गुरुवार, दिसंबर 31

नए वर्ष तुम्हारा स्वागत क्यों करुँ ...?



रस्म अदायगी के लिए
भेज देतें हैं लोग चंद एस एम एस
तुम्हारे आने की खुशियाँ इस लिए मनातें हैं क्योंकि
इस रस्म को निबाहना भी ज़रूरी है
किसी किसी की मज़बूरी है
किन्तु मैं  नए  वर्ष  तुम्हारा  स्वागत  क्यों करुँ ...?
अनावश्यक आभासी रस्मों में रंग क्यों भरूँ ?
पहले  तुम्हें आजमाऊंगा
कोई कसाबी-वृत्ति से विश्व को मुक्त करते हो तो
तो मैं हर इंसान से एक दूसरे को बधाई संदेशे भिजवाउंगा
खुद सबके बीच जाकर जश्न तुम्हारी कामयाबी का मनाऊँगा
तुम सियासत का चेहरा धो दोगे न  ?
तुम न्याय ज़ल्द दिला दोगे न ?
तुम मज़दूर मज़बूर के चेहरे पर मुस्कान सजा दोगे न ?
तुम विश्व बंधुत्व की अलख जगा दोगे  न ?
यदि ये सब करोगे तो शायद मैं आखरी दिन
31 /12 /2010 को रात अपनी बेटी के जन्म दिन के साथ
तुम्हें आभार कहूँगा....!
तुम्हारे लिए बिदाई गीत गढ़ूंगा !!
तुम विश्वास तो भरो
मेरी कृतज्ञता का इंतज़ार करो ?

गुरुवार, दिसंबर 24

पंचम-पुण्य-तिथि 28/12/09




 विनत-श्रद्धांजलि
पति:
काशीनाथ बिल्लोरे,
पुत्र-पुत्रवधु:
हरीश-विद्या,सतीश-संगीता, गिरीश-सुलभा
पुत्री-दामाद:
शोभा-रमेश गुहे,वन्दना-शरद जोशी,
सीमा-राजेन्द्र गुहे,
__________________________
पौत्रियां:
सोनिया,आस्था,गरिमा,प्रिया,अनुभा,
शिवानी,श्रद्धा,

पौत्र:
सौरभ,अंकुर,स्वर्णिम,सिद्दार्थ,
चिन्मय,शाश्वत,समर्थ,
__________________________
स्मरण-आयोजन
24/12/09:पत्रकारितासम्मान(समपन्न)
28/12/09: नारायण-सेवा(ग्वारीघाट)

__________________________

सव्यसाची-कला ग्रुप जबलपुर


मंगलवार, दिसंबर 22

हास्य-व्यंग्य





ललित शर्मा जी  की मूंछें देखिये और घडी   को देख कर जानिये दफ्तर जाने के लिए सबसे सही समय कौन बता सकता है ?
    
