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बुधवार, अगस्त 24

पाकिस्तान 69 बरस का एक नासमझ बच्चा राष्ट्र :01


1948 तक मुक्त बलोचस्तान के मसले पर लालकिले से भारत के प्रधानमंत्री  श्री नरेंद्र मोदी की अभिव्यक्ति से पाकिस्तान में ही नहीं बल्कि आयातित विचारकों के ज़ेहन में खलबली देखी जा रही है. भारत का बलोच लोगों के हित में बोलना एक लुहारी हथौड़ा साबित हुआ है. प्रधानमंत्री जी का बयान दक्षेश ही नहीं विश्व के लिए एक खुला और बड़ा बयान साबित हुआ है. उनका यह बयान बांगला देश विभाजन की याद दिला रहा है जब इंदिरा जी ने पूरी दृढ़ता के साथ न केवल शाब्दिक सपोर्ट किया बल्कि सामरिक सपोर्ट भी दिया.
मोदी जी की अभिव्यक्ति एक प्रधानमंत्री के रूप में बड़ी और ज़वाबदारी भरी बात है. बलोच नागरिक इस अभिव्यक्ति पर बेहद अभिभूत हैं. अभिभूत तो हम भी हैं और होना ही चाहिए वज़ह साफ़ है कि खुद पाकिस्तान लाल शासन का अनुगामी  बन अपने बलात काबिज़ हिस्से के साथ जो कर रहा है उसे कम से कम भारत जैसे राष्ट्र का कोई भी व्यक्ति जो मानवता का हिमायती हो बर्दाश्त नहीं करेगा . मेरे विचार से श्री नरेन्द्र दामोदर मोदी के खिलाफ आयातित विचारधाराएं जो भी सोचें आम राय बलोच आवाम के साथ है.
यहाँ अपनी समझ से जो देख पा रहा हूँ कि आयातित विचारधाराएं कभी भी लाल-राज्य के खिलाफ बयान को स्वीकार्य नहीं करतीं .  बहरहाल साल 48 से  मौजूदा वक्त तक बलोच कौम के समर्थन में खुलकर न आना मानवाधिकार मूल्यों की रक्षा की कोशिशों की सबसे बड़ी कमजोरी का सबूत है .  वज़ह जो भी हो देश का वास्तविक हिस्सा पूरा काश्मीर है जिस पर पाक का हक न तो  था न ही हो सकेगा . तो फिर पाकिस्तान की काश्मीर पर तथाकथित भाई बंदी की वज़ह क्या है ...?
इस मसले की पड़ताल में आपको जो सूत्र लगेंगे उनका मकसद पाक की पञ्चशील पर पंच मारने वाली  लाल-सरकार से नज़दीकियाँ . चीन – पाक आर्थिक कोरिडोर और ग्वादर पोर्ट के ज़रिये पाकिस्तान को चीनी सामरिक सपोर्ट मिलता है. जहां तक विकास की बात है पाकिस्तानी सरकार   बलोचस्तान को छोड़ कर शेष सम्पूर्ण पाक में कर पा रहा है बलोचस्तान उसकी दुधारू बकरी है. इतना ही नहीं इस आलेख लिखने तक मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ 22 हज़ार अधिक लोगों को बड़ी बेहरमी से  मौत के घाट उतारा है. हज़ारों हज़ार युवा गायब कर दिए गए ..  बलोचों के  कत्लो-गारद की हिमायती पाकिस्तानी सरकार फौज से ज़्यादा आतंकवादियों के इशारों पर काम करती .
पाकिस्तान 69 बरस का  एक नासमझ  बच्चा राष्ट्र है . जिसे उसके नागरिकों से अधिक बाहरी विवाद पसंद है. कुंठा की बुनियाद पर बने देश पाकिस्तान धर्माधारित विचारधारा और कट्टरता की वज़ह से  रियाया के अनुकूल नहीं है . पाकिस्तान की वर्तमान दुर्दशा की जिम्मेदारी  विभाजन के लिए षडयंत्र करने वाले तत्वों खासकर नवाबों, पाक की  सेना  और सियासियों की दुरभि संधि  उस पर ततसमकालीन अमेरिका की पाकिस्तान के प्रति सकारात्मक नीतियां हैं. जबकि भारत ने कमियों / अभावों  के बावजूद  अपेक्षाकृत अधिक सहिष्णु एवं सकारात्मक रवैया रखा साथ ही भारतीय आवाम ने विकास को सर्वोच्च माना तभी हम दक्षेस की बड़ी ताकत हैं . अब तो भारत का जादू हर ओर छाया है. वज़ह सियासत, कूटनीति, और भारतीय स्वयं है. भारतीय युवा विश्व के लिए  महत्त्वहीन कतई नहीं है . 1985  के बाद जन्मी पौध ने तो विश्व से लोहा मनवा ही लिया है .
आयातित विचारधारा अपने अस्तित्व को बचाए रखने जो कर रही है उसके उदाहरण जेएनयू जैसी जगहों पर मिल जाएंगें . इसका कदापि अर्थ न लगाएं कि सामाजिक साम्य से असहमति है.. वरन हम  कुंठित साम्य को खारिज करते हुए “समरससाम्य” की ललक में हैं .
भारत की नीती कभी भी सीमाओं के विस्तार की न थी.. पर नवाबों के जेनेटिक असर की वज़ह से पाकिस्तान ने इरान और कदाचित क्राउन शह पर बलोचों की आज़ादी पर डाका डाला है. तो बलोच गुरिल्ले क्यों खामोश रहेंगे. इतना ही नही गिलगित तथा पाक द्वारा कब्जाए कश्मीर की जनता भी अविश्वास से भरी है.
भारत ने अपने कानूनों में आमूलचूल प्रावधान रखें हैं दमित जातियों  के लिए .. पर वे खुद सिया सुन्नी पंजाबी सिंधी, गैर पंजाबी आदि आदि फिरका परस्ती के लिए कोई कारगर प्रबंध न कर सके. जब बलोच को सपोर्ट की बात की तो सनाका सा खिंच गया पाक में       
बदलते हालातों पर पाक के प्रायोजित  वार्ताकार बोडो, असम , सिख , यहाँ तक की नक्सलवादियों तक के लिए रुदालियों की  भूमिका निबाह रहे हैं . जबकि पाक में छोटे से इलाज़ के लिए न चिकित्सकीय इंतजामात हैं न ही बेहतर एजुकेशन सिस्टम. आला हाकिमों और हुक्मरानों और आतंकियों की औलादें ब्रिटेन एवं अमेरिका में पढ़ लिख रहीं हैं. जबकि आम आवाम के पास न्यूनतम सुविधाएं भी न के बराबर है.      

