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अगस्त, 2008 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

भोला का गाँव : राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त गाँव.........!!

कलेक्टर साहब का गाँव में दौरा जान कर भोला खेत नहीं गया उसे देखना था की ये कलेक्टर साहब क्या....कौन .....कैसे होते हैं ? दिन भर मेहनत मशक्कत कर के रोजी-रोटी कमाने वाला मज़दूर आज दिल पे पत्थर रख के रुका था , सिरपंच जी के आदेश को टालना भी उसकी सामर्थ्य से बाहर की बात थी सो बेचारा रुक गया , रात को गुलाब कुटवार [कोटवार ] की पुकार ने सारे पुरुषों को संकर-मन्दिर [शंकर ] खींच लिया बीडी जलाई गई.यहाँ सिरपंच ने तमाखू चूने,बीड़ी,का इंतज़ाम कर दिया था. सरपंच:-"काय भूरे आओ कई नई...?" "मरहई खौं जाएँ बे आएं तो आएं कक्का हम तो हैं जुबाब देबी" "जब से भूरे आलू छाप पाल्टी को मेंबर हो गाओ है मिजाज...............कल्लू की बात अधूरी रह गई कि आ टपका भूरे.....तिरछी नज़र से कल्लू को देखा और निपट लेने की बात कहते कहते रुक गया कि झट कल्लू ने पाला बदला :"जय गोपाल भैया बड़ी देर कर दई........काय भौजी रोकत हथीं का" "सुन कल्लू , चौपाल में बहू-बेटी की चर्चा मति करियो" सरपंच ने मौके की नजाकत भांप बात बदली -''भैया,कल कलेक्टर साब आहैं सबरे गाँव वारे'' भूरे;'काय,क

तुम कौन हो.....?

देखिए आप कौन हैं ? मैं कौन हूँ ? इस बात में ज़्यादा समय गवाने का दौर नहीं है मित्र सियासत ओर सियासती लोग आपको क्या समझते हैं एक कहानी से साफ हो जाएगी बात 'उन भाई ने बड़ी गर्मजोशी से हमारा किया। माँ-बाबूजी ओर यहाँ तक कि मेरे उन बच्चों के हालचाल भी जाने जो मेरे हैं हीं नहीं। जैसे पूछा- “गुड्डू बेटा कैसा है।” “भैया मेरी 2 बेटियाँ हैं।” “अरे हाँ- सॉरी भैया- गुड़िया कैसी है, भाभी जी ठीक हैं। वगैरा-वगैरा। यह बातचीत के दौरान उनने बता दिया कि हमारा और उनका बरसों पुराना फेविकोलिया-रिश्ता है। हमारे बीच रिश्ता है तो जरूर पर उन भाई साहब को आज क्या ज़रूरत आन पड़ी। इतनी पुरानी बातें उखाड़ने की। मेरे दिमाग में कुछ चल ही रहा था कि भाई साहब बोल पड़े - “बिल्लोरे जी चुनाव में अपन को टिकट मिल गया है।” “कहाँ से, बधाई हो सर” “.... क्षेत्र से” “मैं तो दूसरे क्षेत्र में रह रहा हूँ। यह पुष्टि होते ही कि मैं उनके क्षेत्र में अब वोट रूप में निवास नहीं कर रहा हूँ। मेरे परिवार के 10 वोटों का घाटा सदमा सा लगा उन्हें- बोले – “अच्छा चलूं जी !” पहली बार मुझे लगा मेरी ज़िंदगी कितनी बेकार है, मैं मैं नहीं वोट हूं। {नोट:

नागफनी जिनके आँगन में

नागफनी जिनके आँगन में, उनके घर तक जाए कौन ? घर जिनके जाले मकडी के, रेशम उनसे लाए कौन ! हर उत्तर से प्रश्न प्रसूते , प्रश्न-प्रश्न डूबे हैं उत्तर प्रश्न चिन्ह जीवन जो हो तो ऐसा चिन्ह मिटाए कौन ? चिन्तन के घट कुंठा रस मय, गीत जलाने लगे रहल ही पथ पे बिखरे बेर के कांटे , खुद से बाहर जाए कौन ?   मन ही मेरे मन का साथी, शीतल रश्मि समर्पण करता मेरे अंतस  दीप उजागर ,  सूरज के गुन गाए कौन.. ? जिज्ञासा दब गई भूख में पोथी पूज न पाया बचपन चीख रहे हैं आज आंकड़े बूढ़ी आँख पढ़ाए ... ?