घडी सही है या शर्मा जी मेरे हिसाब से शर्मा जी की मूंछ  ऐसा इस लिए कि हर दफ्तर जाने  वाले को शर्मा जी चेहरा याद करके दफ्तर के लिए एक घंटे पूर्व घर से निकलना चाहिए . अब सवा नॉ बज चुका है आप घर  छोडिये और दफ्तर के लिए निकलिए .
-ललित जी, आपका स्मरण हो आया तो  लगा कि दफ्तर जाने का सही समय आप की मूंछों से बेहतर कौन सुझा सकता है घडी का क्या चली चली न चली सच आपके मोहल्ले में आप की मूंछें ही ही याद दिलाती होंगीं.......   हमारे  मोहल्ले में तो सारे अड़ोसी-पड़ोसी मुछ मुंडे हैं  और हम रोज़ दफ्तर जाने में लेट हो जातें हैं आपके  मुहल्ले के करमचारी  कितने  भाग्यशाली है ....! 
है न ...ललित जी ....?   
मूंछें हो तो नत्थूलाल जी की तरह वरना न हो ? अरे क्यों न हो कोई ज़बरदस्ती है.....मूंछें हों तो ललित जी की मानिंद वरना न हों ! अब यही जुमला चल रहा है  .
चंदू भाई  कल ही पूछ रहे थे ललित शर्मा ब्रांड मूंछें किस तरह बनवाएं ?
हम बोले:-चंदू भाई,यह दिव्य-ज्ञान स्वयं साक्षात ललित जी दे सकतें हैं अथवा उनका केश-सज्जक . 
 चंदू भाई बोले -भाई गिरीश बाबू ललित जी से बात ही करवा दीजिये अब ललित जी से उनकी मूंछों पर बात कराना मतलब कम-से-कम 50 रुपये से अघिक का खर्च , अरे भाई दुनिया जहां की बात करूंगा फिर मूंछ पे आउंगा न अगर सीधे मूंछ पर आ गया तो बस ललित जी गलत समझ लेंगें मुझे. यानी कि हर काम का कोई सलीका होना चाहिए कि नहीं. सो हमने मूंछ विहीन  महफूज़ अली जी का फोन नंबर दे दिया .शाम को चंदू भाई का मिस काल देख हमने उसे उठाया नहीं चंदू भाई को  हमारी ये हरकत नागवारा लगी और 6 मिसकाल दिए दना दन हम भी मुकर गए फोन नहीं उठाया. उठाया तो अपनी शामत निश्चित थी . दूसरे दिन खुद आए चंदू भाई आये चीखने ही वाले थे कि हम उन्ही के सामने श्रीमती जी पे बरस पड़े: जब बता नहीं सकतीं तो मेरा फोन लेकर जातीं क्यों हो...?
फिर हम चंदू भाई की ओर मुखातिब हुए आइये चंदू भाई आइये 
चंदू भाई:-काहे हमारी भाभी जी पे बरस रहे हो.? उनके  "हमारी" शब्द ने तो हमारे मन में आग लगा दी पर लोकाचार वश  हम उनको कुछ कह न सके. 
थोडा शांत मन हुआ तो बोले भाई , कल ये हमारा, फोन ले गईं बी सी पार्टी में हमने कहा कोई साला फोन लगा लगा के परेशान हो रहा होगा यें थीं कि फोन को सायलेंट मोड में रखीं थीं .अब आप के ही सात मिस्ड काल मिले. 
चंदू भाई:-अरे हो गया, हाँ तो काल इस लिए किये थे हमने कि  मूंछ वाले की ज़गह आपने किसी मुछ-मुंडे का नंबर दिया था. 
"किसका....?" हम सयाने पन से बोले सुकुल जी की तरह 
चंदू:-"किसी लखनवी नवाबजादे का था नाम महफूज़ बताया था !"
हम:-सारी भाई ये लीजिये , तभी नाम के साथ ललित जी का स्मरण हो आया लगा सवा-नौ बज गए  तत्काल हमने बहाना मारा चंदू भाई दफ्तर जाना है .

शुक्रवार, दिसंबर 18

इस वर्ष का हीरा लाल गुप्त "मधुकर" स्मृति सम्मान श्री गोकुल शर्मा दैनिक भास्कर जबलपुर ,सव्यसाची अलंकरण श्री सनत जैन भोपाल को तथा श्रेष्ट ब्लॉगर सम्मान श्री महेंद्र मिश्र को


