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सितंबर, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

"पश्चाताप : आत्म-कथ्य"

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र वीजा जी के इस बात से "सौ फ़ीसदी सहमत हूं. l"और घरेलू हिंसा के सम्दर्भ में इन प्रयासों को गम्भीरता से लेना चाहिये.मुझे इस बात को एक व्यक्तिगत घटना के ज़रिये बताना इस लिये ज़रूरी है कि इस अपराध बोध को लेकर शायद मैं और अधिक आगे नहीं जा सकता. मेरे विवाह के कुछ ही महीने व्यतीत हुए थे . मेरी पत्नी कालेज से निकली लड़की अक्सर मेरी पसंद की सब्जी नहीं बना पाती थीं. जबकि मेरे दिमाग़ में परम्परागत अवधारणा थी पत्नी सर्व गुण सम्पूर्ण होनी चाहिये. यद्यपि मेरे परिवार को परम्परागत अवधारणा पसंद न थी किंतु आफ़िस में धर्मेंद्र जैन का लंच बाक्स देख कर मुझे हूक सी उठती अक्सर हम लोग साथ साथ खाना खाते . मन में छिपी कुण्ठा ने एक शाम उग्र रूप ले ही लिया. घर आकर अपने कमरे में पत्नी को कठोर शब्दों (अश्लील नहीं ) का प्रयोग किये. लंच ना लेने का कारण पूछने पर मैंने उनसे एक शब्द खुले तौर पर कह दिया :-"मां-बाप ने संस्कार ही ऐसे दिये हैं तुममें पति के लिये भोजन बनाने का सामर्थ्य नहीं ?" किसी नवोढ़ा को सब मंज़ूर होता है किंतु उसके मां-बाप का तिरस्कार कदापि नहीं. बस क्या था बहस शुरु.और बहस के तीखे होत

"एक मुलाकात, एक फ़ैसला"

नमस्कार र्मै अर्चना चावजी मिसफ़िट-सीधीबात पर आप सभी का स्वागत करती हूँ, आइये आज आपकी मुलाकात जिस ब्लॉगर से करवा रही हूँ सुनिए उन्हीं की एक रचना उन्हीं की आवाज में --- मै आभारी हूँ रचना बजाज जी की जिन्होंने मिसफ़िट-सीधीबात के लिए अपना अमूल्य समय दिया। रचना जी का ब्लाग " मुझे भी कुछ कहना है "की ब्लागर रचना बजाज…मूलत: मध्यप्रदेश की हैं. अभी नासिक (महा.) मे रहती हैं. जीवन के उतार चड़ाव के बीच दुनिया भर के दर्द को समझने और शब्दों में उतारने वाली रचना जी की लेखनी की बानगी पेश है... रोटी -२ रोटी -२ इसलिये कि एक बार पहले भी मै रोटी की बात कर चुकी हूं…. आज फ़िर करना पड़ रही है…… बात वही पुरानी है, गरीबों की कहानी है, मुझे तो बस दोहरानी है.. इन दिनो दुनिया भर मे भारत के विकास की तूती बोलती है, लेकिन देश के गरीबों की हालत हमारी पोल खोलती है…. विकास के लिये हमारे देश का मजदूर वर्ग अपना पसीना बहाता है, लेकिन देश का विकास उसे छुए बगैर, दूर से निकल जाता है… भारत आजादी के बाद हर क्षेत्र मे आगे बढ़ा है, लेकिन उसका गरीब आदमी अब भी जहां का तहां खडा है….ं हमारे देश मे अमीरी और गरीबी क

एक प्रेरणादायक प्रसंग--महेन्द्र मिश्र जी के ब्लॉग से

सुनिये महेन्द्र मिश्र  जी के ब्लॉग समयचक्र से एक प्रेरणादायक प्रसंग--- एक निवेदन यहाँ भी 

एक मुलाक़ात प्रशांत श्रीवास्तव के साथ

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''मिसफ़िट : सीधीबात पर पिछले दिनों आपने प्रशांत श्रीवास्तव की ग़ज़ल देखी और प्रशांत भाई को दुलारा मैं आपका आभारी हूं, आज प्रशांत भाई आपसे मुलाक़ात के लिये हाज़िर हैं  पेशे-ख़िदमत प्रशांत भाई का इन्टरव्यू यू-ट्यूब के ज़रिये (भाग एक=यूट्यूब पर सीधे देखने क्लिक कीजिये " इधर " (भाग दो :"यू ट्यूब पर देखने इधर क्लिक कीजिये" और एक मधुर गीत सुनना चाहें तो बाकी सब आल इस वेल

