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सितंबर, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

महिलाओं के विरुद्ध हिंसा रोकने हुआ सीधा संवाद

संभागायुक्त श्री दीपक खांडेकर , आई.जी. महिला सेल श्रीमति प्रग्यारिचा श्रीवास्तव के मार्गदर्शन में महिला सशक्तिकरण विभाग एवम पुलिस विभाग के संयुक्त तत्वावधान में “ सीधा :संवाद ” कार्यक्रम का आयोजन किया गया . दो सोपान में आयोजित  इस कार्यक्रम में बोलते हुए संभागीय आयुक्त श्री  दीपक खांडेकर ने कहा –“ दिन प्रतिदिन विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं कीभागीदारी बढ़ रही है ।  ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि जहां पर महिलाएं जा रही हैं  काम कर रही हैं , वे स्थल चाहे शासकीय हों अथवा अशासकीय हों या निजी हों , कार्य करने की दृष्टि से पूरी तरह सुरक्षित हों , जिससे महिलाएं बिना किसी झिझक के कार्य कर सकें या कार्य करवा सकें । उनमें असुरक्षा की भावना नरहे ।  किसी भी प्रकार से उनका लैंगिक उत्पीड़न न हो । महिलाओं के कार्य करने के स्थल सुरक्षित औरसुविधाजनक हो । यदि ऐसा नहीं हो रहा है तो समानता की बात करना बेमानी होगी ।  देश की संसद ने इसके लिए वर्ष 2013 में कार्य स्थल पर सुरक्षा को लेकर लैंगिक उत्पीड़न निवारण , प्रतिषेध एवं प्रतितोषण , अधिनियम बनाया है । इस अधिनियम में महिलाओं की सुरक्षा के सं

आभार डिंडोरी

डिंडोरी वासियों का विनम्र आभार जिनके सहयोग से दो वर्ष से अधिक समय बाल विकास परियोजना अधिकारी डिंडोरी के पद पर सफलता पूर्वक कार्य कर सका आभार उन सबका भी जिनने मुझे मार्गदर्शन दिया उन सबका भी आभार जो मेरे काम में बाधा पैदा करते रहे और मैं नए नए निर्बाध रास्ते खोजता रहा रास्ते मिले भी और मुझे रास्ते खोजने का तरीका भी मिला । इस कवायद में मेरे कार्य कौशल में इजाफा ही हुआ है दोस्तों आपका आभार जो मुझसे बायस थे पर अब किसी भी कारण से स्तब्ध हैं शायद अब समझ गए होगे कि सूचनाओं के आधार पर राय कायम करना मूर्खता होती है । उन व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक तौर पर चुगलखोरों का विशेष का आभार जो आदतन निंदा कर मेरे सचेतक बने तथा एक्सपोज़ हुए बड़ी आसानी से । ऐसे आस्तीन वाले सहयोगियों को विश्वास करना होगा कि दीवारों के कान फूटे नहीं आज भी दीवारें सुनतीं हैं सुनातीं है। आभार उन कुछ कलमकारों के   जो ये साबित कर पाए कि भिखारी किसी भी रूप में हो भिखारी होता है । आभार उन मूर्खों का जो बताने में सफल हुए कि वे निरे मूर्ख हैं वरना गलत पहचान का दोष मेरे माथे होता । जो मित्र दफ्तर दफ्तर भिक्षा वृत्ति करने निकलते हैं

सिस्टम : एक अवलोकन

सरकारी अफ़सर हो या उसकी ज़िंदगी चौबीसों - घंटे के लिये सरकारी होते हैं जो भी होता है सब कुछ सरकारी ही तो होता है . दफ़्तर का चपरासी आफ़िस से ज़्यादा घर का काम करे तो वफ़ादार , जो बाबू घर जाके चापलूसी करे पूरी निष्ठा और ईमानदारी चुगलखोरी करे वो निष्ठावान , बाकी   बाकियों को “ किसी काम के नहीं वाली श्रेणी में रखा जा सकता है ..!” ईमानदारी का दम भरने वाला साहब उसके कान में चुपके से कुछ कह देता है और वो बस हो जाता है हलाकान गिरी से न रहा गया उसने पूछा - राजेंद्र क्या बात है किस तनाव में हो भई ..? राजेंद्र – का बतावैं , साहब , सोचता हूं कि बीमार हो जाऊं ..! गिरी - बीमार हों तुमाए दुश्मन तुम काए को .. राजेंद्र - अरे साहब , दुश्मन ही बीमार हो जाए ससुरा ! गिरी ने पूछा - भई , हम भी तो जानें कौन है तुम्हारा दुश्मन ..? राजेंद्र - वही , जो अब रहने दो साहब , का करोगे जानकर .. गिरी - अरे बता भी दो भाई .. हम कोई गै़र तो नहीं .. राजेंद्र - साहब , साठ मीटर पर्दे को एडजस्ट करने में कित्ती स्टेशनरी लगेगी .. गणित में कमज़ोर हूं सा ’ ब .. गिरी समझ गया कि राजेंद्र क

हम विकास की भाषा से अनजान हैं..