                                                                                            स्वर्गीय श्री हीरा लाल गुप्ता  पत्रकारिता के क्षितिज पर एक गीत सा , जिसकी गति रुकी नहीं जब वो थे ..तब .. जब वो नहीं है यानी कि अब । हर साल दिसंबर की 24 वीं तारीख़ को उनको चाहने वाले उनके मित्रों को आमंत्रित कर सम्मानित करतें हैं । यह सिलसिला निर्बाध जारी है 1998 से शुरू किया था मध्य-प्रदेश लेखक संघ जबलपुर एकांश के सदस्यों ने । संस्था तो एक प्रतीक है वास्तव में उनको चाहने वालों की की लंबी सूची है । जिसे इस आलेख में लिख पाना कितना संभव है मुझे नहीं मालूम सब चाहतें हैं कि मधुकर जी याद किये जाते रहें । मधुकर जी जाति से वणिक , पेशे से पत्रकार , विचारों से विप्र , कर्म से योगी , मानस में एक कवि को साथ लिए उन दिनों पत्रकार हुआ करते थे जब रांगे के फॉण्ट जमा करता था कम्पोजीटर फिर उसके साथ ज़रूरत के मुताबिक ब्लाक फिट कर मशीनिस्ट  को देता जो समाचार पत्र छपता था । प्रेस में चाय के गिलास भोथरी टेबिलें खादी के कुरते पहने दो चार चश्मिश टाइप के लोग जो सीमित साधनों में असीमित कोशिशें करते नज़र आते थे । हाँ उन दिनों अखबार का दफ्तर किसी मंदिर से कमतर नहीं लगता था . मुझे नहीं मालूम आप को क्या लगता होगा ये जान कर ......?क्योंकि, उस दौर के प्रेसों के प्रवेश-द्वार से ही स्याही की गंध नाक में भर जाती थी... को मेरा मंदिर मानना । अगर अब के छापाखाने हायटेक हों गए हैं तो मुझे इसमें क्यों एतराज़ होने चला ..... भाई मंदिर भी तो हाईटेक हैं । चलिए छोडें इस बात को "बेवज़ह बात बढाने की ज़रूरत क्या है...?" हम तो इस बात कि पतासाज़ी करनी है "आखिर कौन हैं ये -हीरालाल जी जिनको याद करता है जबलपुर "
गुप्ता जी को जानने प्रतीक्षा तो करनी होगी ..... तब तक सुधि पाठक ये जान लें कि मधुकर जी जबलपुर की पत्रकारिता की नींव के वो पत्थर हैं जिनको पूरा मध्य-प्रदेश संदर्भों का भण्डार मानता था । सादा लिबास मितभाषी , मानव मूल्यों का पोषक , रिश्तों का रखवाला, व्यक्तित्व सबका अपना था , तभी तो सभी उनको याद कर रहें है.
जन्म:- मधुकर जी का जन्म उत्तर प्रदेश के फ़तेहपुर जिले के बिन्दकी ग्राम में हुआ । जन्म के साल भर बाद पिता लाला राम जी को जबलपुर ने बुलाया रोज़गार के लिए । साथ में कई और भी परिवार आए जो वाशिंदे हों गए पत्थरों के शहर जबलपुर के । जबलपुर जो संतुलित चट्टानों का शहर है.... जबलपुर जो नर्म शिलाओं का नगर है । फूताताल हनुमान ताल सूपाताल मढाताल, देवताल , खम्बताल के  इर्द गिर्द लोग बसते थे तब के जबलपुर में लालाराम जी भी बस गए खम्बताल के नजदीक जो अब शहर जबलपुर का सदर बाज़ार है। मायाराम सुरजन जी ने गुप्त जी को 1992 के स्मृति समारोह के समय याद करते हुए बताया की "1950 में नव-भारत के दफ्तर में कविता छपवाने आए सौम्य से , युवक जिसने तत्समय छपने योग्य छायावादी रचना उन्हें सौंपी , रचना से ज़्यादा मधुकर उपनाम धारी गुप्ता जी ही पसंद आ गए. बातों -बातों मायाराम जी जान गए की गुप्ता जी बी॰ए॰ पास हैं . पत्रकारिता में रूचि देखते हुए उन्हें नवभारत में ही अवसर दिया
उनको चाहने वालों में मायाराम जी सुरजन ,दुर्गाशंकर शुक्ल ,कुञ्ज बिहारी पाठक , जीवन चंद गोलछा, पं.भगवतीधर बाजपेई,डॉ. अमोलक चंद जैन,मेरे गुरुदेव हनुमान वर्मा,विजय दत्त श्रीधर,अजित भैया[अजित वर्मा] श्याम कटारे , गोकुल शर्मा , फ़तेहचंद,गोयल,विश्व नाथ राव , फूल चंद महावर, निर्मल नारद , शरद अग्रवाल,पुरंजय चतुर्वेदी, माता प्रसाद शुक्ल आदि ने मिलकर उनकी पुण्य तिथि 23 मई 1992 को स्मृति दिवस मनाया उन्हें याद किया .
फ़िर चाहने वालों ने मध्य प्रदेश लेखक संघ के साथ मिलकर मधुकर जी का जन्म दिवस स्मृति दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया . 24 दिसम्बर को हर साल शहर के लोग याद गुप्त जी के बहाने जुड़्तें ही हैं . परिजन उनकी याद में किसी प्रतिष्ठित पत्रकार को बुलाकर सम्मानित करतें  है । उनकी स्मृति में 1992....के बाद 1997 से लगातार गुप्त जी के जन्म दिन पर लोग एकत्र हों कर सम्मानित करतें है उनकी पीडी के सम्मानित पत्रकारों को । इस क्रम में
  • श्री ललित बक्षी जी 1998,
  • "बाबूलाल बडकुल 1999,
  • "निर्मल नारद       2000,
  • "श्याम कटारे        2001
  • "डाक्टर राज कुमार तिवारी "सुमित्र" 2002
  • "पं ० भगवती धर बाजपेयी                  2003,
  • "मोहन "शशि"                                     2004
  • "पं ० हरिकृष्ण त्रिपाठी एवं प्रो० हनुमान वर्मा   2005 (को संयुक्त )
  • " अजित वर्मा                                        2006
  • "पं०दिनेश् पाठक                                  2007
  • श्री सुशील तिवारी                                 2008

