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सोमवार, नवंबर 28

जी हां मैं मुम्बई से सीधा प्रसारण करूंगा :गिरीश बिल्लोरे


प्रेस विज्ञप्ति
शुक्रवार दि. 09 दिसंबर 2011 को सुबह 10 बजे से कल्याण पश्चिम स्थित के. एम. अग्रवाल कला, वाणिज्य एवम् विज्ञान महाविद्यालय में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग संपोषित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद््घाटन सुनिश्चित हुआ है।  संगोष्ठी का मुख्य विषय है ``हिन्दी ब्लागिंग : स्वरूप, व्याप्ति और संभावनायें।'' यह संगोष्ठी शनिवार 10 दिसंबर 2011 को सायं. 5.00 बजे तक चलेगी।
संगोष्ठी के उद््घाटन सत्र में डॉ. विद्याबिन्दु सिंह - पूर्व निदेशिका उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ, श्री. रवि रतलामी - वरिष्ठ हिन्दी ब्लॉगर मध्यप्रदेश एवम् डॉ. रामजी तिवारी - पूर्व अध्यक्ष हिंदी विभाग मुंबई विद्यापीठ, मुंबई के उपस्थित रहने की उम्मीद है। विशिष्ट अतिथि के रूप में नवभारत टाईम्स, मुंबई के मुख्य उपसंपादक श्री. राजमणि त्रिपाठी जी भी उपस्थित रहेंगे। संगोष्ठी का उदघाटन  संस्था के सचिव श्री. विजय नारायण पंडित करेंगे। एवम् अध्यक्षता संस्था के अध्यक्ष डॉ. आर. बी. सिंह करेंगे।
इस संगोष्ठी का `वेबकास्टिंग' के माध्यम से पूरी दुनिया में जीवंत प्रसारण (लाईव टेलीकॉस्ट) करने की योजना है। इसकी जिम्मेदारी वरिष्ठ हिंदी ब्लॉगर गिरीश बिल्लोरे - मध्यप्रदेश ने ली है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग संपोषित हिंदी ब्लागिंग पर आयोजित होनेवाली यह देश की संभवत: पहली संगोष्ठी होगी। इस संगोष्ठी में प्रस्तुत किए जानेवाले शोध-प्रबंधों को पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित करने की योजना भी महाविद्यालय बना चुका है। हिंदी ब्लागिंग पर प्रकाशित होने वाली यह तीसरी पुस्तक होगी।
इस संगोष्ठी में संपूर्ण भारत से प्रतिभागी आ रहे हैं। इनमें हिंदी के कई शीर्षस्थ ब्लागर भी होंगे। जैसे कि - अविनाश वाचस्पति - दिल्ली, डॉ. हरीश अरोरा - दिल्ली, डॉ. अशोक मिश्रा - मेरठ, केवलराम-हिमांचल प्रदेश, रवीन्द्र प्रभात - लखनऊ, सिद्धार्थ त्रिपाठी - लखनऊ, शैलेष भारतवासी - कलकत्ता, मानव मिश्र - कानपुर, रवि रतलामी - मध्य प्रदेश, गिरीश बिल्लोरे - मध्य प्रदेश, आशीष मोहता - कलकत्ता, डॉ. अशोककुमार - पंजाब, श्रीमती अनिता कुमार - मुंबई, यूनुस खान - मुंबई, अनूप सेठी - मुंबई इत्यादि। वरिष्ठ साहित्यकार श्री. आलोक भट्टाचार्य जी भी इस