मंगलवार, जून 13

चलो अच्छा है जानी पहचानी नहीं थीं ये चीखें !!


हां सदमा तो लगा है सुनकर 
हादसा देखा नहीं  है 
 न तो  साथ मेरे जुड़ती है कोई भी  कहानी
इस  हादसे जैसी......!!
मग़र नि:शब्द क्यों हूं..?
सोचता हूं अपने चेहरे पे
सहजता लांऊ   कैसे ?
मैं जो महसूस करता हूं
कहो बतलाऊं   कैसे..?
वो जितना रोई होगी बस में दिल्ली वाली वो  लड़की
मेरी आंखों के आंसू भी सुखाए उसी पगली ने
न मैं  जानता उसे न पहचानता हूं मैं ?
क्या पूछा -"कि रोया क्यूं मैं..?"
निरे जाहिल हो किसी पीर तुम जानोगे कैसे
ध्यान से सुनना उसी चीख
सबों तक आ रही अब भी
तुम्हारे तक नहीं आई
तो क्या तुम भी सियासी हो..?
सियासी भी कई भीगे थे सर-ओ-पा तब
देखा तो होगा ?
चलो छोड़ो न पूछो मुझसे
वो कौन है क्या है तुम्हारी  ?
तो सुन लो जानता नहीं में उसे रत्ती भर  
खूब रोया जी भर के 
दिन भर  ... हुक उठती थी मेरे मन में  
मेरे माथे पे  बेचैनियां
नाचतीं दिन भर  !
मेरा तो झुका है 
क्या तुम्हारा 
झुकता नहीं है सर..?
सुनो तुम भी.. ध्यान  से 
दिल्ली से देशभर में गूँजतीं चीखें 


ज्योति सिंह : फोटो - विकीपीडिया से 

हर तरफ़ से एक सी आतीं.. जब तब 
तुम सुन नहीं पाते सुनते हो तो शायद 
समझ में आतीं नहीं तुमको 
समझ आई तो फ़िर किसकी है चीखें ?
ये तुम सोचते होगे
चलो अच्छा है जानी पहचानी नहीं  थीं ये चीखें  !!
हरेक बेटी की आवाज़ों फ़र्क  करते हो
दिमागी हो अपने मासूम दिल से तर्क  करते हो..?
हमें सुनना है  हरेक आवाज़ को 
अपनी समझ के अब 
अभी नहीं तो बताओ 
प्रतीक्षा करोगे कब तक
किसी पहचानी हुई आवाज़ का 
रस्ता न तकना तुम
वरना देर हो जाएगी 
ये बात समझना तुम !!

रविवार, जून 11

कोलाहल



कोलाहल
कोलाहल हूँ  गूँज रहा हूँ  अंतस से चौराहे तक
इकतारे के आसपास भी, नुक्कड़ से दोराहे तक
भरी सभा में वक्ता से पहले मैं ही तो करता हूँ राज़
आपस का संवाद तुम्हारे , चिड़ियों के सो जाने तक
कोलाहल हूँ  गूँज रहा हूँ 

भय से भरा कोई सुनता है, कोई रचनाकार मेरा
कोई लगा रहा अंदाजा कितना है आकार मेरा ?
मुद्दे सारे कोलाहल हैं, साफ़ कहे जातें हैं क्या ..?
मानस से बस्ती शहरों तक होता है विस्तार मेरा !!
कोलाहल हूँ  गूँज रहा हूँ 

सबका हूँ,  हूँ  पास तुम्हारे, चिंता के गलियारों में
भोर जन्म ले लेता हूँ मैं, कभी रात- अंधियारों में .
कभी अचानक मन के भीतर – उठता हूँ मैं देर सवेर
रोज़ मिला करते हो मुझसे, भीड़ भरे बाज़ारों में !!
 कोलाहल हूँ  गूँज रहा हूँ 

