शुक्रवार, अप्रैल 29

वेब कास्टिंग के लिये आप तीन बजे से तैयार रहें मिसफ़िट पर एक चटके के साथ

 जी आप सही समझ रहे हैं मिसफ़िट पर आज़ आप देख सकेंगे लाइव वेबकास्टिंग दोपहर तीन बजे से 



दिल्ली ब्लागर्स मीट : प्रेस कान्फ़्रेंस लाइव जबलपुर एवम इंदौर से

गिरीश बिल्लोरे मुकुल द्वारा जबलपुर से सुनने के लिये चटका लगाएं
                                  "लाइव" पर

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अर्चना चावजी इंदौर से  



            

गुरुवार, अप्रैल 28

दिल्ली पहुंच कर अन्ना ने चूलें सरकार की हिला दीं थीं ब्लागर ब्लागरा भी ..


                                                           हां तो भाईयो और ब्लागर भग्नियो जो ( मानें ) दिल्ली पहुंच कर अन्ना ने चूलें सरकार की हिला दीं थीं ब्लागर ब्लागरा क्या करेंगे.. जी सम्मेलन की घोषणा होते ही कितने सीनों पे नागिन फ़िलम छाप धुन पै  सांप लोट रए हैं सबरे ब्लागरन को पता है.पर जे जान लो भैया रवींद्र परताप जी  और अगरवाल साब  ने पूरे देस और बिदेस से ज़हर निकालने वाले सपेरे बुलाय लिये. जिनका काम है  ज़हर से  "ज़हर-रोधी" बनाना . सांप भैये  आप तो जिसकी आस्तीन में रहते हो रहो सीनों पे न लोटो वरना ज़हर से हाथ धो लोगे.   खास खबर ये है कि अविनाश  जी और पता नहीं कौन कौन  दिल्ली चलो का हल्ला महीनों से नुक्कड़ पे आके मचाए पड़े थे उधर भाई रवीन्द्र प्रभात की किताबें लिखने की   मौन  साधना अलग जारी थी. बस्स इस आह्वान का असर दिखा अंदर की बात तो जे है भैया कि अन्ना हज़ारे तक दिल्ली आ गये और बस हिला दीं चूलें सरकार की ऐसा माना जा रहा है... और खास खबर ये है कि लारा मेमसाब पर इस आह्वान का असर कुछ ज़ियादा ही हुआ उनने कसम खाई कि 29 अप्रैल 2011 से पूरे देश में ब्लागर्स के वास्ते  आह्वान करेंगीं   नारा देंगी  "दिल्ली चलो "समीर बाबू कनाड़ा से सोच रए हैं के   दिल्ली में बस जाने को जी चाहता है. हजूर बस एक बार चुनाव लड़ लिये होते तब्ब तो पक्का था कि आप दिल्ली में इच्च होते..सुना है कुछ लोग जो सम्मेलन को फ़ेस न कर पाए वे  फ़ेस बुक में...पद्मावलि (पद्मावति नहीं) बारे  पद्म भैया सुनिये हमारे राशी फ़ल में जात्रा के लिये मनाही है पर हम आयेंगे ज़रूर आएंगे पक्के में आएंगे  . संगीता  ताई से तोड़ निकलवाएंगे पक्के में. जी और तो और हम वेबकास्टिंग करेंगे ललित भाई  के अलावा सवा लाख पे भारी श्री बी एस पाबला  श्री संजीव तिवारी  से  मिलना भी होगा और देखिये हम लोग ऐसे दिखेंगे
वेबकास्टिंग के लिये किस ब्लाग पे चटका लगाना है..?

जी डा०विजय तिवारी किसलय के बताए अनुसार मुझे बताया "वेबकास्टिंग जिसकी चर्चा देश विदेश की पत्र पत्रिकाओं में भी की गई है.  इतना ही नहीं उक्त कार्यक्रम का लाइव प्रसारण http://www.nukkadh.comhttp://sanskaardhani.blogspot.comतथा http://editers.blogspot.com/ , http://hindisahityasangam.blogspot.com/ पर  दिनांक 30 अप्रैल 2011 .को शाम तीन बजे से उपलब्ध होगा. 
 "

इस पर एक रपट देखिये भाई पियूस पाण्डे साब की कतरन भास्कर की
दैनिक भास्कर के राष्ट्रीय संस्करण में आज दिनांक २९.०४.२०११ को प्रकाशित पीयूष पांडे का विस्तृत विवेचन हिंदी ब्लॉग सम्मलेन के बहाने 
नुक्कड़ से साभार 








बुधवार, अप्रैल 27

नाव गाड़ी का रिश्ता

पाकिस्तान में मिली ये तस्वीर नाव गाड़ी का रिश्ता  बयां कर रही है. यही  हक़ीकत है पाकिस्तान की हमेशा नाव पर गाड़ी होती है. नाव जो हमेशा डूबती-उतराती नज़र आती है.पर चल रही है परम आत्माओं के सहारे जो विश्व के हर हिस्से को हिला देने की जुगत में तत्पर.   अब तो जागो पाक़िस्तान ... विश्व को बता दो तुम भी नेक नियत देश हो... तुम्हारे दामन के दाग धोने के लिये इससे बेहतर वक़्त कब आएगा. तब जब विश्व एक बड़े सामाझिक परिवर्तन के लिये तत्त्पर है. 














एक रपट किसलय जी के सेलफ़ोन से 

सोमवार, अप्रैल 25

तुमने किसका गीत ये गाया ,अपने सुर में आज़ पिरोकर किसका ओढ़ लबादा आये- कहो कहां से आये होकर !