(आगे भी जारी........ प्रतीक्षा कीजिये )        

बुधवार, अक्तूबर 24

रामायण कालीन भारत और अब का भारत



साभार : ताहिर खान 
       राम को एक ऐसा व्यक्ति मान लिया जाये जो एक राजा थे तो वास्तव में  समग्र भारत के कल्याण के लिये कृतसंकल्पित थे तो अनुचित कथन नहीं होगा.  राम ऐसे राज़ा थे जो सर्वदा कमज़ोर के साथ थे. सीता के पुनर्वन गमन को लेकर आप मेरी इस बात से सहमत न हों पर सही और सत्य यही है. राम की दृढ़्ता और समुदाय के लिये परिवार का त्याग करना राम का नहीं वरन तत्समकालीन  प्रजातांत्रिक कमज़ोरी को उज़ागर करता है. जो वर्तमान प्रजातंत्र की तरह ही एक दोषपूर्ण व्यवस्था का उदाहरण है. आज भी देखिये जननेताओं को भीड़ के सामने कितने ऐसे समझौते करने होते हैं जो  सामाजिक-नैतिक-मूल्यों के विरुद्ध भी होते हैं. अपराधियों के बचाव लिये फ़ोन करना करवाना आम उदाहरण है. आप सभी जानतें हैं कि तत्समकालीन भारतीय सामाजिक राजनैतिक आर्थिक  परिस्थितियां 
आज से भिन्न थीं. किंतु रावण के पास वैज्ञानिक, सामरिक, संचरण के संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे. यानी कुल मिला कर एक शक्ति का केंद्र. जो दुनिया को आपरेट करने की क्षमताओं से लैस था. किंतु प्रजातांत्रिक एवम मूल्यवान सामाजिक व्यवस्था के संपोषक श्री राम का लक्षमण के साथ  "आपरेशन-वनगमन" चला कर  १४ बरस तक धैर्य से अंतत: सफ़ल  परिणाम हासिल करना वर्तमान की राजनैतिक इच्छा शक्ति के एकदम विपरीत है. 
         इसे नज़दीकी सीमावर्ती राष्ट्रों के हमारे प्रति नकारात्मक व्यवहार के विरुद्ध हमारा डगमगाते क़दमों से चलना  चिंतित करता है. व्यवस्था की मज़बूरी है शायद डेमोक्रेट्रिक सिस्टम पर गम्भीर चिंतन के साथ बेहतर बदलाव के लिये संकेत सुस्पष्ट रूप से मिल रहे हैं फ़िर भी हमारा शीर्ष शांत है इस बिंदु पर ? राम ऐसे न थे.
    जब भ्रष्टाचार की बात होती है तब बस हल्ला गुल्ला मचाते नज़र आते है हम सब . सिर्फ़ हंगामा सिर्फ़ व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप के अलावा कुछ भी नहीं किसी को बदलाव की ज़रूरत नहीं नज़र आ रही ऐसा प्रतीत होता है. 

