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वीर तो शर शैया पर आराम की तलब रखतें हैं

बेहद कुण्ठित लोगों के का जमवाड़ा सा नज़र आता है हमारे इर्द-गिर्द हमको.   हम लोग अकारण आक्रामक होते जा रहे हैं. वास्तव में हमारी धारण शक्ति का क्षय सतत जारी है. उसके मूल में केवल हमारी आत्म-केंद्रित सोच के अलावा और कुछ नहीं है. इस सोच को बदलना चाहें तो भी हम नहीं बदल सकते क्यों कि जो भी हमारे पास है उससे हम असंतुष्ट हैं.एक बात और है कि  हमारी आक्रामकता में बहादुर होने का गुण दिखाई नहीं देता अक्सर हम पीछे से वार करतें हैं या छिप के वार करते हैं.यानी युद्ध के आदर्श स्वरूप हटकर हम छ्द्म रूप से युद्ध में बने रहते हैं. यानी हम सिर्फ़ पीठ पे वार करने को युद्ध मानते हैं. हां रण-कौशल में में "अश्वत्थामा-हतो हत:" की स्थिति कभी कभार ही आनी चाहिये पर हम हैं कि अक्सर "अश्वत्थामा-हतो हत:" का उदघोष करते हैं. वीर ऐसा करते हैं क्या ? न शायद नहीं न कभी भी नहीं. वीर तो शर शैया पर आराम की तलब रखतें हैं .पता नहीं दुनियां में ये क्या चल रहा है..ये क्यों चल रहा है..?  कहीं इस युग की यही नियति तो नहीं..शायद हां ऐसा ही चलेगा लोग युद्ध रत रहेंगे अंतिम क्षण तक पर चोरी छिपे..! क्यों कि

दोस्ती का हलफ़नामा मांगने वाले सम्हल

जिसे देखो अपने मक़सद का मुसाफ़िर है यहां- तंग रस्ते से बताएं आप जाते हैं कहां..? जिसे देखो खुदपरस्ती में बहुत मशरूफ़ है- कहो क्या तुम उसी बस्ती से आए हो यहां..? कुछ शरारे तुम्हारे चोगे पे कहीं जा न गिरें- दृदय के ज्वालामुखी का रास्ता आंखैं यहां. दोस्ती का हलफ़नामा मांगने वाले सम्हल- "रेत की बुनियाद पे महल बनते हैं कहां ?"

हरि रैदास की रोटियां....

रोटीयों पर लिखी नजीर अकबराबादी की   नज़्म  तो याद है न आपको  नजीर साहेब  का नज़रिया साहित्य के हिसाब किताब से देखा जाए तो साफ़ तौर पर एक फ़िलासफ़ी है..  जब आदमी के पेट में आती हैं रोटियाँ । फूली नही बदन में समाती हैं रोटियाँ ।। आँखें परीरुख़ों [1]  से लड़ाती हैं रोटियाँ । सीने ऊपर भी हाथ चलाती हैं रोटियाँ ।।          जितने मज़े हैं सब ये दिखाती हैं रोटियाँ ।।1।। रोटी से जिनका नाक तलक पेट है भरा । करता फिरे है क्या वह उछल-कूद जा बजा ।। दीवार फ़ाँद कर कोई कोठा उछल गया । ठट्ठा हँसी शराब, सनम साक़ी, उस सिवा ।।          सौ-सौ तरह की धूम मचाती हैं रोटियाँ ।।2।।                                                                अदभुत है.. सच मुझ से दूर नहीं हो पातीं वो यादें...  जब रेल की पटरियों  का काम करने वाली गैंग वाले मेहनत मज़दूरों के पास न चकला न बेलन बस हाथ से छोटी सी अल्यूमीनियम की छोटी सी परात में सने आटे के कान मरोड़ कर एक लोई निकाल लेते हाथ गोल-गोल रोटियां बना देते थे.उधर पतले से तवे पर रोटी गिरी और आवाज़ हुई छन्न से पलट देता मज़दूर रोटी को  खुशबू   बिखेरती रोटी

