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नवंबर, 2008 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

आ मीत लौट चलें

आ ओ मीत लौट चलें गीत को सुधार लें वक़्त अर्चना का है -आ आरती संवार लें । भूल हो गई कोई गीत में कि छंद में या हुआ तनाव कोई , आपसी प्रबंध में भूल उसे मीत मेरे सलीके से सुधार लें ! छंद का प्रबंध मीत ,अर्चना के पूर्व हो समेटी सुरों का अनुनाद भी अपूर्व हो, अपनी एकता को रेणु-तक प्रसार दें । राग-द्वेष,जातियाँ , मानव का भेद-भाव भूल के बुलाएं पार जाने एक नाव ! शब्द-ध्वनि-संकेत सभी आज ही सुधार लें ! इस गीत में सच आज जो बात कहनी चाही थी कौन सुनता इस गीत का संदेश खो गया था कुछ ने वाह वाह करके मेरी आवाज़ भुला दी कुछ अर्थ खोजते रहे फ़िर निरर्थक समझ के छोड़ दिया . कुछ के लिए तो फिजूल था कवि । मेरी यानी कवि की आत्मा को मारने वालो "तुम समझो देश तुम्हारे लिए खिलौना कतई न बने इस बात का तमीज इस भारत नें सीख लिया है " आज मैं एक सूची जारी करना चाहता हूँ :- इसे स्वीकारना ही होगा भारत में कोई भी व्यक्ति या समुदाय किसी भी स्थिति में जाति, धर्म,भाषा,क्षेत्र के आधार पर बात करे उसका बहिष्कार कीजिए । लच्छेदार बातों से गुमराह न हों । कानूनों को जेबी घड़ी बनाके चलने वालों को सबक सिखाएं ख़ुद भी भारत के संविधा

शनिचरी - निठल्ले के साथ चिट्ठो का चिट्ठा

" शनिचरी" :- सुबह संदेशा भर लाई कि महाशक्ति समूह की चिंता को पाठकों स्पर्श न करना सिद्ध कर गया समंदर की हवाएं अब तरो-ताज़ा नहीं करतीं. हैं किंतु कोई यदि ये कहे कि - सर्द मौसम... और तुम्हारी यादें... तो बाक़ी मौसमों में क्या करतें हैं जी ? हाँ शायद “ इंतजार ” कर रहें होंगे इस मौसम का . युवाओं में विवाह के प्रति बढ़ती अनास्था की समस्या को देखते हुए सबकी चिंता जायज़ है न इसी लिए तो समाचार मिलता है कि - “ दो वर्ष में तीस हजार युवाओं को मिलेगा रोजगार ? अच्छी खबरिया ले आएं हैं इसे पड़कर . कुंवारी बेटी के बाप दूसरे समाचार से प्रभावित है . सभी कहतें है सूर्य उदय हो गया है . जयश्री का ब्लॉग सच देखने काबिल है फ़ैमिली डॉक्टर की ज़रूरत है कबाड़खाने को . सियासी मैदान में ज़मीन तलाशती औरतें और इस समाचार के साथ पुरूष घरेलू कामकाज सीखरहे है , इस मसले पर ब्लॉग लिखने जा रहे हैं कुछ ख़बर चुनाव क्षेत्र से : संवाद दाता ताऊ भेज रहें है ज़रूर बांचिए ' जय शनि देव

माचिस की तीली के ऊपर बिटिया की से पलती आग

► माचिस की तीली के ऊपर बिटिया की से पलती आग यौवन की दहलीज़ को पाके बनती संज्ञा जलती आग . ******** एक शहर एक दावानल ने निगला नाते चूर हुए मिलने वाले दिल बेबस थे अगुओं से मज़बूर हुए झुलसा नगर खाक हुए दिल रोयाँ रोयाँ छलकी आग ! ******** युगदृष्टा से पूछ बावरे , पल-परिणाम युगों ने भोगा महारथी भी बाद युद्ध के शोक हीन कहाँ तक होगा हाँ अशोक भी शोकमग्न था , बुद्धं शरणम हलकी आग ! ******** सुनो सियासी हथकंडे सब , जान रहे पहचान रहे इतना मत करना धरती पे , ज़िंदा न-ईमान रहे ! अपने दिल में बस इस भय की सुनो ' सियासी-पलती आग ? हाँ अशोक भी शोकमग्न था,बुद्धं शरणम हलकी आग