संगोष्ठी में सम्मिलित हो रहे है। विभिन्न महाविद्यालयों - विश्वविद्यालयों से जुड़े प्राध्यापक भी बड़ी संख्या में इस संगोष्ठी में शामिल हो रहे हैं। इनमें से कुछ प्रमुख नाम हैं - डॉ. रामजी तिवारी - मुंबई, डॉ. आर. पी. त्रिवेदी-मुंबई, डॉ. प्रकाश मिश्र - कल्याण, डॉ. एस. पी. दुबे - मुंबई, डॉ. सतीश पाण्डेय - मुंबई, डॉ. के. पी. सिंह - ऍटा, डॉ. एन्.एन्.राय-रायबरेली, डॉ. शमा खान- बुलंदशहर, डॉ. ईश्वर पवार-पुणे, डॉ. गाडे-सातारा, डॉ. शास्त्री - कर्नाटक, डॉ. परितोष मणि-मेरठ, डॉ. अनिल सिंह-मुंबई, डॉ. कमलिनी पाणिग्रही-भुवनेश्वर, डॉ. पवन अग्रवाल - लखनऊ, डॉ. मधु शुक्ला-इलाहाबाद, डॉ. पुष्पा सिंह-आसाम, डॉ. गणेश पवार-तिरूपति, विभव मिश्रा-मेलबर्न आस्ट्रेलिया, डॉ. सुरेश चंद्र शुक्ल-नार्वे, डॉ. शशि मिश्रा-मुंबई, डॉ. सुधा -दिल्ली, डॉ. विनीता-दिल्ली, डॉ. बलजीत श्रीवास्तव - बस्ती, डॉ. विजय अवस्थी-नाशिक, डॉ. संजीव दुबे-मुंबई, डॉ. वाचस्पति-आगरा, डॉ. संजीव श्रीवास्तव-मथुरा, डॉ. डी. के. मिश्रा - झाँसी इत्यादि।
दो-दिवसीय यह राष्ट्रीय संगोष्ठी कुल 06 सत्रों में विभाजित है। उद््घाटन सत्र एवम् समापन सत्र के अतिरिक्त चार चर्चा सत्र होंगे। पूरी संगोष्ठी का संयोजन महाविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रभारी डॉ. मनीष कुमार मिश्रा कर रहे हैं। चार चर्चा सत्रों के लिए चार सत्र संयोजक नियुक्त किये गये हैं। क्रमश: डॉ. आर. बी. सिंह - उपप्राचार्य, अग्रवाल कॉलेज, डॉ. (श्रीमती) रत्ना निम्बालकर - उपप्राचार्य अग्रवाल महाविद्यालय, डॉ. वी. के. मिश्रा, वरिष्ठ प्राध्यापक एवम् सी.ए. महेश भिवंडीकर - वरिष्ठ प्राध्यापक - अग्रवाल कॉलेज। महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. अनिता मन्ना संगोष्ठी से जुड़ी सारी तैयारियों की व्यक्तिगत तौर पर देखरेख कर रही हैं।
इस संगोष्ठी की मुख्य बाते निम्नलिखित हैं। 
1) विश्व विद्यालय अनुदान आयोग संपोषित यह हिंदी ब्लागिंग पर आयोजित संभवत: देश की पहली संगोष्ठी है। 
2) पूरे दो दिन की संगोष्ठी का वेब कास्टिंग के जरिये इंटरनेटपर सीधा प्रसारण होगा। 3) इस संगोष्ठी में प्रस्तुत किये जानेवाले शोध आलेखों को पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित किया जा रहा है। जो कि हिंदी ब्लॉगिंग पर प्रकाशित होनेवाली देश की तीसरी पुस्तक होगी। 
4) हिंदी ब्लॉगरो एवम् हिंदी प्राध्यापकों को एक साथ राष्ट्रीय मंच प्रदान करने का यह नूतन प्रयोग होगा। दो दिनों के कार्यक्रम का विवरण संलग्न है।

