रविवार, नवंबर 30

तय करो की वोट बचाना है या की देश ?

"मेरे प्रिय "
वंदे-मातरम
यदि देश की अस्मिता और देश को बचाना है- तो चलिए इस
देश को चुनावी अखाडे में तब्दील होने से बचाएं , सब के सब
एक सुर में गायें "शुजलाम सुफलाम् मलयज शीतलाम "
हम को तय कराना ही होगा
"तय करो की वोट बचाना है या की देश "
इस पोस्ट की चर्चा की हरिभूमि ने अपने नियमित कालम "ब्लॉग की दुनिया से " में ०२/१२/२००८ को हरिभूमि का आभार ब्लॉग-चर्चा के लिए और पोस्ट को शामिल कराने के लिए

आ मीत लौट चलें

आ ओ मीत लौट चलें गीत को सुधार लें
वक़्त अर्चना का है -आ आरती संवार लें ।
भूल हो गई कोई गीत में कि छंद में
या हुआ तनाव कोई , आपसी प्रबंध में
भूल उसे मीत मेरे सलीके से सुधार लें !
छंद का प्रबंध मीत ,अर्चना के पूर्व हो
समेटी सुरों का अनुनाद भी अपूर्व हो,
अपनी एकता को रेणु-तक प्रसार दें ।
राग-द्वेष,जातियाँ , मानव का भेद-भाव
भूल के बुलाएं पार जाने एक नाव !
शब्द-ध्वनि-संकेत सभी आज ही सुधार लें !
इस गीत में सच आज जो बात कहनी चाही थी कौन सुनता इस गीत का संदेश खो गया था कुछ ने वाह वाह करके मेरी आवाज़ भुला दी कुछ अर्थ खोजते रहे फ़िर निरर्थक समझ के छोड़ दिया . कुछ के लिए तो फिजूल था कवि । मेरी यानी कवि की आत्मा को मारने वालो "तुम समझो देश तुम्हारे लिए खिलौना कतई न बने इस बात का तमीज इस भारत नें सीख लिया है "
आज मैं एक सूची जारी करना चाहता हूँ :- इसे स्वीकारना ही होगा
  1. भारत में कोई भी व्यक्ति या समुदाय किसी भी स्थिति में जाति, धर्म,भाषा,क्षेत्र के आधार पर बात करे उसका बहिष्कार कीजिए ।
  2. लच्छेदार बातों से गुमराह न हों ।
  3. कानूनों को जेबी घड़ी बनाके चलने वालों को सबक सिखाएं ख़ुद भी भारत के संविधान का सम्मान करें ।
  4. थोथे आत्म प्रचारकों से बचिए ।
  5. जो आदर्श नहीं हैं उनका महिमा मंडन तुंरत बंद हो जो भी समुदाय व्यक्ति ऐसा करे उसे सम्मान न दीजिए चाहे वो पिता ही क्यों न हो।
  6. ईमानदार लोक सेवकों का सम्मान करें ।
  7. भारतीयता को भारतीय नज़रिए से समझें न की विदेशी विचार धाराओं के नज़रिए से ।
  8. अंधाधुंध बेलगाम वाकविलास बंद करें ।
  9. नकारात्मक ऊर्जा उत्पादन न होनें दें ।
  10. देश का खाएं तो देश के वफादार बनें ।
  11. किसी भी दशा में हुई एक मौत को सब पर हमला मानें ।
  12. देश की आतंरिक बाह्य सुरक्षा को अनावश्यक बहस का मसला न बनाएं प्रेस मीडिया आत्म नियंत्रण रखें ।
  13. केन्द्र/राज्य सरकारें आतंक वाद पे लगाम कसने देश में व् देश के बाहर सख्ती बरतें । पुलिस , गुप्तचर एजेंसीयों को सतर्क,सजग,निर्भीक रखें उनका मनोबल न तोडें ।

शुक्रवार, नवंबर 21

शनिचरी - निठल्ले के साथ चिट्ठो का चिट्ठा


" शनिचरी":- सुबह संदेशा भर लाई कि

महाशक्ति समूह की चिंता को पाठकों स्पर्श न करना सिद्ध कर गया समंदर की हवाएं अब तरो-ताज़ा नहीं करतीं. हैं किंतु कोई यदि ये कहे कि- सर्द मौसम... और तुम्हारी यादें... तो बाक़ी मौसमों में क्या करतें हैं जी ? हाँ शायद इंतजारकर रहें होंगे इस मौसम का . युवाओं में विवाह के प्रति बढ़ती अनास्था की समस्या को देखते हुए सबकी चिंता जायज़ है न इसी लिए तो समाचार मिलता है कि- “ दो वर्ष में तीस हजार युवाओं को मिलेगा रोजगार ? अच्छी खबरिया ले आएं हैं इसे पड़कर. कुंवारी बेटी के बाप दूसरे समाचार से प्रभावित है. सभी कहतें है सूर्य उदय हो गया है . जयश्री का ब्लॉग सच देखने काबिल हैफ़ैमिली डॉक्टर की ज़रूरत है कबाड़खाने को. सियासी मैदान में ज़मीन तलाशती औरतें और इस समाचार के साथ पुरूष घरेलू कामकाज सीखरहे है, इस मसले पर ब्लॉग लिखने जा रहे हैं कुछ ख़बर चुनाव क्षेत्र से : संवाद दाता ताऊ भेज रहें है ज़रूर बांचिए '