                            भारत में सामाजिक भ्रष्टाचार को रोकने के कठोर क़दम उठाने के लिये सबसे पहले सरकार को भारत वासियों को आर्थिक सुनिश्चितता देनी होगी. यहां सवाल यह है कि सम्पूर्ण ज़िंदगी के अर्थतंत्र का लेखा जोखा रखने वाला भारतीय नागरिक सबसे पहले अपने बच्चों के लिये बेहतर शिक्षा, और बेहतर चिकित्सा, सहज आवास की व्यवस्था के लिये चिंतित होता है. इस हेतु उसे अपनी आय में वृद्धि के लिये प्रयास करने होते हैं और वह अव्यवस्थित यानी अस्थिर बाज़ार कीमतों के साथ जूझता भ्रष्टाचार के रास्ते धन अर्जित करता है..
न केवल सरकारी कर्मचारी आम आदमी जो जिस प्रोफ़ेशन में है.. उसमें इस तरह की कोशिश करता है. बिल्डर डाक्टर शिक्षक यहां तक की फ़ुटपाथ पर चाय बेचने वाला भी सामान्य से अधिक लाभ हासिल करने किसी न किसी तरह का शार्ट-कट अपनाता है.  सिर्फ़ सरकारी अधिकारी कर्मचारी भ्रष्ट है या 
नेता भ्रष्ट हैं 
  ऐसा कहना सर्वथा ग़लत है.
भारतीय समाज के गिरते नैतिक मूल्यों" को रोकने की एक भावनात्मक कोशिश  


करके की ज़रूरत है .आज़ वाक़ई राम की ज़रूरत है 
 जो वास्तव में समाज को भ्रष्टाचार से मुक्त कराना चाहता हो. पर दूर तक नज़र नही आता ऐसा राम ये अलग बात है.. जै श्रीराम का उदघोष सर्वत्र गूंज रहा है. 
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 ( संदर्भ :एक  था रावण बहुत बड़ा प्रतापी यशस्वी राज़ा, विश्व को ही नहीं अन्य ग्रहों तक विस्तारित उसका साम्राज्य वयं-रक्षाम का उदघोष करता आचार्य चतुरसेन शास्त्री के ज़रिये  जाना था रावण के पराक्रम को. उसकी साम्राज्य व्यवस्था को. ये अलग बात है कि उन दिनों मुझमें उतनी सियासी व्यवस्था की समझ न थी. पर एक सवाल सदा खुद  पूछता रहा- क्या वज़ह थी कि राम ने रावण को मारा................. राम ने रावण का अंत किया क्योंकि रावण  एक ऐसी शक्ति के रूप में उभरा था  जो विश्व को अपने तरीक़े से संचालित करना चाहती थी. राम को पूरी परियोजना पर काम काम करते हुए चौदह साल लगे. यानी लगभग तीन संसदीय चुनावों के बराबर . 
यह आलेख पूरी तरह  आप मेरी इस पोस्ट पर देखिये "क्यों मारा राम ने रावण को ?)

सोमवार, दिसंबर 6

भ्रष्टाचार मिटाने ब्लागर्स आगे आयॆं.

