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मई, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

समापन किस्त : कुत्ते भौंकते क्यों हैं...?

मिसफ़िट पर पिछली पोस्ट में आपने बांचा  उस्ताद – जमूरे, ये क्या है..? जमूरा- कुत्ता... उस्ताद... इतना काटेंगे कि सारे रैबीज खत्म हो जाएं अब आगे :- (इस वाक़ये से एक चिंतन का दरवाज़ा खुलता है. वो दरवाज़ा जो हमारे मन में पनप रहे कुत्तावृत्ति का परिचय देगा सोचते रहिये यही सोचेंगे जो मै लिख रहा हूं) चित्र क्रमांक 01 कुत्तावृत्ति का प्रमुख परिचय भौंक है, जिसका अर्थ आप सभी बेहतर तरीके से जानते हैं. जिसका क्रिया रूप "भौंकना" है. भौंक एक तरह से  आंतरिक- भय जन्य   आवेग का समानार्थी भाव है. जो आत्म-रक्षार्थ प्रसूतता है. अब बांये चित्र में ही देखिये ये चारों लोग जो मयकश जुआरी हैं नशा आते ही इनके चिंतन पर हावी होगा भय. कहीं मैं हार न जाऊं.और दूसरे को हारता देख खुश होंगे खुद को हारने का भय भी होगा.. फ़िर टुन्न होकर अचानक चिल्लाने लगेंगे ध्यान से सुनने पर आप को साफ़ तौर पर  कुत्तों के लड़ने की ही  आवाज़ आएगी.       जब आप कभी अपने आपको आसन्न खतरे से बचाना चाहते हैं तो आप बचाने के राह खोजने से पहले आप चीखेंगे अपना चेहरा देखना तब कुत्ते सा ही लगेगा आपको.मेरे एक परिचित हैं जिनकी आवाज़ वै

कुत्ते भौंकते क्यों हैं...?

अवधिया जी ने आलेख के लिये भेजा है इसे  उस्ताद – जमूरे, ये क्या है..? जमूरा-      कुत्ता... उस्ताद...कुत्ता...! उस्ताद – कुत्ता हूं ?   नमकहराम जमूरा -    न उस्ताद वो कुत्ता   है पर आप नमक...   उस्ताद – क्या कहा ? जमूरा -    पर आप नमक दाता ! उस्ताद – हां, तो बता कुत्ता क्या करता है..? जमूरा -    ... खाता है..? उस्ताद –   क्या खाता है ? जमूरा -      उस्ताद , हड्डी   और और क्या..! उस्ताद –   मालिक के आगे पीछे क्या करता है जमूरा -    टांग उठाता के उस्ताद –   क्या बोल   बोल जल्दी बोल जमूरा -    सू सू और क्या ? उस्ताद – गंवार रखवाली   करता है, और क्या   जमूरा -    पर उस्ताद, ये भौंकता क्यों है....... उस्ताद :- जब भी इसे मालिक औक़ात समझ में आ जाती है तो भौंकने लगता है. जमूरा   :- न उस्ताद, ऐसी बात नही है..   उस्ताद :- तो फ़िर कैसी है ? जमूरा   :-   उस्ताद तो आप हो आपई बताओ उस्ताद :-   हां, तो जमूरे कान खोल के सुन – जब उसके मालिक पर खतरा आता है   तब भौंकता है जमूरा   :-     न, कल आप खुर्राटे मार रए थे तब ये भौंका   उस्ताद :-    तो, जमूरा   :-   तो ये साबित हुआ कि उसकी भौंक इस कारण नहीं निक

