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फ़रवरी, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

एक साथी एक सपना ...!!

एक साथी एक सपना साथ ले हौसले संग भीड़ से संवाद के । ००००० हम चलें हैं हम चलेगे रोक सकते हों तो रोको हथेली से तीर थामा क्या मिलेगा मीत सोचो । शब्द के ये सहज अनुनाद .. से .....!! ०००००० मन को तापस बना देने, लेके इक तारा चलूँ । फर्क क्या होगा जो मैं जीता या हारा चलूँ ......? चकित हों शायद मेरे संवाद ... से ......!! ०००००० चलो अपनी एक अंगुल वेदना हम भूल जाएं. वो दु:खी है,संवेदना का, गीत उसको सुना आएं कोई टूटे न कभी संताप से ......!!

सर्वहारा के बारे में सोचने की सनद और मेरा वो दोस्त

साभार:  बारिश की खुशबू                   जी,सवाल सीधा सपाट उन लोंगों से है जिनके लिये जन-चिंतन वाग्विलास का साधन है. इस विषय को लेकर आप बस एक हुंकार भरिये और भीड़ से अलग थलग दिखिये इससे ज़्यादा इनकी और कोई मंशा नहीं. एक मित्र याद है कमसिनी ही कहूंगा कालेज के दौर की उम्र को जनवाद भाया सो वह मित्र मुझसे मिला. आकर्षित होना लाज़मी था एक आईकान की तलाश जो थी मुझे और उसकी बातों में वक्तव्यों में लय थी, कोई बात किसी दूसरी बात के बीच असंगत न लगती थी. बेहतरीन कविता लिखता था . उस समय वो क्षेत्रीय राजनैतिक दलों की परिस्थितियां देख रहा था. जब   केवल दो पार्टी का बोलबाला था और आपतकाल के बाद सब जुड़े एक हुए थे .भारतीय सत्ता पर काबिज़ हुए थे. जीं हां, तभी की बात कर रहा हूं जब राजनारायण ने गुड़ चना खाने की सलाह दी थी . मेरा वो मित्र उस समय आज़ की स्थितियों का बयान कर रहा था. उसके वक्तव्य आम आदमी से इतना क़रीब होते कि मन कहता बस “इस युवक में ही भारत बसता है.”         गंजीपुरा के साहू मोहल्ले वाली गली में हम लोग रूपनारायण जी के किराएदार थे. आगे बनी एक बिल्डिंग में मेरा

अंतरजालिया-साहित्य को कोसने का दौर

  इसे देखिये क्या यह साहित्यिक पत्रिका नहीं है जो अब आन लाइन है  कादम्बिनी अब बांचिये यह आलेख                      इन दिनों अंतरजालिया-साहित्य और उसके लेखक,लेखिकाओं के खिलाफ़ ठीक उसी तरह का वातावरण बनाते हुए नज़र आ रहे हैं जैसा मुहल्ले की कामवाली-बाईयां उन घरों  की चुगलियां अन्य घरों तक नकारात्मक भाव से किन्तु तेज़ गति से प्रसारित करतीं हैं.यह खबर हम सबके लिये बहुत नुकसान देह नहीं. इससे लोगों तक हिंदी साहित्य नेट पर लाने की कोशिशें जारी होने की खबर हासिल हो गई है.         जब हम ने उनमे से एक सज्जन से बात करनी चाही तो वो बोले-“आप कौन..?” मैं:-“सर,इस नाचीज़ को गिरीश बिल्लोरे कहतें हैं” वे:-“हर चीज़ में ना लगाना ज़रूरी है क्या ?”          गोया, हज़ूर हमें हमें पहचान गये कि हम कोई “चीज़ हैं” हमने इस सवाल का ज़वाब न देते हुए कहा - आपका वेबकास्ट इंटरव्यू लेना चाहता हूं..! वे:-“आप प्रश्नावली भेज दें में वीडियो भेज दूंगा ” मैं:- :-“हज़ूर,आपका वीडियो मेरे प्रसारण के लिये उपयुक्त नहीं यह लाईव ही रेकार्ड होता है ”   मेरे हज़ूर,सर आद

"कौआ ,चील ,गदहा ,बिल्ली ,कुत्ते

 एक सरकारी बना "बहुत  असरकारी"   होशियार था कौए की तरह   और जा बैठा वहीं जहां अक्सर  होशियार कौआ बैठता है.!! *************************                                                                  चील:-  चीखती चील ने  मुर्दाखोर साथियों को पुकारा एक बेबस जीवित देह  नौंचने    सच है घायल होना सबसे बड़ा अपराध है.  मित्र मेरे, बीते पलों का  यही एहसास आज़ मेरे  तो कल तुम्हारे साथ है. **************************** गधा  जो अचानक रैंकने लगता है  सड़क पर मुहल्ले के नुक्कड़ पर लगता है कि :- "मैं अपने दफ़्तर आ गया ?" वहां जहां मैं और मेरा गधा  एक ही सिक्के  के दो पहलू हैं. मुझे इसी लिये प्रिय है मेरा गधा.. सर्वथा मेरा अपना "अंतरंग-मित्र " ***************************** बिल्ली सुना है बिल्लियों का भाग से भरोसा  उठ गया ! बताओ दोस्त क्यों है ये मंज़र नया ? जी सही  अब आदमी छीकें तोड़ रहें हैं ***************************** कुत्ते पर इंसानी नस्ल का रंगत   चढ़ गई ये जानकर अ

तोता बोला मैना मौन ?