जय शनि देव

बुधवार, नवंबर 12

माचिस की तीली के ऊपर बिटिया की से पलती आग

माचिस की तीली के ऊपर बिटिया की से पलती आग

यौवन की दहलीज़ को पाके बनती संज्ञा जलती आग .

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एक शहर एक दावानल ने निगला नाते चूर हुए

मिलने वाले दिल बेबस थे अगुओं से मज़बूर हुए

झुलसा नगर खाक हुए दिल रोयाँ रोयाँ छलकी आग !

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युगदृष्टा से पूछ बावरे, पल-परिणाम युगों ने भोगा

महारथी भी बाद युद्ध के शोक हीन कहाँ तक होगा

हाँ अशोक भी शोकमग्न था,बुद्धं शरणम हलकी आग !

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सुनो सियासी हथकंडे सब, जान रहे पहचान रहे

इतना मत करना धरती पे , ज़िंदा न-ईमान रहे !

अपने दिल में बस इस भय की सुनो 'सियासी-पलती आग ?


हाँ अशोक भी शोकमग्न था,बुद्धं शरणम हलकी आग

सोमवार, नवंबर 10

"ज्ञानरंजन जी अब पहल बंद कर देंगे "


पंकज स्वामी गुलुश नें बताया की ज्ञान जी ने अपना निर्णय सुना ही दिया की वे पहल को बंद कर देंगे कबाड़खाना ने इस समाचार को को पहले ही अपने ब्लॉग पर लगा दिया था. व्यस्तताओं के चलते या कहूं तिरलोक सिंह

होते तो ज़रूर यह ख़बर मुझे समय पर मिल गई होती लेकिन इस ख़बर के कोई और मायने निकाले भी नहीं जाने चाहिए . साहित्य जगत में यह ख़बर चर्चा का बिन्दु इस लिए है की मेरे कस्बाई पैटर्न के शहर जबलपुर को पैंतीस बरस से विश्व के नक्शे पर अंकित कर रही पहल के आकारदाता ज्ञानरंजन जी ने पहल बंद कराने की घोषणा कर दी . पंकज स्वामी की बात से करने बाद तुंरत ही मैंने ज्ञान जी से बात की .

ज्ञान जी का कहना था :"इसमें हताशा,शोक दु:ख जैसी बात न थी न ही होनी चाहिए .दुनिया भर में सकारात्मक जीजें बिखरीं हुईं हैं . उसे समेटने और आत्म सात करने का समय आ गया है"

पहल से ज्ञानरंजन से अधिक उन सबका रिश्ता है जिन्होंने उसे स्वीकारा. पहल अपने चरम पर है और यही बेहतर वक़्त है उसे बंद करने का .

हाँ,पैंतीस वर्षों से पहल से जो अन्तर-सम्बन्ध है उस कारण पहल के प्रकाशन को बंद करने का निर्णय मुझे भी कठोर और कटु लगा है किंतु बिल्लोरे अब बताओ सेवानिवृत्ति भी तो ज़रूरी है.

ज्ञान जी ने एक प्रश्न के उत्तर में कहा :-"हाँ क्यों नहीं, पहल की शुरुआत में तकलीफों को मैं उस तरह देखता हूँ की बच्चा जब उम्र पता है तो उसके विकास में ऐसी ही तकलीफों का आना स्वाभाविक है , बच्चे के दांत निकलने में उसे तकलीफ नैसर्गिक रूप से होती है,चलना सीखने पर भी उसखी तकलीफों का अंदाज़ आप समझ सकते हैं "उन घटनाओं का ज़िक्र करके मैं जीवन के आनंद को ख़त्म नहीं करना चाहता. सलाह भी यही है किसी भी स्थिति में सृजनात्मकता-के-उत्साह को कम न किया जाए. मैं अब शारीरिक कारण भी हैं पहल से अवकाश का

ब्लागर्स के लिए ज्ञान जी का कहना है :"पहल का विराम कोई अन्तिम विराम नहीं है सकारात्मकता के साथ स्वयं के और समाज के -विकास के डेरों दरवाज़े खुले हैं कभी भी कभी भी सकारात्मकता को विराम नहीं मिला हमें चाहिए कि सकारात्मकता को साथ लेकर आगे बढें "

जो जो भी करे बेहतर कर !

