्पसंख्यक आरक्षित समुदाय की.  
हलीमा सिंगापुर की एक मलय राजनीतिज्ञ हैं तथा इनका नाता  सिंगापुर की सत्तारूढ़ पीपुल्स एक्शन पार्टी की सदस्य हैं. इनको उन्हें 14 जनवरी, 2013 को सिंगापुर की संसद का अध्यक्ष चुना गया। सिंगापुर में वे प्रथम महिला संसद प्रधान   थीं .  हलीमा निरंतर 2000 के बाद से सक्रीय राजनीतिज्ञ हैं.