  भ्रष्टाचार किस स्तर से समाप्त हो आज़ य सबसे बड़ा सवाल है ..? इसे कैसे समाप्त किया जावे यह दूसरा अहम सवाल है जबकि तीसरा सवाल न कह कर मैं कहूंगा कि :- भारत में-व्याप्त, भ्रष्टाचार न तो नीचे स्तर  चपरासी या बाबू करता है न ही शीर्ष पर बैठा कॊई भी व्यक्ति, बल्कि हम जो आम आदमी हैं वो उससे भ्रष्टाचार कराते हैं या हम वो जो व्यवसाई हैं. जो कम्पनीं हैं, जो अपराधी है, जो आरोपी हैं वही तो करवातें है इन बिना रीढ़ वालों से भ्रष्टाचार. यानी हमारी सोच येन केन प्रकारेण काम निकालने की सोच है.  मेरे एक परिचित बहुत दिनों से एक संकट से जूझ रहे हैं वे असफ़ल हैं वे आजकल के हुनर से नावाकिफ़ हैं दुनिया के लिये भले वे मिसफ़िट हों मेरी नज़र से वे सच्चे हिंदुस्तानी हैं. ऐसे लोग ही शेषनाग की तरह "सदाचार" को सर पर बैठा कर रखे हुए हैं,वरना  दुनियां से यह सदाचार भी रसातल में चला जाता. ऐसे ही लोगों को मदद कर सकते हैं. ब्लागर के रूप में सचाई को सामने लाएं. एक बार जब सब कुछ सामने आने लगेगा तो साथियो पक्का है पांचवां-स्तम्भ सबसे आगे होगा. पर पवित्रता होना इसकी प्राथमिक शर्त है.सही बात तथ्य आधारित कही जावे, झूठ मन रचित , केवल क्षवि हनन करने के भाव से प्रेरित न हो छद्म नाम से कुछ भी स्वीकार्य न हो . सब साफ़ साफ़  स्पष्ट और देश के हित के लिये न कि ... स्वयम के हित के लिये.भ्रष्टाचार के प्रेरक और प्रेरित दौनो को ही बेनक़ाब किया जा सकता है.  हिन्दी ब्लागिंग की ताक़त को समझने के लिये सबसे बेहतर अवसर है अगर भारत से भ्रष्टाचार  को ख़त्म करना है ब्लागिंग एक बेहतरीन और नायाब प्लेटफ़ार्म साबित हो सकता है. किंतु इस आह्वान के भीतर से भयानक  आहट निकल के आ रही है वो "यलो-सिटीज़न-जर्नलिज़्म". किंतु यदि एक संगठनात्मक संस्थागत तरीके से पूरी पवित्रता के साथ यह मुहिम छेड़ी जाए तो फ़िर  किसी भी स्थिति में   सफ़लता ही हाथ लगेगी यह तय है.चलिये आगे कदम बढ़ाएं सच्ची बात सबके सामने लाएं.    