ज्ञानरंजन




ज्ञान जी पूरे उछाह के साथ पहल का प्रकाशन बंद कर रहें हैं किसी से कोई दुराग्रह, वितृष्णा,वश नहीं . पहल भारतीय साहित्य की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित एवं पठित ऐसी पत्रिका है जो कल इतिहास बन के सामने होगी बकौल मलय:"पहल,उत्कृष्ट विश्व स्तरीय पत्रिका इस लिए भी बन गई क्योंकि भारतीय रचना धर्मिता के स्तरीय साहित्य को स्थान दिया पहल में . वहीं भारत के लिए इस कारण उपयोगी रही है क्योंकि पहल में विश्व-साहित्य की श्रेष्ठतम रचनाओं को स्थान दिया जाता रहा'' मलय जी आगे कह रहे थे की मेरे पास कई उदाहरण हैं जिनकी कलम की ताकत को ज्ञान जी ने पहचाना और साहित्य में उनको उच्च स्थान मिला,

प्रेमचंद के बाद हंस और विभूति नारायण जी के बाद "वर्तमान साहित्य के स्वरुप की तरह पहल का प्रकाशन प्रबंधन कोई और भी चाहे तो विराम लगना ही चाहिए ऐसी कोशिशों पर पंकज गुलुश से हुई बातचीत पर मैंने कहा था "

इस बात की पुष्टि ज्ञान जी के इस कथन से हुई :-गिरीश भाई,पहल का प्रकाशन किसी भी स्थिति में आर्थिक कारणों,से कदापि रुका है आज भी कई हाथ आगे आएं हैं पहल को जारी रखे जाने के लिए . किंतु पहल के सन्दर्भ में लिया निर्णय अन्तिम है.

  • ज्ञान जी अब क्या करेंगें ?
  • ज्ञान जी ने क्यों पहल बंद कर दी
  • ज्ञान जी की पहल; का विकल्प
  • इनमें से अधिकाँश मुद्दों पर ज्ञान जी ने ऊपर स्पष्ट कर दिया है किंतु एक बार प्रथम बिन्दु की और सुधि पाठकों का ध्यान आकृष्ट कराना चाहूंगा ज्ञान जी ने कहा:-"A counceler i am availeble " ज्ञान जी ने यह भी कहा मुझे और सृजन करना है वो करूंगा ।
  • पहल के विकल्प के सम्बन्ध में ज्ञान जी का कथन है : "जो भी होगा अच्छा होगा ऐसा नहीं है कि पहल के बाद सब कुछ ख़त्म हो गया "
आज क्या बीस दिन से लगातार पहल को लेकर ज्ञान जी के पास फोन आ रहें हैं उन में आफर भी शामिल हैं । किंतु दृड़ता से सबसे कृतज्ञता भरे शब्दों में स्नेह बिखेरते ज्ञानरंजन संपृक्त विद्वान या कहूं महर्षि भाव से दृड़ता से अपने निश्चय का निवेदन कर ही लेते हैं ।