अभिव्यक्ति ने छापा मेरा व्यंग्य : उफ ! ये चुगलखोरियाँ

अभिव्यक्ति ने यहाँ छापा मेरा व्यंग्य : उफ ! ये चुगलखोरियाँ मुझे उन चुगली पसन्द लोगों से भले वो जानवर लगतें हैं ,  जो चुगलखोरी के शगल से खुद को बचा लेते हैं। इसके बदले वे जुगाली करते हैं। अपने आप को श्रेष्ठ साबित करने वालों को आप किसी तरह की सजा दें न दें कृपया उनके सामने केवल ऐसे जानवरों की तारीफ जरूर कीजिये। कम-से-कम इंसानी नस्ल किसी बहाने तो सुधर जाए। आप सोच रहे होंगें ,  मैं भी किसी की चुगली कर रहा हूँ ,  सो सच है परन्तु अर्ध-सत्य है ! मैं तो ये चुगली करने वालों की नस्ल से चुगली के समूल विनिष्टीकरण की दिशा में किया गया एक प्रयास करने में जुटा हूँ। अगर मैं किसी का नाम लेकर कुछ कहूँ तो चुगली समझिये। यहाँ उन कान से देखने वाले लोगों को भी जीते जी श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहूँगा जो गांधारी बन पति धृतराष्ट्र का अनुकरण करते हुए आज भी अपनी आँखे पट्टी से बांध के कौरवों का पालन-पोषण कर रहें हैं। सचमुच उनकी   '' चतुरी जिन्दगी ``  में मेरा कोई हस्तक्षेप कतई नहीं है और होना भी नहीं चाहिए ! पर एक फिल्म की कल्पना कीजिए ,  जिसमें विलेन नहीं हो ,  हुजूर फिल्म को कौन फिल्म मानेगा   ?  अपने

किसी को धोखा देते वक़्त अक्सर विजेता होते हैं...धोखेबाज़

साभार : जागरण जंक्शन            अक्सर धोखा देने षड़यंत्र के जाल बुनने वाले अचानक किसी से धोखा  खाते हैं तब मढ़ा करते हैं दूसरों पर धोखे बाज़ी के इल्ज़ाम . इन्सानी  फ़ितरत अज़ीब है मेरा एक मित्र कहता है :-"प्राकृतिक-न्याय से कोई नहीं बचता"  धोखा देना क्रूरता का पर्याय ही तो है. सियासत कुछ इस तरह हावी है हमारे जीवन क्रम पर कि हम हमेशा दूसरों को हराने की प्रवृत्ति के भाव से भरे पड़े हैं. किसी की जीत को नकारात्मक भाव से देखना या यूं कहूं कि किसी की जीत में अपनी पराजय का एहसास करना आज़ का  जीवन-दर्शन बन चुका है. सभ्य समाज समय के उस मोड़ पर आ चुका है जहां से अध्यात्मिक-चेतनाएं असर हीन हो गईं हैं .गाहे बगाहे सभी किसी न किसी  धोखे का शिकार होते हैं.कौन कितना पावन है कहना मुश्किल है. मुझे तो मालूम है कि मेरी आस्तीनों में धोखे़बाज़ भरे पड़े हैं आप भी इस मुग़ालते में न रहना कि आप के इर्द गिर्द वाले सभी अपने हैं.     ईसा मसीह सबसे अच्छा उदाहरण हैं , सियासत में तो अटे पड़े हैं उदाहरण पर इनका ज़िक्र ज़रूरी नहीं क्यों कि धोखा सियासत का मूलभूत तत्व है.     हां चलते चलते एक बात याद आ रही