 डॉ. (श्रीमती) अनिता मन्ना                                         
  प्राचार्या - के.एम.अग्रवाल महाविद्यालय
डॉ. मनीष कुमार मिश्रा
संयोजक एवम प्रभारी हिंदी विभाग
        मो. 8080303132

मंगलवार, अप्रैल 12

अंगुली-पुराण


(आपने शायद भारत ब्रिगेड पर यह सटायर  देखा होगा .... न देखा हो तो कोई हर्ज़ नहीं उस अधूरे आलेख को पूरा कर आदर-सहित पेश कर रहा हूं यहां....)
अंगुली करने में हम भारत वालों की कोई तोड़ नहीं है ।हमें हर मामले में उंगली करनें में महारत हासिल है .....!
             गोया कृष्ण जीं ने गोवर्धन पर्वत को अंगुली पे क्या उठाया हमने उनकी तर्ज़ पर हर चीज़ को अंगुली पे उठाना चालू कर दिया है । मेरे बारे मे आप कम ही जानते हैं ...! किन्तु जब अंगुली करने की बात हो तो आप सबसे पहले आगे आ जायेंगें कोई पूछे तो झट आप फ़रमाएंगे "बस मौज ले रहा था ?" अंगुली करने की वृत्ति पर अनुसंधान करना और ब्रह्म की खोज करना दोनों ही मामलों में बस एक ही आवाज़ गूंजती है "नयाति -नयाति" अर्थात "नेति-नेति" सो अब जान लीजियेजिसे जो भी सीखना है सीख सकता है बड़ी आसानी से ...! जानते हैं कैसे ? अरे भाई केवल अंगुली कर कर के !! मुझ जैसे लोग जो कम्प्यूटर को कम भी न जानते थे बस अंगुली कर कर के कम्प्यूटर-कर्म सीख गया देखिये मेरी अंगुली को आज तक कुछ भी नहीं हुआ ...! ये अलहदा बात है कि कम्प्यूटर ज़रूर थोड़ा खराब हुआ । इससे आप को क्या शिक्षा मिली ......? यही कि "चाहे जहाँ ,जितनी भी अंगुली करो अंगुली का बाल भी बांका नहीं होगा । इतिहास गवाह है कृष्ण जीं की अंगुली याद करिये !  
                     इंद्र की बोलती बंद कर दी योगेश्वर ने उनकी अंगुली का कुछ भी न हुआ. होता भी कैसे प्रभु ने अंगुली बनाते वक़्त उसके अनुप्रयोग के बाद किसी भी विपरीत प्रभाव के न पड़ने का अभय दान सिर्फ अँगुलियों को ही दिया था. आज देखिये कितने लोग सिर्फ अंगुली उठा कर जीवन यापन कर रहें  हैं - अब खबरिया/जबरिया टी वी चैनल्स को ही देखिये अंगुली दिखा दिखा के उठा आपकी हालत खराब करना इनकी ड्यूटी है आप इनकी अंगुली पे अंगुली नहीं उठा सकते . यदि आप यह करना भी चाहें तो.........संभव नहीं है कि आप कुछ कर पायेंगें 





                           अब अन्ना को का पड़ी थी बिल में अंगुली डालने की बताओ भला अन्ना ने अब जब अंगुली से बिल अपने मन का घुसने लायक बना लिया तो मोदी भाई साब के बारे में जो  चार अंगुली उठा के  कहा उसे सुन कर कपिल मुनि की एक जबरदस्त अंगुली उठना  ज़ायज़ है कि नहीं... आप ही बताओ मोदी भाई सा’ब का जिकर किया काहे तो सिब्बल जी कि अंगुली उठ गई.... 
किरकिटिया अंगुली उठाव में आए बदलाव से शक़ूर राणा और बक़नर  टाइप-के एम्पायरों की  अंगुली के महत्व में ज़रा कमी आई है.  रीव्यू ने खेल का इतिहास भूगोल सब बदल दिया. एल बी ड्ब्ल्यू की भारी भरकम अपील को  इस बदलाव से बक़नर सहित पाकिस्तानी पुराने एम्पायर्स को भारी कुंठा हो रही है. उन दिनों शकूर भाई साब को हर खिलाड़ी अंगुली उठाने पर अंगुली दिखा देता था . पर शकूर भाई जान भी कोई कुम्हड़े का फ़ूल न थे जो अंगुली देख के डर के हट जाते अड़े रहे. मुल्क की आन बान शान किरकिट के मामले में उनकी अंगुली पे और बाक़ी दायित्व  पाकिस्तान के  सियासी लोगों पर था (है भी) गाहे बगाहे "कश्मीर के मामले " में अंगुली करते रहते हैं.ये लोग करें भी तो क्या ? इनको भी तो आई एस आई अंगुली करती है. अब उनका ख्याल तो रखना ही पड़ेगा वरना  राज पाठ....वाला मामला किसी भी समय खटाई में पड़ सकता है
                         बाबा भीमराव जी आज़ तक संविधान की किताब हाथ में लिये चौराहे चौराहे समझा रहे हैं कि भाई संविधान की ताक़त जानो. इसमें तुम्हारे हर अधिकार हैं कर्तव्य है गारंटी है लोग मानते ही नहीं कितनी बार बताया भीमराव जी ने किसी को समझ नही आता.... पहले आता था समझ में अब सब के सब रीव्यू मांग रहे हैं. हमारी भी कोई नही सुनता न ये न वो न आप... अरे भाई किरकिट में रीव्यू चलता है आप भारतीय हो आईने के सामने खड़े हो खुद का प्री-व्यू देख लो आईने में फ़िर मांगना "संविधान का री-व्यू".... पर क्या करें बाबा की अंगुली की ताक़त का असर जाता रहा गोया
 खैर चुनाव के समय इस अंगुली का "भटीली-स्याही" से आयोग  श्रृंगार किया करता है तब जब भारतीय वोट नुमा जनता की अंगुली "सौभाग्यवति" होती है हां..तब जब  इसी अंगुली के सहारे सच झूट ठूंसा जाता है..भाषणों के साथ  हमारे-आपके दिमागों में और एक समय आता है कि कुछ अंगुलियां गिनती करके सदन के अंदर या बाहर का रास्ता बतातीं हैं. ..... बहरहाल अंगुली का इस्तेमाल करो खूब जम के करो कोई गलत नहीं है पर ज़रा देख समझ के  कहीं ग़लत जगह चली गई तो अंगुली को खामियाज़ा भुगतना पड़ सकता है ....फ़िर मत कहना -"बताना तो था !!"
वरना बाबा  बाल ठाकरे ने क्या कहा था भारत के रत्न को की बाट जोहते सचिन भैया को