रविवार, नवंबर 9

एक थे तिरलोक सिंग जी

एक व्यक्तित्व जो अंतस तक छू गया है उनसे मेरा कोई खून का नाता तो नहीं किंतु नाता ज़रूर था कमबख्त डिबेटिंग गज़ब चीज है बोलने को मिलते थे पाँच मिनट पढ़ना खूब पङता था लगातार बक-बकाने के लिए कुछ भी मत पढिए ,1 घंटे बोलने के लिए चार किताबें , चार दिन तक पढिए, 5 मिनट बोलने के लिए सदा ही पढिए, ये किसी प्रोफेसर ने बताया था याद नहीं शायद वे राम दयाल कोष्टा जी थे ,सो मैं भी कभी जिज्ञासा बुक डिपो तो कभी पीपुल्स बुक सेंटर , जाया करता था। पीपुल्स बुक सेंटर में अक्सर तलाश ख़त्म हों जाती थी, वो दादा जो दूकान चलाते थे मेरी बात समझ झट ही किताब निकाल देते थे। मुझे नहीं पता था कि उन्होंनें जबलपुर को एक सूत्र में बाँध लिया है। नाम चीन लेखकों को कच्चा माल वही सौंपते है इस बात का पता मुझे तब चला जब पोस्टिंग वापस जबलपुर हुयी। दादा का अड्डा प्रोफेसर हनुमान वर्मा जी का बंगला था। वहीं से दादा का दिन शुरू होता सायकल,एक दो झोले किताबों से भरे , कैरियर में दबी कुछ पत्रिकाएँ , जेब में डायरी, अतरे दूसरे दिन आने लगे मलय जी के बेटे हिसाब बनवाने,आते या जाते समय मुझ से मिलना भूलने वाले व्यक्तित्व ..... को मैंने एक बार बड़ी सूक्ष्मता से देखा तो पता चला दादा के दिल में भी उतने ही घाव हें जितने किसी युद्धरत सैनिक के शरीर,पे हुआ करतें हैं। कर्मयोगी कृष्ण सा उनका व्यक्तित्व, मुझे मोहित करने में सदा हे सफल होता..... ठाकुर दादा,इरफान,मलय जी,अरुण पांडे,जगदीश जटिया,रमेश सैनी,के अलावा,ढेर सारे साहित्यकार के घर जाकर किताबें पढ़वाना तिरलोक जी का पेशा था। पैसे की फिक्र कभी नहीं की जिसने दिया उसे पढ़वाया , जिसके पास पैसा नहीं था या जिसने नही दिया उसे भी पढवाया कामरेड की मास्को यात्रा , संस्कार धानी के साहित्यिक आरोह अवरोहों , संस्थाओं की जुड़्न-टूटन को खूब करीब से देख कर भी दादा ने इस के उसे नहीं कही। जो दादा के पसीने को पी गए उसे भी कामरेड ने कभी नहीं लताडा कभी मुझे ज़रूर फर्जी उन साहित्यकारों से कोफ्त हुई जिनने दादा का पैसा दबाया कई बार कहा " दादा अमुक जी से बात करूं...? रहने दो ...? यानी गज़ब का धीरज सूरज राय "सूरज" ने अपने ग़ज़ल संग्रह के विमोचन के लिए अपनी मान के अलावा मंच पे अगर किसी से आशीष पाया तो वो थे :"तिरलोक सिंह जी " इधर मेरी सहचरी ने भी कर्मयोगी के पाँव पखार ही लिए। हुआ यूँ कि सुबह सवेरे दादा मुझसे मिलने आए किताब लेकर आंखों में दिखना कम हों गया था,फ़िर भी आए पैदल सड़क को शौचालय बनाकर गंदगी फैलाने वाले का मल उनके सेंडील मे.... मेन गेट से सीदियों तक गंदगी के निशान छपाते ऊपर गए दादा. अपने आप को अपराधी ठहरा रहे थे जैसे कोई बच्चा गलती करके सामने खडा हो. इधर मेरा मन रो रहा था की इतना अपनापन क्यों हो गया कि शरीर को कष्ट देकर आना पड़ा दादा को .संयुक्त परिवार के कुछ सदस्यों को आपत्ति हुयी की गंदगी से सना बूडा आदमी गंदगी परोस गया गेट से सीडी तक . सुलभा के मन में करूणा ने जोर मारा . उनके पैर धुलाने लगी .

शुक्रवार, नवंबर 7

मेरा संसार :ब्लॉग कहानी भाग 02

छवि-साभार :शैली खत्री के ब्लॉग बार -बार देखो से
समय चक्र ने रुकना कहाँ सीखा यदि समय रुक जाना सीख लेता तो कितना अजीब सा दृश्य होता . प्रथम प्रीत का मुलायम सा एहसास मेरे जीवन में आज भी कभी उभर आता है . मधुबाला सी अनिद्य सुन्दरी जीवन में प्रवेश करती है . चंचला सुनयनी मेरी प्रिया का वो नाम न लूंगा जो है उसे क्षद्म ही रखना उसका सम्मान है . चलिए सुविधा के लिए उसे "मधुबाला" नाम दे दिया जाए .दब्बू प्रकृति का मैं किसी मित्र के अपमानजनक संबोधन से क्षुब्ध कालेज की लायब्रेरी में किताब में मुंह छिपाए अपने आप को

पढ़ाकू साबित कर रहा था. तभी मधु जो मेरे पीछे बैठी मेरे एक एक मूवमेंट पर बारीकी से निगाह रख रही थी बोल पड़ी :'क्या हुआ ?....रो क्यों रहे हो ?'

'कुछ तो नहीं ?'

नहीं,दीपक से कोई कहा सुनी हो गई ?

नहीं तो .........! विस्मित मैं उससे छुटकारा पाने की गरज से क्लास अटैंड करने का बहाना करके निकल गया. मधु मेरा पीछा करते-हुए सीडियों से उतर रही थी ,

कर मधु ने अपने जन्म दिन का न्योता दिया . और मेरी हाँ सुनते ही मुझे पीछे छोड़ते आगे निकल गयी.मेरी पीड़ा प्रथम आमंत्रण से रोमांच में बदल गयी. मन ही मन आहिस्ता आहिस्ता सपनों की आवाजाही शुरू हो गयी.