सागर पाखी अपने पर को फ़ैला कर मापें जब सागर,
तब जानो सागर नन्हा है- आतुर वे भरने को गागर !
लघु विशाल का भेद निरर्थक देखो तो साहिल पे  जाकर.
इनसे भी ज़्यादा है मापा- जलचर ने अंतस तक सागर !!
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तुमने किसका गीत ये गाया ,अपने सुर में आज़ पिरोकर
किसका ओढ़ लबादा आये-    कहो कहां से आये    होकर !
बंद करो खोने का रोना- मिथ्या गीत नहीं सुनना है-
नित नूतन कुछ कुछ पाया है, हमने जग में खुद को खोकर !!

अपना उदर भरा करते हो इस उस के मुख छीन निवाला
अपनी ठिठुरन मिटा रहे क्यों- मेरे तन से  छीन दुशाला .
चिंगारी से डरने वालो क्या मशाल लोगे हाथों में-
हमको देखो जल जल हमने रोज़ राह में किया उज़ाला !!
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बाबा की उस सम्पत्ति की चर्चा करो जो मानव कल्याण के लिये बिखरी पड़ी है

ये  विषय नही कि संस्थान के पास क्या है,उसका क्या होगा, उसे कौन संचालित करेगा.चर्चा तो इस बात की होनी चाहिये  कि बाबा ने कितने  जीवनो को पारस-मणि सा स्पर्श दिया और लोहे से सोने सा बना दिया...? किसी भी योगी  की आध्यात्मिक शक्ति को न देख पाना हमारे चिंतन की अपरिपक्कवता ही है. लोग मंदिर की भव्यता से ईश्वर की शक्ति को तौलते हैं . किसने कहा ईश्वर सिर्फ़ भव्य मंदिरों में ही मिलते हैं.भक्त के मन में भगवान का स्वरूप किसी "धनाड्य" सा होगा तभी भक्त प्रभावित होगा ऐसा सोचना भी मिथ्या है.सत्य साई बाबा के लोककल्याण की अवधारणा का समापन उनके शारीरिक अवसान के बाद भी जारी रहेगा.क्योंकि बाबा का देह त्याग एक लीला मात्र है. वे आध्यात्मिक रूप से आत्माओं में सृष्टि के अनंत विस्तार तक रहेंगें.   
  बाबा को आप  सतही अपनी आंखों से देखना है न कि सतही खबरों के ज़रिये तभी तो बाबा की उस सम्पत्ति की चर्चा कर सकोगे  जो मानव कल्याण के लिये बिखरी पड़ी है. जो हुआ है. बाबा के आश्रम की चिंता तुम मत करो बस चिंतन करो 