एक बाल गीत पेश है इस गीत में श्लेष-अलंकार का अनुप्रयोग है       तोता बोला मैं न  मौन , बात मेरी बूझेगा कौन ? ************** एक अनजाना एक अनजानी राह पकड़ के चला गया कैसे नाचे ठुमुक   बंदरिया   बंदर   लड़   के    चला गया        अपना    ही   जब   रूठा   हो   तो   औरों   से जूझेगा कौन ?                                          तोता बोला मैं न  मौन , बात मेरी बूझेगा कौन ? ************** बूढ़े   बंदर   ने    समझाया   काहे    बंदरिया   रोती   है देह से छोटी होय चदरिया , किचकिच हर घर होती है       मनातपा   ले   आ   घर   पर ,  बिन जोड़ी पूछेगा कौन ?                                  तोता बोला मैं न  मौन , बात मेरी बूझेगा कौन ? **************

होली तो ससुराल की बाक़ी सब बेनूर सरहज मिश्री की डली,साला पिंड खजूर

होली तो ससुराल की बाक़ी सब बेनूर सरहज मिश्री की डली,साला पिंड खजूर साला पिंड-खजूर,ससुर जी ऐंचकताने साली के अंदाज़ फोन पे लगे लुभाने कहें मुकुल कवि होली पे जनकपुर जाओ जीवन में इक बार,स्वर्ग का सुख पाओ..!! ######### होली तो ससुराल की बाक़ी सब बेनूर न्योता पा हम पहुंच गए मन में संग लंगूर, मन में संग लंगूर,लख साली की उमरिया मन में उठे विचार,चलॆ लें नयी बंदरिया . कहत मुकुल कविराय नए कानून हैं आए दो होली में झौंक, सोच जो ऐसी आए ...!! ######### होली तो ससुराल की ,बाक़ी सब बेनूर देवर रस के देवता, जेठ नशे में चूर, जेठ नशे में चूर जेठानी ठुमुक बंदरिया ननदी उमर छुपाए कहे मोरी बाली उमरिया . कहें मुकुल कवि सास हमारी पहरेदारिन ससुर “देव के दूत” जे उनकी पनिहारिन..!! ######### सुन प्रिय मन तो बावरा, कछु सोचे कछु गाए, इक-दूजे के रंग में हम-तुम अब रंग जाएं . हम-तुम अब रंग जाएं,फाग में साथ रहेंगे प्रीत रंग में भीग अबीरी फाग कहेंगे ..! कहें मुकुल कविराय होली घर में मनाओ मंहगे हैं त्यौहार इधर-उधर न जाओ !!

ब्लॉग प्रहरी : एग्रीगेटर के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ

  ब्लॉगप्रहरी डॉट कॉम .              आपके सभी सवाल यहीं खत्म होते हैं. ब्लॉगप्रहरी वह व्यापक परिकल्पना है , जिसने अब तक के सभी अनुत्तरित सवालों को सुलझा दिया है. यह कोई अवतार नहीं है , यह कोई थोपा गया और प्रचारित-प्रसारित व् सुनियोजित पहल नहीं है. यह प्राकृतिक तरीके से विकास को अपनाते हुए आज रणक्षेत्र में खड़े उस योद्धा जैसा है , जिसके माथे पर कोई शिकन का भाव नहीं. क्योंकि इस विकास की पराकाष्ठा को इसके उत्पति के समय ही भांप लिया गया था. आज ब्लॉगजगत उस लंबे इंतजार से बाहर आकार खड़ा है , जब उसे आवश्यकता थी एक साझा मंच की. जब एग्रीगेटर के भूमिका पर ही सवाल उठने लगे और तमाम बड़े एग्रीगेटरों   ने अपनी सेवाएं समाप्त कर लीं कारण जो भी हों.                और शायद एग्रीगेटर अपनी सुविधाओं और दृष्टि को वह विस्तार नहीं दे पाए , जिसकी आवश्यकता समय ने पैदा कर दी थी. ऐसे में ब्लॉगप्रहरी पुनः सक्रिय हुआ और आज उसे देखा तो पाया कि उसने वह कर दिखाया , जिसके लिए वह चर्चा में आया था. मिसफ़िट : एक एग्रीगेटर के तौर पर ब्लॉगप्रहरी क्या सुविधा दे  रहा है …? ब्लाग प्रहरी : आपके ब्लॉग पोस्ट के लिंक का तु