जन्मदिन के दिन जब मई मधु के घर पहुंचा.जन्मदिन का उपहार जो उसने खोला तो मधु का परिवार बेहद प्रसन्न हुआ मेरे उपहार चयन को ले कर होता भी क्यों न साहित्यिक किताबें थीं जो मधु के पिता जी को आकर्षित कर रहीं थी . इससे अधिक वे मुझे पुत्री के निरापद मित्र होने का खिताब दे चुके थे मन ही मन . जन्मदिन की संक्षिप्त पारिवारिक पार्टी में मै अपने आप को मिसफिट पा रहा था. किंतु मधु के पापा थे की मुझसे चर्चा करने लगे . बमुश्किल मैं उनसे इजाज़त पा सका था उस दिन . मधु बाहर तक छोड़ने आयी मुझे रिक्शा लेना था सो थोड़ा गेट पर चर्चा करने का अवसर भी मिला उसे बस अवसर मिलते ही मधु बोल पड़ी :- लड़कियों को गिफ्ट भी नहीं देना आता बुद्धू कहीं के ?

मैं अवाक उसे अपलक देखता रहा कि एक ऑटो सर्र से निकल गया . तभी मधु ने एक फूल जो अपने साथ लाई थी मुझे दिया मैंने पूछा "ये क्या है ? "

फ़िर वही ,बुद्धू ...ये रिटर्न गिफ्ट है.........! साॅरी तुमको तो रामायण गीता देना थी .

तत्क्षण मेरे अंर्तमन का युवक प्रगट हो गया और मैं बोल पड़ा :"सुनो मधु , मेरा अन्तिम लक्ष्य सिर्फ़ ये.....नहीं है मैं सब जानता हूँ जो तुम कहना चाह रहीं हो लेकिन सही समय पर ही सही काम करना चाहिए अभी हम मित्र ही हैं एक दूसरे के "

ठीक है लेकिन फ़िर मिलोगे तो मुझे तुम से बात करनी है ?

"ज़रूर,किंतु समय की प्रतीक्षा तो करनी ही होगी तुमको "

ठीक है....! पर याद रहे अगले जन्म-दिन के पहले ?

"कोशिश करूंगा ...!"

समय को रोकना आपकी तरह मुझे भी नहीं आता । आए भी तो समय को ख़ुद रुकना आता है क्या......! और समय को रुकना भी आ जाए तो क्या समाज रुकना चाहता है न ही चाहेगी मधुबाला कि उसका अगला जन्म दिन ठीक उस तारीख को न हो । माँ -बाबूजी भी तो चाहते थे कि बेटों की शादियाँ तभी हों जब कि उनकी बेटियाँ ब्याह जाएँ हम घर के अनुशासन को भंग भी नहीं करना चाहते थे । अपने लिए तो सभी जीतें हैं किंतु माँ बाप के सपनों और उनकी आकांक्षाओं के विरुद्ध बिगुल भी नहीं बजाना है इसी सोच को लेकर हम अनुशासित रहे ।हो सकता है कि पिछडेपन की निशानी थी हमारी औरों की नज़रों में ......हम संतुष्ट थे। मधु की -इज़हारे तमन्ना पर अपना रिअक्शन न देना अच्छा था या बुरा ,सही था या ग़लत मुझे मेरा कवि बार बार कहता -"पता तो करो किसी नायिका से कोई भी नायक ऐसा बर्ताव नहीं करता कभी "

'' राम ने भी तो '

राम ने क्या अनुशासन तोडा़ था परिवार का , नहीं उनने तो सिर्फ़ धनुष तोडा था वो जो सशक्त आयुध था , उसका जिसने स्वयं कामदेव को उद्दंडता का सबक सिखाया था । राम ने कभी कोई मर्यादाएं नहीं तोडी । मन ऐसी स्थिति में पीर से सराबोर हुआ कवि तब जागा और रच दिया प्रीतगीत

साथ ही उस दौर में लिखी गयी इस तरह , रचना करना कैसे सीखा मुझे नहीं मालूम किन्तु ऐसा ही है चिंतनघट से जब भाव रस पीया तो ऐसी ही कविता निकली दिल से अपनी चिंता के पैमानों से कुछ पी कर ऐसी कविता कभी न कह पाता । मेरी कवितायेँ सुनाने वालों में मधु भी होती किंतु कविताओं से बेखर ही होती थी वो उसे केवल एक प्रीतगीत ही पसंद था । वैसी कविता लिखने का आग्रह कई बार किया मुझसे न लिखा गया । मेरी कवितायेँ को बूडों़ की कविताएँ होने का आरोप मिला मुझे बुरा नहीं लगा था आज भी वो चुलबुली सी खनकती आवाज़ सुनाई देती है मुझे । आप सोच रहें है न कि उस नायिका का क्या हुआ ? क्या मैं...............?

फ़िर कभी बताउगा अगली किश्त में ये सवाल आप पर ही छूड़ता हूँ कि आप अंदाज़ लगाएं अगली पोस्ट तक ........!