रविवार, अप्रैल 24

बस एक बार बाबा की विभूती चखो तो समझ जाओगे तुम क्या हो बाबा क्या हैं

आज़ से ३१ वर्ष एक माह पूर्व की वो सुबह हां याद आया  मार्च १९८० के एक गुरुवार  एक सुबह यानी  चार से पांच के बीच का वक़्त था , जाग तो चुका था मैं साढ़े तीन बजे से , लग भी रहा था कि लगा कि आज़ का दिन बहुत अदभुत है. था भी, मुझे नहीं मालूम था कि आज़ क्या कुछ घटने  वाला है. गंजीपुरा के साहू मोहल्ले वाली गली में अचानक एक समूह गान की आवाज़ गूंजती है बाहर दरवाजा खोल के देखता हूं बाबा के भक्तों की टोली  अपनी प्रभात फ़ेरी में  नगर-संकीर्तन करती हुई निकलती है. श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा.. जैसे कई भजन पूरे पथ संचलन में.  गाते जा रहे थे भक्त गण .. साई कौन है ? इस पड़ताल में लग गया मैं. मार्च अस्सी की मेट्रिक की परीक्षा के बाद पड़ताल करना शुरु किया. वैसे मेरे कई मित्र जैसे अविजय उपाध्याय, शेषाद्रि अय्यर, जितेंद्र जोशी (आभास-जोशी के चाचा मेरे मौसेरे भाई), मुकुंद राव नायडू ,सत्य साई सेवा समिति की  बाल विकास के विद्यार्थी थे.बाबा के बारे में इतना जानता था कि वे मेरे नाना जी के आध्यात्मिक गुरु हैं. उनके घर से समिति के काम चला करते थे.  करंजिया के श्रृंखला बद्ध  आलेखों ने मेरे  किशोर मन पर एक नकारात्मक छवि बना दी थी बाबाओं के प्रति. उन में  साई प्रमुख थे.मैं बाबा का विरोधी हो गया मन ही मन जैसे बाबा ने कुछ छीन लिया हो मेरा . 
 फ़िर एक दिन नानाजी मिलने जब गया तो नाना जी कम्बलों को व्यवस्थित कर रहे थे. मैने पूछा :-"नानाजी ये क्यों. इत्ते सारे कम्बल क्यों खरीदे "
नानाजी ने बताया आज़ रात को हम लोग बस स्टैंड, रेल्वे-स्टेशन, सड़क किनारे जहां भी कोई ठण्ड में ठिठुरता , "नारायण" मिलेगा उसे ओढ़ा देंगे.
नारायण..?
हां, नारायण जो दु:खी , अकिंचन है उसमें भगवान है, वही भगवान है.. उसकी सेवा ही तो प्रभू की सेवा है. 
         जिस गुरु के इस दिशा दर्शन का इतना अदभुत असर वो तो महान होगा ही. बस जरा सा आकर्षण पैदा हुआ. पर विश्वास न विश्वास अभी भी न जमा सका. मुझ पर स्वामी शुद्धानंद के "प्रपंच अध्यात्म योग" का असर था.   "प्रपंच अध्यात्म योग" और " सत्यसाई  के चमत्कार" दो अलग अलग बात थी मेरे लिये. मुझे चमत्कारों में भरोसा न था. मुझ पर यह विचार हावी था कि बाबा बस चमत्कार करते हैं. वो तो कोई भी ज़ादूगर कर देता है. बाबा की पड़ताल करनी थी सो सोचा कि बिना इनके चेलों के बीच घुसे बाबा को जानना असम्भव है. रेल्वे के राज़ भाषा अधिकारी श्री आर बी उपाध्याय के कछियाना स्थित निवास पर जाना आना शुरु कर दिया.    
                                 मुझे मालूम था कि मेरी आस्था बाबा के लिये तब तक न जागेगी जब तक  कि उनके सामाजिक पहलू का अंवेषण कर न लूंगा . "आस्थावान होना और पिछलग्गू होना अलग अलग तथ्य हैं. नेता गण भली भांति जानते हैं. नहीं जानते हों तो अब जानलें. 
       हां तो हर शनिवार भजन में जाना और  ये देखना कि कौन कौन आता है क्या क्या करता है. भजन में एक प्रोफ़ेसर राव साहब आते थे, पता नही कितने अफ़सर, कितने क्लर्क, कितने मास्टर, कितने गरीब जो सिर्फ़ बाबा के प्रति आराधना के स्वर बिखेरते थे और भजन के बाद विभूति प्रसाद मिलता था. मैं बेमन से विभूती लेता था . दूसरे ही भजन में किसी ने कानों में कहा –“बस एक बार बाबा की विभूती चखो तो समझ जाओगे तुम क्या हो बाबा क्या हैं ?”
आर बी उपाध्याय जी के घर जिनको हम चाचाजी कहते हैं के घर भजन में. इनका एक बेटा है अभिनव  (अभिनव उपाध्याय)जिसे आपने देखा होगा जगजीत सिंह जी के कंसर्ट में तबला बजाते हुए. उसकी तबले की थाप वाह जैसे गंधर्व प्रभू की आराधना में संगीत दे रहे हों. मेरी  उम्र से कुछ कम उम्र का युवा होता एक दिव्य चेहरा  जो प्रोफ़ेसर राव के बेटे थे भजन में आया करता थे.. विचार और वाणी की मृदुलता ने मुझे इन युवाओं की ओर आकर्षित किया.ये सारे लोग मौन साधना करते थे कर भी रहे हैं. पर कभी किसी प्रचार का हिस्सा नहीं बनते.  तभी तो  मुझे लगा कि बाबा ने जो कार्य साथ लिये हैं  वो विश्व को बदल सकतें हैं. आंध्र-प्रदेश में वाटर प्रोजेक्ट जो भारत की किसी भी सरकारी व्यवस्था में सहजता से होना सम्भव नहीं था . पुट्टपर्थी का चिकित्सालय, यूनिवर्सिटी, उन सबसे बढ़कर वे भक्त मुझे लुभाने लगे जो सेवा तो कर देतें हैं हर किसी ज़रूरत मंद की पर कभी भी प्रचार का हिस्सा न बनने देते "सेवा को". यही तो जानना चाहता था. बस एक दिन मैने भी किसी के उकसाने पर गा दिया 
"विभूती सुंदर साई नाथ सत्य साईं नाथ 
 साई नाथ साई नाथ सत्य साई नाथ..."
     कभी भी बाबा से न मिला कभी पर्ती नहीं गया पर बाबा  मुझे हमेशा मेरे साथ हैं. मुझे यक़ीन है.यक़ीन की कई वज़ह हैं. उनमें से बाबा से हुए आत्मिक संवाद . जिनको यदि कभी जरूरी हुआ तो अवश्य प्रस्तुत करूंगा. पर यह सच है कि १४ मार्च २००९ को जब "बावरे-फ़क़ीरा" विमोचित हुआ तब अपना भाषण देने जितेंद्र जोशी जी  ने मुझे आहूत किया तब बोलने के लिये जो तय शुदा एजेण्डा लेकर मंच पर गया उससे भिन्न कुछ कहा मैने ... सारा हाल स्तब्ध चकित सुन रहा था पिन ड्राप सायलेंस था तब  मुझे मालूम है कि मैं नहीं एक कोई और था, साथ जो बोल रहा था सामने बैठे मूर्धन्य, आत्मिक जन, परिजन,मित्र, पता नहीं कितने अपनी आंखों से अमृत गिरा रहे थे.  




  • भगवान की सेवा क्या है:-

  1. बच्चों  की जिज्ञासा शांत  करना 
  2. भूखे को सम्मान से आहार देना
  3. रोगी की सेवा करना 
  4. अपने यश पर घमंड न करना
  5. सेवा और दान का बखान न करना 
  6. अपने धर्म का त्याग न करना
  7. दूसरे धर्म का आदर करना 