          विश्व में  शांति की बहाली को लेकर समझदार लोग बेहद बेचैन हैं  कि किस प्रकार विश्व में अमन बहाल हो ? चीनी राष्ट्रपति के भारत आगमन के वक़्त तो अचानक मानों चिंतन और चर्चा को पंख लग गए . जिधर देखिये उधर चीन की विस्तारवादी नीति के कारण प्रसूते सीमाई विवाद के चलते  व्यवसायिक अंतर्संबंधों को संदर्भित करते हुए  चर्चाओं में खूब ऊर्ज़ा खर्च की जा रही है .                हम भारतीयों की एक आदत है कि हम किसी मुद्दे को या तो सहज स्वीकारते हैं या एकदम सिरे से खारिज़ कर देते हैं. वास्तव में आज़कल जो भी वैचारिक रूप से परोसा जा रहा है उसे पूरा परिपक्व तो कहा नहीं जा सकता. आप जानते ही हैं कि जिस तरह अधपका भोजन शरीर के लिये फ़ायदेमंद नहीं होता ठीक उसी तरह संदर्भ और समझ विहीन वार्ताएं मानस के लिये . तो फ़िर इतना वैचारिक समर क्यों .. ? इस बिंदु की पड़ताल से पता चला कि बहस   कराने वाला एक ऐसे बाज़ार का हिस्सा है जो सूचनाओं के आधार पर अथवा सूचनाओं (समाचारों को लेकर ) एक प्रोग्राम प्रस्तुत कर रहा होता है. उसे इस बात से कोई लेना देना नहीं कि संवादों के परिणाम क्या हो सकते हैं.               बाज़ार का विर

न्यायालय से हुए समाचार घर

मन चिकित्सक बना देखता ही रहा, दर्द ने देह पर हस्ताक्षर किये...! आस्था की दवा गिर गई हाथ से और रिश्ते कई फ़िर उजागर हुए...!! हमसे जो बन पड़ा वो किया था मग़र  कुछ कमी थी हमारे प्रयासों में भी हमसे ये न हुआ, हमने वो न किया, कुछ नुस्खे लिये  न किताबों से ही लोग समझा रहे थे हमें रोक कर , हम थे खुद के लिये खुद प्रभाकर हुए मन चिकित्सक बना देखता ही रहा, दर्द ने देह पर हस्ताक्षर किये...! चुस्कियां चाय की अब सियासत हुईं  प्याले ने आगे आके बदला समां, चाय वाले का चिंतन गज़ब ढा गया पीने वाले यहीं और वो है कहां..? उसने सोचा था जो सच वही हो गया, गद्य बिखरे बिखरके आखर हुए मन चिकित्सक बना देखता ही रहा, दर्द ने देह पर हस्ताक्षर किये...! हर तरफ़ देखिये नागफ़नियों के वन, गाज़रीघास की देखो भरमार है *न्यायालय से हुए समाचार घर, ये समाचार हैं याकि व्यापार हैं....? छिपे बहुत से हिज़ाबों ही, कुछेक ऐसे हैं जो उज़ागर हुए...!! मन चिकित्सक बना देखता ही रहा, दर्द ने देह पर हस्ताक्षर किये...! *News Room's like Court 

आभार ए बी पी न्यूज़ : हिंदी ब्लागिंग को पहचानने के लिये किंतु सवाल शेष रह गये

                        हिंदी भाषा   को लेकर ए बी पी न्यूज़ पर आज़ एक उत्सव का आयोजन बेशक चिंतन को दिशा दे गया. चिंतन में   पहला सवाल हिंदी के उत्सव के मनाने न मनाने को लेकर विमर्श में सबने कहा कि -" हिंदी के लिये उत्सव मनाना चाहिये हिंदी विपन्न नहीं हुई है संवाहकों संवादकर्ताओं की विफ़लता है." मेरी मान्यता इससे ज़रा सी अलग है हिन्दी जब तक रोटी की भाषा न बनेगी तब तक मैं सोचता हूं  हिन्दी दिवस हिन्दी सप्ताह हिन्दी पखवाड़े हिन्दी माह के बेमानी है. ये अलग बात है कि हमारे प्रधान सेवक हिंदी में अपनी बात रख रहे हैं. फ़िर भी मैं हिंदी उत्सव तब मनाऊंगा   जबकि  हिंदी विकीपीडिया वाले हिन्दी के सन्दर्भों जब तक टांग अड़ाना बंद करेंगे ,  देश के वकील हिंदी में  रिट पिटीशन और डाक्टर नुस्खे हिन्दी  में लिखेंगे तथा कर्ज़ के लिये आवेदन हिंदी में भरवाए जाएंगे हां तब तक  कम से कम मैं तो उत्सव न मनाऊंगा. यहां स्पष्ट करना चाहता हूं कि मैं भारतीय भाषाओं के महत्व के लिये उतना ही उत्तेजित हूं जितना कि हिंदी के लिये.                       भाषा की समृद्धि का आधार   है भाषा और   रोटी का समीकर