गुरुवार, नवंबर 6

विमर्श


संदेह को सत्य समझ के न्यायाधीश बनने का पाठ हमारी ."पुलिस " कोअघोषित रूप से मिला है भारत /राज्य सरकार को चाहिए की वे,सामाजिक आचरण के अनुपालन कराने के लिए,पुलिस को दायित्व नहीं देना चाहिए . इस तरह के मामले,चाहे सही भी हों विषेशज्ञ से परामर्श के पूर्व सार्वजनिक किएँ,जाएँ , एक और आरुशी के मामले में पुलिस की भूमिका,के अतिरिक्तदेखा जा रहा है पुलिस सर्व विदित है .
सामान्य रूप से पुलिस की इस छवि का जन मानस में अंकन हो जाना
समाज के लिए देश के लिए चिंतनीय है , सामाजिक-मुद्दों के लिए
बने कानूनों के अनुपालन के लिए पुलिस को सौंपा जाए बल्कि पुलिस इन मामलों के निपटारे के लिए
विशेष रूप से स्थापित संस्थाओं को सौंपा जाए
संदेह को सत्य समझ के न्यायाधीश बनने का पाठ हमारी पुलिस को
अघोषित रूप से मिला है भारत /राज्य सरकार को चाहिए की वे
सामाजिक आचरण के अनुपालन कराने के लिए
पुलिस को दायित्व नहीं देना चाहिए . इस तरह के मामले
चाहे सही भी हों विषेशज्ञ से परामर्श के पूर्व सार्वजनिक किएँ
जाएँ , एक और आरुशी के मामले में पुलिस की भूमिका,के अतिरिक्त
देखा जा रहा है पुलिस सर्व विदित है .
सामान्य रूप से पुलिस की इस छवि का जन मानस में अंकन हो जाना
समाज के लिए देश के लिए चिंतनीय है , सामाजिक-मुद्दों के लिए
बने कानूनों के अनुपालन के लिए पुलिस को सौंपा जाए बल्कि पुलिस इन मामलों के निपटारे के लिए
विशेष रूप से स्थापित संस्थाओं को सौंपा जाए .
"किंतु इस सबसे पहले इधर भी गौर करें "
दर असल पुलिस को लेकर सामाजिक सोच नेगेटिव होने के कारण जग ज़ाहिर हैं
किंतु कभी आपने पुलिस वालो के जीवन पर गौर किया होगा तो आप पाया ही होगा
व्यक्तिगत-पारिवारिक जीवन कितना कठिनाइयों भरा होता है .
सोचिए जब बेटी के साथ ,मुस्कुराने का वक्त हो तब उनको वी आई पी ड्यूटी में लगे होना हो,पिता बीमार हैं और सिपाही बेटा नौकरी बजा रहा हो ,या होली,दीवाली,ईद,दीवाली,इन सब को दूर से देखने वाले पुलिस मेन की संवेदना हरण होना अवश्यम्भावी है. चलिए सिर्फ़ पुलिस की आलोचना करने के साथ साथ व्यवस्था में सुधार के लिए चर्चा कर उनको संवेदनशील,ईमानदार,ज़बावदार,बनाने सटीक सुझाव दें, कोई तो कभी तो सुनेगा ही
पुलिस जीवन के लिए मेरी सोच जो मैंने,उन दिनों देखी थी जब मैं लार्डगंज पुलिस-कालोनी में बच्चों को ट्यूशन पढाता था
बहुत करीब से इनको देखा था तब आँखें भर आया करतीं थीं उस स्थिति पर आधारित है . आप भी इसे देख सकतें हैं आज भी कमोबेश दशा वही है
प्रेरणा :
भाई समीर यादव की पोस्ट "शहीद पुलिस "से प्रेरित हुआ हूँ और संग साथ हैं बीते दिनों की यादें जिन दिनों बेरोज़गारी के दौर में ट्यूशन पढाता मैं लार्डगंज जबलपुर के वाशिंदे पुलिस वालों के बच्चों को जिनमें से अधिकाँश अच्छी नौकरियों में अब मिलते हैं कभी कभार नमस्ते मामाजी के संबोधन सहित

मंगलवार, नवंबर 4

मेरा संसार :ब्लॉग कहानी

आचार्य रजनीश
(वेब दुनिया से साभार )