धुआंधार की गिरती धारा, मुझको जना करे है रोज़
सन्नाटों के षडयंत्रों के बाद , मेरा बढ़ता है ओज .
जनमन की प्रतिध्वनि हूँ , तुमने क्यों न पहचाना
कोलाहल हूँ भरा ख़ुशी से, या फिर होता हूँ आक्रोश .!!
                      गिरीश बिल्लोरे मुकुल    

    

शुक्रवार, जून 2

पेरिस समझौता : ट्रंप की चिंता पर भारी भारतीय चिंतन



            ग्राहम लुक्स 
ट्रंप की वक्रोक्ति आनी तय  थी  पर्यावरण के मसले पर विकसित देशों को दीनो-ईमान के पासंग पर रखा जाना अब तो बहुत मुश्किल है. स्मरण हो कि जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर  30 नवंबर से 12 दिसंबर 2015.को एक महाविमर्श का आयोजन हुआ था.  उद्देश्य था ग्लोबल वार्मिंग के लिए उत्तरदायी कार्बन डाई आक्साइड गैस के विस्तार  को रोका जावे. समझौता भी ऐतिहासिक ही कहा जा सकता है .  2050 तक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन 40 और 70 प्रतिशत के बीच कम किया जाने की और 2100 में शून्य के स्तर तक लाने के उद्देश्य की पूर्ती के लिए तक 2.7 डिग्री सेल्सियस तक ग्लोबल वार्मिंग में कमी लाने का लक्ष्य नियत करना भी दूसरा वैश्विक  कल्याण का संकल्प है. इस समझौते का मूलाधार रहा है . जो ट्रंप भाई जी के अजीब बयान से खंडित हुआ नज़र आ रहा है.
साफ़ साफ़ न कहते हुए ट्रंप ने न केवल पेरिस समझौते से हटने की कोशिश की है वरन  चीन और भारत जैसे देशों के विकास के रथ को रोकने की छद्म रूप से कोशिश की है.
जर्मनी के डायचे वैले  एक जर्नलिस्ट ग्राहम लुक्स  ने तो 177 देशों द्वारा दस्तावेज़ के  हस्ताक्षरित होने  के हफ्ते भर के भीतर ही संदेह व्यक्त करते हुए साफ़ तौर पर संधि को एक धोखा करार दिया था. जर्नलिस्ट ने अपने संदेह का आधार में विकसित देशों के नेता भविष्य में मुकर सकते हैं .
अमेरिकन रिपब्लिकन  लीडर्स का जिक्र अपने आलेख में लुक्स ने साफ़ तौर पर कर दिया था. हुआ भी यही एन पर्यावरण दिवस के तीन दिन पूर्व ट्रंप का समझौते से यह कह कर  हटना कि वे अमेरिकी रियाया के हितों के संरक्षण की वज़ह से संधि से हट रहे हैं हालांकि बराक ओबामा ने इस पर ट्रंप की “कड़ी निंदा” करने में देर न की.
विश्व की अन्य शक्तियां भी ट्रंप की इस विपरीत अभिव्यक्ति के खिलाफ हैं. जहां तक भारत का सवाल है भारत के लीडर्स और जन मानस ग्लोबल वार्मिंग के लिए अत्यधिक सतर्क हैं . बच्चों में ग्लोबल वार्मिंग के लिए चिंता है. वैसे भी भारत के सम्बन्ध में स्मरण ही होगा कि जब जब अमेरिका ने भारत को घेरने की कोशिश की भारत ने विकल्प तलाशने में विलम्ब नहीं किया.