ज़ाकिर हुसैन चाहतें हैं सबसे सहयोग

ज़ाकिर हुसैन चाहतें हैं सबसे सहयोग : 30 जून 1982,को जन्मे ज़ाकिर-हुसैन डटें हैं मुंबई में अपने भविष्य को सवारने !आभास-जोशी के बाद मध्य-प्रदेश के अंग रहे छत्तीसगढ़ का यह गायक वास्तव में सपनों की पोटली लिए अपने मित्र अविनाश के साथ माया-नगरी में ज़ोर आज़माइश कर रहा है।संगीत के रसिकों की नजर में ज़ाकिर के हाई और लो नोड नियंत्रित हैं . गायन में सहज़ता है . इसी कारण अन्तिम दस में स्थान पाने में ज़ाकिर हुसैन सफल हुए हैं . चूंकि रियलिटी शो का वोटिंग फार्मेट ऐसा की जो वोट पाएगा वो ही आगे बड़ता जाएगा. अत: ज़ाकिर ने सहयोग की मार्मिक अपील करते हुए मुझसे गत रात्रि टेलीफोनिक बात चीत के दौरान कहा कि- मुझे नहीं मालूम कि मैं कैसे मध्य-प्रदेश के संगीत प्रेमियों तक अपनी बात रखूँ भैया अगर आप जबलपुर मीडिया के ज़रिए मेरीआकांक्षा व्यक्त करने में सहायता करें तो तो तय है कि छत्तीसगढ़ और सारा देश मिल कर मुझे और आगे तक ले जा सकता है ! छत्तीसगढ़ के इस युवक का सम्बन्ध एक सामान्य मध्यम वर्गीय परिवार से है. १२ वीं तक शिक्षित के रोज़गार का ज़रिया आर्केष्ट्रा रहा है. जन्म के एक बरस बाद पोलियो की गिरफ्त में आए ज़ाकिर की

आभास पे फ़िदा हुए अन्नू कपूर

आभास पे फ़िदा हुए अन्नू कपूर आभास पे फ़िदा हुए अन्नू कपूर आभास की प्रतिभा की दीवानगी का हर तरफ़ असर दिखाई देता है. एन डी टी वी इमेजिन के बेहतरीन म्यूजिकल शो जुनून के आने वाले शो में सबसे मार्मिक और भावुक कर देने वाला दृश्य होगा आभास और अन्नू कपूर के बीच सम्मान और सराहना का आदान प्रदान बेहद भावुक किंतु संगीत के लिए प्रतिबद्ध एंकर अन्नू ने आभास की परफोर्मेंस के बाद बेहद अनोखे तरीके से की तारीफ़ जिससे प्रभावित हो आभास ने इस हस्ती के पाँव छू लिए . इस बात से बेखबर सभी आभास की प्रस्तुति और विनम्रता पे मोहित थे की अन्नू कपूर ने आभास के पाँव छुऐ..........!इस बात का आभास न तो आभास को था और न ही आडिएंस को , जजेज भी हतप्रभ हुए और अन्नू जी की ऊंचाई को ताकते रह गए सभी . की अन्नू जी ने कहा:-"बेटे,इस ग़लत फहमी में मत रहना की मैंने तुम्हें प्रणाम किया मैंने तो तुममे बसी माँ सरस्वती को प्रणाम किया है"अन्नू कपूर की ऊंचाई को नापना सबके बस में नही तभी तो यह घटना और अन्नू कपूर का कथन सबके लिए प्रेरक प्रसंग सी बन गया है .

कथा महोत्सव-2008

सौजन्य =>पूर्णिमा जी कथा महोत्सव-2008 अभिव्यक्ति, भारतीय साहित्य संग्रह तथा वैभव प्रकाशन द्वारा आयोजित अभिव्यक्ति, भारतीय साहित्य संग्रह तथा वैभव प्रकाशन की ओर से कथा महोत्सव २००८ के लिए हिन्दी कहानियाँ आमंत्रित की जाती हैं। दस चुनी हुई कहानियों को एक संकलन के रूप में में वैभव प्रकाशन, रायपुर द्वारा प्रकाशित किया जाएगा और भारतीय साहित्य संग्रह http://www.pustak.org/ पर ख़रीदा जा सकेगा। इन चुनी हुई कहानियों के लेखकों को ५ हज़ार रुपये नकद तथा प्रमाणपत्र सम्मान के रूप में प्रदान किए जाएँगे। प्रमाणपत्र विश्व में कहीं भी भेजे जा सकते हैं लेकिन नकद राशि केवल भारत में ही भेजी जा सकेगी। महोत्सव में भाग लेने के लिए कहानी को ईमेल अथवा डाक से भेजा जा सकता है। ईमेल द्वारा कहानी भेजने का पता है- teamabhi@abhivyakti-hindi.org डाक द्वारा कहानियाँ भेजने का पता है- रश्मि आशीष, संयोजक- अभिव्यक्ति कथा महोत्सव-२००८, ए - ३६७ इंदिरा नगर, लखनऊ- 226016, भारत महोत्सव के लिए भेजी जाने वाली कहानियाँ स्वरचित व अप्रकाशित होनी चाहिए तथा इन्हें महोत्स

