Ad

शुक्रवार, मार्च 25, 2011

रंग पंचमी तक होली होली ही होती है

आज़ क्रिकेट के रंग में  विश्व यहां तक की गूगल बज़ तक सराबोर था.
आस्ट्रेलिया को हराना विश्व कप का रास्ता साफ़ करने के बराबर है.
इसी हंगामा खेज मौके पर ब्लागवुड के समाचार सुनिये

                             मिडियम वेब चार दो शुन्य मेगाहार्टज पर ये ब्लॉगवुड का रेडियो केन्द्र है , सभी श्रोताओं को रंग पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं।अब आप ललित शर्मन: से ब्लॉग वुड के बचे-खुचे मुख्य समाचार सुनिए।
टेक्स्ट में बांचिये इधर 




बुधवार, मार्च 23, 2011

भगतसिंह का अन्तिम खत ......

शहीद भगतसिंह का अन्तिम खत ...दीपक "मशाल" की आवाज में





और ये रहा तीनों वीरों का लिखा संयुक्त पत्र 
महोदय,
उचित सम्मान के साथ हम नीचे लिखी बाते .आपकी सेवा में रख रहे हैं -
भारत की ब्रीटिश सरकार के सर्वोच्च अधिकारी वाइसराय ने एक विशेष अध्यादेश जारी करके लाहौर षड़यंत्र अभियोग की सुनवाई के लिए एक विशेष न्यायधिकर्ण (ट्रिबुनल ) स्थापित किया था ,जिसने 7 अक्टुबर ,1930 को हमें फांसी का दंड सुनाया | ह
मारे विरुद्ध सबसे बड़ा आरोप यह लगाया गया हैं कि हमने सम्राट जार्ज पंचम के विरुद्ध युद्ध किया हैं |
न्यायालय के इस निर्णय से दो बाते स्पष्ट हो ज़ाती हैं -पहली यह कि अंग्रेजी जाति और भारतीय जनता के मध्य एक युद्ध चल रहा हैं |दूसरी यह हैं कि हमने निशचित रूप में इस युद्ध में भाग लिया है |अत: हम युद्ध बंदी हैं | यद्यपि इनकी व्याख्या में बहुत सीमा तक अतिशयोक्ति से काम लिया गया हैं , तथापि हम यह कहे बिना नहीं रह सकते कि ऐसा करके हमें सम्मानित किया गया हैं |पहली बात के सम्बन्ध में हमें तनिक विस्तार से प्रकाश डालना चाहते हैं |
हम नही समझते कि प्रत्यक्ष रूप से ऐसी कोई लड़ाई छिड़ी हुई हैं | हम नहीं जानते कि युद्ध छिड़ने से न्यायालय का आशय क्या हैं ? परन्तु हम इस व्याख्या को स्वीकार करते हैं और साथ ही इसे इसके ठीक सन्दर्भ को समझाना चाहते हैं | ………………….
पूरा पत्र "दखल की दुनियां" पर देखिये  