एक ओर भारत और चीन की अर्थ व्यवस्थाएं क्रमश: सुदृढ़ होती हैं वहीं दूसरी ओर 2015 के पेरिस समझौते के बाद अमेरिका को विकाशशील देशों को ग्लोबल वार्मिंग से बचने के लिए तकनीकी एवं  आर्थिक मदद की चिंता सता रही है . उसका एक कारण यह भी है कि – “अमेरीकी युवा बेरोज़गार के मुहाने पर है”
अमेरीका का इतिहास उठा के देखें तो अमेरीकी प्रशासन विश्व की परवाह किये बिना केवल अपनी भौगोलिक सीमाओं एवं नागरिकों के हितों के बारे में ही सोचता है. यह अमेरीका का मूलभूत सिद्धांत है. मात्र 83 बरस बाद ग्लोबल टेम्प्रेचर में अगर 2 से 2.7 डिग्री का इजाफा हुआ तो तय है कि आने वाली नस्लें अमेरिका के डोनाल्ट ट्रंप के माथे पर ठीकरा फोड़ती नज़र आएगी.
लेकिन भारत कुछ ही वर्षों में वो तकनीकी हासिल कर लेगा जिससे कार्बन उत्सर्जन में कमी लाई जा सकेगी . इस मुद्दे पर मैं ही नहीं बल्कि हर भारतीय को अपने वैज्ञानिकों पर भरपूर भरोसा है.
रहा सवाल चीन का तो चीन भी भारत के समानांतर ही कार्य करेगा. और मुझे यह कहने में कोई संदेह नहीं कि एशिया अन्य बातों को भुला कर जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर एकीकृत प्लान विश्व के सामने पेश अवश्य करेगा.
मुझे यह भी विश्वास है कि अब तक हमारे वैज्ञानिक ट्रंप महाशय के वक्तव्य के पूर्व ही  बहुत कुछ अनुसंधान कर चुके होंगे.
अमेरिका का वर्तमान नेतृत्व अजीब सी भ्रम की स्थिति में है . किन्तु अमेरिका यह नहीं जानता कि भारतीय  बच्चे तक ग्लोबल-वार्मिंग के खतरे को रोकने के लिए चिंतनरत हैं . ट्रंप साहब की चिंता अमेरिकी लोगों की  बेरोज़गारी, तथा विश्व को लड़वाने और फिर हथियार बेचने  से कमाए धन का बड़ा हिस्सा चैरेटी पर खर्च न करने की है तो सनद रहे भारत के बच्चों तक  में  कार्बन उत्सर्जन को रोकने या कमी लाने का चिंतन  मौजूद है.
आलेख के प्रारम्भ में  ग्राहम लुक्स के आलेख का ज़िक्र किया था जिसमें उन्हौने पेरिस समझौते को सन्देश की नज़र से देखा था आलेख के अंत में मैं आशान्वित हूँ कि एक यही बिंदु है जो हमें विश्व गुरु के रूप में प्रतिष्ठा  दिला सकता है. अत: केवल स्वचछता एवं सतत अनुशीलन करते रहिये और अगले कुछ वर्षों में वैकल्पिक ऊर्जा के प्रयोग, ऊर्जा के कम स्तेमाल , तथा ऐसे  वैज्ञानिक अनुसंधानों में जुटाना होगा जिनसे हम विश्व को पर्यावरण की रक्षा हेतु एक ऐसी तकनीकी दे सकें जिससे ओजोन परत सुरक्षित रखने के लिए कार्बन उत्सर्जन में कमीं लाई जा सके.