सारे फोटो गूगल से मिले किसी को कोई आपत्ती हो बताएं जी बाहर से स्वामित्व को लेकर अंगुली मत कराना ह ह हा  

सोमवार, मार्च 14

प्रीत की तुम मथानी ले मेरा मन मथ के जाती हो


प्रीत की तुम मथानी ले  मेरा मन मथ के जाती हो
कभी फ़िर ख्वाब में  आके  मुझे  ही  थपथपातीं हो !
क़िताबों में तुम्हीं तो हो ,दीवारों पे तुम्ही तो हो -
बनके  मीठी  सी  यादें तुम मन  को  गुदगुदातीं हो..!
विरह की पोटली ले के कहो अब मैं किधर जाऊं
आ भी जाओ कि क्यों कर तुम मुझे अब आज़माती हो


 

शुक्रवार, मार्च 4

अलबेला खत्री लाइव फ़्राम जबलपुर




सूरत से सिंगरौली व्हाया जबलपुर जाते समय जबलपुरियों हत्थे चढ़ गये राज़ दुलारे अलबेला के साथ आज न कल देर रात तक फ़ागुन की  आहट का स्वागत किया  गया बिल्लोरे निवास पर डाक्टर विजय तिवारी "किसलय" बवाल ,और हमने यक़ीं न हीं तो देख लीजिये 