प्रशांत श्रीवास्तव शानू की ग़ज़ल

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                   मेरे अज़ीज़ मित्र इस वक़्त मध्य-प्रदेश सरकार के राजस्व महक़मे में तहसीलदार का ओहदा रखते हैं. तमाम सरकारी कामकाज़ के साथ हज़ूर के दिल में छिपा शायर नोट शीट, आर्डरशीट से इतर बहुत उम्दा काम ये कर रहें हैं कि अपने दिल में बसे शायर को सरकारी मसरूफ़ियत का हवाला देकर रुलाते नहीं. बाक़ायदा ग़ज़ल लिखते हैं. मौज़ूदा हालातों से जुड़े रहतें हैं.  रौबदार विभाग के  नाजुक़ ख्याल अफ़सर की ग़ज़ल की बानगी नीचे स्कैन कर पेश है. पसंद आयेगी ज़रूर मुझे यक़ीन है. कौमी एकता के इर्दर्गिर्द  घूमते विचारों को करीने से संजोता है शायर प्रशांत और बुन लेता है एक गज़ल 

मुन्डी भेजो मुंडी

मनीष भाई के भेजे गए एस एम एस वाकई बेहद मजेदार होते होते हैं नमूना देखिये :- एक अपहर्ता ने श्रीमति ”क” का अपहरण कर पति श्री ख को उसकी अंगुलि के एक हिस्से के साथ संदेश भेजा-”मैने तुम्हारी बीवी का अपहरण किया है बतौर प्रूफ़ अंगुली भेज रहा हूं बीवी को ज़िन्दा ज़िन्दा चाहते हो तो पचास लाख भेजो ”पति ने तुरंत उसी पते पे उत्तर भेजा :”इस सबूत से  प्रूफ़ नही होता कि वो मेरी ही पत्नी की अंगुली है कोई बड़ा प्रूफ़ भेजो भाई ..... मुन्डी भेजो मुंडी  ” आप भी चाहें तो भेज सकतें है क्या कोई जोक याद नहीं ? कोई बात नहीं इधर जाएँ => "JOKS"

इलैक्ट्रानिक मीडिया को आत्म नियंत्रित होना ही होगा

  मीडिया को आत्म नियंत्रित होना होगा     भारतीय संविधान पर आस्था रखने वाले निर्णय से अविचलित होंगे     सायबर कैफ़े पर सतत निगरानी ज़रूरी     अवांछित/संदिग्ध गतिविधियों सूचना देने पुलिस को अवश्य दी जावे     किसी भी उकसाउ भड़काउ बयान बाज़ी से बचिये ( विस्तार- से इधर देखिये )

अरे दिमाग पे असर कैसे होगा तुम्हारे दौनो कानों की घुटने से दूरी नापी कभी ?

हरिवंशराय जी के पोते हैं जो कहेंगे वो हम सुनेंगे बोलते हैं अब बोलने के लिये किसी भाषा की ज़रूरत नहीं "What an idea sir ji...!!"  इस बिन्दु पर मन में विचार चल रहा था कि अचानक एक अज़नवी मेरे एन सामने आ खड़ा हुआ बोलने लगा तुमाए मन की बात का खुलासा कर दूं...? मुझे लगा परम ज्ञानी की परीक्षा क्यों न लूं सो हां कर दी  वो बोला :- सेलवा के एड की बात सोचत हौ न बाबू...? हां लोग काहे इन झूठी बात को मानत ह्वें  दादू....? इ झुट्टा ह्वै ... कम्पनी जुट्ठी ह्वे हामाए फ़ोनवा का मीटर ऐसने घूमत है कि बस बिना बात कै ४०० सौ रुपिया ज़ादा का बिल थमा देवत है कम्पनी ? दादू बोला :- मूरुख ब्लागर उही तो वो बोलत ह्वै...? वो चेतावनी दैके समझा रहा है  कम्पनी का फ़ण्डा ''अब बोलने के लिये किसी भाषा की ज़रूरत नहीं समझे बिना बोले का पैसा लगेगागुरु '' हम चकरा गये कि कित्ती दूर से दादू कौड़ी लाया होगा सो हमने पूछा :- दादू, आप ओकर हर बात मानत  हौ ... हम उसकी का उसके बाप दादा सबकी मानत हैं मधुशाला से शराबी तक दादू ने ये कहते हुए कांधे पे टंगे खादी के झुल्ले से बाटल निकाली और पूछा:- पियोगे..? ”न..” न सुनते