गिरीश बिल्लोरे मुकुल
969 , गेट न. 04
जबलपुर मध्यप्रदेश





गुरुवार, जून 1

जबलपुर स्टेशन पहुँचे जय-वीरू...... : ज़हीर अंसारी

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जय और वीरू आज अचानक जबलपुर रेलवे स्टेशन पहुँच गए। दोनों को शायद राजधानी जाना था, कौन सी राजधानी की ट्रेन तत्काल मिलेगी, यह जानने के लिए वो सीधे प्लेटफ़ार्म नम्बर एक पर पहुँच गए। इनके पास कोई लगेज नहीं था, न ही साथ में कोई दो-पाया साथी। दोनों ने पहले इधर-उधर देखा फिर बेधड़क प्लेटफ़ार्म स्थित एकीकृत क्रू लॉबी में घुस गए। दोनों इतने हट्टे-कट्टे थे कि किसी की हिम्मत ही नहीं हुई उन्हें रोकने की। उलटे जो लोग लॉबी में काम कर रहे थे, उनमें कुछ डर के मारे बाहर भाग खड़े हुए।
जय और वीरू शान से अंदर गए, चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई। शायद जानना चाह रहे थी कौन सी ट्रेन राजधानी जाएगी। दोनों दो-तीन मिनिट वहीं खड़े रहे। भाषा प्रोब्लम होने की वजह से उनका किसी ने न तो अभिवादन किया, न किसी से उन्हें रिस्पांस दिया। वहाँ मौजूद कुछ कर्मचारी उनकी डील-डौल देखकर घबरा गए। ये दोनों मुस्तंडे 'खेलने दो वरना खेल बिगड़ेंगे' की तर्ज़ पर थोड़ी देर खड़े रहे, जब कोई रिस्पांस नहीं मिला तो उनमें एक ने गंदगी फैला दी।
आप सोच रहे होंगे कि यहाँ शोले फ़िल्म के जय और वीरू की बात हो रही है मगर ऐसा नहीं है। यहाँ दो हष्ट-पुस्ट बैलों की बात हो रही है। गुरुवार की रात नौ बजे दो तंदूरुस्त बैल प्लेटफ़ार्म नम्बर एक पर कहीं से घुस आए। ये किधर से आए, ये तो रहस्य है। आते ही दोनों पहले डाक आफिस में घुसने का प्रयास किया, वहाँ से हकाले गए तो बाज़ू वाली क्रू लॉबी में घुस गए। एक बैल ने अंदर खड़े-खड़े गोबर कर दिया। लगा कि उसे 'ज़ोर' से आई थी। लॉबी से ये दोनों बाहर निकले तो यात्री ऐसे तितर-बितर हुए जैसे आतंकवादी घुस आए हों। हालाँकि की बैलों की हरकतें कुछ इसी तरह की थी।
वहाँ से भगाए तो प्लेटफ़ार्म पर टहलने लगे। इसी प्लेटफ़ार्म पर मुंबई जाने वाली महानगरी आने वाली थी लिहाज़ा वहाँ मौजूद यात्रियों ने हिम्मत करके उन्हें भगाया तो ये दोनों बैल मस्त टहलते हुए सिग्नल की तरफ़ निकल गए।
बैलों की हरकतों से तो ऐसा महसूस हुआ कि जैसे इन्हें ट्रेन में बैठकर फ़ौरन दिल्ली जाना है और वहाँ जाकर पशुओं को लेकर बनाई जा रही नीति के सिलसिले में कोई ज्ञापन देना है।

बुधवार, मई 24

वाट्सएप ग्रुप “समस्या_क्या हैं” ने दिया शान्ति को आसरा


गिरीश बिल्लोरे “मुकुल”

पिछले सप्ताह इंदौर प्रवास के दौरान मुझे ऐसे युवकों से मिलाने का अवसर मिला जो अपने काम के साथ साथ लोक सेवी भी हैं परन्तु प्रचार प्रसार से दूर रहते हैं .   इंदौर  में नार्मदेय समाज के  युवा वाट्सएप पर एक  ग्रुप   “समस्या_क्या हैं” नाम से चलाते हैं . इस ग्रुप के युवा यश पाराशर को मित्र