मंगलवार, नवंबर 30

सबसे लचीली है भारत की धर्मोन्मुख सनातन सामाजिक व्यवस्था

साभार: योग ब्लाग से


बेटियों को अंतिम संस्कार का अधिकार क्यों नहीं..? के इस सवाल को गम्भीरता से लिये जाने की ज़रूरत है. यही चिंतन सामाजिक तौर पर महिलाऒं के सशक्तिकरण का सूत्र पात हो सकता है. क़ानून कितनी भी समानता की बातें करे किंतु सच तो यही है कि "महिला की कार्य पर उपस्थिति ही " पुरुष प्रधान समाज के लिये एक नकारात्मक सोच पैदा कर देती है. मेरे अब तक के अध्ययन में भारत में वेदों के माध्यम से स्थापित की गई  की व्यवस्थाएं लचीली हैं. प्रावधानों में सर्वाधिक विकल्प मौज़ूद हैं. फ़िर भी श्रुति आधारित परम्पराओं की उपस्थिति से कुछ  जड़ता आ गई जो दिखाई भी देती है. सामान्यत: हम इस जड़त्व का विरोध नही कर पाते
  1. रीति-रिवाज़ों के संचालन कर्ता घर की वयोवृद्ध पीढी़, स्थानीय-पंडित, जिनमें से सामन्यत: किसी को भी वैदिक तथा पौराणिक अथवा अन्य किसी ग्रंथ में उपलब्ध वैकल्पिक प्रावधानों का ज्ञान नहीं होता. 
  2. नई पीढ़ी तो पूर्णत: बेखबर होती है. 
  3. शास्त्रोक्त प्रावधानों/विकल्पों की जानकारीयों से सतत अपडेट रहने के लिये  सूचना संवाहकों का आभाव होता है. 
  4. वेदों-शास्त्रों व अन्य पुस्तकों का विश्लेषण नई एवम बदली हुई परिस्थियों में उन पर सतत अनुसंधानों की कमीं. 
  5. विद्वत जनों में लोकेषणाग्रस्त होने का अवगुण का प्रभाव यानी अधिक समय जनता के बीच नेताओं की तरह भाषण देने की प्रवृत्तियां.स्वाध्याय का अभाव 
                       उपरोक्त कारणों से कर्मकाण्ड में नियत व्यवस्थाओं के एक मात्र ज्ञाता होने के कारण पंडितों/कुटुम्ब के बुजुर्गों की आदतें  परम्पराओं को जड़ता देतीं हैं. उदाहरण के तौर पर स्वास्थ्य सम्बंधी विज्ञान जन्म के तुरंत बाद बच्चे को स्तन-पान की सलाह देता है, घर की बूढ़ी महिला उसकी घोर विरोधी है. उस महिला ने न तो वेद पढ़ा है न ही उसे चिकित्सा विज्ञान की सलाह का अर्थ समझने की शक्ति है बल्कि अपनी बात मनवाने की ज़िद और झूठा आत्म-सम्मान पुत्र-वधू को ऐसा कराने को बाध्य करता है. आप बताएं कि किस धर्मोपदेशक ने कहां कहा है कि :- ”जन्म-के तुरन्त बाद  स्तन पान न कराएं. और यदि किसी में भी ऐसा लिखा हो तो प्रमाण सादर आमंत्रित हैं. कोई भी धर्म-शास्त्र /वेद/पुराण (यहां केवल हिंदू सामाजिक व्यवस्था के लिये तय नियमों की चर्चा की जा रही है अन्य किसी से प्रमाण विषयांतरित होगा ) किसी को जीवन की मूल ज़रूरतों से विमुख नहीं करता.
       परिवार में मेरे चचेरे भाई के जन्म के समय जेठानियों की मर्यादा का पालन करते हुए मां ने नवज़ात शिशु को स्तन पान विरोध कर रही जेठानियों को बातों में उलझा कर करवाया घटना का ज़िक्र ज़रूरी इस लिये है कि सकारात्मक-परिवर्तनों के लिये सधी सोच की ज़रूरत होती है. काम तो सहज सम्भव हैं. 
    मृत्यु के संदर्भ में मां ने अवसान के एक माह पूर्व परिवार को सूचित किया कि मेरी मृत्यु के बाद घर में चावत का प्रतिषेध नहीं होगा. मेरी पोतियां चावल बिना परेशान रहेंगी. उनके अवसान के बाद प्रथम दिन जब हमारी बेटियों के लिये चावल पकाये गए तो कुछ विरोध हुआ तब इस बात का खुलासा हम सभी ने सव्यसाची  मांअंतिम इच्छा के रूप में किया. 
The Blind SideDecision Points    यहां आपको एक उदाहरण देना ज़रूरी है कि भारतीय धर्म- आधारित सामाजिक व्यवस्था में आस्था हेतु प्रगट  की जाने वाली ईश्वर-भक्ति के  तरीकों में जहां एक ओर कठोर तप,जप,अनुष्ठान आदि को स्थान दिया है वहीं नवदा-भक्ति को भी स्थान प्राप्त है. यहां तक कि "मानस-पूजा" भी प्रमुखता से स्वीकार्य कर ली गई है.   आप में से अधिकांश लोग इस से परिचित हैं 
"रत्नै कल्पित मासनम 
हिम-जलयै स्नान....च दिव्याम्बरम ना रत्न विभूषितम ."
              अर्थात भाव पूर्ण आराधना जिसे पूरे मनोयोग से पूर्ण किया जा सकता है क्योंकि इस आराधना में भक्त ईश्वर से अथवा किसी प्रकोप भयभीत होकर शरण में नहीं होता बल्कि नि:स्वार्थ भाव से भोले बच्चे की तरह आस्था व्य्क्त कर रहा होता है. 
                         जीवन के सोलहों संस्कारों में वेदों पुराणों का हस्तक्षेप न्यूनतम है. जिसका लाभ उठाते हुए समकालीन परिस्थितियों के आधार पर अंतर्नियम बनाए जाने की छूट को भारतीय धर्मशास्त्र बाधित नहीं करते . मेरे मतानुसार  सबसे लचीली है भारत की धर्मोन्मुख सनातन सामाजिक व्यवस्था
वेद और पुराण /अभिव्यक्ति पर एक महत्वपूर्ण-जानकारी :- विरासत बना ऋग्वेद
 

शुक्रवार, नवंबर 5

बराक़ साहब के नाम एक खत :ट्वीट कर दूंगा

दुखद सूचना : खुशदीप सहगल भैया के पिताश्री के  निधन की सूचना से ब्लाग जगत स्तब्ध है.  82 वर्षीय पिताजी का मेरठ के एक अस्‍पताल के आई सी यू में 5 नवम्‍बर 2010 की प्रात: बीमारी से निधन हो गया है। शोक-संतप्‍त परिवार के प्रति नुक्‍कड़ अपनी संवेदना व्‍यक्‍त करता है और परमपिता परमात्‍मा से दिवंगत आत्‍मा की शांति के लिए प्रार्थनारत हैं हम सभी (तीन)( चार  )