"ज्ञानरंजन जी अब पहल बंद कर देंगे "

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--> पंकज स्वामी   गुलुश   नें बताया की ज्ञान जी ने अपना निर्णय सुना ही दिया की वे पहल को बंद कर देंगे   कबाड़खाना   ने इस समाचार को को पहले ही अपने ब्लॉग पर लगा दिया था.   व्यस्तताओं   के चलते या कहूं   “ तिरलोक   सिंह ” होते तो ज़रूर यह ख़बर मुझे समय पर मिल गई होती   लेकिन इस ख़बर के कोई और मायने निकाले भी नहीं जाने चाहिए . साहित्य जगत में यह ख़बर चर्चा का   बिन्दु   इस लिए है की मेरे   कस्बाई   पैटर्न   के शहर जबलपुर को पैंतीस बरस से विश्व के नक्शे पर   अंकित   कर रही पहल के   आकारदाता   ज्ञानरंजन   जी ने पहल बंद कराने की घोषणा कर दी . पंकज स्वामी की बात से करने बाद   तुंरत   ही मैंने ज्ञान जी से बात की .ज्ञान जी का कहना था :"इसमें हताशा , शोक   दु:ख जैसी बात न थी न ही होनी चाहिए .दुनिया भर में सकारात्मक   जीजें   बिखरीं   हुईं हैं . उसे समेटने और   आत्मसात करने का समय आ गया है" पहल से   ज्ञानरंजन   से अधिक उन सबका रिश्ता है जिन्होंने उसे   स्वीकारा. पहल अपने चरम पर है और यही बेहतर वक़्त है उसे बंद करने का . हाँ , पैंतीस वर्षों से

एक थे तिरलोक सिंग जी

एक व्यक्तित्व जो अंतस तक छू गया है । उनसे मेरा कोई खून का नाता तो नहीं किंतु नाता ज़रूर था । कमबख्त डिबेटिंग गज़ब चीज है बोलने को मिलते थे पाँच मिनट पढ़ना खूब पङता था । लगातार बक - बकाने के लिए कुछ भी मत पढिए ,1 घंटे बोलने के लिए चार किताबें , चार दिन तक पढिए , 5 मिनट बोलने के लिए सदा ही पढिए , ये किसी प्रोफेसर ने बताया था याद नहीं शायद वे राम दयाल कोष्टा जी थे , सो मैं भी कभी जिज्ञासा बुक डिपो तो कभी पीपुल्स बुक सेंटर , जाया करता था। पीपुल्स बुक सेंटर में अक्सर तलाश ख़त्म हों जाती थी , वो दादा जो दूकान चलाते थे मेरी बात समझ झट ही किताब निकाल देते थे। मुझे नहीं पता था कि उन्होंनें जबलपुर को एक सूत्र में बाँध लिया है। नाम चीन लेखकों को कच्चा माल वही सौंपते है इस बात का पता मुझे तब चला जब पोस्टिंग वापस जबलपुर हुयी। दादा का अड्डा प्रोफेसर हनुमान वर्मा जी का बंगला था। वहीं से दादा का दिन शुरू होता सायकल , एक दो झोले किताबों