कलेक्टर गुलशन बामरा ने बिना शर्त माफी मांगी

जबलपुर , 18  अप्रैल , 2012            पिछले   दो   दिन   से   समाचार   पत्रों   में  16  अप्रैल  2012  को   गेहूँ   खरीदी   के   संबंध   में   ली   गई   मीटिंग   तथा   उसके  बाद   मीडिया   प्रतिनिधियों   को   दिये   गये   वक्तव्य   के   संबंध   में   कलेक्टर   गुलशन   बामरा   ने   अपने   जिले   के   किसानों  से   बिना   शर्त   माफी   मांगी   है।            इस   संबंध   में   कलेक्टर   ने   कहा   है   कि   मेरी   याददाश्त   और   समझ   के   अनुसार   मेरे   द्वारा   जिले   के   किसानों   के  संबंध   में   किसी   प्रकार   के   अपशब्द   नहीं   कहे   गये   हैं।   उन्होंने   कहा   है   कि   कतिपय   गेहूँ   खरीदी   केन्द्रों   में   गेहूँ   की  गुणवत्ता   ठीक   नहीं   होने   की   सूचना   मिलने   के   उपरांत   इस   संबंध   में   मेरे   द्वारा   किसानों   से   अपील   की   गई   थी   कि समर्थन   मूल्य   पर   खरीदा   गया   गेहूँ   सार्वजनिक   वितरण   प्रणाली   के   माध्यम   से   आंगनवाड़ियों   में   बच्चों ,  गर्भवती  माताओं ,  स्कूलों   में   मध्यान्ह   भोजन   कार्यक्रम   तथा   पीला   एवं

कभी देखिये तो आईने में ज़रा किसी भेड़िये से कम नज़र नहीं आते हम

साभार: आलोक मलिक के ब्लाग -" कलम से " साभार:" पद्मावलि "                       सगाई हुई.. दो दिन बाद किसी वज़ह से रिश्ता टूट गया. लड़के वाले परिवार में कोई फ़र्क नहीं पड़ा .लड़की वाला परिवार कुछ दिन  उदास रहा.नियति मान कर मां-बाप ने बात को  आई गई कर दिया.  किसे मालूम कि बिटिया के दिल पे क्या बीती ? पता करने की भी क्या ज़रूरत क्यों बेवज़ह किसी को कुदेरा जाए. लड़की का हृदय किसने बांचा जो पल पल गुलती है कभी अपने भाग्य को तो कभी अपने सांवले,मोटे,बेढप होने के दर्द को बारी बारी गिन रही होती है. लानत भेजिये ऐसी  सामाजिक व्यवस्था को उसके व्यवस्थापकों को जो  हर कमज़ोर को शिकार बनाती है. लड़की ने सल्फ़ास खा कर आत्म हत्या की कोशिश की उफ़्फ़ !! क्या यही उसकी कायरता थी जो वो अपराध बोध से ग्रसित आत्महंता हुई..हां थी उसकी कायरता कि वो हार गई पर गौर से देखिये हम और आप उससे बड़े कायर हैं जो समाज के ऐसे लोगों को समझाने ज़ुबां खोलने की हिम्मत न कर सके जो सगाई तोड़ देने की जुर्रत करते चले आ रहे हैं. अथवा लड़कियों को दहेज-का रास्ता मात्र है मानते हैं.  नहीं करते हम कायर जन 

जबलपुर में कायम रही पचहत्तर साल पुरानी परम्परा : प्रो. उपाध्याय अध्यक्ष सतीश बिल्लोरे उपाध्यक्ष मनोनीत.