क्या करें हो ही गई ललित शर्मा जी से मुठभेड़

_________________________ कार्यक्रम वाले दिन यानी 30 अप्रैल 2011  अल्ल सुबह घर  से निकला किंगफ़िशर जनता फ़्लाईट में नाश्ता-वास्ता लिये  बिना सोचा था कि   उधर यान बालाएं खाने पीने को पूछेंगी ही सो  श्रीमति जी की एक न मानी. अब ताज़ा हसीन ताज़ा तरीन चेहरे वाली व्योम बालाओं  के हाथों से खाऊंगा सोचकर सतफ़ेरी अर्धांगिनी की न मानना महंगा पडेगा इस बात का मुझे इल्म न था.  ट्राली लेकर पधारीं  दो लावण्य मयी व्योम-बालाओं  में से एक बोली : आप मीनू अनुसार आर्डर कीजिये  वेज़ सेण्डविच..? न, नहीं है सर  तो साल्टी काज़ू ही दे दो  काफ़ी भी देना,  काफ़ी के साथ दो जोड़ा बिस्किट फ़्री मिले.  नाश्ता आते आते पड़ोसी से दोस्ती हो गई थी. उनको गुज़रात जाना था. समीपस्थ  सिवनी नगर  के व्यापारी थे जो अपने जीजा जी के अत्यधिक बीमार होने की खबर सुन के रातों रात जबलपुर आए थे. यात्रा के दौरान पनपी मित्रता का आधार उनका पहली बार का विमान यात्री होना तो था मेरा आकर्षण वो इस कारण बने क्योंकि उनके पास तम्बाखू मिश्रित जबलपुरिया गुटखे का भण्डार पर्याप्त था. न भी होता तो मै मित्र अवश्य बना लेता ... बात चीत तो करनी ही थी.  

विधवाओं के सामाजिक धार्मिक सांस्कृतिक अधिकारों को मत छीनो

एडवोकेट दिनेश राय द्विवेदी जी के ब्लाग तीसरा खम्बा से आभार सहित   साभार " जो कह न सके ब्लाग से "                    विधवा होना कोई औरत के द्वारा किया संगीन अपराध तो नहीं कि उसके सामाजिक और धार्मिक अधिकारों से वंचित किया जाए.अक्सर शादी विवाहों में देखा जाता है कि विधवा की स्थिति उस व्यक्ति  जैसी हो जाती है जिसने कोई गम्भीर अपराध किया हो. जैसे तैसे अपने हौसलों से अपने बच्चों को पाल पोस के सुयोग्य बनाती मां को शादी के मंडप में निभाई जाने वाली रस्मों से जब वंचित किया जाता है तब तो स्थिति और भी निर्दयी सी लगती है. किसी भी औरत का विधवा होना उसे उतना रिक्त नहीं करता जितना उसके अधिकारों के हनन से वो रिक्त हो जाती है. मेरी परिचय दीर्घा में कई ऐसी महिलाएं हैं जिनने अपने नन्हें बच्चों की देखभाल में खुद को अस्तित्व हीन कर दिया. उन महिलाओं का एक ही लक्ष्य था कि किसी भी तरह उसकी संतान सुयोग्य बने. आखिर एक भारतीय  मां को इससे अधिक खुशी मिलेगी भी किस बात से.  दिवंगत पति के सपनों को पूरा करती विधवाएं जब अपने ही बच्चों का विवाह करतीं हैं तब बेहूदी सामाजिक रूढि़यां उसे मंडप में जान

बुद्ध मुस्कुराए थे उस दिन याद है न ?

जी ऐसी ही  मृदुल मुस्कान रही होगी बुद्ध की  अटल जी बोले होंगे- कमाल कर दिया आपने  जवाब में कलाम साहब ने ये कहा होगा :-  श्रीमान बुद्ध की मुस्कान देखिये          बुद्ध मुस्कुराए थे उस दिन 11 मई 1998 को दशकों से बस्ते में बंधा संकल्प अचानक आकार ले लेगा इसका इल्म न था किसी को भी न ही यहां तक कि विश्व के "दादा" को भी नहीं. पोखरण में ये भारत का 18 मई 1974 के 24 बरस बाद  दूसरा परीक्षण था.  फ़िर 13 मई 1998 को पांचवां परीक्षण होते ही भारत परमाणु शक्ति सम्पन्न देश बन चुका था. उस दिन यानी   11 मई 1998 को बुद्ध-पूर्णिमा थी. एक बार बुद्ध के दर्शन को विश्व ने चकित हो स्वीकारा था . चकित तो उस बुद्ध पूर्णिमा पर भी था जब भारत ने पोखरण में परीक्षण किया. कलाम साहब के चेहरे का ओज अटल जी में आत्म विश्वास देखते ही बन रहा था. भारत का एक एक नागरिक जो इस बात को समझता था इतना खुश था गोया उसे कोई खजाना मिल गया हो.  खुश हों भी क्यों न भारत का भाल उजारते इन आईकान्स ने जो भी किया था उस दिन उससे विश्व में भारत नये रूप में उभरने वाला जो था. हुआ भी यही आप देख रहें हैं. जी वो दिन कि