ललित जी का पिटारा खुल गया और हम सी एम साब से न बतिया पाए

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शाम के अखबार के आन लाइन एडीसन  पी डी एफ़ हो  अथवा सरकारी  वेब साईट या पाबला भैया का ब्लाग आज़ सिर्फ़ ललित शर्मा जी के हिन्दी पोर्टल पर ही चर्चिया रहे है. खबर तो हम भी बज़्ज़ पे छैप दिये थे पर लगा दादा नाराज़ हो गये तो हमारे थोबड़े का शिल्प कर्म न कर दें कहीं. पर  भैया  ऐसे  नहीं  हैं  मेरे  मित्र                                                     इधर से रास्ता है जी तीन भागों में विभक्त पोर्टल का कलेवर सामान्य एवम ललित भाई की मनोभावनाओं को उजागर कर रहा है . हिन्दी का यह पोर्टल किसी फ़ैंटेसी को नहीं जन्मता बल्कि सामान्य सी बातों को आगे लाने की कोशिश करता है जो अनदेखी किंतु ज़रूरी है Home शुभेच्छु आमुख  एक राज़ की बात बताऊं गूगल खोज सन्दूक में यह तीसरे स्थान पर है जबकि इसका उदघाटन अभी कुछ घण्टों पहले हुआ है.  ललित भाई कहते हैं  ”भाई आज़ फ़ोन काहे बन्द था ?” मैं:- ”असल में कोर्ट में

हां सोचती तो है कभी कभार छै: बरस की थी तब वो भी तो बन गई थी दुलहनियां

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एक किताब सखी  के साथ बांचती बिटिया पीछे से दादी देखती है गौर से बिटिया को लगभग पढ़ती है टकटकी लगाये उनको देखती कभी पराई हो जाने का भाव तो कभी कन्यादान के ज़रिये पुण्य कमाने के लिये मन में उसके बड़े हो जाने का इंतज़ार भी तो कर रही है ? इसके आगे और क्या सोच सकती है मां हां सोचती तो है कभी कभार छै: बरस की थी तब वो भी तो बन गई थी दुलहनियां तेरह की थी तो गरभ में कल्लू आ गया था बाद वाली चार मरी संतानें भी गिन रही है कुल आठ औलादों की जननी पौत्रियों के बारे में खूब सोचती हैं दादियां उसकी ज़ल्द शादी के सपने पर ख़त्म हो जाती है ये सोच

फ़ुल टाईम माँ----

जन्माष्टमी ,राधाष्टमी ......दिन विशेष की जरूरत नहीं ..........एक बार हम भी पुकार ही लें---  इसे पढ़िये यहाँ---

एक निवेदन महेन्द्र मिश्र जी का...............

आज किसी परिचय की जरूरत नहीं है ...बस एक पोस्ट सबको सुनानी है ...... पल-पल मंजिलों की ओर ...

युनुस ज़ादु के साथ जबलपुर में

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मशहूर उदघोषक युनुस खान इन दिनों अपने परिवार के साथ जबलपुर में पधारे हैं . आनन फ़ानन में जो किया जाना है वो कल शाम तक ही तो हो पाएगा जो भी होगा वो उसका नाम  ”काफ़ी विद युनुस” का आयोजन सोचा है.... देखिये कितना और क्या हो पाता है फ़िलहाल एक ब्लागर्स मीट होना तय है. जबलपुर के ब्लागर मित्रों स्थान की सूचना अतिशीघ्र एस०एम०एस० से दी जावेगी . मित्रो मेरे सेल फ़ोन में खराबी के कारण फ़ोनबुक से डाटा गायब हो गया है... आपसे अनुरोध है कि सारे मित्र मेरे इन सेल नम्बर्स पर अपना फ़ोन नम्बर भेजें =>9926471072 अथवा 9479756905 युनुस जी के साथ जादू और उनकी शरीके हयात ममता जी से मिलने सभी इच्छुक हैं ईद और गणेश पर्व पर इस दम्पत्ति से मिलना एक सुखद एहसास होगा हम सबके लिये युनुस आरकुट पर और इधर भी  Blogger (Blogspot) - radiovani Blogger (Blogspot) - tarang-yunus रेडियोनामा radionama Blogger (Blogspot) - doosrapanna