प्रो. एस. डी. उपाध्याय नवनिर्वाचित अध्यक्ष श्री राजेश अमलाथे सचिव  श्री एस. के बिल्लोरे नवनिर्वाचित उपाध्यक्ष              नार्मदीय ब्राह्मण समाज, जबलपुर के त्रिवार्षिक चुनाव प्रो0 योगेश उपरीत की अध्यक्षता में स्थानीय हितकारिणी नर्सिगं कालेज, जबलपुर में दिनांक 15.04.2012 को संपन्न हुये । विगत 75 वर्षो से अधिक अवधि से नार्मदीय ब्राह्मण समाज, जबलपुर के पदाधिकारियों का चयन मनोनयन के आधार पर किया जाता है। इसी क्रम में डा. मोतीलाल पारे, श्री एम.एल. जोशी, श्री चन्द्रशेखर पारे, श्री रमेश शुक्ला, श्री महेन्द्र परसाई एवं श्रीमती पुष्पा जो्शी के सदस्यता वाली चुनाव समिति द्वारा सर्वसमिति से प्रो0 एस.डी.उपाध्याय को अध्यक्ष मनोनीत करते हुये अपनी कार्यकारिणी के गठन के अधिकार प्रदत्त किये । नवनिर्वाचित अध्यक्ष द्वारा अपनी कार्यकारिणी का गठन कर आम-सभा से अनुमोदन प्राप्त किया। संरक्षक मण्डल-श्री मांगीलाल गुहा, श्री काशीनाथ अमलाथे, श्री काशीनाथ बिल्लौरे, श्री प्रो. योगेष उपरीत, श्री मोतीलाल पारे, श्री उमेश बिल्लौरे, श्री मनोहरलाल जोशी, श्री चन्द्रशेखर पारे, श्री महेन्

अपराजेय योद्धा डॉ. भीमराव अंबेडकर: सुनीता दुबे

भारतीय संविधान के मुख्य शिल्पकार, दलितों के मुक्ति संग्राम के अपराजेय योद्धा, भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर का जन्म 120 वर्ष पूर्व 14 अप्रैल 1891 को मध्यप्रदेश के इंदौर के पास महू में हुआ था। दलित चेतना के अग्रदूत बाबा साहेब अम्बेडकर ने वर्ण-व्यवस्था के दुष्चक्र में फंसे भारतीय समाज के एक बड़े हिस्से को दशकों पूर्व जिस तरह आत्मसम्मान की राह दिखाई वह आज अपने मुकम्मल पड़ाव पर पहुंचने को आतुर है। इस युगदृष्टा ने अपनी गहरी विश्लेषणात्मक दृष्टि और स्वानुभूत पीड़ा के मेल से जो बल हजारों वर्षों से दलित-दमित जातियों को दिया वह एक युग प्रवर्तक ही कर सकता है।  मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान की घोषणा के अनुपालन में मध्यप्रदेश शासन द्वारा अपने इस गौरवशाली सपूत की जन्म स्थली अम्बेडकर नगर (महू) में बने स्मारक पर प्रत्येक वर्ष 14 अप्रैल को महाकुंभ का आयोजन किया जाता है। इसमें देश-प्रदेश के मूर्धन्य व्यक्तियों सहित तकरीबन एक लाख लोग भाग लेते हैं। वर्ष 2007 से आयोजित इस महापर्व के लिये राज्य शासन द्वारा व्यापक प्रबंध किये जाते हैं। यहां मकराना के सफेद संगमरमर एवं मंगलुरु के ग्रेनाइट से न

स्त्री की मानवीय पहचान के लिए खतरा है पोर्नोग्राफी :जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

पोर्नोग्राफी के विरोध में सशक्त आवाज के तौर पर आंद्रिया द्रोकिन का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। पोर्नोग्राफी की जो लोग आए दिन हिमायत करते रहते हैं वे उसमें निहित भेदभाव,नस्लीयचेतना और स्त्रीविरोधी नजरिए की उपेक्षा करते हैं। उनके लिए आंद्रिया के विचार आंखे खोलने वाले हैं। आंद्रिया ने अपने निबंध ‘भाषा, समानता और अपकार: पोर्नोग्राफी का स्त्रीवादी कानूनी परिप्रेक्ष्य और घृणा का प्रचार’(1993) में लिखा- ‘‘बीस वर्षों से स्त्री आंदोलन की जड़ों एवं उसकी शक्ति से जुड़े व्यक्ति, जिनमें कुछ को आप जानते होंगे कुछ को नहीं, यही बताने की चेष्टा कर रहे हैं कि पोर्नोग्राफी होती है। वकीलों की माने तो भाषा, व्यवहार, क्रियाकलापों में (के द्वारा)।’’ आंद्रिया और कैथरीन ए मैकिनॉन ने इसे ‘‘अभ्यास कहा था जो घटित होता है, अनवरत हो रहा है। यह नारी जीवन का यथार्थ बन गया है। स्त्रियों का जीवन दोहरा और मृतप्राय बना दिया गया है। सभी माध्यमों में हमें ही दिखाया जाता है। हमारे जननांग को बैगनी रंग से रंग कर उपभोक्ताओं का ध्यान आकर्षित किया जाता है। हमारी गुदा, मुख व गले को कामुक क्रियाओं के लिए पेश किया जा