 तयशुदा कार्यक्रम के मुताबिक हम कार्यालयीन काम निपटा के हज़ूरे आला की आगवानी के वास्ते जबलपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफ़ार्म नम्बर चार पर खडे़ अपने ड्रायवर रामजी से बतिया रहे थे. समय समय पर हमको  अलबेला जी कबर देते रहे कि अब हम यहां हैं तो अब हम आने ही वाले हैं किंतु पता चला कि महानगरी एक्सप्रेस नियत प्लेटफ़ार्म पर न आकर दो नम्बर प्लेट फ़ार्म पर आने वाली है. सो बस हम भी जबलपुर रेलवे स्टेशन के मुख्य-प्लेट फ़ार्म पर आ गये. जहां ट्रेन आने के बावज़ूद भाई से मुलाक़ात न हुई. मुझे लगा कि कि खत्री महाशय ने फ़टका लगा दिया. कि फ़िर एक फ़ोन से कन्फ़र्म हुआ कि ज़नाब यहीं हैं. कार में सवार हुये 
अलबेला जी को  इस बात का डर सता सता रहा कि मेरे घर उनका अतिशय प्रिय पेय मिलेगा या नहीं, मिलेगा तो पता नहीं पहुंचने के कितने समय बाद मिलेगा जिस पेय के वे तलबगार हैं....अर्र र र ललित भाई आप गलत समझे ये वो पेय नहीं जिसकी तलब में आप हैं भाई अलबेला जी को "चाय" की तलब थी , सो डिलाइट-टाक़ीज़ के पास होटल में ले जाया गया. कार में बैठे-बैठे चाय पी गई. घर आकर देखा तो वाक़ई श्रीमति जी मुहल्ले में आयोजित किसी कार्यक्रम में भागीदारी के लिये रवाना हो रहीं थीं. सो  
 हम मान गये लोहा अलबेला जी के दूरगामी चिंतन का .चाय तो मिली किंतु नियत समय से आधे-घंटे की देरी से. और फ़िर स्वागत सत्कार के लिये विजय तिवारी किसलय, भाई जितेंद्र जोशी (आभास के चाचू) बवाल, यशभारत जबलपुर के प्रति निधि श्री मट्टू स्वामी, पधारे इस बीच माय एफ़ एम 94.3 जियो दिल से वालों ने एक लाईव प्रसारण भी किया टेलीफ़ोन पर खूब चहके भाई अलबेला खत्री.    
 फ़िर क्या हुआ..?
फ़िर फ़िर ये हुआ कि :-"अलबेला जी लाइव हो गये बैमबज़र के ज़रिये. और क्या होना था"
मोबाइल कैमरा फ़ोटो सेशन के बाद अरविन्द यादव जी आये को फ़ोटो ग्राफ़्री हुई. जम के हुआ वेबकास्ट इंटरव्यू . 43 साथी लाइव देख रहे थे. 
यानी हंगामें दार रही शाम. की गवाही दे सकते हैं  संगीत निर्देशक श्री सुनील पारे, जीवन बीमा निगम के प्रबंधक श्री तुरकर जी एवम मेरे अग्रज़  श्री सतीष बिल्लोरे जो घटना स्थल के बिलकुल समीप थे. कुल मिला का होली-हंगामा शुरु.. 
 उधर भूख के मारे पेट में चूहे कत्थक,कुचिपुड़ी,सालसा, करने लगे भोजन भी तैयार था सो संचालकीय तानाशही का भाव मन में आया और हमने एकतरफ़ा ऐलान कर दिया..... सभा बर्खास्त, अब नहीं हो पा रही भूख बर्दाश्त. 
ताज़ा सूचना मिलने तक ज्ञात हुआ की अलबेला खत्री जी को ट्रेन में कंडेक्टर ने जगाया बोला जोर से मत सुनाओ. 
"क्या मैं कविता सुना रहा हूँ ..?"  
 टीसी ने कहा :- नहीं श्रीमान खर्राटे .......
मित्रो , जो बुके उनके स्वागतार्थ आये वे मेरे घर की शोभा बढायेंगे . सच अलबेला खत्री जी खूब याद आएंगे. 

बुधवार, फ़रवरी 2

कुछ चुनिन्दा वेबकास्ट


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शुक्रवार, दिसंबर 10

वेबकास्ट अमृतस्यनर्मदा : लेखक अमृतलाल वेगड़



              
जबलपुर संस्कारधानी के लेखक,कलाकार,श्रीयुत अमृतलाल वेगड़ की कृति  अमृतस्यनर्मदा का वेब कास्ट सुधि साथियों के लिये सादर प्रस्तुत है .
Secret Chants: A Trip to IndiaIndia - A Trip to the Taj Mahal 

रविवार, नवंबर 7

महफ़ूज़ मुझे खुद मुझसे ज़्यादा प्रिय हो..!

प्रिय महफ़ूज़
"असीम-स्नेह"
बज़ से जाना कि अब बिलकुल ठीक हो हम सबके लिये   खुशी की बात है. तुम्हारी कविता तुमको याद है न 

Fire is still alive.
But what of the fire?
Its wood has been scattered,
But the embers still dance.
Though the fire is tiny,
It survived.
Though the fire is weak,
It's still alive.