शनिवार, अप्रैल 23

डा० उमाशंकर नगायच कृत ग्रंथ : महर्षि दयानंद का समाज दर्शन



कृति समीक्षा - महर्षि दयानंद का समाज दर्शन
 प्रस्तुति :-गिरीश बिल्लोरे मुकुल 
1. आज बाजारीकरण के प्रभावों से आक्रान्त जनमानस भौतिक विज्ञानों की दिशा में ही चिन्तन के लिए समय दे पा रहा है। सृष्टि के मूल सिद्धान्तों और युगों के अन्तराल के बाद स्थापित मानव संस्कृति, सभ्यता एवं समाज व्यवस्था के सम्बन्ध में चिन्तन घटता दृष्टि गोचर हो रहा है। समाज में संतुलित विकास के लिए दोनो ही दिशाओ में समान रूप से बढ़ना आवश्यक है। एक को छोडकर किसी दूसरे की ओर बढने से जीवन में पूर्णत्व की प्राप्ति नहीं होगी। आदरणीय डॉ. उमाशंकर नगायच द्वारा आई.टी. की चकाचौंध के इस युग में समाज में मूल्यों के घटते महत्व के कारण पनप रही अप्रतिमानता की समाप्ति के लिए भारतीय सभ्यता के मूलाधार ‘वेदों’ को जनसामान्य तक पहुँचाने वाले मनीषी महर्षि दयानन्द के समाज दर्शन की विवेचना अपने शोध ग्रन्थ में की है। उनका यह कार्य अनूठा, अद्भुत और अतुलनीय है।
2. शोधग्रंथ में वैदिक संस्कृति व धर्म के उद्धारक महर्षि दयानंद सरस्वती के बहुआयामी व्यक्तित्व, उदार कृतित्व, जीवन के प्रति उनके व्यापक और सर्वग्राही दृष्टिकोण का रोचक ढंग से वर्णन किया गया है। विद्वान् लेखक ने अपनी शोध-प्रवण दृष्टि से वर्णव्यवस्था, आश्रमव्यवस्था, पुरुषार्थचतुष्टय, शिक्षा व्यवस्था, विवाह-सिद्धान्त, अर्थव्यवस्था एवं राजव्यवस्था इत्यादि महत्वपूर्ण विषयों पर महर्षि दयानन्द की मूलगामी वैदिक दृष्टि और उसके दार्शनिक आधार का सांगोपांग विवेचन किया है। जो प्रत्येक व्यक्ति को सुख-सुविधा सम्पन्न बनाने, सुव्यवस्थित सामाजिक संरचना और संास्कृतिक मूल्यों की रक्षा के लिये उपयोगी और व्यवहारिक है।
3. ‘महर्षि दयानंद का समाज दर्शन डा. उमाशंकर नगायच की शोधदृष्टि का वैचारिक फल है। इस फल का भोक्ता समाज होता है और समाज की सेहत के लिये ऐसे फल सेवनीय होने से पथ्य हैं। वस्तुतः साहित्य लेखन की सार्थकता इसी में है कि वह व्यवहारिक जीवन में उपयोगी हो। इस दृष्टि से लेखक का प्रयास सफल व सराहनीय है। समाज में व्याप्त अनेक कुरीतियों और समस्याओं, यथा- बाल विवाह, दहेजप्रथा, गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, जनसंख्या वृद्धि आदि के समाधानकारी सिद्धान्तों का ग्रंथ में किया गया विस्तृत विवेचन वर्तमान समय में भी प्रासंगिक है। पुस्तक की भूमिका में डा.सोमपाल शास्त्री ने इसीलिये इस कृति को ‘जीवन-जगत के लिये अधिकतम व्यावहारिक, प्रासंगिक और उपयोगी’ कहा है। प्रस्तुत कृति महर्षि दयानंद के
आर्ष चिन्तन को लोकोपयोगी भाषा शैली में लोक के समक्ष लाने का प्रषंसनीय प्रयास है। महर्षि दयानन्द का तपःपूत चिन्तन किसी कालखण्ड या भूखण्ड विषेष की सीमाओं में आबद्ध नहीं है। उसकी परिधि मानवता के हर छोर को छूती है और समूची मानव जाति को ‘सर्वे वै सुखिनः सन्तु’ का शाष्वत संदेष पहुंचाती हुई परिलक्षित होती है। पुस्तक की विषयवस्तु के विवेचन में यह तथ्य सर्वत्र झलकता और छलकता हुआ दिखाई देता है।
4. संन्यासियों के बारे में जन सामान्य की धारणा है कि वे दीन-दुनिया से कोई नाता-रिश्ता नहीं रखते। जिसने संन्यास लेते समय पुत्र, वित्त और लोक (संसार) से नाता तोड लिया, उससे हम यह अपेक्षा कैसे करें कि वह लोकहित तथा समाज की व्यापक भलाई के लिये कुछ सोचेगा या करेगा। उन्होने तो स्वेच्छा से प्रवृत्ति मार्ग को त्यागकर निवृत्ति मार्ग को अपनाया है, प्रेय को छोड श्रेय पथ पर चलने का निश्चय किया है। अतः वे समाज के समक्ष खडी समस्याओं का निदान करने में रुचि क्यों लेंगे? मध्यकाल के सभी साधु-संन्यासी, सन्त-महन्त, पंडे, पुजारी मात्र परलोक चिन्ता मे लगे रहे और सांसारिक दायित्वों से पूर्णतया विमुख रहे। किसी ने संसार के प्रति अपना कोई दायित्व नहीं समझा और लोगों को दीन-दुनिया से नाता तोडकर परमात्मा से लगन लगाने की बात करते रहे। इस परम्परा के विपरीत नवजागरण काल में दयानन्द तथा विवेकानंद सदृश संन्यासियों ने भी जनमानस में चेतना जगाई। संन्यासियों में दयानंद ही थे, जिन्होने अध्यात्म, दर्शन और धर्म चिन्तन के साथ-साथ इहलोक (संसार व समाज) की समस्याओं के निदान की चिन्ता की तथा भारतवासियों को आर्थिक,सामाजिक तथा राजनैतिक शक्ति उपार्जित करने का संदेश दिया।
5. सामाजिक सरोकारों की चर्चा करें, तो उन्नीसवीं शताब्दी के समाज सुधारकों में