सर , और सर के चम्मच जो सर के खाने के सहायक उपकरण होते हैं को मेरा हार्दिक सलाम मैं….. आपका दास जो आपको नहीं डालता घास ,इसलिए क्योंकि आप कोई गधे थोड़े हैं॥ आप आप हैं मैं आपका दास इतना दु:साहस कैसे करूँ हज़ूर । आप और आपका ब्रह्म आप जानिए मेरा तो एक ही सीधा सीधा एक ही काम है.आपकी पोल खोलना . आपकी मक्कारियों की पाठशाला में आपको ये सिखाया होगा कि किस तरह लोगों को मूर्ख बनाया जाता है..किन्तु मेरी पाठशाला में आप जैसों को दिगंबर करने का पाठ बडे सलीके से पढाया गया मैंनें भी उस पाठ को तमीज से ही पढा है.तरकश का तीर कलम का शब्द सटीक हों तो सीने में ही उतरते हैं सीधे ॥ तो सर आप अपने स्पून सम्हाल के रखिये शायद ये आपके बुरे वक़्त में काम आ जाएँ । परंतु ऐसा कतई नहीं . होगा सर आप अपने सर से मुगालता उतार दीजिए । कि कोई चम्मच खाने के अलावा कभी और उपयोग में लाया जा सकता है॥

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एक ऑफिस में बॉस नाम की चीज़ भेजी जाती है…..लोग समझते हैं कि बॉस ऑफिस चलाता है । यहाँ आपको बता दूं - ऑफिस तो चपरासी जिसका नाम राजू आदि हों सकता हैवोही तो ऑफिस खोलता सुबह समय पर तिरंगा चढाता है। शाम उसे निकालता है आवेदन लेता है साहब को बाबू के हस्ते आवेदन देता है । आवेदक को काम के रस्ते बताता है…! बेकार फ़ाइल जिससे कुछ उपजने की उम्मीद ना हों ऎसी नामुराद नास्तियों को बस्ते में सुलाता है। अब भैया ! आप ही बताओ न ! ऑफिस कौन चलाता है….?

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आप को इस बात को समझाता हूँ -”सरकार में लोग बाग़ काम करतें हैं काम होना तो कोई महत्वपूर्ण बात है ही नहीं महत्त्व तो काम नहीं हों तब दीखता है अब देखिए न….. दफ्तर में बाबूलाल की अर्जी के खो जाने का ठीकरा मैने जांच के बाद राजू भृत्य के सर फोड़ दिया बाबूलाल भी खुश हम भी खुश । जिम्मेदारी तय करने जब लोग निकले हजूर पाया गया छोटी नस्ल के कर्मचारी दोषी हैं । भैया दोषी वोही होता है जो सबसे ज्यादा ज़िम्मेदार हों जैसे मेरा चपरासी राजू …!भैया ! देखा सबसे छोटा सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार है देश में बाकी आप खुद समझ दार हैं ……आगे क्या लिखूं …. आप समझ गए न ।

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तो भाई इस लम्बी कहानी में मैं हूँ ,आप हैं हम सभी तो हैंचालू रहेगा ये उपन्यास जो राग दरबारी वाले आई.ए.एस.की तर्ज़ पर तो नही पर उनसे प्रभावित ज़रूर होगा अगर ये आपकी आत्म कथा है तो आन लाईन कमेन्ट दे देना शायद मेरे काम आ जायेगी

आपकी बात……ऊपर जो लिखा सो लिखा उसे भूल जाना वो तो यूँ ही लिख दिया कहानी शुरू होती हैअब सो सुन भाई साधौ ….टूटे फूटे घर में रहने वाला राजू चपरासी घर से परेशान होता तो भगवान् से अपने घर को सर्किट हाउस सा बनाने की नामुराद अपील करता !

अपील तो सब करतें हैं सबकी अपील अलाऊ हो ये कैसे संभव है . सर्किट हाउस जब अच्छे-अच्छों को को लुभा सकता है तो वो राजू को क्यों नहीं लुभा सकता . आपको याद होगा अब्राहम लिंकन को सफ़ेद-घर पसंद आया वो अमेरिका के सदर बने थे न.? यदि वे सपना देख सकते हैं तो अपने राजू ने देखा तो क्या बुरा किया

आज कल मेरे शहर के कई लोग मुझसे पूछ रहें हैं भाई, क्या नया कुछ लिखा जीं ख़ूब लिख रहा हूँ …!क्या ..गद्य या गीत …?अपुन को उपर से नीचे सरकारी अफसर हुआ देख उनके हरी लाल काली सारी मिर्चियां लग गईँ कल्लू भैया हमसे पूछ बैठे:-” क्या चल रहा है ?”

हमारे मुँह से निकल पड़ा जो दिल में था , हम ने कहा-भाई,आजकल हमारी बास से खट पट चल रही हैवो शो- काज लिख रहे हैं और अपन उसका ज़बाव !

ये तो आप राज काज की बात कर रहे होमैं तो आपकी साहित्य-साधना के बारे मैं पूछ रहा .?

