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जुलाई, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

काग दही के कारने वृथा जीवन गंवाय..!

मृत काग काग दही के कारने वृथा जीवन गंवाय..!             छोटी बिटिया श्रृद्धा ने स्कूल से लौटकर मुझसे पूछा.. पापा- “कागद ही के कारने वृथा जीवन गंवाय..!” का अर्थ विन्यास कीजिये.. मैने दार्शनिक भाव से कहा – बेटी यहां कागज के कारण जीवन व्यर्थ गंवाने की बात है.. शायद कागज रुपए के लिये प्रयोग किया गया है.. ? बेटी ने फ़िर पूछा- “काग दही के कारने वृथा जीवन गंवाय..!” अब फ़िर से बोलिये.. इसका अर्थ क्या हुआ.. हतप्रभ सा मैं बोल पड़ा – किसी ऐसी घटना का विवरण है जिसमें कौआ दही के कारण जीवन खो देता है.. गदही बेटी ने बताया कि आज़ स्कूल में एक कहानी सुना कर टीचर जी ने इस काव्य पंक्ति की व्याख्या की. कहानी कुछ यूं थी कि एक दही बेचने वाली के दही वाले घड़े में लालची कौआ गिर के मर गया. महिला निरक्षर थी पर कविता करना जानती थी सो उसने अपने मन की बात  कवित्त में कही- “काग दही के कारने वृथा जीवन गंवाय..!” इस पंक्ति को दुहराने लगी . फ़िर राह पर किसी पढ़े लिखे व्यक्ति से उक्त पंक्ति लिपिबद्ध कराई..          पढ़े लिखे व्यक्ति ने कुछ यूं लिखा – “कागद ही के कारने वृथा जीवन गंवाय..!”                 

संघर्ष का कथानक : जीवन का उद्देश्य

संघर्ष का कथानक   जीवन का पर उद्देश्य होना चाहिये ऐसा मैं महसूस करता हूं.. आप भी यही सोचते   होगे न.. सोचिये अगर न सोचा हो तो . इन दिनों मन अपने इर्द-गिर्द एवं समाज़ में घट रही घटनाओं से सीखने की चेष्टा में हूं.. अपने इर्द गिर्द देखता हूं लोग सारे जतन करते दिखाई देते हैं स्वयं को सही साबित करने के. घटनाएं कुछ भी हों कहानियां  कुछ   भी हों पर एक एक बात तय है कि अब लोग आत्मकेंद्रित अधिक हैं. मैं मेरा , मुझे , मेरे लिए , जैसे शब्दों के बीच जीवन का प्रवाह जारी है.. समाप्त भी  इन्हीं शब्दों के बीच होता है.   ज़रूरी है पर एक सीमा तक. उसके बाद सामष्टिक सोच आवश्यक होनी चाहिये. सब जानतें हैं स्टीफ़न हाकिंग  को किसी से छिपा नहीं है ये नाम . वो इन बंधनों से मुक्त जी रहा है.. जियेगा भी अपनी मृत्यु के बाद निरंतर .. कबीर, सूर, यानी सब के सब ऐसे असाधारण उदाहरण हैं.. ब्रेल को भी मत भूलिये.. मैं ये सचाई उज़ागर करना  चाहता हूं कि -"संघर्ष का कथानक : जीवन का उद्देश्य हो "..  संघर्ष का अर्थ पारस्परिक द्वंद्व क़दापि नहीं   बल्कि तपस्या है.. संघर्ष आत्मिक संबल का स्रोत भी है.. !               पत