दयानंद सरस्वती का नाम अग्रणी है। सामाजिक परिवर्तन और क्रान्ति के अग्रदूत थे,महर्षि दयानंद सरस्वती। विभिन्न शोध विद्वानों ने स्वामी दयानंद के समाजोन्मुखीव्यक्तित्व तथा कृतित्व की अल्प ही चर्चा की है। इस विस्तृत तथा गंभीर विषय के सभी कोणों को  स्पर्श करने  वाले हाल ही में प्रकाशित  डा. उमाशंकर नगायच (ई-117/6 शिवाजी नगर, भोपाल) के विद्वतापूर्ण शोध प्रबंध (महर्षि दयानंद का समाज दर्शन) में स्वामी दयानंद के चिन्तन और कृतित्व का विस्तृत, प्रमाण पुरस्सर विवेचन किया गया है। इस ग्रंथ में स्वामी दयानंद के आविर्भाव की पृष्ठभूमि तथा तात्कालिक परिस्थितियों की सटीक समीक्षा की गई है। महर्षि के जीवन में आये विभिन्न पड़ावों का विवरण देने के साथ उनके विचार और कर्म क्षेत्र की तात्विक पड़ताल इस ग्रंथ की प्रमुख विषेषता है। ध्यान रहे कि सामाजिक विचारों का क्षेत्र गृह, परिवार, समाज तक ही सीमित नहीं है। लेखक की जागरूकता के कारण इसमें स्वामी दयानंद के आर्थिक तथा राष्ट्रीय (राजनैतिक तथा प्रशासन विषयक) विचारों की समुचित विवेचना हुई है। षिक्षा और सामाजिक उत्थान अन्योन्याश्रित हैं। समाज की चतुर्मुखी उन्नति में षिक्षा की भूमिका
को स्वामी दयानंद ने सम्यकतया समझा था, इसी कारण ऋषि दयानंद के शिक्षा विषयक विचारों का विस्तारपूर्वक विवेचन इस पुस्तक में किया गया है। निश्चय  ही दयानंद के बहुकोणीय व्यक्तित्व की विवेचना करने में लेखक को असाधारण सफलता मिली है। दयानंद के धार्मिक एवं दार्षनिक विचारों की पर्याप्त चर्चा अनुसंधाता विद्वानों द्वारा हुई है, किन्तु उनके समाज-दार्षनिक विचारों, समाज दृष्टा तथा समाज संशोधक व्यक्तित्व को जानने के लिये यह ग्रंथ पाठकों के अध्ययन क्रम में अनिवार्यतः आना चाहिये।
6. पुस्तक की विषय वस्तु पुरःस्थापना से उपसंहार तक ग्यारह अध्यायों में विभक्त है। प्रथम अध्याय में ग्रंथ के उद्देष्य और प्रतिपाद्य का औपचारिक निदर्शन है। ग्रंथ का द्वितीय अध्याय महर्षि दयानन्द के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को समर्पित है। इसमें महर्षि की लोक से परलोक तक की यात्रा का सजीव वर्णन विद्धान् लेखक ने कुछ इस तरह किया है, जैसे कि वह महर्षि के सहयात्री रहें हो। शेष अध्यायों में समाज व्यवस्था, अर्थ व्यवस्था और राज्य व्यवस्था के संबंध में उनके दार्षनिक विचारों को व्याख्यायित किया गया है।
7. वैदिक दर्शन में कालान्तर में आये विक्षेपण को दूर करते हुये लेखक ने वैज्ञानिक दृष्टि से वैदिक समाज व्यवस्था के आधारभूत सिद्धान्तों का सूक्ष्म विवेचन कर महर्षि के ‘वेदों की ओर लौटो‘ के संदे्श को औचित्यपूर्ण सिद्ध किया है। वेदों में समाहित समाज वैज्ञानिक सिद्धान्तों का महर्षि दयानंद ने जो अन्वेषण किया, उस अन्वेषण को क्रमबद्धता  की लय में पिरोने का दुष्कर कार्य लेखक ने बडी सहजता से किया है। तदनुसार ग्रंथ जीवन उपयोगी एवं मानव के सर्वांगीण विकास के लिये आवश्यक जीवन दर्शन को प्रस्तुत करता है। समग्र समाज को पोषित, संबर्द्धित करने के लिये ऋषियों ने अपनी दिव्य दृष्टि से सामाजिक संरचना वर्णव्यवस्था का जो तानाबाना बुना, उसको इस ग्रंथ ने औचित्यपूर्ण एवं नवीन विश्व सामज व्यवस्था के संदर्भ में वर्णव्यवस्था की प्रासंगिकता, आवश्यकता एवं महत्व को प्रतिपादित किया है। पुस्तक के चार सौ चौदह पृष्ठीय कलेवर में लगभग नब्बे प्रतिषत अंष महर्षि दयानन्द के दर्षन को समर्पित है। इससे स्पष्ट है कि लेखक की मंषा महर्षि के कृतित्व के दार्षनिक पक्ष को उजागर कर उसे सुबोध शैली में समाज तक पहुंचाने की है। यह उपक्रम पुस्तक के शीर्षक में समाविष्ट बोध को भी सार्थक करता है।
8. ‘महर्षि दयानन्द का समाज दर्शन’ पुस्तक सामाजिक सरोकारों का दुरुस्त दस्तावेज है। समाज की प्रगति पर मानव जीवन की समृद्धि निर्भर है, इस तथ्य की पुष्टि ‘‘महर्षि दयानंद के समाज दर्शन’’ में है। इसकी विषय वस्तु में महर्षि दयानन्द की दार्शनिक विचारधारा के सामाजिक पक्ष की प्रस्तुति के लिये वैदिक समाज व्यवस्था, अर्थ व्यवस्था और राज्य व्यवस्था की सैद्धान्तिक और व्यावहारिक दृष्टि से विवेचना की गई है। समाज व्यवस्था के अंतर्गत वर्ण विभाजन के औचित्य और वर्णव्यवस्था की वर्तमान में उपादेयता और प्रासंगिकता पर बेबाकी से विचार व्यक्त किये गये हैं। इसके अतिरिक्त जीवन के संतुलित विकास के लिये अत्यावश्यक वैदिक आश्रम व्यवस्था एवं पुरुषार्थचतुष्टय- धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की बहुत सटीक व्याख्या की गई है। वैदिक संस्कृति की पुरुषार्थ चतुष्टय की अवधारणा को लेखक ने अपने वैशिष्ट्य में रेखांकित किया है, जिसमें अलौकिक जीवन के लिये लौकिक जीवन की उपेक्षा नहीं की गई है। मनुष्य के व्यक्तित्व में आत्मा के साथ शरीर को समान रुप से महत्तवपूर्ण माना है।