                    इस वर्ष यानी 05 नवम्बर 2010 को  दीपावली पूजा का शुभ मुहुर्त सुबह 06:50 से 11:50 आज दोपहर  12:23 से 04:50 संध्या  05:57 से 09:12 ,रात 09:12 to 10:47 रात्रि 11:57 to 12:48 बजे ज्योतिषानुसार नियत है. शेयर बाज़ार  भी पूरे यौवन पर बंद हुआ. कुल मिला कर व्यापार के नज़रिये से भारत ऊपरी तौर मज़बूत नज़र आ रहा है.भारत में विदेशी पूंजी के अनियंत्रित प्रवाह को आशंका की नज़र से देखा जा रहा था,उस पूंजी की मात्रा में कमी दिखाई देना एक शुभ सगुन ही है (एक)एवम (एक-01) यानी  विदेशी कम्पनीयों पर लगाम लगाते हुए  भारतीय बाज़ार से प्राप्त लाभ के प्रतिशत में कमीं आना निश्चित है. किंतु क्या यह स्थिति बनी रहेगी क्या भारतीय घरेलू उत्पादन  को अवसर बाक़ायदा बेरोक हासिल होता रहेगा यह वित्त-विशेषज्ञता की पृष्ठभूमि  वाले प्रधानमंत्री एवं वित्त मंत्री महोदय को करना है.  अब तो और साफ़ रहना होगा कि वे घरेलू-कम्पनीयों  के सन्दर्भ में पाजीटिव हैं अथवा बराक साहब के बहाव में आ जावेंगे ? इस सवाल का हल खोजा भी जा रहा होगा हो सकता है कि खोज भी लिया हो. यदि भारतीय व्यापारिक-उत्पादक,कम्पनीयों, के प्रतिकूल कोई समझौता करना पड़ा तो उस मज़बूरी का खुलासा करना भी ज़रूरी होगा सरकार के लिये. क्योंकि भारतीय-बाज़ार की लक्ष्मी का पूजन अनुकूल मुहुर्त पर भारतीयों ने ही किया है उसका (लक्ष्मी का )  भारतीयों के पास ही होना ज़रूरी है. ओबामा साहब का स्वागत (दो) हम सभी करतें हैं हम  आत्मसम्मान के भी पक्षधर हैं, हमारी अपेक्षा साफ़ है कि भारत और पाक़िस्तान को "एक तराज़ू-तौल" के फ़ार्मूले से अलग कर दिया जावे. भारत भारत है पाक़िस्तान पाकिस्तान है . अमेरिका को इस बात को लेकर भ्रमित हो सकता है कि पाक़ उनका सहयोगी है पर भारत का बच्चा-बच्चा पाक़ के इरादों से परिचित है. हमें सामरिक-संसाधनों से ज़्यादा आपके द्वारा पाक को मुहैया कराए गये अथवा कराए जा रहे संसाधनों में कटौती की अपेक्षा है. हम चीन के अपनत्व से पंचशील से ही परिचित हैं पाकिस्तान के संबंध उनसे भी मधुर हैं इस मधुरता से भारतीयों को कोई आपत्ति नही यदि वे सामरिक न हों. भारत वैसे भी अहिंसा का अनुयायी है. लेकिन महाभारत और लंका-विजय को न भूला जावे जो जन-मन में कथानक के रूप में अंकित है.  
 बहरहाल एजेण्डा तो तय है हमारी इस राय से बेहतर कहने सुझाने वाले लोग आपके पास भी है हमारे प्रधान मंत्री साहब के पास भी आप तो हमारी ओर से हैप्पी दीवाली स्वीकारिये हमारा तो  काम था लिखना सो लिख दिया अब आपको ट्वीटर के ज़रिये भेज भी देते हैं किसी से पढ़वा लीजिये अंग्रेज़ी में हम न लिखेंगें आप हिंदी को पढ़ेंगे नहीं सो किसी से पढ़वा लीजिये. 
पुन: अशेष-शुभकामनाओं सहित 
    ट्विटर पर चार बराक ओबामा है 
______________________________________
-:टिप्पणीयाँ एवम लिंक्स  :-
(एक) "विदेशी मुद्रा आस्तियों में गिरावट के कारण 22 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 1.034 अरब डॉलर घटकर 295.40 अरब डॉलर रह गया जिससे पाँच सप्ताह से जारी तेजी का दौर थम गया।पिछले सप्ताह विदेशी मुद्रा भंडार 64.1 करोड़ डॉलर बढ़कर 296.43 अरब डॉलर पर पहुँच गया था।भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी किए गए आँकड़ों में दर्शाया गया है कि समीक्षाधीन सप्ताह में विदेशी मुद्रा की तेजी का प्रमुख कारक विदेशी मुद्रा आस्तियों की मात्रा 98.8 करोड़ डॉलर घटकर 267.69 अरब डॉलर रह गई थीं।.आँकड़े दर्शाते हैं कि भारत का स्वर्ण मुद्रा भंडार 20.51 अरब डॉलर पर अपरिवर्तित रहा जबकि विशेष निकासी अधिकार (एसडीआर) भी 3.3 करोड़ डॉलर घटकर 5.178 अरब डॉलर रह गया(स्रोत:-वेब दुनिया )"
(एक-01) :- एक विश्लेषण राम त्यागी जी के ब्लाग "मेरी आवाज़" पर
(दो) वेब-पोर्टल प्रवक्ता पर : -प्रभात कुमार रॉयका आलेख  बराक़ ओबामा की भारत यात्रा के आयाम
(तीन) :-शोक-सूचना  अविनाश वाचस्पति के ब्लाग पिताश्री  से
(चार) :-पाबला जी के ब्लाग ज़िंदगी के मेले से 