हमारी इस पहल को माँ प्रमिला देवी बिल्लोरे ने नयी पीड़ी के लिए भी प्रोत्साहन के उद्देश्य 
अपने परिवार से सम्मान देने की पेशकश की और पिता जी श्री काशी नाथ बिल्लोरे ने
युवा पत्र कार को सम्मानित करने की सामग्री मय धनराशी के दे दी वर्ष 2000 से
  • श्री मदन गर्ग                   2000
  • " हरीश चौबे                   2001
  • " सुरेन्द्र दुबे                   2002
  • " धीरज शाह                 2003
  • " राजेश शर्मा                2004,
माँ प्रमिला देवी के अवसान 28 /12 /2004 के बाद  मित्रों ने इस सम्मान का कद बढाते हुए
"सव्यसाची प्रमिला देवी अलंकरण " का रूप देते हुए निम्नानुसार प्रदत्त किये

  • श्री गंगा चरण मिश्र    2005
  • " गिरीश पांडे             2006
  • " विजय तिवारी        2007
  • '' श्री पंकज शाह         2008
दिनांक 24 दिसंबर 2009 को हीरालाल गुप्त स्मृति समारोह समिति  एवं सव्यसाची कला ग्रुप जबलपुर  द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित होने वाले कार्यक्रम में "मधुकर" स्मृति सम्मान श्री गोकुल शर्मा दैनिक भास्कर जबलपुर ,सव्यसाची अलंकरण श्री सनत जैन भोपाल को तथा श्रेष्ट ब्लॉगर सम्मान श्री महेंद्र मिश्र को प्रदान किया जावेगा .कार्यक्रम का आयोजन स्थानीय भातखंडे संगीत महाविद्यालय 
                                इ-पत्रकारिता की प्रारम्भिक अवस्था ब्लागिंग को समीर लाल के बाद जबलपुर के  सबसे पहले    ब्लॉगर  के रूप में बंद कमरे में बैठ कर दुनिया जहान को जबलपुर से रू-ब-रू कराने वाले
महेंद्र मिश्र जी अब केवल ब्लॉगर है शासकीय सेवा से मुक्त हुए मिश्र जी अब शुद्ध ब्लॉगर हैं . 