मेरा संसार :ब्लॉग कहानी भाग 02

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छवि-साभार : शैली खत्री के ब्लॉग बार -बार देखो से समय चक्र ने रुकना कहाँ सीखा यदि समय रुक जाना सीख लेता तो कितना अजीब सा दृश्य होता . प्रथम प्रीत का मुलायम सा एहसास मेरे जीवन में आज भी कभी उभर आता है . मधुबाला सी अनिद्य सुन्दरी जीवन में प्रवेश करती है . चंचला सुनयनी मेरी प्रिया का वो नाम न लूंगा जो है उसे क्षद्म ही रखना उसका सम्मान है . चलिए सुविधा के लिए उसे "मधुबाला" नाम दे दिया जाए .दब्बू प्रकृति का मैं किसी मित्र के अपमानजनक संबोधन से क्षुब्ध कालेज की लायब्रेरी में किताब में मुंह छिपाए अपने आप को पढ़ाकू साबित कर रहा था. तभी मधु जो मेरे पीछे बैठी मेरे एक एक मूवमेंट पर बारीकी से निगाह रख रही थी बोल पड़ी : ' क्या हुआ ?.... रो क्यों रहे हो ?' ' कुछ तो नहीं ?' नहीं , दीपक से कोई कहा सुनी हो गई ? नहीं तो .........! विस्मित मैं उससे छुटकारा पाने की गरज से क्लास अटैंड करने का बहाना करके निकल गया. मधु मेरा पीछा करते-हुए सीडियों से उतर रही थी , कर मधु ने अपने जन्म दिन का न्योता दिया . और मे

विमर्श

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संदेह को सत्य समझ के न्यायाधीश बनने का पाठ हमारी . "पुलिस " को अघोषित रूप से मिला है भारत / राज्य सरकार को चाहिए की वे ,सामाजिक आचरण के अनुपालन कराने के लिए ,पुलिस को दायित्व नहीं देना चाहिए . इस तरह के मामले ,चाहे सही भी हों विषेशज्ञ से परामर्श के पूर्व सार्वजनिक न किएँ ,जाएँ , एक और आरुशी के मामले में पुलिस की भूमिका , के अतिरिक्त देखा जा रहा है पुलिस सर्व विदित है . सामान्य रूप से पुलिस की इस छवि का जन मानस में अंकन हो जाना समाज के लिए देश के लिए चिंतनीय है , सामाजिक - मुद्दों के लिए बने कानूनों के अनुपालन के लिए पुलिस को न सौंपा जाए बल्कि पुलिस इन मामलों के निपटारे के लिए विशेष रूप से स्थापित संस्थाओं को सौंपा जाए । संदेह को सत्य समझ के न्यायाधीश बनने का पाठ हमारी पुलिस को अघोषित रूप से मिला है भारत / राज्य सरकार को चाहिए की वे सामाजिक आचरण के अनुपालन कराने के लिए पुलिस को दायित्व नहीं देना चाहिए . इस तरह के मामले

मेरा संसार :ब्लॉग कहानी

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आचार्य रजनीश (वेब दुनिया से साभार ) सर , और सर के चम्मच जो सर के खाने के सहायक उपकरण होते हैं को मेरा हार्दिक सलाम मैं ….. आपका दास जो आपको नहीं डालता घास , इसलिए क्योंकि आप कोई गधे थोड़े हैं॥ आप आप हैं मैं आपका दास इतना दु:साहस कैसे करूँ हज़ूर । आप और आपका ब्रह्म आप जानिए मेरा तो एक ही सीधा सीधा एक ही काम है.आपकी पोल खोलना . आपकी मक्कारियों की पाठशाला में आपको ये सिखाया होगा कि किस तरह लोगों को मूर्ख बनाया जाता है..किन्तु मेरी पाठशाला में आप जैसों को दिगंबर करने का पाठ बडे सलीके से पढाया गया मैंनें भी उस पाठ को तमीज से ही पढा है.तरकश का तीर कलम का शब्द सटीक हों तो सीने में ही उतरते हैं सीधे ॥ तो सर आप अपने स्पून सम्हाल के रखिये शायद ये आपके बुरे वक़्त में काम आ जाएँ । परंतु ऐसा कतई नहीं . होगा सर आप अपने सर से मुगालता उतार दीजिए । कि कोई चम्मच खाने के अलावा कभी और उपयोग में लाया