शनिवार, दिसंबर 6

48 घंटे में होगी कार्रवाई : लकड़ी के आगे नाची मकड़ी

मेरी पिछली पोष्ट स्मरण-कीजिए . आज रात यानी 11:30 सेवाशिंगटन पोस्ट के हवाले से भारत सरकार की कूटनीतिक कोशिशों की सफलता का विस्तृत समाचार प्रसारित हुआ .भारतीय कूट्नीतिक की सफलता ही कहा जाएगा । इस समाचार के आने से उन सारे मुंहों पर फिलहाल ताले से पड़ गए हैं जो कल तक सरकार पर निशाना साध रहे थे । मैं एक अन्य पोस्ट
में आंशिक परिवर्तन करना चाहता हूँ एक सूत्र और जोड़ कर"कि सिम कार्ड्स की खरीद फरोख्त" को और अधिक सख्त कर देना चाहिए . इस मसाले पर नियामक आयोग को अब कार्रवाई करनी चाहिए,
जहाँ तक आई डी फ्रूफ की ज़रूरत का सवाल है किसी भी स्थिति में आई डी प्रूफ़स का पुन: परीक्षण करना अब बेहद ज़रूरी हो गया है। नवभारत टाइम्स -की चिंता पर भी जायज़ है। अब इन भैया लोगों के - द्वारा मार्च निकाला जा रहा है इनके लिए हमारी शुभ कामनाएं


भारत की अस्मिता से खिलवाड़ करने वाली

ताक़तों के विरुद्ध जो जूनून अभी पनपा है उसे

सभी भारतवासी कायम रखें देश की सुरक्षा

के लिए यही ज़ज्बात ज़रूरी हैं मित्रो

तरक्की के साथ सुरक्षा सर्वोपरी है

वंदे-मातरम


रविवार, अक्तूबर 5

गुजरात का गरबा अब शेष भारत और विश्व का हो गया



जबलपुर का गरबा फोटो अरविंद यादव जबलपुर
जबलपुर का गरबा फोटो अरविंद यादव जबलपुर
गुजरात के व्यापारियों ने सारे विश्व को अपने साथ साथ अपनी संस्कृति से परिचित कराया इतना ही नही उनको सर्व प्रिय बना दिया. गरबा गुजरात से निकल कर सुदूर प्रान्तों तथा विश्व के उन देशों तक जा पहुंचा है जहाँ भी गुजराती परिवार जा बसे हैं , मेरी महिला मित्र प्रीती गुजरात सूरत से हैं उनको मैंने कभी न तो देखा न ही जाना किंतु मेरे कला रुझान कोपरख मित्र बन गयीं हैं , "आभासी दुनिया यानी अंतरजाल" पर मेरे लिए उनके प्रीती होने या अन्य कोई होने की पड़ताल नहीं करनी वरन इस बात के लिए सराहना करनी है की वे सूरत,गुजरात,गांधीनगर,के बारे में अच्छी जानकारियाँ देतीं है . मेरे आज विशेष आग्रह पर मुझे सूरत में आज हुए गरबे का फोटो सहजता से भेज दिया उनने मेरी और से उनको हार्दिक सम्मान एवं आभार
वेब दुनियाँ पर गायत्री शर्मा का आलेख चर्चा योग्य है गरबा परिधान पर "गरबों की शान पारंपरिक चणिया-चोली और केडि़या" जिसकी झलक आज समूचे गरबा आयोजनों में दिखाई देती है।
आवारा बंजारा की यह पोस्ट गरबा का जलवा भी समीचीन ही है .......जिसमें उन्हौने स्पष्ट किया है :-"ज का गुजरात नौवीं शताब्दी में चार भागों में बंटा हुआ था, सौराष्ट्र, कच्छ, आनर्ता (उत्तरी गुजरात) और लाट ( दक्षिणी गुजरात)। इन सभी हिस्सों के अलग अलग लोकनृत्य थे जिनके आधार पर हम कह सकते हैं कि आज गुजरात के लोकनृत्यों में गरबा, लास्या, रासलीला, डाँडिया रास, दीपक नृत्य, पणिहारी, टिप्पनी और झकोलिया प्रमुख है। अब सवाल यह उठता है कि करीब करीब मिलती जुलती शैली के बाद भी सिर्फ़ गरबा या डांडिया की ही नेशनल या इंटरनेशनल छवि क्यों बनी। शायद इसके पीछे इसका आसान होना, बिना एसेसरीज़ या अतिरिक्त उपकरणों-साधनों के किया जा सकना आदि प्रमुख कारण है। इसके अलावा और भी कारण हैं।"