टमाटर के नाम खुला खत

डिंडोरी 24.072014 फ़्रीज़ की तस्वीर भेज रहा हूं..  ताकि आप को यक़ीन आ जाए... प्रिय टमाटर                 “ असीम - स्नेह ”                   मैं डिंडोरी   में तुम्हारे बिना जी रहा हूँ तुम्हारी कीमत यहां रुपये 80/- है.. मुम्बई दिल्ली मद्रास भोपाल यानी आएं-बाएं की   खबरें खूब सुनी हैं   बाकी सब ठीक ठाक है   तुम महंगे हमारी क्षमता तुमको घर लाने की नहीं है तुम और प्याज भैया मिल के   कुछ नीचे आ जाओ   हमें तुम्हारी लज़ीज़ चटनी खाए   बहुत दिन बीत गए आलू भैया को स्नेह कहिये   जहां रहिये   ज़रा सस्ते रहिये   आप तीनों और   नमक दादा सबका ध्यान रखेंगें ... आम आदमी ( केजरिया नहीं ) प्रजाति के लोग बेहद चिंतित है.. मोदी भैया को भी "प्रथम ग्रासे- मक्षिका पाते" के संकट से निज़ात दिलाइये.. हम जानते हैं आप सभी अर्थात- आप , आलू भैया , प्याज भैया ,, नमक जी   के मन में हम सबके प्रति दुरभाव नहीं.. बशीर चचा ने कहा ही है कि " कुछ तो मज़बूरियां रहीं होंगी- यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता"   हमाई कही सुनी माफ़ करिये.. आपकी वज़ह से हमाए चेहरों पे रौनक   रहती है... आप रूठे तो हमा

तुमको सोने का हार दिला दूँ

सुनो प्रिया मैं गाँव गया था भईयाजी के साथ गया था बनके मैं सौगात गया था घर को हम दौनों ने मिलकर दो भागों मैं बाँट लिया था अपना हिस्सा छाँट लिया था पटवारी को गाँव बुलाकर सौ-सौ हथकंडे आजमाकर खेत बराबर बांटे हमने पुस्तैनी पीतल के बरतन आपस में ही छांटे हमने फ़िर खवास से ख़बर रखाइ होगी खेत घर की बिकवाई अगले दिन सब बेच बांच के हम लौटे  इतिहास ताप  के हाथों में नोट हमारे सपन भरे से नयन तुम्हारे प्लाट कार सब आ जाएगी मुनिया भी परिणी जाएगी सिंटू की फीस की ख़ातिर अब तंगी कैसे आएगी ? अपने छोटे छोटे सपने बाबूजी की मेहनत से पूरे पतला खाके मोटा पहना माँ ने कभी न पहना गहना चलो घर में मैं खुशियाँ ला दूँ तुमको सोने का हार दिला दूँ

आम का अचार तैयार करने का सही समय है ये ...

बाबूजी का निर्देशन जारी रहा प्रभू सलामत रखियो आम का    अचार  बनाने का ये सही  वक्त है. बारिश के बाद  नमी भरा वातावरण बाबूजी की पहल और बहुत से इंतज़ामात चाहिये ही चाहिये. आम काटना अब एक द्विराष्ट्रीय संबंधों जैसी समस्या हो चुकी है. अर्र न अब ये समस्या इत्ती बड्डी नहीं कि हम परेशान हों. सच तो जे है कि अब आम काटने वाले लोग आराम से बाज़ार में मौज़ूद हैं. बस हमको साफ़ सफ़ाई एवम शुद्धता का ख्याल रखना है.       हां तो आम का अचार बनाने से पेश्तर ईश्वर और ईश्वर तुल्य पूर्वजों को हाज़िर नाज़िर मान कर ये पुनीत  कार्य संपादित होना था. बहन जी आम की सफ़ाई करते फ़ोटो हैंचवाने को तत्पर  जीजा श्री का अविश्मरणीय अवदान . सो हुआ. प्रभू के सामने कटी हुई कैरी का भोग लगाया गया ताक़ि निर्माण-कार्य में कोई अनावश्यक आपदा न आ जाए. उधर हमारे जीजाश्री जिनकी पृष्ट्भूमि ग्रामीण है ने मसाला तैयार करने में खुल के मदद की. हमारी बहन जी श्रीमति वंदना जोशी  कटे हुए आमों की स्वच्छता तय कर रहीं   तो  सुआ पंखी साड़ी में हल्का सा पल्लू ढांक श्रीमति बिल्लोरे मसाले  का भली प्रकार मिश्रण  कर रही थीं. पल पल बा