विषय

"विषय '', जो उगलतें हों विष उन्हें भूल के अमृत बूंदों को उगलते कभी नर्म मुलायम बिस्तर से सहज ही सम्हलते विषयों पर चर्चा करें अपने "दिमाग" में कुछ बूँदें भरें ! विषय जो रंग भाषा की जाति गढ़तें हैं ........! वो जो अनलिखा पढ़तें हैं ... चाहतें हैं उनको हम भूल जाएँ किंतु क्यों तुम बेवज़ह मुझे मिलवाते हो इन विषयों से .... तुम जो बोलते हो इस लिए कि तुम्हारे पास जीभ - तालू - शब्द - अर्थ - सन्दर्भ हैं और हाँ तुम अस्तित्व के लिए बोलते हो इस लिए नहीं कि तुम मेरे शुभ चिन्तक हो । मेरा शुभ चिन्तक मुझे रोज़ रोटी देतें है चैन की नींद देते हैं

रविवार शाम ढलते-ढलते एक ब्लॉग चर्चा !!

"प्यार करते हैं", बयाँ भी किया करतें है हज़ूर ये न करें तो बवाल मचने का पूरा खतरा है की कहीं कोई पूछ न ले कि क्‍या हम प्‍यार कर रहे थे ... ?। कुछ बेतुकी, और अनाप शनाप बाते ,यकीनन आहिस्ता आहिस्ता.. ही समझतें है लोग यदि न करें तो क्या करें भैया एक ब्लॉगर भैया ने किसी की '' पोस्ट " , क्या चुराई यमराज ने , " गीता - सार बता दिया जैसे ही सुमो , प हलवान ने जो बताया उससे सब को कुछ और पता चला । खैर जो भी हो उधर बात ज़्यादा नहीं बढेगी बस छोटे - बड़े का ओहदा तय होगा कहानी अपने आप ख़तम हो जाएगी । मुम्बई से बाहर जा सकता है भोजपुरी फिल्म उद्योग यदि तो "भइया" " जबलपुर - " आ जाना अपन इंतज़ाम कर देंगे यहाँ सबई कछु उपलब्ध है । आपका इंतज़ार रहेगा हम तब तक रख लिए हमने "तकिए पर पैर" और भोजपुरी निर्माताओं के निर्णय का इंतज़ार कर रहे हैं । राज के राज में मनोज बाजपेई, ,की किसी सांकेतिक पोस्ट का न आना अभिव्यक्ति पर सेंसर शिप जैसा है। जानते है जल में रह कर मगर से बैर ...........?

स्वर्गीय केशव पाठक

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मुक्तिबोध की ब्रह्मराक्षस का शिष्य , कथा को आज के सन्दर्भों में समझाने की कोशिश करना ज़रूरी सा होगया है । मुक्तिबोध ने अपनी कहानी में साफ़ तौर पर लिखा था की यदि कोई ज्ञान को पाने के बाद उस ज्ञान का संचयन,विस्तारण, और सद-शिष्य को नहीं सौंपता उसे मुक्ति का अधिकार नहीं मिलता । मुक्ति का अधिकारक्या है ज्ञान से इसका क्या सम्बन्ध है,मुक्ति का भय क्या ज्ञान के विकास और प्रवाह के लिए ज़रूरीहै । जी , सत्य है यदि ज्ञान को प्रवाहित न किया जाए , तो कालचिंतन के लिए और कोई आधार ही न होगा कोई काल विमर्श भी क्यों करेगा। रहा सवाल मुक्ति का तो इसे "जन्म-मृत्यु" के बीच के समय की अवधि से हट के देखें तो प्रेत वो होता है जिसने अपने जीवन के पीछे कई सवाल छोड़ दिये और वे सवाल उस व्यक्ति के नाम का पीछा कर रहेंहो । मुक्तिबोध ने यहाँ संकेत दिया कि भूत-प्रेत को मानें न मानें इस बात को ज़रूर मानें कि "आपके बाद भी आपके पीछे " ऐसे सवाल न दौडें जो आपको निर्मुक्त न होने दें !जबलपुर की माटी में केशव पाठक,और भवानी प्रसाद मिश्र में मिश्र जी को अंतर्जाल पर डालने वालों की कमीं नहीं है किंतु केशवपाठ