मित्र
  के अमित शिकरवार  जी के माध्यम से सूचना मिली कि कोई  एक 80 वर्ष की बुजुर्ग महिला जिनको उनके बच्चो ने घर से निकाल दिया है और अब वह बुजुर्ग महिला रेलवे स्टेशन पर रहकर एवं मंदिर मंदिर से भीख मांगकर अपना गुजरा कर रही हे और वह बहुत पीड़ित भी है उनके पास रहने के लिए कोई सहारा नहीं है .. ।
इस जानकारी मिलते ही   यश पाराशर अपने मित्र रोहित त्रिवेदी के सहयोग से   बुजुर्ग महिला को अपनी स्कूटी से लेने गए और उन्हें स्कूटी पर बैठाकर आपने साथ लेकर नार्मदीय ब्राह्मणों द्वारा संचालित  श्रीराम निराश्रित बृद्धाश्रम में रहने की व्यवस्था की.
 श्रीमती  शांति बाई नामक इन बुजुर्ग महिला को  उनके बच्चे उन्हें बहुत प्रताड़ित थे तथा उन्हें उन बच्चों ने घर से निकाल तक निकाल दिया  दिया ! 
 यश पाराशर ने बताया कि उनका संगठन नार्मदेय युवा संगठन के नाम से लोक सेवा का कार्य करता है जिसे वे   एनडीवायएस नाम से संबोधित करते हैं . इंदौर जैसे शहर में  किसी को भी कही कोई बृद्ध बेसहारा पीड़ित व्यक्ति परेशानी में मिले तो उनके हैल्प लाइन नंबर    पर  तुरत संपर्क करे का अनुरोध करते हुए यश पाराशर ने श्रीराम निराश्रित  वृद्धाश्रम का हैल्प लाइन नंबर 09755550555  देते   कहा कि मेरा नाम बताए बिना आप  इस सन्देश को अधिक से अधिक शेयर करे ताकि किसी बेसहारा को सहारा मिल सके । परन्तु यश सहित ऐसे सभी युवाओं का कायल हो जाना स्वाभाविक है जो लोक कल्याण का काम बिना किसी स्वार्थ के करते हैं





बुधवार, मई 17

न तो हमको दुनिया को पढ़ने की तमीज है और न ही टेक्स्ट को ही ..!”

