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फ़रवरी, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जयपुर और दिल्ली के बाद जबलपुर में लगाऊंगा कविता पोस्टर प्रदर्शनी : विनय अम्बर

जी हां मेरी ही कविताएं हैं विनय अम्बर के बनाए पोस्टर्स में........ जयपुर और दिल्ली में एक्ज़ीबीशन लग चुके हैं..  विनय अम्बर ने अल्टीमेटम दे दिया था गिरीश भैया कल कविताएं मिल ही जानी चाहिये.. दस कविताएं.. न उससे भी ज़्यादा कविताएं दीं विनय को.......    खूबसूरती के साथ उकेरे गए चित्रों के संग साथ मेरी कविताएं लिख दीं विनय भाई ने......... कविता पोस्टर दिसम्बर २०११ को जयपुर में लगे थे फ़रवरी में विनय ने दिल्ली में लगाए........... कल विनय ने बताया "भैया. जबलपुर में लगाऊंगा कविता पोस्टर प्रदर्शनी." ये हैं विनय-अम्बर   जबलपुर को जिस पर पूरा भरोसा है...मैं  भी इनके उजले कल को देख पा रहा हूं......... जो बहुत नज़दीक है............ जब आप पूछेंगे -जी विनय को आप जानते हैं..?  

तो फ़िर द हिंदु को ही माफ़ी मांगना चाहिये लक्ष्मी शरद के विवादित आलेख पर

" The-Hindu " में प्रकाशित एक आलेख का सिंहावलोकन ब्लाग पर ज़िक्र करते हुए जब श्री राहुल सिंह  जनता का ध्यान आकृष्ट कराया किंतु न तो अनुशासन हीन लेखिका ने किसी भी प्रकार से अनुशासन हीनता के लिये क्षमा चाही और न ही अखबार ने कुछ कहा. अपितु महिला आयोग द्वारा मामले को दुर्भाग्य-पूर्ण बताया वहीं ब्लागर एक जुट नज़र आ रहे हैं.  रश्मि  रविजा   , संतोष त्रिवेदी ,   भारतीय नागरिक - Indian Citizen , विष्णु बैरागी , संजय @ मो सम कौन ,   डॉ॰ मोनिका शर्मा , सुनीता  शर्मा  , अभिषेक मिश्र  , खुशदीप  सहगल  , प्रवीण पाण्डेय , डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक , अली  , लोकेन्द्र  सिंह  राजपूत , यशवन्त माथुर  , वीरुभई  , संगीता स्वरुप ( गीत )  , अनूप शुक्ल , संजय  मिश्र  'हबीब '  , राजेश उत्‍साही , आशा जोगळेकर , उड़न  तश्तरी , ज्ञान्दुत्त  पाण्डेय ,  ईश्वर  खान्देलिया ,  महेंद्र  वर्मा  , केवल राम ,  संजीत  त्रिपाठी , जी.के. अवधिया  , वरुण कुमार सखाजी , रमाकांत  सिंह , देवेन्द्र पाण्डेय  , अरविन्द  मिश्र , सतीश सक्सेना , अविनाश  चन्द्र  , कौशलेन्द्र , शिखा  वार्ष्णेय , प्रतिभा सक्सेना , अ

जो गीत तुम खुद का कह रहे हो मुकुल ने उसको जिया है पगले

कि जिसने देखा न खुद का चेहरा उसी  के  हाथों  में  आईना है, था जिसकी तस्वीर से खौफ़ सबको,सुना है वो ही तो रहनुमां है. हां जिनकी वज़ह से है शराफ़त,है उनकी सबको बहुत  ज़रूरत- वो  चार लोगों से डर रहा हूं… बताईये क्या वो सब यहां हैं..? अगरचे मैंने ग़ज़ल कहा तो गुनाह क्या है.बेचारे  दिल का... वो बेख़बर है उसे खबर दो    कि उसके चर्चे कहां कहां हैं..? वो लौटने का करार करके गया था, लेकिन कभी न लौटा- करार करना सहज सरल है- निबाहने का ज़िगर कहां है . जो गीत तुम खुद का कह रहे हो मुकुल ने उसको जिया है पगले किसी को तुम अब ये न सुनाना सभी कहेंगे सुना- सुना है .

जितनी ज़ल्द हो सके मन से कुण्ठा को विदाई दिलाना ज़रूरी है.