9. पुस्तक में वैदिक षिक्षा व्यवस्था का विस्तार से प्रतिपादन है। महर्षि दयानंद के विचार अनुसार मानव जीवन के सम्यक् विकास के लिये एवं जीवन साध्यों - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि के लिये उत्तम शिक्षा सर्वोपरि साधन है। सबको शिक्षा के समान अधिकार एवं अनिवार्य शिक्षा की अवधारणा महर्षि के विचारों का वेैशिष्ट्य है। महर्षि दयानन्द ने संपन्न तथा विपन्न सभी की संतानों को शिक्षा पाने हेतु समान सुविधाएं राज्य व समाज द्वारा उपलब्ध कराने का सिद्धांत प्रस्तुत कर दीन.हीन, वंचित, शोषित और पीड़ित मनुष्यों के उत्थान के लिये स्तुत्य प्रयत्न किया है, जो विश्व मानवता को उनकी अविस्मरणीय देन है।
10. पुस्तक में विवाह सिद्धान्त की लोकोपयोगिता को वैज्ञानिक दृष्टिकोंण के साथ व्याख्यायित किया गया है। सफल वैवाहिक जीवन के आधारसूत्र के रूप में स्वयंवर विवाह विषयक महर्षि के दृष्टिकोण का वृहद् विश्लेषण कृ्रति में किया गया है। दाम्पत्य प्रीति को गृहस्थ आश्रम की सफलता तथा समग्र परिवार के सुनिश्चित कल्याण का साधन माना है। महर्षि के अनुसार संसार का उपकार करना समाज का मुख्य उद्देश्य है, अर्थात शारीरिक, आर्थिक और सामाजिक,उन्नति करना। आर्यसमाज के इस छठवे नियम में समाहित अपेक्षाओं का पल्लवन लेखक ने पुस्तक में आद्यन्त किया है।
11. अर्थ समाज के शरीर का रक्त है। जिस प्रकार से मानव शरीर के स्वास्थ्य के लिये रक्त शुद्धि आवश्यक है। उसी प्रकार समाज के स्वास्थ्य के लिये अर्थ सिद्धि की आवश्यकता है। कृति में धर्मानुगामी अर्थोपार्जन की प्रवृति को समाज के लिये हितकर निरूपित किया गया है। अर्थव्यवस्था में धर्म और अर्थ के अन्तःसम्बन्ध संबंधी महर्षि के विचारों की बहुत सटीक व्याख्या की गई है। महर्षि की मान्यता है कि ‘अर्थ वह है जो धर्म ही से प्राप्त किया जाये और जो अधर्म से सिद्ध होता है वह अनर्थ है।’ इस संदेश में वर्तमान भ्रष्टाचार पीडित समाज के साध्यपरक अर्थोन्मुखीकरण के फलस्वरूप उपजे अपघाती परिणामों से उबरने के लिये कारगर उपचार का संकेत है।
12. पुस्तक के दसम् अध्याय में महर्षि दयानन्द के राजनैतिक दर्शन की विवेचना की गई है। इसमें राजधर्म, राज्य की प्रकृति, राज्य के मूल अंगों और कार्यों का उल्लेख तथा न्याय एवं प्रशासन व्यवस्था का निदर्शन, अथर्ववेद और मनुस्मृति के उद्धरणों से समर्थित है। महर्षि ने राज्य में सम्यक् दण्ड की व्यवस्था को आवश्यक निरूपित किया है। वस्तुतः यह विवेचन वर्तमान राजनैतिक तंत्र की कमियों को सुधार कर तंत्र को नियंत्रित करने के लिये मार्गदर्षक की भूमिका का निर्वाह कर सकता है। इस अध्याय का उल्लेखनीय वैषिष्ट्य महर्षि के राष्ट्रवाद संबंधी विचारों की उपयुक्त प्रस्तुति है। लेखक के विचार से अंग्रेजों की दासता से जकड़े हुये देष में राष्ट्रीय स्वाभिमान तथा स्वराज की भावनाओं से युक्त राष्ट्रवादी विचारों की शुरूआत करने तथा अपने कृत्यों एवं उपदेषों से निरन्तर राष्ट्रवाद को पोषित करने वाले महर्षि दयानन्द को ही आधुनिक युग में भारतीय राष्ट्रवाद का जनक कहना उपयुक्त होगा।
13. अंतिम अध्याय उपसंहार के रूप में अपने अग्रज अध्यायों का सारतत्व समेटे हुये है। इस अध्याय के अंतिम वाक्य-’महर्षि दयानन्द एक जीवनदृष्टा थे और उनके विचारों में सर्वांग जीवन ब दर्शन विद्यमान है’, में यह स्पष्ट रूप से व्यक्त है। महर्षि का व्यक्तित्व और कृतित्व आदर्श भारतीय समाज सुधारक का समाजोपयोगी संस्करण है।
14. ग्रंथ की शैली उत्कृष्ट, विवेचनापरक एवं भाषा सरस, सरल, बोधगम्य, सप्राण, सारगर्भित और धाराप्रवाह है। लेखक ने ग्राहय शैली के साथ जिज्ञासु पाठकों के लिये एक अद्भुत ग्रन्थ रचा है। महर्षि के विचारों को माध्यम बनाकर लेखक ने विहंगम दृष्टि से ग्रन्थ लिखा है, पुस्तक में लेखक ने सरल-सरस और सुस्पष्ट रीति से वैदिक संस्कृति, दर्शन और धर्म की गहन गंभीर अवधारणाओं को बोधगम्य बनाया है। जिससे पाठक की समस्त शंकायें एवं जिज्ञासायें ग्रन्थ पढते-पढते स्वतः समाधान को प्राप्त हो जाती हैं। ग्रन्थ के अध्ययन उपरांत भारतीय संस्कृति में स्वतः आये अथवा सप्रयास लाये गये विक्षेपण स्वतः तिरोहित हो जाते हैं और ग्रन्थ की सार्थकता स्वतः सिद्ध हो जाती हैं। महर्षि के विचार, दृष्टिकोण, कृतित्व के अन्वेषण का गुरुतर कार्य विद्वान लेखक द्वारा किया जाकर ग्रंथ में वेदों के ज्ञान को गागर में सागर जैसा भरा है। हर दृष्टि से ‘महर्षि दयानन्द का समाज दर्शन’ कृति पठनीय और संग्रहणीय है।  डा नगायच की वर्षों से  की साधना से किये गए सृजन हेतु डॉ. उमाशंकर नगायच बधाई के पात्र हैं। ईश्वर से प्रार्थना है कि भविष्य में भी वे समाज कल्याण की दिशा/क्षेत्र में लेखन कार्य हेतु ऊर्जावान रहें।
कृति: ‘महर्षि दयानन्द का समाज दर्शन’
कृतिकार: डा. उमाशकर नगायच
117/6, शिवाजी नगर, भोपाल
मोबा. 09407518452
पृष्ठ संख्या: 414, मूल्य - 300 रु.
प्रकाषक:
आर्श गुरुकुल महाविद्यालय,नर्मदापुरम्,होशगाबाद म.प्र