लिव-इन रिश्ते बनाने से पहले अपने कल के बारे में अवश्य सोचिये

       अपने कल के बारे में अवश्य सोचिये            डाक्टर शालिनी कौशिक का   एक आलेख लिव इन संबंधों के आगामी   परिणामों को लेकर एक खासी चिंता का बीजारोपण करता है. कारण साफ़ है कि   " वर्ज़नाओं के खिलाफ़ हम और हमारा शरीर एक जुट हो चुका है..!"   अर्थात हम सब अचानक नहीं पूरी तैयारी से वर्ज़नाओं के खिलाफ़ हो रहें हैं. हम अब प्रतिबंधों को समाप्त करने की ज़द्दो ज़हद में लगे हैं.   जिन प्रतिबंधों को हमें तोड़ना चाहिये उनसे इतर हम स्वयं पर केंद्रित होकर केवल कायिक मुद्दों पर सामाजिक व्यवस्था द्वारा लगाए प्रतिबंधों को तोड़ रहे हैं. निर्मुक्त हो परीमित न होने की उत्कंठा का होना सहज़ मानव प्रवृत्ति है.  इस उत्कंठा का स्वागत है. किंतु केवल शारीरिक संदर्भों में प्रतिबंधों का प्रतिकार करना अर्थात केवल विवाह-संस्था का विरोध करना तर्क सम्मत नहीं है.. न ही ग्राह्य है. यहां धर्म इसे गंधर्व विवाह कहता है तो हम इसे लिव-इन का नया नवेला नाम दे रहे हैं. बहुतेरे उदाहरण ऐसे भी हैं जिनका रहस्य ऐसे दाम्पत्य का रहस्योदघाटन तब करता है जब किसी एक का जीवन समाप्त हो खासकर उज़ागर भी तब ही होते हैं जब पिता  क

हज़ूर के बंगले के पर्दे

सरकारी अफ़सर हो या उसकी ज़िंदगी चौबीसों - घंटे के लिये सरकारी होते हैं जो भी होता है सब कुछ सरकारी ही तो होता है . दफ़्तर का चपरासी आफ़िस से ज़्यादा घर का काम करे तो वफ़ादार , जो बाबू घर जाके चापलूसी करे पूरी निष्ठा और ईमानदारी चुगलखोरी करे वो निष्ठावान , बाकी   बाकियों को “ किसी काम के नहीं हैं..!” - वाली श्रेणी में रखा जा सकता है ..!” ईमानदारी का दम भरने वाला साहब उसके कान में चुपके से कुछ कह देता है और वो बस हो जाता है हलाकान गिरी से न रहा गया उसने पूछा - राजेंद्र क्या बात है किस तनाव में हो भई ..? राजेंद्र – का बतावैं , साहब , सोचता हूं कि बीमार हो जाऊं ..! गिरी - बीमार हों तुमाए दुश्मन तुम काए को .. राजेंद्र - अरे साहब , दुश्मन ही बीमार हो जाए ससुरा ! गिरी ने पूछा - भई , हम भी तो जानें कौन है तुम्हारा दुश्मन ..? राजेंद्र - वही , जो अब रहने दो साहब , का करोगे जानकर .. गिरी - अरे बता भी दो भाई .. हम कोई गै़र तो नहीं .. राजेंद्र - साह

"फ़ुरसतिया का माईन्यूट आब्ज़र्वेशन पाईंट : सर्वहारा पुलिया एवम ज़ेंडर-विभेद"

औरों की तरह मशहूर चिट्ठाकार  अनूप शुक्ल जी उर्फ़ फ़ुरसतिया रोज़िन्ना सुबह सकारे टहला करते हैं. जबलपुर में अनूप जी का सुबह सवेरे माईन्यूट आब्ज़र्वेशन पाईंट है एक "पुलिया" जिसे उनने सर्वहारा पुलिया नाम दिया है.इस पुलिया तक पहुंचे  नहीं कि बस सेलफ़ोन से फ़ोटू निकाले और बस फ़ेसबुक पर लाद देते हैं.   आज़ भी एक फ़ोटो उनने  फ़ोटो लादा है वो तो बच्चों जिसमें एक लड़की दूसरा लड़का है. दौनों ही सर्वहारा-पुलिया पर बैठे हैं  एक असहज दूरी बना के. इस फ़ोटो पर " भाई सतीष चंद्र सत्यार्थी " का कमेंट पाया गया - " जेंडर गैप... " बस आलेख यहीं से शुरू करना चाहता हूं..........                       भारतीय सामाजिक व्यवस्था में जैंडर गैप की बुनियाद शैशव काल से ही जन्म ले लेती है इस पर कोई दो राय नहीं है. बाल्यावस्था आते आते तक बच्चों के मन में ये बात गहरी और पुख्ता होती चली जाती है.  वास्तविकता की पड़ताल करें तो "जैंडर-विभेद" सामाजिक सोच का नतीज़ा है. नर संतान के बारे में सोच कर अभिभावक ही नहीं वरन उनसे सरोकार रखने वाले लोग भी... बहुत आशावादी होकर कहा करते हैं.. वाह , बेटा