                           उदास आंखों में सपनों ने जगह बना ही ली . अक्सर हम सोचा करतें हैं कि हम सबसे ज़्यादा दुखियारे अकिंचन हैं.हमारी आदत है ऊंचाईंयों तक निगाह करने की. और फ़िर खुद को देखने की. अब बताईये परबत देख कर आप खुद को देखेंते हैं तब  तो सामान्य सी बात है कि खुद को नन्हा महसूस करेंगे ही. बस यहीं कुंठाएं जन्म ले लेतीं हैं. हम खुद को असहज पाते हैं.     दस बरस का था तब मुझे लगा कि मैं क्रिकेट खेल सकता हूं और फ़िर कोशिश की बैसाखियों के सहारे दो रन बनाए भी. दूसरी ही बाल पर क्लीन बोल्ड. बोल्ड होने से अधिक पीढा थी खेल न पाने की. बाल मन अवसाद से सराबोर हुआ . रोया भी ....खूब था तब       रेल स्टेशन के क़रीब रेल्वे  क्वार्टर में  अक्सर दुख:द खबरें मिला करतीं थीं. उस दिन स्कूल से लौटते वक़्त देखता हूं कि एक इंसान जाने किस भ्रम के वशीभूत हुआ रेल पटरी पार करने के बाद वापस लौटा और यकायक रेलगाड़ी की चपेट में आ गया.. मेरी आंखों के सामने घटा ये सब ये क्या .. उफ़्फ़ दौनों टांगें .. खुद से खूब सवाल करता रहा -"बताओ, अब वो जी भी गया तो क्या सहजता से चल सकेगा..?        अर्र अब उस बे

बहुत प्रिय हैं पादुकाएं.. आपको मुझको सभी को अगर सर पर जा टिकें तो रुला देतीं हैं सभी को.

इन पे अब ताले लगा दो ताकि ये न चल सकें.. ज़ुबां की मानिंद इनको चलने की बीमारी लग गई. वो कतरनी सी चले हैं..ये सरपट गाल पर यक़बयक़ ये जा चिपकती चमकते से भाल पर  रबर और चमड़े की किसी की भी बनी हो असरकारक हो ही जातीं दोस्तों की चाल पर  देवताओं से अधिक मन में पादुकाओं की लगन इनके चोरी जाते ही,सुलगती मन में अगन.. बहुत प्रिय हैं पादुकाएं.. आपको मुझको सभी को  अगर सर पर जा टिकें तो रुला देतीं हैं सभी को. जागती जनता मशालें छोड़ जूते हाथ ले  सरस चिंतन से अभागी बढ़ा लेती फ़ासले.   

वर्जनाओं के विरुद्ध खड़े : सोच और शरीर

लाइफ़-स्टाइल में बदलाव से ज़िंदगियों में सबसे पहले आधार-भूत परिवर्तन की आहट के साथ कुछ ऐसे बदलावों की आहट सुनाई दे रही है जिससे सामाजिक व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन अवश्यंभावी है. कभी लगता था मुझे भी  कि सामाजिक-तानेबाने के परम्परागत स्वरूप को आसानी से बदल न सकेगा . किंतु पिछले दस बरसों में जिस तेजी से सामाजिक सोच में बदलाव आ रहे हैं उससे तो लग रहा कि बदलाव बेहद निकट हैं शायद अगले पांच बरस में... कदाचित उससे भी पहले .कारण यह कि अब "जीवन को कैसे जियें ?" सवाल नहीं हैं अब तो सवाल यह है कि जीवन का प्रबंधन कैसे किया जाए. कैसे जियें के सवाल का हल सामाजिक-वर्जनाओं को ध्यान रखते हुए खोजा जाता है जबकि जीवन के प्रबंधन के लिये वर्जनाओं का ध्यान रखा जाना तार्किक नज़रिये से आवश्यक नहीं की श्रेणी में रखा जाता है.जीवन के जीने के तौर तरीके में आ रहे बदलाव का सबसे पहला असर पारिवारिक व्यवस्था पर खास कर यौन संबंधों  पड़ता नज़र आ रहा है. बेशक विवाह नर-मादा के व्यक्तिगत अधिकार का विषय है पर अब  पुरुष अथवा महिला के जीवन की व्यस्तताओं के चलते उभरतीं  दैहिक (अनाधिकृत?) आकांक्षाओं के प्रबंधन का

तस्वीर ही बदल दी : संवेदनशील अधिकारी दीपेंद्र सिंह के ज़ज़्बे को सलाम

संवेदनशील अधिकारी दीपेंद्र सिंह बिसेन     बाल-गृह जबलपुर में कोई दस बरस पहले गया था मैं.... मुझे अच्छी तरह याद है इस संस्थान में प्रवेश द्वार से ही उपेक्षा एवम नैराश्य का वातावरण पहली ही नज़र में मुझे दिखाई दे गया था.बेसहारा बच्चों के लिये स्थापित आवासीय संस्था की स्थिति देख कर घोर निराशा लिये लौटा था. पिछले बरसों में मध्य-प्रदेश सरकार के निर्णय अनुसार महिला बाल विकास विभाग को बच्चों एवम किशोरों के लिये संचालित कार्यक्रमों/योजनाओं के क्रियांवयन का दायित्व गया.जबलपुर में संचालित शासकीय बाल-गृह भी इसी निर्णय के तहत  महिला बाल विकास विभाग को हस्तांतरित किया गया. जिसकी बागडोर  संवेदनशील अधिकारी दीपेंद्र सिंह बिसेन जो  बाल विकास परियोजना अधिकारी के रूप में पदस्थ हैं को सौंपी गई. इंजिनियरिंग के विद्यार्थी होने के बावज़ूद संवेदनात्मक भाव से परिपूर्ण हैं    दीपेंद्र .  तभी तो लीक से हटकर काम करने का जोखिम भी उठाकर तस्वीर बदलने के प्रयास में लग गए.बाल-गृह के बच्चों के पैर में चप्पल न देख मन में उदासी होना जायज थी.  जाड़े के पहले अपने बच्चों की तरह उन बच्चों के तन पर ऊलन कपड़ों की चिंता भ