मैंनें कहा - भाई,साहित्य और जीवन के अंतर्संबंधों को पहचानों लोग बाग़ मेरी बात में कुंठा को भांपते कन्नी काटते । हमने भी लोगों के मन की परखनली में स्प्रिट लैंप की मदद से उबलते रसायन को परखा , अब जो हमको साहित्य के नाम पे चाटता तो अपन झट राग सरकारी गाने लगते , जो सरकारी बात करता उसको हम साहित्यिक-वार्ता में घसीट लेते.

कोई अपने दर्द के अटैची लेकर आता मेरे पास तो मैं अपनी मैली-कुचैली पोटली खोलने की कोशिश करता !इससे - वो लोग मेरे पास से निकल जाते कुछ तो समझने लगे जैसे मैं बदबू दार हूँ…!”और अपन बेमतलब के तनाव से दूर..!!

हजूर ! रजनीश और गिरीश दौनों ही एक ही शहर के पर्यावरण से सम्बंधित हैंअब देखिए ! सामर्थ्य की चाबी को लेकर ओशो दिमागी तौर पर लगभग बेहद उत्साहित हो जाते थे । अपने राम भी ऐसे लोगों को जो "सामर्थ्य की चाबी " लेकर पैदा हुए मामू बना देते हैं , जेइच्च धंधा है अपुन का….!

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ओशो से अपना गहरा नाता रहा है वो वक्ता थे अपन भी वक्ता है डेरों प्रमाण हैं इसके खूब शील्डैं जीतीं थीं हमने उषा त्रिपाठी के संग डी एन जैन कालेज के लिए भैया धूम थी अपनी उनदिनों ओशो के लगभग 25 साल बाद .जब हम अपने वज़न से भारी रजत वैजयंती लेकर आए ....प्राचार्य .प्रोफेसर .विनोद अधौलिया जी रो पड़े थे पिता स्व.भगवत शरण जी को याद करके .जी उस दौर में मेरी तरक्की सदाचार के लिए मेरे गुरुदेवों ने आशीर्वाद दिए थे. माँ-बाबूजी भी मुझे लेकर चिंतनरत होते .

सब कुछ बड़ों के आशीर्वाद से ही घटा है जीवन में . अफसरी मिली भले छोटी नस्ल के बड़ी भी मिलती तो क्या वही सब कुछ करता जो आज कर रहा हूँ.

@@@@ भाग एक संपन्न

सोमवार, नवंबर 3

विषय

"विषय '',
जो उगलतें हों विष
उन्हें भूल के अमृत बूंदों को
उगलते
कभी नर्म मुलायम बिस्तर से
सहज ही सम्हलते
विषयों पर चर्चा करें
अपने "दिमाग" में
कुछ बूँदें भरें !
विषय जो रंग भाषा की जाति
गढ़तें हैं ........!
वो जो अनलिखा पढ़तें हैं ...
चाहतें हैं उनको हम भूल जाएँ
किंतु क्यों
तुम बेवज़ह मुझे मिलवाते हो इन विषयों से ....
तुम जो बोलते हो इस लिए कि
तुम्हारे पास जीभ-तालू-शब्द-अर्थ-सन्दर्भ हैं
और हाँ तुम अस्तित्व के लिए बोलते हो
इस लिए नहीं कि तुम मेरे शुभ चिन्तक हो
मेरा शुभ चिन्तक मुझे
रोज़ रोटी देतें है
चैन की नींद देते हैं

रविवार, नवंबर 2

रविवार शाम ढलते-ढलते एक ब्लॉग चर्चा !!

"प्यार करते हैं",बयाँ भी किया करतें है हज़ूर ये न करें तो बवाल मचने का पूरा खतरा है की कहीं कोई पूछ न ले कि क्‍या हम प्‍यार कर रहे थे ...?। कुछ बेतुकी, और अनाप शनाप बाते,यकीनन आहिस्ता आहिस्ता..ही समझतें है लोग यदि न करें तो क्या करें भैया एक ब्लॉगर भैया ने किसी की '' पोस्ट ",क्या चुराई यमराज ने , " गीता - सार बता दिया जैसे ही सुमो, हलवान ने जो बताया उससे सबको कुछ और पता चलाखैर जो भी हो उधर बात ज़्यादा नहीं बढेगी बस छोटे-बड़े का ओहदा तय होगा कहानी अपने आप ख़तम हो जाएगीमुम्बई से बाहर जा सकता है भोजपुरी फिल्म उद्योग यदि तो "भइया""जबलपुर - "आ जाना अपन इंतज़ाम कर देंगे यहाँ सबई कछु उपलब्ध है । आपका इंतज़ार रहेगा हम तब तक रख लिए हमने "तकिए पर पैर" और भोजपुरी निर्माताओं के निर्णय का इंतज़ार कर रहे हैं । राज के राज में मनोज बाजपेई, ,की किसी सांकेतिक पोस्ट का न आना अभिव्यक्ति पर सेंसर शिप जैसा है। जानते है जल में रह कर मगर से बैर ...........?