रविवार, दिसंबर 13

"भिलाई में लिए निर्णयों की घोषणा से मध्य-प्रदेश में हर्ष


सहोदर प्रदेशों यानी मध्य-प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ के ब्लॉगर इन दिनों निरंतर नवाचारों में व्यस्त हैं . इन नवाचारों का सीधा संकेत यह भी है कि ब्लागिंग को किस तरकीब से स्तरीय और पठनीय बनाया जावे. ब्लॉग बनाम पांचवे खम्बे की ज़रुरत और उसकी उपादेयता अब किसी से छिपी नहीं है. हिंदी-ब्लागिंग यानि चिट्ठाकारिता के विकास की इस पहल से जो भी कुछ बेहतर होगा आज से पांच बरस बाद सबके सामने होगा. तभी तो भिलाई में जिस महत्वपूर्ण बात का खुलासा किया गया वो भारतीय भाषाओं के अंतर्जालीयकरण का मेल-स्टोन ही कहा जावेगा. पांचवे स्तम्भ को प्रोत्साहित करने भिलाई चिंतन बैठक में चिट्ठाचर्चा को डोमिन पर पंजीकृत करा लिया है ऋतु परिवर्तन-पर्व यानी संक्रांति के दिन से आरम्भ हो ही जावेगा. सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में खबर-रटाऊ सबसे आगे वाले फार्मूले से मुक्ति दिलाती हिंदी चिट्ठाकारिता ने वैचारिक-आदानप्रदान को भी बढावा दिया है.इस बात को नकारना असंभव है. अब तो भिलाई और जबलपुर इतने करीब हैं जितने कभी न थे. . छत्तीसगढ़ के ब्लागर्स का यह अनूठा प्रयास सफल होगा सभी आश्वस्त हैं पूत के पाँव पालने में ही नज़र आ जातें हैं.... ? इनके चेहरे तथा आत्म विश्वास को अनदेखा करना अथवा  नकारना हमारी भूल होगी. साधू वाद दीजिये इनको  

शनिवार, दिसंबर 12

जिस दिन से देश आज़ाद हुआ है हम हमारे हक़ से ज़्यादा शायद ही कुछ सोच पा रहे हैं.....?

                                          जीवन भर प्रिवलेज़ के आदी हम लोग किस मार्गदर्शक मशाल की तलाश में हैं समझ में नहीं आ रहा हम किस दिशा में सोच रहे हैं और किस दिशा में जा रहें हैं. जिस दिन से देश आज़ाद हुआ है हम हमारे हक़ से ज़्यादा शायद ही कुछ सोच पा रहे हैं.....? क्यों आखिर क्यों हमें आने वाले समय का ख्याल नहीं होता बस आत्म-केन्द्रित सोच कुंठित वृत्ति इसके आगे भी कुछ सोचा-समझा है हमने तो आत्म-प्रसंशा के लिए .
                            आज का दौर वो दौर है जिस दौर में राजनैतिक दबाव में आकर मशीनरी को काम करना होता है नियमों को बलाए-ताक रखवाने में अग्रणी राज-नीतिज्ञों को अपने "शक्तिवान होने का दुरुपयोग न तो करना चाहिए और न हीं अपने इर्द-गिर्द स्वपन-दिखाने वाला आभा मंडल ही बनाना चाहिए " नियमों के अनुसार कार्य कराने और शास्त्री जी की तरह सादगी पूर्ण विचार वान  देश का सच्चा सेवक होता है  बाकी जो भी देश सेवक होने का दावा करतें हैं नाटकबाज़ नज़र आतें हैं दुनिया को.................................!
                                                         