कुछ बेवकूफ़ रोज़ मिला करतें हैं मुझे कल है रविवार हम भी बा-सुकू़ं हुए

जब भी तन्हां हुए तुझसे रूबरू हुए बरसों हुए - बज़्म  हुए ,गुफ़्तगूं  हुए !! आए हैं जबसे सामने  धुआंधार  हम तेरे- थमते गए तूफ़ां वो बेआबरू हुए !! कुछ बेवकूफ़ रोज़ मिला करतें हैं मुझे कल है रविवार हम भी बा-सुकू़ं हुए. बेवज़ह चापलूसी का ईनाम मिला यार- कुछ इस तरह एक से चार हम हुए. बच्चों को पालना है वर्ना खोलता छतैं- कोई बताए आके हम ऐसे क्यूं हुए .

कर्जे की भाषा के ज़रिये सफल क्रांतियाँ क्या संभव है..?

कर्जे की भाषा के ज़रिये सफल क्रांतियाँ क्या संभव है..? तुमने जो कुछ  किया मीत  वो केवल   प्रयोग अभिनव है..!! अपनी अपनी भाषा में ही आज क्रांति की अलख जगालो.! सच कैसे बोला जाता है मीत ज़रा खुलकर समझा दो..!! एक पड़ाव को जीत मानकर रुके यही इक  भूल  थी साथी ! जिन दीपों से जगी मशालें- उन दीपों की बुझ गई बाती..!  रुको कृष्ण से जाओ पूछो-  शंखनाद कैसे करतें हैं....?              बैठ के पल भर साथ राम के               पूछो हिम्मत कैसे भरते हैं.?        

याद रखो न्याय की कश्ती रेत पे भी चल जाती है !! गिरीश बिल्लोरे "मुकुल"

चित्र साभार : एक-प्रयास आज़ किसी ने शाम तुम्हारी घुप्प अंधेरों से नहला दी तुमने तो चेहरे पे अपने, रंजिश की दुक़ान सजा   ली ? मीत मेरे तुम नज़र बचाकर छिप के क्यों कर दूर खड़े हो संवादों की देहरी पर तुम समझ गया  मज़बूर बड़े हो  ..!! षड़यंत्रों का हिस्सा बनके तुमको क्या मिल जाएगा मेरे हिस्से मेरी सांसें.. किसका क्या लुट जायेगा …? चलो देखते हैं ये अनबन किधर किधर ले जाती है..? याद रखो न्याय की कश्ती रेत पे भी चल जाती है !!

एक करोड़ रुपये देने का वादा करता हूं ब्लागर्स राहत कोष के लिये ?

  ये हैं सारा मादाम पता नहीं मेरे बारे में क्या क्या फ़ोरकास्ट करती रहतीं है.मेरे अलावा इनको ललित शर्मा,राजीव तनेजा अरे हां वो अपना महफ़ूज़ नज़र नहीं आता जो खामखां मेरे बारे में हमेशा सोचती हैं.. अब देखिये न हमारी ब्याहता श्रीमती जी को पता चलेगा कि कुछ अंट-शंट हो रहा है तो ब्लागिंग बंद आंदोलन भी खड़ा कर सकतीं है.  हज़ारों बार मेल कर करके ये मादाम मेरा भविष्यफ़ल बतातीं हैं.. अरे भाई आज़ तो इनने कमाल ही कर दिया देखिये एक मेल भेजा है हमको  Dear Girish, Be very CAREFUL because in this letter I have extremely important revelations for you. Therefore, I must ask you to carefully read this letter till the end. It is very important for your future... but it is above all extremely important for you. Indeed, Girish a fantastic opportunity to cash in a large sum of money could arise as soon asday Thursday, April 19, 2012. Indeed, very soon, this wonderful date which is day Thursday, April 19, 2012 will mark for you the beginning of a fantastic and generous time full of Luck