बिना छींटॆ-बौछार के रवि रतलामी जी एक समारोह में मुख्य अतिथि जबलपुर आए

अविनाश वाचस्पति जे का हो गया कह रहे थे कि आप कनाट-प्लेस पे दूकान लेंगें यह चित्र    राजे_शा   जी के ब्लाग पर है उनका ब्लाग है " कौन कहता है हंसना मना है..? " हैं   मित्रो, मित्राणियो..                   सब को हमारी राम राम वंचना जी . कल रात जब नेट खोला तो रवि रतलामी जी का मेल बांच के खुशी हुई.. समझ तो हम सवेरे ही गये थे जब गौर दादा जी ने अपनी मुंडेर वाला कौआ जो उनके घर की तरफ़ मुंह करके कांव कांव किये जा रहा था को डपट के भगा दिया. और वो कौआ हमारे घर पे आय के कांव कांव करने लगा. हम बोले श्रीमति जी से -’देखो, तुम्हारे मैके का संदेशा लेके आ गया ..! श्रीमति जी किचिन से बोलीं- ”न, वो आपके किसी ब्लागर मित्र के आने की खबर लाया है. चाय पिओगे, नहा धो लो शनिवार की छुट्टी है हफ़्ते भर की.... अब बताओ भला , ऐसा बो्ल गईं गोया नहाना मेरा साप्ताहिक कार्यक्रम हो. हम चुप रहे सोचा सुबह से उलझे तो शाम तक पता नहीं का गत बने...? खैर कन्फ़र्म हुआ कि रवि रतलामी ही की गाड़ी विलम्ब से किंतु जबलपुर आ ही गई. उस गाडी़ में बिना छींटॆ-बौछार के रवि भैया  एक समारोह में बतौर प्रशिक्षक एवम मुख्य अति

डॉ अ कीर्तिवर्धन की कविता : आँख का पानी

आँख का पानी होने लगा है कम अब आँख का पानी, छलकता नहीं है अब आँख का पानी| कम हो गया लिहाज,बुजुर्गों का जब से, मरने लगा है अब आँख का पानी| सिमटने लगे हैं जब से नदी,ताल,सरोवर सूख गया है तब से आँख का पानी| पर पीड़ा मे बहता था दरिया तूफानी आता नहीं नजर कतरा ,आँख का पानी| स्वार्थों कि चर्बी जब आँखों पर छाई भूल गया बहना,आँख का पानी| उड़ गई नींद माँ-बाप कि आजकल उतरा है जब से बच्चों कि आँख का पानी| फैशन के दौर कि सबसे बुरी खबर मर गया है औरत कि आँख का पानी| देख कर नंगे जिस्म और लरजते होंठ पलकों मे सिमट गया आँख का पानी| लूटा है जिन्होंने मुल्क का अमन ओ चैन उतरा हुआ है जिस्म से आँख का पानी| नेता जो बनते आजकल,भ्रष्ट,बे ईमान हैं बनने से पहले उतारते आँख का पानी| डॉ अ कीर्तिवर्धन 09911323732 डॉ अ कीर्तिवर्धन, की कविता : आँख का पानी डा० अ कीर्तिवर्धन अ कीर्तिवर्धन के ब्लाग :-     संवाद  एवम  समंदर