यह सच है की व्यवसायिता का तत्व गरबा को घेर चुका है तो एस एम् एस/टेलीवोटिग/घडियाली आंसू बहाते मनोरंजक चैनलों से बेहतर है "गरबा '' पर विस्तार से जानकारी विकिपीडिया पर भी वहाँ के अन्य लोक नृत्यों के साथ टिप्पणी दी गयी है
संजीत भाई की पोस्ट में जो भी लिखा वह ग़लत कदापि नहीं है ,इस पर भाई संजय पटेल की की टिप्पणी "संजीत भाई;गरबा अपनी गरिमा और लोक-संवेदना खो चुका है।मैने तक़रीबन बीस बरस तक मेरे शहर के दो प्रीमियम आयोजनो में बतौर एंकर पर्सन शिरक़त की . अब दिल खट्टा हो गया है. सारा तामझाम कमर्शियल दायरों में है. पैसे का बोलबाला है इस पूरे खेल में और धंधे साधे जा रहे हैं.'' सही ही है किंतु मैं थोडा सा इतर सोच रहा हूँ कि व्यवसायिकता में बुराई क्या अगर गुजराती परिधान लोकप्रिय हो रहें है , और यदि सोचा जाए तो गरबा ही नहीं गिद्दा,भांगडा,बिहू,लावनी,सभी को सम्पूर्ण भारत ने सामूहिक रूप से स्वीकारा है केवल गरबा ही नहीं ये अलग बात है कि गरबा व्यवसायिक प्रतिष्ठानों के सहारे सबसे आगे हो गया।
दैनिक भास्कर समूह ने गरबे को गुजरात से बाहर अन्यप्रान्तों तक ले जाने की सफल-कोशिश की तो नई-दुनिया,ऍफ़ एम् चैनल्स भी अब पीछे नहीं रह गए हैं । इंदौर का गरबा, मस्कट में इस बार छाने गया है तो यह भारत के लिए गर्व की बात है । ये अलग बात है कि गरबे के लिए महिला साथी भी किराए , उपलब्ध होने जैसे समाचार आ ने लगे हैं ।
संजय पटेल जी उस व्यवसायिकता से परहेज कर रहे हैं जो उनने अपने शहर में देखी [ मेरे शहर में गरबा इन दिनों चौंका रहा है] इस दृश्य से हर कोई पहेज करेगा जो संजय भाई ने किया उनकी पोस्ट कहती है कि :
"चौराहों पर लगे प्लास्टिक के बेतहाशा फ़्लैक्स।गर्ल फ़्रैण्डस को चणिया-चोली की ख़रीददारी करवाते नौजवानदेर रात को गरबे के बाद (तक़रीबन एक से दो बजे के बीच) मोटरसायकलों की आवाज़ोंके साथ जुगलबंदी करते चिल्लाते नौजवानघर में माँ-बाप से गरबे में जाने की ज़िद करती जवान लड़कीगरबे के नाम पर लाखों रूपयों की चंदा वसूलीइवेंट मैनेजमेंट के चोचलेरोज़ अख़बारों में छपती गरबा कर रही लड़के-लड़कियों की रंगीन तस्वीरेंदेर रात गरबे से लौटी नौजवान पीढी न कॉलेज जा रही,न दफ़्तर,न बाप की दुकानकानफ़ोडू आवाज़ें जिनसे गुजराती लोकगीतों की मधुरता गुमफ़िल्मी स्टाइल का संगीत,हाइफ़ाई या यूँ कहे बेसुरा संगीतआयोजनों के नाम पर बेतहाशा भीड़...शरीफ़ आदमी की दुर्दशारिहायशी इलाक़ों के मजमें धुल,ध्वनि और प्रकाश का प्रदूषणबीमारों,शिशुओं,नव-प्रसूताओं को तकलीफ़नेतागिरी के जलवे ।मानों जनसमर्थन के लिये एक नई दुकान खुल गईनहीं हो पा रही है तो बस:वह आराधना ...वह भक्ति जिसके लिये गरबा पर्व गुजरात से चल कर पूरे देश में अपनी पहचान बना रहा है। देवी माँ उदास हैं कि उसके बच्चों को ये क्या हो गया है....गुम हो रही है गरिमा,मर्यादा,अपनापन,लोक-संगीत।माँ तुम ही कुछ करो तो करो...बाक़ी हम सब तो बेबस हैं !
न्यूयार्क के ब्लॉगर भाई चंद्रेश जी ने इसे अपने ब्लॉग Chandresh's IACAW Blog (The Original Chandresh), गरबा शीर्षक से पोष्ट छापी है जो देखने लायक है कि न्यूयार्क के भारत वंशी गरबा के लिए कितने उत्साही हैं