Mahfooz Ali

 महफ़ूज़ भाई तुम्हारे जीवन की कविता है सच  तुम वो आग हो जिसे कोई सहजता से खत्म कैसे कर सकता है. मैं क्या सारे लोग तुम्हारी ज़िंदगी के लिये अपने अपने तरीक़े से प्रार्थनारत थे. कौन हो किधर से हो कैसे हो मैं नहीं जानना चाहता. पर नेक़ दिल हो तभी तो "महफ़ूज़" हो. सारी बलाएं जो भी जब भी तुम पर आतीं हैं जिसकी आशंका मुझे सदा रहती है ईश्वर की कृपा से सच ज़ल्द निपट ही जातीं हैं.ज़िन्दगी में उतार-चढ़ाव सबके आतें हैं किन्तु तुममें प्रकृति ने जो ईर्षोत्पादक-तत्व  दिया है वो एक मात्र कारण है कि किसी न किसी की शिकारी निगाह तलाश ही लेतीं हैं तुमको. मेरे तुम्हारे जीवन में बस एक यही समरूपता है. मैं भी बार बार मारे जाने वाला इंसान हूं मुआं मरता ही नहीं  .वो.जो . जो बार बार पीछे से वार कर रहें है ईश्वर से विनत प्रार्थना करता हूं "प्रभू इन को माफ़ कर देना ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहें हैं..?" यक़ीन करो  तुम पर हमले वाले दिन बहुत बेक़ल फ़िर उस रात देर रात देखी तुम्हारी कविता और बस यकीं कर लिया महफ़ूज़ को  कोई मार नहीं सकता. महफ़ूज़ मुझे मालूम था शायद तुम मेरी स्थिति जान कर भावुक हो जाओगे रोने लगोगे तभी तो मैने अपना दर्द तुमसे शेयर नहीं किया. इन दिनों मैं बहुत तनाव जी रहा हूं लोग निरंतर कपट कर रहें हैं तुम भाग्यवान हो कि तुम्हारे शत्रु सामने हैं. मुझे दिखाई नहीं देते बस महसूस कर लेता हूं. २९  नवम्बर को  मेरा अड़तालीस का होना तय है  उम्र के इस मोड़ पर करूं तो क्या करूं खैर छोड़ो मेरे तनावों को गोली मारो... बस बताओ बिना संघर्ष के जीवन बेनूर नहीं लगता ? लगता है न हां तो संघर्ष में जीत का  पहला कवच सदा "धैर्य" ही होता है. जिसे मैं एक बार खोने जा रहा था पर बस सोचा "सवेरा तो रोज़ ही होता है न..? कब तक तिमिर रुक पाएगा. 
मेरे घरेलू एलबम में मेरी आठ माह की उम्र की एक तस्वीर हुआ करती थी "मरफ़ी-बेबी" तुलना करती थी मां फ़िर अक्सर  मुझे देखकर  आंखे भर आतीं थीं उनकी मैं बेखबर होता था यह घटना कई बार होती . एक बार मेरे चाचा जब आये और उनने यह दृश्य देखा तो मेरी फ़ोटो मांग ली ले भी गए अपने साथ अर्थ बहुत दिनों बाद समझ पाया कि मां की आंखें क्यों नम हो जाया करतीं थीं. रमेश काका फ़ोटो क्यों ले गये. मां-बाबूजी अक्सर मेरे भविष्य को लेकर चिंता करते थे इस बात का एहसास मुझे जब भी हुआ कोशिश की कि कुछ ऐसा करूं कि  वे निश्चिंत रहें .कोशिश की सफ़लता मिलीं किंतु आज़ बाबूजी मेरे लिये बेहद दु:खी हैं अस्सी बरस के बाबूजी का खून जल रहा है मेरा एक अफ़सर जिसके  बीमार पिता को मैंने अपने शरीर से खून दिया उसी ने सारे ऐसे-षड़यंत्र की रचना की है जो मेरे पिता के  खून जलाने का सर्व-प्रथम कारण  रहा उसे भी इस आलेख के ज़रिये उसे भी माफ़ कर रहा हूं . यह विवरण यहां इस लिये दे रहा हूं किसी  शत्रुओं से ज़्यादा खतरनाक होते हैं सबसे क़रीबी लोग होते हैं इनको पहचानना मुझे दे से आया तुम इनको ज़ल्द पहचानो मेरी मंशा है विश्वास भी है. इस बीच तुमको बताना चाहूंगा कि मेरे दो एलबम बहुत शीघ्र आएंगे अगर परिस्थियां अनुकूल रहीं एक तो टंग-ट्विस्टर गीतों का जो बच्चों के लिये होगा पूर्णत: चैरिटि के लिये होगा. दूसरे के लिये  आज़ ही सूचना मिली है. अब बताओ कि ज़िंदगी कितनी ज़रूरी है ईश्वर के हाथों सब कुछ संचालित होता है  दुश्मनों की सद गति के लिये हम सभी ईश्वर ये याचना करें यही जीवन का सर्वोच्च सत्य है. तुम्हारे और मेरे जीवन में एक अहम समानता है वो है दु:खों का आधिक्य तभी तो  महफ़ूज़ मुझे खुद मुझसे ज़्यादा प्रिय हो..!
अशेष शुभ कामनाओं के साथ दाल-बाटी खाने का न्योता भी दिये देता हूं