मंगलवार, मार्च 22, 2011

जबलपुरिया होली : ढोलक-मंजीरे की थाप तो गोया थम ही गईं

टिमकी वाली फ़ाग न सुन पाने का रंज गोलू भैया यानी
जितेंद्र चौबे को भी तो है  
                होली की हुल्लड़ का पहला सिरा दूसरे यानी आखिरी सिरे से बिलकुल करीब हो गया है यानी बस दो-चार घण्टे की होली. वो मेरा ड्रायवर इसे अब हादसा मानने लगा है. कह रहा था :-"बताईये, त्यौहार ही मिट गये शहरों का ये हाल है तो गांव का न जाने क्या होगा. " उसका कथन सही है. पर उसके मन में तनाव इस बात को लेकर था कि शुक्रवार  को मैने उसे समय पर नहीं छोड़ा. होलिका दहन के दिन वो चाह रहा था कि उसे मैं इतना समय दूं कि वो दारू-शारू खरीद सके समय रहते. मुन्नी की बदनामी पे नाचना या शीला की ज़वानी पर मटकना होगा... उसे. 
             यूं तो मुझे भी याद है रंग पंचमी तक किसी पर विश्वास करना मुहाल था दसेक बरस पहले. अगले दिन के अखबार बताते थे कि फ़ंला मुहल्ले में तेज़ाब डाला ढिकां मुहल्ले में चाकू चला.अपराधों का बंद होना जहां शुभ शगुन है जबलपुरिया होली के लिये तो दूसरी तरफ़ ढोलक-मंजीरे की थाप तो गोया थम ही गईं जिसके लिये पहचाना जाता था मेरा शहर अब बरसों से फ़ाग नहीं सुनी....इन कानों ने. अब केवल शीला मुन्नी का शोर सुनाई दिया. कुछेक पुराने मुहल्लों में फ़ागों का जंगी मुक़ाबला हुआ भी हो तो उनकी कवरेज किसी अखबार के लिये कोई खबर कैसे हो सकती है अब जब की बड़ी-बड़ी बेशकीमतीं खबरें होतीं हैं उनके लिये.  
             खैर जब भी मौका मिलेगा फ़ाग सुन लेंगे किसी गांव में जाकर पर ये सच है कि उधर भी पहले से बताना होगा. तब कहीं जुड़ाव होगा फगुआरों का अगरचे उनके बीच  हालिया चुनावों की कोई रंजिश शेष न रही हो तो. वरना गांवों में न तो अलगू चौधरी रह गये न जुम्मन शेख, जिनके मुंह से परमेश्वर बोलता था. अब तो बस एलाटमेंट और निर्माण कार्य बोलते हैं गांव ... मनरेगा भी चीख पुकार करने लगा है. मुझे क्या लेना देना इन बातों से खोज ही लूंगा टिमकी बजाने वाले, फ़ाग गाने वाले झल्ले बर्मन, खेलावन दाहिया के गांव को जो  पूरी तल्लीनता से फ़ाग गाते हैं.
          हां पंद्रह  बरस पुरानी बात याद आ रही  आर आई   रामलाल चढ़ार से सुनी थी फ़ागें .. है किसान मेले में  ...तब से आज़ तक हज़ूर एक भी आवाज़ नहीं पड़ी इन कानों में फ़ाग की. इसुरी तुम्हारी सौं झूठ नहीं बोल रा हूं....अब तो भूल ही गया फ़ाग की धुनें .  
      चित्र-परिचय :- ऊदय शर्मा टिमकी वादक S/O मूंछ वाले ललित शर्मा, उदास चेहरा:-गोलू भैया          

जबलपुर में आज़ होंगे फ़ुरसतिया जी और अलबेला खत्री

प्रिय ब्लागर साथियो
सादर अभिवादन 
                आज़ सुबह पधार चुके हैं फ़ुरसतिया जी जबलपुर तो देर रात तक भाई अलबेला खत्री का संक्षिप्त प्रवास होगा जबलपुर शहर में . शाम को सभी स्थानीय - ब्लागर्स मित्रों से अनुरोध है कि आप चाहें तो संपर्क कर सकतें है . साथ ही यह भी कि जबलपुर का ऐसा गुलाल इन के गालों पर रगड़  दीजिये जो कभी न छूटे .

सोमवार, मार्च 21, 2011

सुनामी के बाद रेडियेशन के खतरे अंतर्राष्ट्रीय पावर लिफ़्टर्स का जापान दौरा अनिश्चितता में

                                                        भारत के लिये पदक हासिल वाले खिलाड़ियों में पावर लिफ़्टर्स का योगदान कमतर नहीं.किंतु यह खेल औलोंपिक खेलों में शामिल  न होने की वज़ह से उपेक्षा का शिकार रहा है. संजय बिल्लोरे का कहना है कि :-" राष्ट्रीय-स्तर पर आयोजित टूर्नामेंट्स के लिये तो हम स्वयम संसाधन जुटा पाते हैं किंतु अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में भागीदारी के लिये बेहद मशक्क़त करनी होती संसाधन जुटाने में . मिसफ़िट पर वेबकास्टिंग के दौरान उन्हौने बताया कि बहुत दुखी है जापान सुनामी के बाद रेडियेशन के खतरे अंतर्राष्ट्रीय पावर लिफ़्टर्स का जापान दौरा अनिश्चितता में है. तथापि वे आगामी २६ फ़रवरी २०११ को कानपुर में आयोजित राष्ट्रीय-स्तर पर आयोजित टूर्नामेंट में भाग लेंगे.