भोपाल वाली बुआ

भोपाल वाली बुआ.. कला बुआ वाला भोपाल मामाजी वाला भोपाल मेरा नहीं हम सबका भोपाल जी हां.. गैस रिसी थी तबका भोपाल जिसे निगला था मिथाइल आइसो सायानाईट के धुंएँ ने जो समा गया गई थी हवा के साथ देहों में जो  देहें  निष्प्राण हो गयीं जो बचीं वे ज़र्ज़र आज भी कांपते हुए जी रहीं हैं उनमें से एक हैं मेरी भोपाल वाली बुआ जिसने देह में बैठे प्राण को आत्म-साहस के साथ सम्हाले रखा हैं , बुआ रोज जन्मती  हैं रोजिन्ना मारती है  भोपाल वाली बुआ  रो देती है....... उन को याद  कर शाह्ज़हानाबाद की आम वाली मस्जिद के आसपास रहने वाली सहेली आशा बुआ को, अब्दुल चाचा, जोजफ सतबीर को यानी वो सब जिनकी हैं अलग अलग इबादतगाहें बुआ अब खिल खिला के हंसती नहीं है उसके बिना शादियों में ढोलकी बज़ती नहीं है बुआ तुम फ़िर बनना मेरी बुआ जनम जनम तक अब बुआ जरजर शरीर को लेकर सबसे बातें करती है  बहुत धीमे धीमें सुर निकलते हैं  सच उस हादसे ने छीनी  उनकी ओजस्विनी मूरत हम सबसे  पर वो हमारे साथ हैं हादसे

पाडकास्ट : जैसे तुम सोच रहे साथी

श्रीमति रचना बजाज के सौंजन्य से प्राप्त श्री विनोद श्रीवास्तव जी की एक रचना -- सुनिए  उ नकी  ही आवाज में --- जैसे तुम सोच रहे साथी  जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम, जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम। पिंजरे जैसी इस दुनिया में, पंछी जैसा ही रहना है, भर पेट मिले दाना-पानी,लेकिन मन ही मन दहना है। जैसे तुम सोच रहे साथी, वैसे संवाद नहीं हैं हम, जैसे तुम सोच रहे साथी, वैसे आजाद नहीं हैं हम। आगे बढ़नें की कोशिश में ,रिश्ते-नाते सब छूट गये, तन को जितना गढ़ना चाहा,मन से उतना ही टूट गये। जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आबाद नहीं हैं हम, जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम। पलकों ने लौटाये सपने, आंखे बोली अब मत आना, आना ही तो सच में आना,आकर फिर लौट नहीं जाना। जितना तुम सोच रहे साथी,उतना बरबाद नहीं हैं हम, जैसे तुम सोच रहे साथी,वैसे आजाद नहीं हैं हम। आओ भी साथ चलें हम-तुम,मिल-जुल कर ढूंढें राह नई, संघर्ष भरा पथ है तो क्या, है संग हमारे चाह नई। जैसी तुम सो

राजकाज

संस्थानों के दीमक आगामी अंक में तब तक इस व्यंग्य को देखिये साभार :  दखलंदाजी.काम  से इस  पन्ने  से            सरकारी आदमी हर्फ़-हर्फ़ लिखे काम करने का संकल्प लेकर नौकरी में आते हैं सब की तयशुदा होतीं हैं ज़िम्मेदारियां उससे एक हर्फ़ भी हर्फ़ इधर उधर नहीं होते काम. सरकारी दफ़तरों के काम काज़ पर तो खूब लिक्खा पढ़ा गया है मैं आज़ आपको सरकार के मैदानी काम जिसे अक्सर हम राज़काज़ कहते हैं की एक झलक दिखा रहा हूं.                                      सरकारी महकमों  में अफ़सरों  को काम करने से ज़्यादा   कामकाज करते दिखना   बहुत ज़रूरी होता है जिसकी बाक़ायदा ट्रेनिंग की कोई ज़रूरत तो होती नहीं गोया अभिमन्यु की मानिंद गर्भ से इस   विषय    की का प्रशिक्षण उनको हासिल हुआ हो.                                            अब कल्लू को ही लीजिये जिसकी ड्यूटी चतुर सेन सा ’ ब  ने  “ वृक्षारोपण-दिवस ”  पर गड्ढे के वास्ते  खोदने के लिये लगाई थी मुंह लगे हरीराम की पेड़ लगाने में झल्ले को पेड़ लगने के बाद गड्डॆ में मिट्टी डालना था पानी डालने का काम भगवान भरोसे था.. हरीराम किसी की चुगली में व्यस्त