मंगलवार, दिसंबर 8

कुंठा का कोई अंत नहीं है

अल्पग्य  लोगों  कुंठा का कोई अंत नहीं है अन्यथा ब्रिगेडियर-महफूज़ अली  को  विशेष-रपट  देने की क्या ज़रुरत थी .किसिम किसिम के विचार उठ रहें हैं मन में कितनी गन्दगी है....उन  लोगों के ..जो....घटिया और गलीच सोच वाले जो हिंसा के रास्ते धर्म की स्थापना करने निकल पड़े.किसी धर्म के  रास्ते चलकर  ईश्वर को पहचाना जाता है. जबकी कुंठित-लोग जिन्हें धर्म के सार-तत्व यानी अध्यात्म का ज्ञान नहीं है वे ईश्वर को परिभाषित करने की बेवज़ह कोशिशों में लिप्त हैं . जब सभी पंथों धर्मों के दिव्य साहित्यों में लिखा है कि ईश्वर से साक्षात्कार सहज नहीं है न तो चार किताबें बांच के कोई देवदूत हो जाता न ही श्लोक ऋचाएं गाकर उस दिव्य शक्ति की प्राप्ति होती है. सौरभ भाई आपकी सोच जब इतनी उम्दा है
अपने ज़ख्मों को अपनो को बता कर रखना ।
मन्दिरो में ही मिलते हो भगवान जरुरी नहीं ,
हर किसी से रिश्ता बना कर रखना .
                     तो एक बार तो सोचते तो शायद इतनी अफसोस जनक स्थिति नहीं आती गौर से देखो इस तस्वीर में तुम्हारे आराध्य नहीं तुम दौनों ही हो .=>
प्रिय भाई जो सच्चा ईश्वरवादी होगा वो अपने आप से बेखबर होगा उसे  यह तक नहीं मालूम होता कि वो कौन है.  न तो वो हिन्दू होता है न मोमिन न सिक्ख न ईसाई वो सिर्फ और सिर्फ एक इंसान होता है.जिसे कहा खुद तराशता है. अपना अंश भरता है उसमें . जो खुद के तर्कों के ज़रिये प्रभू के पथ पर चलने का अभिनय करता है उससे  परम पिता का कोई नाता वैसे भी नहीं होता. मुझे आपसे बस इतनीं गुजारिश करनी है कि प्रभू की खोज सलीम खान जैसों की बकवास से रुके न .! महफूज़ भाई जैसे भी हैं.... जो वाकई "स्वच्छ सन्देश दे रहे हैं.!"

शनिवार, दिसंबर 5

जीत लें अपने अस्तित्व पर भारी अहंकार को

आज
तुम मैं हम सब जीत लें
अपने अस्तित्व पर भारी
अहंकार को
जो कर देता है
किसी भी दिन को कभी भी
घोषित "काला-दिन"
हाँ वही अहंकार
आज के दिन को
फिर कलुषित न कर दे कहीं ?
आज छोटे बड़े अपने पराये
किसी को भी
किसी के भी
दिल को तोड़ने की सख्त मनाही है
कसम बुल्ले शाह की
जिसकी आवाज़ आज भी गूंजती
हमारे दिलो दिमाग में

शुक्रवार, दिसंबर 4

मन का पंछी / यू ट्यूब पर सुनिए


Man ka Panchhi मन का पंछी यू  ट्यूब पर सुनिए 

मन का पंछी खोजता ऊँचाइयाँ,
और ऊँची और ऊँची उड़ानों में व्यस्त हैं।

चेतना संवेदना, आवेश के संत्रास में,
गुमशुदा हैं- चीखों में अनुनाद में।
फ़लसफ़ों का किला भी तो ध्वस्त है।
मन का पंछी. . .

कब झुका कैसे झुका अज्ञात है,
हृदय केवल प्रीत का निष्णात है।
सुफ़ीयाना, इश्क में अल मस्त है-
मन का पंछी. . .
बाँध सकते हो तो बाँधो, रोकना चाहो तो रोको,
बँधा पंछी रुका पानी, मृत मिलेगा मीत सोचो
उसका साहस और जीवन इस तरह ही व्यक्त है।।