बुधवार, अक्तूबर 27

हेनरी का हिस्सा

पिता की मौत के बाद अक्सर पारिवारिक सम्पदा के बंटवारे तक काफ़ी तनाव होता है उन सबसे हट के हैनरी  बैचेन और दु:खी था कि पिता के बाद उसका क्या होगा. पिता जो समझाते  वो पब में उनकी बात का माखौल उड़ाता उसे रोजिन्ना-की गई  हर उस बात की याद आई जो पिता के जीवित रहते वो किया करता था. जिसे पापा मना करते रहते थे.सबसे आवारा बदमाश हेनरी परिवार का सरदर्द ही तो था ही बस्ती के लिये उससे भी ज़्यादा सरदर्द था. पंद्रह साल की उम्र में शराब शबाब की आदत दिन भर सीधे साधे लोगों से मार पीट जाने कितनी बार किशोरों की अदालत ने उसे दण्डित किया. पर हेनरी के आपराधिक जीवन  में कोई परिवर्तन न आया. अंतत: उसे पिता ने बेदखल कर दिया कुछ दिनों के लिये अपने परिवार से. पिता तो पिता पुत्र के विछोह  की पीड़ा मन में इतने गहरे पहुंच गई कि बस खाट पकड़ ली पीटर ने. प्रभू से सदा एक याचना करता हेनरी को सही रास्ते पे लाना प्रभु..?
पीटर  ज़िंदगी के आखिरी सवालों को हल करने लगा. मरने से पहले मित्र जान को बुला सम्पदा की वसीयत लिखवा ली पीटर ने. और फ़िर अखबारों के ज़रिये हेनरी को एक खत लिखा.  
प्रिय हेनरी
अब तुम वापस आ जाओ, तुम्हारा निर्वासन समाप्त करता हूं. मेरे अंतिम समय में तुम्हारी ज़रूरत है मुझे .
तुम्हारा पिता 
पीटर
                      हेनरी निर्वासन के दौरान काफ़ी बदल चुका था. दिन भर चर्च के बाहर लोंगों की मदद करना, अंधे-अपहिजों को सड़क पार कराना उसका धंधा अपना लिया था. खबर पढ़ के भी हैनरी वापस तुरंत वापस न गया. जाता भी कैसे उसे जान के बूड़े बाप की मसाज़ करनी थी, सूज़न के बच्चे को हास्पिटल ले जाना था. कुल मिला के अपनी आत्मा को शांत करना और पापों को धोना था. सारे काम निपटा कर जब वो प्रेयर कर रहा था तब  उसे दिखाई दिया  ईशू की जगह क्रास पर पिता पीटर  हैं... और बस प्रभू का संदेश स्पष्ट होते ही तेज़ क़दमों से हेनरी  रेल्वे स्टेशन की तरफ़ भागा. पता नहीं दस मिनट में तीन किलोमीटर का रास्ता किस ताक़त ने तय किया खुद हतप्रभ था.  पिता को क्रास पर देख कितना डरा था उसका आभास बस उसे ही था. देर रात कड़ाके की ठण्ड भोगता अल्ल सुबह ट्रेन में बैठ रवाना हो गया. दोपहर पिता के पास पहुंचा तो देखा कि पिता अब आखिरी सांसें गिन रहे हैं पिता पीटर अपलक उसे निहारते और यक़ायक चीखे ..."हेनरी.........!" इस चीख के साथ पिता के प्राणांत हो चुके थे. 
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http://top-10-list.org/wp-content/uploads/2009/08/The-Catholic-Church.jpgघर में पिता के अन्य सारे सफ़ल पुत्र बैंजामिन,स्टीफ़न,सभी बहनें धनवान बाप की सम्पत्ति के बंटवारे की राह देख रहे थे आशंकित संताने सोच रहीं थीं कि कहीं पिता की वसीयत में सबसे ज़्यादा हिस्सा नक़ारा हेनरी को न मिले. स्टीफ़न तो बीवी के साथ चर्च भी हो आया प्रेयर भी कर आया .गोया प्रभू वसीयत ही बदल देंगे .सभी औलादों के मन अपनी रुचि की सम्पदा मिलेगी या नहीं इस बात को लेकर काफ़ी तनाव था कईयों को इस बात का तनाव था :-"शायद उनको पिता हिस्सा दें भी न.
स्टीफ़न ने अपनी बीवी से कहा:-"पिता का मुझसे कोई लगाव न था रोज़ी पता नहीं क्यों वे मुझसे हमेशा अपमानित करते थे मुझे नहीं लगता कि मुझे मेरा मिलेनियर बाप कुछ दे जायेगा "
सारे कयास बेरिस्टर जान के आते ही खत्म हो गये वसीयत खोली गई , किसी को फ़ार्म हाउस, किसी को फ़ेक्ट्री, किसी को सोना बेटियों को बेंक में जमा रकम बराबर बराबर मिली आखिरी में लिखा था मैं अपनी सबसे प्यारी ज़मीन जो दस हेक्टर है हेनरी के नाम करता हूं. हेनरी ने खुशी खुशी उसे स्वीकारा. जान ने पूछा:-हेनरी , उस ज़मीन पर तो सांपों की बांबियां है..?
स्टीफ़न:- "भाई मुझे बहुत दु:ख है पिता ने न्याय नहीं किया !"
 बैंजामिन:- ”हेनरी, तुम चाहो तो मेरे साथ रह सकते हो ...?”
सारा:-"घोर अन्याय मैं तुम्हारी मदद करूं क्या...!"
    हैनरी ने कहा:- "पिता कभी ग़लत नही करते जो किया वो सही किया मैं खुश हूं तुम सब चिंता मत करो बस चिंतन करो मिलते रहना दु:ख दर्द आये तो एक दूसरे की मदद करना मैं एक बरस बाद वापस आऊंगा