मेरे मुहल्ले मे आये थे अमिताभ बच्चन जी

ग्वारीघाट की शाम कोशिश थी कि सबसे पहले माई को गुलाल अर्पण करूं  कल 19 मार्च 2011 की तस्वीर है
उसपार होली के लिये सज़ा संवरा गुरुद्वारा 

इस पार चिन्मय शुभम गोलू भैया के साथ दीप दान की जुगत लगा रहे थे
आज तो गज़ब ही हो गया हमारी सुबह देर रात तक मोहल्ले में व्यस्त रहने की वज़ह से 

अरे क्या सजल अमिताभ बच्चन जी से लम्बा है इस साल इसके हाथ  पीले करना है
मिलें या लिखें आपका नाम व पता किसी को नही बताऊंगा 
वैसे उज्जवल भी लाइन में लगा . जो रह जाए बाद में ट्राय करते रहना 
वैसे शादी तो करेंगे पर बेचेंगे नहीं  हम इन को 

गौर दादा जी को तिलक लगाते अमिताभ बच्चन 

और फ़िर फ़ोटो खिचवा ही लिया लम्बू जी ने
सच आज़ आये थे अमिताभ जी जबलपुर 
मुहल्ले में टोली का घूमना एक मज़ेदार और अनोखा पहलू है आज़ फ़िर एक बार मलय जी की लायब्रेरी को देखने का मौका मिला 


मलय जी,बाबूजी,मिश्रा जी, वर्मा जी, सभी तो थे साथ साथ 

कविवर मलय का ये अदभुत चित्र


जी भूल ही गया था भतीजा चिन्मय बच्चों मे खोजे न मिल रहा था आज़, 

जाने  क्या खोजतीं आखैं वर्मा जी की राख का ढेर है शोला है न चिंगारी है..
 कल रात जली हुई राख बनी होलिका के पास खड़े  नायडू भैया जेब में हाथ डाले विचार मग्न  यही गुनगुना रहे हैं 

मेरे परियोजना अधिकारी मित्रों में सबसे इन्नोसेंट 
         "दीपेन्द्र है जिनको दीपू कहता हूं"
मनीष शर्मा के क्या कहने
हमारे ग्रुप के सबसे शातिर लगता है किंतु है नही
जी पुनीत यानि गिलबिल

ये है मनीष सेठ खूब हंसा रहे थे  जज़ूर कोई दर्द था जिसे छिपा रहे थे

ये अपन साफ़्ट ड्रिंक पी रहे थे तब की फ़ोटो 

ये भी अपन ही हैं 

दीपेंद्र भाई एक दम मस्त ड्रायवर 


गिलबिल और शर्मा जी 

सेठ जिनको फ़त्ते कहो कोई हर्ज़ नहीं

रविवार, मार्च 20, 2011

फ़ागुन के गुन प्रेमी जाने, बेसुध तन अरु मन बौराना

फ़ागुन के गुन प्रेमी जाने, बेसुध तन अरु मन बौराना
या जोगी पहचाने फ़ागुन , हर गोपी संग दिखते कान्हा
रात गये नज़दीक जुनहैया,दूर प्रिया इत मन अकुलाना
सोचे जोगीरा शशिधर आए ,भक्ति - भांग पिये मस्ताना
प्रेम रसीला, भक्ति अमिय सी,लख टेसू न फ़ूला समाना
डाल झुकीं तरुणी के तन सी, आम का बाग गया बौराना
जीवन के दो पंथ निराले,कृष्ण की भक्ति अरु प्रिय को पाना
दौनों ही मस्ती के पथ हैं , नित होवे है आना जाना--..!!
चैत की लम्बी दोपहरिया में– जीवन भी पलपल अनुमाना
छोर मिले न ओर मिले, चिंतित मन किस पथ पे जाना ?
गिरीश बिल्लोरे “मुकुल”

Ad

यह ब्लॉग खोजें

मिसफिट : हिंदी के श्रेष्ठ ब्लॉगस में