केवल हिन्दुस्तान के हक़ में दुआ कीजिये

क्षमा कीजिये आज यहां चुगली के सन्दर्भ में पोस्ट लगानी थी किंतु ईद के अवसर पर ये पोस्ट ज़रूरी है..भारत ब्रिगेड से इसे मिसफिट पर लाया जावे अत: आलेख की पुन: प्रस्तुति कर रहा हूं... अब्दुल और पंडित दीनानाथ के बीच की दोस्ती इत्ती पक़्की है कि उसे अलग करना किसी कौमी फ़सादी के बस की बात नहीं. सब कुछ गोया उसके अल्लाह इसके भगवान ने तय कर दिया हो.  अब्दुल्ल की अम्मी की देह में कैन्सर के जीवाणु का बसेरा है उधर दीनानाथ भी अपनी अभाव ग्रस्त ज़िन्दगी से जूझ रहा था. वे दौनों ही एक पेड़ के नीचे बैठे आपसी चर्चा कर रहे थे कि  अचानक उन पर आकाश की सैर कर रहे  फ़रिश्ते और देवदूत की नज़र पड़ी .दौनों कौतुहल वश पेड़ की शाखा पे बैठ के मित्रों की बातें सुनने लगे. फ़रिश्ता जो अल्लाह का भेजा हुआ था सबसे पहले   प्रगट होकर  अब्दुल्ल से कहता है:- सुनो, तुम आज़ मस्ज़िद में जाकर जो दुआ करोगे कुबूल हो . अब्दुल बोला :- फ़रिश्ते, मेरे दोस्त के लिये भी...! फ़रिश्ता उस बात को सुने बिना ग़ायब हो गया. तभी देवदूत प्रगट हुआ उसने दीनानाथ से कहा:- दु:खी इंसान, आज़ तुम जो मंदिर की मूरत से मांगोगे वो होना अटल है...! अनोखे एहसास लेकर

"दुश्मनों के लिये आज़ दिल से दुआ करता हूं....!"

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सोचता हूं कि अब लिखूं ज़्यादा और उससे से भी ज़्यादा सोचूं .....?  सच कितना अच्छा लगता है जब किसी को धीरज से सुनता हूं. आत्मबल बढ़ता है. और जब किसी को पढ़्ता हूं तो लगता है खुद को गढ़ता हूं. एक  पकवान के पकने की महक सा लगता है तब ....और जब  किसी के चिंतन से रास्ता सूझता है...तब उगता है साहस का ...दृढ़ता का सूरज मन के कोने में से और फ़िर यकायक  छा जाता है प्रकाश मन के भीतर वाले गहन तिमिर युक्त बयाबान में.... ?  ऐसा एहसास किया है आपने कभी ..! किया तो ज़रूर होगा जैसा मैं सोच रहा हूं उससे भी उम्दा आप  सोचते हो है न........? यानी अच्छे से भी अच्छा ही होना चाहिये सदा. अच्छे से भी अच्छा क्या हो यह चिंतन ज़रूरी है. वे पांव वक़्त के नमाज़ी है, ये त्रिसंध्या के लिये प्रतिबद्ध हैं, वो कठोर तपस्वी हैं इन धर्माचरणों का क्या अर्थ निकलता है तब जब हम केवल स्वयम के बारे में सोचते हैं. उसने पूरा दिन दिलों को छलनी करने में गुज़ारा... और तीस दिनी रोज़ेदारी की भी तो किस तरह और क्यों अल्लाह कुबूल करेंगें सदा षड़यंत्र करने वाला मेरे उस मित्र को अगले रमज़ान तक पाक़ीज़गी से सराबोर कर देना या रब .ताकि उसके रोज़े अगली रमज़ान कुब

किसी ने किसी को नहीं सुना दुनिया की सबसे लम्बी चैटिंग में

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आज़ एक प्रयोग किया मैने अर्चना चाओजी से बात कर रहा था कि लगा इंदू ताई को भी बुलवां के टीचर्स डे मना लिया जावे फ़िरसोचाऔर लोगों  को जोड़ूं सो बस चैट चालू आपने indu को इस चैट के लिए आमंत्रित किया है.  यह अब एक समूह चैट है. एक अन्य व्यक्ति जोड़ें  archana chaoji शामिल हो गए हैं.  indu puri goswami शामिल हो गए हैं. मैं:  इन्दु ताइ भी साथ में है archana:  जी नमस्ते indu:  नमस्ते मैं:  ताइ को पहचानती हैं न आप indu:  कैसी हैं आप? archana:  जी नमस्ते ठीक हू indu:  कहाँ से हैं? मैं:  इनकी मज़ेदार बात सुनिये दौनो टीचर जी का अभिवादन indu:  क्या जॉब में हैं? archana:  इन्दौर indu:  हा हा हा archana:  स्पोर्ट्स टीचर ह्म्म्म्म्म्म्म indu:  अर्चना जी भी टीचर? मैं:  शिक्षक-दिवस है नाज़ indu:  बाप रे! मैं:  है दौनो पर archana:  अब गिरीश जी का शुक्रिया...... indu:  ज्यादा ऊंची न दो गिरीश archana:  शिक्शक दिवस पर इन्दुजी से मिलवाने के लिए indu:  खूब मिसयूज किया  सबने ताचर्स का मैं:  ताई को सम्मानित किया है आज़ जेन्ट्स क्लब ने indu:  इंसानों से लेके पशु तक गिनवा लिए archana:  वाह ....बधाई indu:  ओह टीचर्स का