शुक्रवार, अप्रैल 22

बवाल के स्वरों में सुनिये गीत " कुछ झन झन झन था"

लुकमान चाचा 


बवाल हिंदवी यानी एक सम्पूर्ण कलाकार यानी एकदम पूरा का पूरा बवाल जब मंच पर आये तो समझिये लोग एक पल भी ऐसे बवाल से दूर न होने की क़सम खा लेते हैं. विनोबा-भावे ने  जबलपुर को सैंत में न दिया ये नाम एक बानगी तो देखिये....


लाल और बवाल ब्लाग से साभार  



वाल एक ऐसे उस्ताद का शागिर्द है जिनने उर्दू -कव्वाली कव्वाली से उर्दू का एकाधिकार समाप्त किया.हिंदी कविताओं गीतों को प्रवेश दिलाया था कवाली-शैली की गायकी में. बवाल के गुरु स्वर्गीय लुकमा जो गंधर्व से कम न थे. हम लोगों में  गज़ब की दीवानगी थी चच्चा के लिये...देर रात तक उनको सुनना उनकी महफ़िल सजाना एक ज़ुनून था.. फ़िल्मी हल्के फ़ुल्के संगीत से निज़ात दिलाती चचा की महफ़िल की बात कैसे बयां करूं गूंगा हो गया हूं..गुड़ मुंह में लिये   
आप सोच रहें हैं न कौन लुकमान कैसा लुकमान कहाँ  का लुकमान जी हाँ इन सभी सवालों का ज़वाब उस दौर में लुकमान ने दे दिया था जब  उनने पहली बार भरत-चरित गाया. और हाँ तब भी तब भी जब गाया होगा ''माटी की गागरिया '' या मस्त चला इस मस्ती से थोड़ी-थोड़ी मस्ती ले लो   (आगे देखिये यहां चचा लुक़मान के बारे में)


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गुरुवार, अप्रैल 21

दीप अकेला -- अज्ञेय जी की एक रचना

आज एक कविता "अज्ञेय" जी की---
जो प्राप्त हुई है  सिद्धेश्वर जी के सौंजन्य से...

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन
Ajneya.jpg
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'
उपनाम:अज्ञेय
जन्म:७ मार्च १९११
कुशीनगरदेवरियाउत्तर प्रदेशभारत
मृत्यु:४ अप्रैल १९८७
दिल्लीभारत
कार्यक्षेत्र:कवि, लेखक
राष्ट्रीयता:भारतीय
भाषा:हिन्दी
काल:आधुनिक काल
विधा:कहानीकविताउपन्यासनिबंध
विषय:सामाजिकयथार्थवादी
साहित्यिक
आन्दोलन
:
नई कविता,
प्रयोगवाद
प्रमुख कृति(याँ):आँगन के पार द्वारकितनी नावों में कितनी बार
हस्ताक्षर:Hastaksharagyeya.jpg
विकीपीडिया से साभार 

दीप अकेला - अज्ञेय
यह दीप अकेला स्नेह भरा
है गर्व भरा मदमाता पर
इसको भी पंक्ति को दे दो

यह जन है : गाता गीत जिन्हें फिर और कौन गायेगा
पनडुब्बा : ये मोती सच्चे फिर कौन कृति लायेगा?
यह समिधा : ऐसी आग हठीला बिरला सुलगायेगा
यह अद्वितीय : यह मेरा : यह मैं स्वयं विसर्जित :

यह दीप अकेला स्नेह भरा
है गर्व भरा मदमाता पर
इस को भी पंक्ति दे दो

यह मधु है : स्वयं काल की मौना का युगसंचय
यह गोरसः जीवन-कामधेनु का अमृत-पूत पय
यह अंकुर : फोड़ धरा को रवि को तकता निर्भय
यह प्रकृत, स्वयम्भू, ब्रह्म, अयुतः
इस को भी शक्ति को दे दो

यह दीप अकेला स्नेह भरा
है गर्व भरा मदमाता पर
इस को भी पंक्ति दे दो
यह वह विश्वास, नहीं जो अपनी लघुता में भी काँपा,
वह पीड़ा, जिसकी गहराई को स्वयं उसी ने नापा,
कुत्सा, अपमान, अवज्ञा के धुँधुआते कड़वे तम में
यह सदा-द्रवित, चिर-जागरूक, अनुरक्त-नेत्र,
उल्लम्ब-बाहु, यह चिर-अखंड अपनापा
जिज्ञासु, प्रबुद्ध, सदा श्रद्धामय
इस को भक्ति को दे दो

यह दीप अकेला स्नेह भरा
है गर्व भरा मदमाता पर
इस को भी पंक्ति दे दो


बुधवार, अप्रैल 20

शरद कोकास एक जिद्दी व्यक्ति

साभार : शब्दों का सफ़र से

"शरद कोकास" ----एक सराहनीय और मिलाजुला प्रयास.......शरद कोकास एक जिद्दी व्यक्ति का नाम है.जी हाँ वह शरद कोकास एक जिद्दी जो की  कविता कोष में इस तरह से शामिल है
 

सोमवार, अप्रैल 18

दादी की पोथी ..