http://hindi.webdunia.com/samayik/bbchindi/bbchindi/1004/19/images/img1100419060_1_1.jpg एक साल बाद हेनरी वापस लौटा सबसे पहले उस ज़मीन पर गया जो उसे वसीयत में मिली थी उसके साथ में था बैग जिसमें सांप पकड़ कर रखे जाते हैं. और घर लौटा तो उसके बैग में पांच सांप थे. वो भी तेज़ ज़हरीले. घर आकर इन सांपों से  ज़हर निकाला.  और बाटल में भर के विष रोधी दवा कम्पनी को बेच आया. धीरे विषधरों से इतनी दोस्ती हो गई हर सांप उसे पहचानने लगा. सबको उसने नाम दिये उनसे बात करता घायल सांपों क इलाज़ करता . अब उसका नाम देश के सबसे प्रतिष्ठित विष उत्पादकों की सूची में था . उसका संदेश वाक्य था :-"पिता किसी से अन्याय नहीं करते "
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पोस्ट एक कथानक मात्र है इसका नाट्य-रूपांतरण शीघ्र प्रकाशित करूंगा जो विक्रय हेतु होगा उपयोगकर्ता से प्राप्त राशी का प्रयोग एक नेत्र-हीन बालक मंगल के भविष्य के लिये किया जावेगा शायद सफ़ल हो सकूं इस संकल्प में 
छवियां:- गूगल से साभार
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