एक चैनल  ने कहा चीलों को बूचड़खानों में खाने का इंतज़ार रहा. बूचड़खानों को बरसों से लायसेंस का इंतज़ार था. मिल जाते तो ? चील भूखे न रहते अवैध बूचड़खाने बंद न होते  ... 
बूचड़खानों को वैध करने की ज़िम्मेदारी और गलती  किसकी थी. शायद कुरैशी साहब की जो बेचारे सरकारी दफ्तर में बूचड़खाने को लायसेंस दिलाने चक्कर काट रहे थे...और सरफिरी व्यवस्था ने उनको तब पराजित कर दिया होगा..?
काम कराने के लिए हम क्यों आज भी नियमों से जकड़ दिए जातें हैं . कुछ दिनों से एक इंटरनेट के लल्लनटॉप चैनल के ज़रिये  न्यूज़ मिल रही है कि गरीबों के लिए  राशनकार्ड बनवा लेना उत्तर-प्रदेश में आसान नहीं है..! ......... दुःख होता है.. दोष इसे दें हम सब कितने खुद परस्त हैं कि अकिंचन के भी काम न आ पाते हैं ... दोष देते हैं.. सरकारों पर जो अफसर, क्लर्क, चपरासी के लिबास में हम ही चलातें हैं. क्यों हम इतने गैर ज़िम्मेदार हैं.    
आप सब  तो जानतें ही हैं कि रागदरबारी समकालीन सिस्टम का अहम सबूती दस्तावेज है.. स्व. श्रीलाल शुक्ल जी ने खुद अफसर होने के बावजूद सिस्टम की विद्रूपता को सामने लाकर आत्मचिंतन को बाध्य किया... !
कल कविता दिवस पर बच्चों  से वार्ता के दौरान हमने बताया था कि- “जिस तरह लोग साहित्य को पढ़ रहे हैं वो तरीका ठीक नहीं. आज एक और एहसास हुआ जिस तरह लोग सथियों को पढ़ रहे हैं आजकल वो भी तरीका ठीक नहीं ?”
तो फिर ठीक क्या है.. ठीक जो है वो ये कि हम अपनी अध्ययनशीलता को तमीज़दार बनाएं. चाहे वो किताब पढ़ने का मुद्दा हो या दुनिया के कारोबार का. दौनों  को पढ़ने का सलीका आना चाहिए.
दुनिया भर के खुशहाल देशों की आज एक लिस्ट जारी हुई जिसमें भारत को शोधकर्ताओं नें 117वें स्थान पर रखा है. रखना लाजिमी है... जब आम और  ख़ासवर्ग दोनों की समझदारी तेल लेने बाज़ार गई हो नौ मन तेल ज़रूरी है खुशियाली की राधा जी तभी न नाचेंगी...अब खरीददार ही कन्फ्यूज़ है तो तेल खरीदा भी न जाएगा न राधा जी नाचेंगी ये तय है.
“...........ऐसा क्यों..?
भाई ऐसा इसलिए क्योंकि न तो हमको  दुनिया को पढ़ने की तमीज है और न ही टेक्स्ट को ही ..!
आप यह दावा कैसे कर सकतें हैं ...?”
भाई हम ठहरे दो कौड़ी के लेखक .. हम तो कुछ भी कह सकतें हैं. अरे जब नेता जी की जुबां पर लगाम नहीं टीवी पर चिकल्लस करने वालों में तहजीब नहीं तो हम और क्या लिखें अच्छा लिखेंगे तो आप हमको बैकवर्ड कहोगे अच्छा आपको पढ़ना नहीं अब बताओ भैया कल एक मोहतरमा ने फेसबुक पर बलात्कार के के खिलाफ ऐसी पोस्ट लिखी जैसे वे किसी विजय वृत्तांत का विश्लेषण कर रहीं हों..उनके लिखने का मकसद अधिकतम पाठक जुटाना था न कि समाज को सुधार लाने के लिए उनकी कलम चली.
अब बताओ एनडीटीवी वालों ने अवैध  बूचड़खाने को चीलों की भूख से जोड़ा तो कौन सा गलत किया. प्रजातंत्र है सीधे को उलटा साबित करो फिर जब दुनिया दूसरे मुद्दों पर विचार करने लगे तो उस उलटे को सीधा साबित कर दो. यानी विक्रम का मुंह खुलवाओ और फुर्र से वैताल सरीखे आकाश मार्ग से जा लटको किसी पेड़ पर.
पांच साल तक उलटे लटके रहो फिर विक्रम आएगा..  तब तुम उसका मुंह खुलवाना वो बोला कि तुमको उलटे लटकने का शौक पूरा करने का मौका मिल जाएगा.. 
मुद्दा ये नहीं कि हम किसी डेमोक्रेटिक सिस्टम में कोई समस्या है मुद्दा तो ये है कि हम सिस्टम को खुद पढ़ रहे हैं या कोई हमको पढ़वा रहा है. डेमोक्रेटिक सिस्टम को अगर हम पढ़ ही रहें हैं तो हमारे अध्ययन का तरीका क्या है..?
टी वी पर चैनल्स पर  रोज बहुत तीखी बहसें हमें पढ़ा रहीं हैं.. हम असहाय से उसे ही पढ़ रहे हैं . हमारे पास न तो आर्थिक चिंतन हैं न ही सामाजिक सोच....... चंद  जुमले याद हैं जो वाट्सएप से फेसबुक से मिले हैं फिर शाम को टीवी चैनल्स का शास्त्रार्थ ............! 

मौलिकता हम से दूर है शायद जुमलों ट्वीटस - के सहारे हम राय बनाते हैं. हम सोचते हैं हम सही है पर आत्म चिंतन के लिए न तो हम तैयार हैं न ही हम अब उस लायक रह गए हैं. इसकी एक वज़ह है की हममें ज्ञान अर्जन की तमीज नहीं न तो हम टेक्स पढ़ पाते हैं.... और न ही स्थिति पढने की तमीज है.. मुझे भय है कि कहीं ऐसा न हो हम चेहरा बांचना भूल जाएं