आज पुरानी पुस्तकों के बीच दादी की पोथी हाथ लगी....मूल्य लिखा है ५/- और नाम है
"रामायन मनका-१०८"...
बस और कुछ नहीं .....सोचा आज हनुमान जयंती है, तो इसे ही सब तक पहुँचाया जाए... 


और महावीर के चरणों में समर्पित ये
हन हनुमतये नम:
___________
हन हनुमंत दुष्ट दलन को
लाज़ रखो निर्बल जन मन को !
कुंठित दुष्ट क्रूर अग्यानी-
सुन कापैं तुम्हरी जस बानी..!
जो नारकी दिये दु:ख मोही-
राम की सौं मत तज़ियो सो ही .
मो सम भाग हीन तुम नाथा-
तुम संग जीत गयहुं जुग सा..!!

अब सुनिए--
रामायन मनका-१०८

रविवार, अप्रैल 17

अंगुली पुराण भाग दो


  

 गोया कृष्ण जीं ने गोवर्धन पर्वत को अंगुली पे क्या उठाया हमने उनकी तर्ज़ पर हर चीज़ को अंगुली पे उठाना चालू कर दिया है । मेरे बारे मे आप कम ही जानते हैं ...! किन्तु जब अंगुली करने की बात हो तो आप सबसे पहले आगे आ जायेंगें कोई पूछे तो झट आप फ़रमाएंगे "बस मौज ले रहा था ?" अंगुली करने की वृत्ति पर अनुसंधान करना और ब्रह्म की खोज करना दोनों ही मामलों में बस एक ही आवाज़ गूंजती है "नयाति -नयाति" अर्थात "नेति-नेति" सो अब जान लीजिये जिसे जो भी सीखना है सीख सकता है बड़ी आसानी से ...! ..........................................................................  ..... बहरहाल अंगुली का इस्तेमाल करो खूब जम के करो कोई गलत नहीं है पर ज़रा देख समझ के  कहीं ग़लत जगह चली गई तो अंगुली को खामियाज़ा भुगतना पड़ सकता है ....फ़िर मत कहना -"बताना तो था !!"
वरना बाबा  बाल ठाकरे ने क्या कहा था भारत के रत्न को की बाट जोहते सचिन भैया को
अब आगे :-
भास्कर से साभार 
ब्लागर जित गुप्ता  बोलीं कि हम तो अंगुली पर नचाना ही जानते हैं। जरूरत पड़े तो अंगुली टेडी करना भी जान जाते हैं। बज़ा फ़रमाया उनने, हमारे देश में जो भी कुछ था, है, रहेगा उसमें अंगुली का खास योगदान है. 
साभार विक्की पीडिया
चलिये एक कहानी सुनाए देता हूं :- एक  साहिब को हमारे होने न होने से कोई फ़र्क नही पड़ता हमने  न तो  उनकी भैंस बांधी  न ही उनकी पुश्तैनी बकरी के वंशज को हमने काटा पर किसी ने अंगुली कर दी हज़ूर हम पे बिफ़र गये. एक दिन बोले तुम से सारे सम्बध तोड़ता हूं 
हम बोले :- "जी साब,"
 उनसे हमारा रिश्ता कई बार टूटा कई बार हमने सोचा कि चलो काहे की बुराई पालें ग्वारीघाट में हम दौनो की बाड़ी जानी ही है तो काहे का बैर काहे की दुश्मनी पर हज़ूर लोगों से दुश्मनी यूं पालते जैसे कोई "कुत्ता बिलैया" पालने का शौकीन हो हम उनका मान रखने को उनसे अलग हो गये तो देखा हज़ूर को फ़िर भी चैन  नहीं .... इधर उधर अपनी कुंठित अंगुली करते नज़र आ रहे हैं. . .अपन ठहरे बे हया काहे का फ़र्क पड़ेगा हम पर हम पर फ़र्क न पड़ा जान हज़ूर ने अबकी बार अंगुली क्या पूरा का पूरा मुक्का  हमारी शान पर दे मारा. हम भी कम कलाकार नहीं दूर हट गये उधर से हटते ही भाई का घूंसा उर्फ़ मुक्का दीवार से टकराया सुना है अब हज़ूर प्लास्टर बांधे फ़िर रहे हैं. हां हमारा थोबड़ा सलामत है.  
           फ़त्ते जी की  सुख चैन की लाईफ़ चल रही थी कि एक दिन उनकी बीवी जिनकी अंगुलियों के इशारे पर वे नाचते थे कि रिश्ते अधेड़ कुआंरी  बहन जी आईं और न जाने क्या क्या पुरुष विरोधी बातें कि कि फ़त्ते जी के चरित्र पर   उनकी नवोढ़ा बीवी ने अंगुली उठाना शुरु कर दिया . बात इतनी बड़ गई कि - हालात तलाक तक पहुंच गये बमुश्किल भाई अपनी लाइफ़ बचा पाया. पालतू भैंसे की तरह आज़ कल जीवन गुज़ार रहा है. बेचारा........... 
    बाद में जाकर खुलासा हुआ कि जिस अंगुली बाज़ बहन की कुंठा की वज़ह से  नरक का आभास फ़त्ते  जी को हुआ उसका रिश्ता फ़त्ते जी के बड़े भाई के लिये आया था....
                            सरकारी गैर सरकारी संस्थानों में अंगुली बाज़ों की उपस्थिति न हो यह सम्भव कदापि नहीं.आगामी अंक में देखिये "संस्थानों के अंगुली बाज़ "