समांतर सिनेमा की बेहतरीन अदाकारा : स्व. स्मिता पाटिल (आलेख- फ़िरदौस खान, Star News Agency )

               हिंदी सिनेमा की सशक्त अभिनेत्री स्मिता पाटिल को उनकी जीवंत और यादगार भूमिकाओं के लिए जाना जाता है. उन्होंने पहली ही फ़िल्म से अपनी अभिनय प्रतिभा का लोहा मनवा दिया था , लेकिन ज़िंदगी ने उन्हें ज़्यादा वक़्त नहीं दिया. स्मिता पाटिल का जन्म 17 अक्टूबर , 1955 को महाराष्ट्र के पुणे में हुआ था. उनके पिता शिवाजीराव पाटिल महाराष्ट्र सरकार में मंत्री थे. उनकी माता सामाजिक कार्यकर्ता थीं. उनकी शुरुआती शिक्षा मराठी माध्यम के एक स्कूल से हुई थी. कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह मराठी टेलीविजन में बतौर समाचार वाचिका काम करने लगीं. ख़ूबसूरत आंखों वाली सांवली सलोनी स्मिता पाटिल का हिंदी सिनेमा में आने का वाक़िया बेहद रोचक है. एक दिन प्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता-निर्देशक श्याम बेनेगल ने उन्हें टीवी पर समाचार पढ़ते हुए देखा. वह स्मिता के नैसर्गिक सौंदर्य और समाचार वाचन से प्रभावित हुए बिना न रह सके. उन दिनों वह अपनी फ़िल्म चरणदास चोर बनाने की तैयारी कर रहे थे. स्मिता पाटिल में उन्हें एक उभरती अभिनेत्री दिखाई दी. उन्होंने स्मिता पाटिल से मुलाक़ात कर उन्हें अपनी फ़िल्म में एक छोटा-सा कि

मुदिता का अर्थ

मित्रो दुनियां में केवल मुदिता  शेष होगी.. मुदिता का अर्थ  “ प्रफ़ुल्लता  के साथ  जीवन जीना ” ही तो है.. इस प्रफ़ुल्लता का अर्थ सदा ही  रचनात्मकता की दिशा में उठता क़दम ही है. यही प्रफ़ुल्लता विश्व का कल्याण करने के लिये "महत्वपूर्ण-टूल" है.  जो सांस्कृतिक रूप से पुष्टिकृत है. अर्थात इसे केवल दार्शिनिकों ने पुष्टिकृत किया हो ऐसा क़दापि नहीं हैं.आइये इसे अधिक विश्लेशित करें..  प्रफ़ुल्लता कैसे लाएं जीवन में :- जीवन में प्रफ़ुल्लता का प्रवेश तब होता है जब हम आप निस्पृह होकर रहें. अन्य किसी के जीवन से स्पर्द्धा, तुलना, एवम गुण-अवगुण की समीक्षा का सीधा अर्थ है कि हम अपने मानस में "कुंठा" का बीजारोपण कर रहें हैं. जब हमारे मानसिक क्षेत्रफ़ल में कुंठा का विस्तार होता है तो बेशक अन्य किसी भाव के लिये स्थान शेष क़दापि मिलना असंभव है. अत: प्रफ़ुल्लता के लिये मानस-स्थल सदा खाली रखें और दुनियां को देखने का नज़रिया बदलें.   प्रफ़ुल्लता के लिये सकारात्मक सोच को मानस में जगह दें  :- अब आप कहेंगे कि मानस को रिक्त रखना हैं तो सकारात्मक सोच भी मानस में न रखी जाए.. न ऐसा नहीं हैं.. सकार