विश्व छायांकन दिवस पर विशेष : जबलपुर के महान छायाकार:-स्व.शशि यादव

शशिन यादव , जी ने ये सारे चित्र समकालीन सेलीब्रिटीज़ के जबलपुर प्रवास के दौरान ही लिए थे ।समीर लाल जी उर्फ़ उड़ने वाली प्लेट ने शशिन जी के फोटोस की एक्जीबिशन जबलपुर में लगाई थी जब समीर जबलपुर में थे ..... हर साल मिलन फोटो ग्राफिक सोसायटी "मिफोसो" उनकी याद में प्रतियोगिता "ये जाने अनजाने छायाकार " शीर्षक से आयोजित करती है। हर साल कई केटेगरी में पुरस्कृत होते हैं छायाकार याद आते हैं शशिन जी बच्चन जी पलंग की निवार का आनंद लेती "गौरैया" मुक्तिबोध उपेन्द्र नाथ "अश्क" जबलपुर के प्रतिष्ठित छायाकार स्वर्गीय शशिन यादव , के फोटोग्राफ'स श्वेत-श्याम श्रेणी के है उस दौर में रंगीन छाया चित्रों का न तो दौर था और न ही उस समय रंगीन फोटो ग्राफिक केमेरा का विकास ही हो सका था । फ़िर गुजरात से रोज़गार की तलाश में आया कोई शशिनजी जैसा युवक कैसे संसाधन के तौर पर जुगाड़ पाता । किंतु वे स्थानीय महत्त्व पूर्ण अवसरों को न चूकने वाले शशिन जी ने उन अवसरों को नहीं छोडा जिनसे अचानक सामना हुआ उनका ............. [सभी फोटो शशिन जी के पुत्र श्री अरविंद यादव जी के सौजन्

माँ....तुझे प्रणाम...माँ तुझे सलाम

अभिनव बिंद्रा , की कोशिश से स्वर्ण किरण ,मेरे आँगन में बिखरीं , और वो जो - वो पैरों से नहीं हौसलों से चलता है !" जी हाँ वो जो तारे जमीं पर , ले आता है .....जी हाँ वो जीमज़दूर है किसान है जी हाँ वही जो आभास -दिलाता है सु इश्मीत , सी यादें जो पलकों,की किनोरें भिगो देतीं हैं उन सबको मेरा सलाम माँ तुझे प्रणाम माँ तुझे सलाम

"वो पैरों से नहीं हौसलों से चलता है !"

जीवन को लहरों से बचा लाया है ये शख्स पैरों से नहीं हौसलों से चला करता हैं। इसे आप कोई भी नाम दे सकतें है राम,रहीम,जान,कुलवंत,मैं तो उसका नाम "हौसला "रख देना चाहता हूँ । इस पर कोई भी निगाह पड़ती है केवल संवेदना की निगाह होती है .....मुझे उसका बाहरी मदद के लिए कहा वाक्य आज तक याद है :- भैया मुझे हर मदद एक बार और अपाहिज बना देती है.......... ! उसे जीवन को सामान्य रूप से जीने की अभिलाषा है वो पूरी शायद ही हो। मेरे कवि-मन नें पंक्तियाँ गढ़ लीं "नहीं वेदना उसको कोई पर संवेदन जीवन है " छायाकार : संतराम चौधरी ,जबलपुर /भोपाल

बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी

तुम्हें मालूम है अपने शहर के पास के गाँव में डाक्टर जोगी आएं हैं । देखो सबको आराम दिलाने का वादा कर चुकें है......देखो भोलू अपनी नाड़ी जांच करा रहा है .......... भोलू को दवा के रूप में मिलेगी भभूत जिसका असर होगा की नहीं मुझे नहीं मालूम पर इत्ता जानती हूँ की बाबा के डेरे में फोटो वाली भगवानों में से कोई-न-कोई फोटो वाले भगवान का आशीर्वाद ज़रूर असर करेगा अरी लाली तू ये सब मुझे कान में ऐसे बता रही है जैसे की किसी सी डी के बारे में बता रही हो........! लाली :-अरे ,मैं कहना चाहतीं हूँ की हमको संतान चाहिए चलें डाक्टर जोगी के पास ? अरे तू भी बे वजह बखेडा खडा करती है चल ग्वारी घाट जहाँ साक्षात शंकर भगवान की मान नर्मदा की कृपा से कितनों का भला हो रहा है ...........! इन माँ-बेटी को देखो ये कितनी सुखी दम्पति है और ये खुशहाल कुटुंब .................! जी हाँ ये बात तुमको कानाफूसी केज़रिए इस लिए बता रही हूँ प्रियतम क्योंकि बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जायेगी, बेहतर है की हम तुम .............से काम चलाएं {सभी फोटो:संतराम चौधरी जबलपुर,भोपाल ,}

"पुत्री वती भव: कहने में डर कैसा"

"पुत्री वती भव: कहने में डर कैसा" ताज़ातरीन समाचार एक ब्लॉग "रांचीहल्ला"से तथा समीर लाल की मज़ाहिया किंतु गहरे अर्थ वाली पोस्ट प्रेरित हो सोचता हूँ “औरतों की दशा जितनी चिकित्सा विज्ञान ने बिगाड़ के रखी है उससे अधिक ज़िम्मेदार है मध्य वर्ग की सामाजिक विवशता यहाँ मध्यवर्ग को सरे आम अपमानित करना मेरा लक्ष्य बिलकुल नहीं है किंतु वास्तविकता यही है "पति बदलू कथानकों पे आधारित एकता कपूर छाप सीरियल देखतीं महिलाओं के ज़ेहन में घरेलू जिम्मेदारी के अलावा यह भी जिम्मेदारी है की अखबारों/संचार-माध्यमों में शाया आंकड़ों पे नज़र डाल लें किंतु जैसे ही कन्या सौभाग्यवती होती है उसे करवाचौथ,संतान सप्तमीं,वट-सावित्री जैसे व्रत वर्तूले याद रह जाते क्या महिलाओं के लिए ये सब शेष है सच यदि महिलाएं स्वयं लिंग परीक्षण के विरुद्ध एक जुट हो जाएँ तो यकीनन सारा परिदृश्य ही बदल जाएगा आप सोच रहें होंगे कि किन कारणों से ये ज़बाव देही मैं महिलाओं पे डाल रहा हूँ जन संख्या आयुक्त और महापंजीयक जेके भाटिया का कहना है कि 1981 में लड़कियों की सं`या 1000 लड़कों के मुकाबले में 960 थी जो अब गिरकर 927 पर आ

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दिल्ली की बारिश और बीजिंग को लेकर लाइव इंडिया की स्टोरी देख के लगा कि ओलम्पिक खेल से ज़्यादा भारत की इन्सल्ट तुलना करके करना ही ख़बर है .... भैया प्रोड्यूसर साहब सरकार राज़ से ऐसी क्या गलती हुई कि आप दिल्ली की लगातार बरसात के बाद सडकों गलियों में भरे पानी को दो साल बाद भारत में होने वाले खेल महा कुम्भ से जोड़ कर दिखाया जिसका न तो कोई अर्थ था और न ही ज़रूरत कि इस देश की किसी अन्य देश से तुलना कर भारत को नीचा दिखाएं । मेरठ में उड़नतश्तरी के बारे जानकार खुशी हुई हुई ही थी की पुण्य प्रसून बाजपेयी के आगमन की ख़बर मेल इनबाक्स से निकलने को फड़फड़ा रही थी ।मैनें आनन् फानन बाजपेयी जी का स्वागत कर दिया और कह दिया है कि उडन तश्तरी .... की तरह औरों ब्लॉग को टिप्पणी तिलक ज़रूर कीजिए । अब ये कोई बात है जो ब्लॉग पर लिखूं .....तो फ़िर ब्लॉग पे लिखने के लिए क्या विषय चुक गए हैं कटाई नहीं विषय के चुक जाने का संकट अपुन को कतई नहीं अपन यानी "अपुन जेक ऑफ़ आल मास्टर ऑफ़ नन" जो ठहरे....ठेल देंगें कछु भी । यदि कुछ न सूझा तो कट पेस्ट थेरेपी जिंदाबाद ..... ! चीन में ओलोम्पिक की शुरुआत ,तिब्बतियों का विर