मर्मस्पर्श (कहानी)

        " गुमाश्ता जी क्या हुआ भाई बड़े खुश नज़र आ रहे हो.. अर्र ये काज़ू कतली.. वाह क्या बात है.. मज़ा आ गया... किस खुशी में भाई.. ?"         " तिवारी जी , बेटा टी सी एस में स्लेक्ट हो गया था. आज  उसे दो बरस के लिये यू. के. जाना है... !" लो आप एक और लो तिवारी जी..           तिवारी जी काज़ू कतली लेकर अपनी कुर्सी पर विराज गये. और नक़ली मुस्कान बधाईयां देते हुए.. अका़रण ही फ़ाइल में व्यस्त हो गए. सदमा सा लगता जब किसी की औलाद तरक़्की पाती , ऐसा नहीं कि तिवारी जी में किसी के लिये ईर्षा जैसा कोई भाव है.. बल्कि ऐसी घटनाओं की सूचना उनको सीधे अपने बेटे से जोड़ देतीं हैं. तीन बेटियों के बाद जन्मा बेटा.. बड़ी मिन्नतों-मानताओं के बाद प्रसूता... बेटियां एक एक कर कौटोम्बिक परिपाटी के चलते ब्याह दीं गईं. बचा नामुराद शानू.. उर्फ़ पंडित संजय कुमार तिवारी आत्मज़ प्रद्युम्न कुमार तिवारी. दिन भर घर में बैठा-बैठा किताबों में डूबा रहता . पर क्लर्की की परीक्षा भी पास न कर पाया. न रेल्वे की , न बैंक की. प्रायवेट कम्पनी कारखाने में जाब लायक न था. बाहर शुद्ध हिंदी घर में बुंदेली बोलने वाले लड़का

चैनल V के दिल दोस्ती डांस में नवोदित सितारा : आशुतोष बिल्लोरे

  खरगौन जिले के भीकनगांव कस्बे में बतौर  पंडित राजेंद्र बिल्लोरे अपने बेटे को किसी ऐसे अच्छे प्रोफ़ेशन में डालना चाहते थे जिससे बेटे को आर्थिक-समृद्धि एवम  सामाजिक तौर पर  प्रतिष्ठा दे सके. सामान्यरूप से ऐसा मंज़र आम मध्य-वर्ग परिवारों में होता है. किंतु  पिता माता ने आशुतोष की कला को सर्वोपरि रखा और 11 वीं के बाद कला-साधना को साधन और अवसर देने के लिये इंदौर जाने की अनुमति दे दी. जहां उन्हैं बी.काम. की पढ़ाई के साथ साथ पर्फ़ार्मिंग कला के विस्तार के अवसर मिले. मध्य-प्रदेश टेलेंट शो, मलवा कला अकादमी, डांस इंडौर डांस, आइ.आइ.एम इन्दौर, डांश का महा संग्राम जैसी प्रतियोगिताओं में बेहद प्रसंशा एवम अव्वल स्थान अर्जित किये. इंदौर में ही जावेद जाफ़री, गीता कपूर, धर्मेष  कुंवर अमर, जैसी हस्तियों ने आशुतोष की कला साधना को सराहा और सतत साधना जारी रखने की सलाह दी.         आशुतोष ने भारतीय और विदेशी शैली में नृत्य एवं अभिनय को अपनाया. पर अपने जन्म भूमि भीकनगांव में कला-साधकों के लिये लगातार कई शार्ट-टर्म-कोर्स, वर्कशाप आयोजित कीं.         भीकनगांव के स्कूल शिक्षक का बेटा जब मायानगरी गया तब उसके

अदभुत सोचते हैं पी नरहरि जी

नित नया करना सहज़ है लेकिन नित नया सोचना वो भी आम आदमी की मुश्किलों से बाबस्ता मुद्दों पर और फ़िर रास्ता निकाल लेना सबके बस में कहां. जितना मानसिक दबाव कलेक्टर्स पर होता है शायद आम आदमी उसका अंदाज़ा सहज नहीं लगा पाते होंगें. ऐसे में क्रियेटिविटी को बचाए रखना बहुत मुश्किल हो जाता है. किंतु कुछ सख्त जान लोग ऐसे भी हैं जो दबाव को अपनी क्रिएटिविटी के आधिक्य से मानसिक दबाव को शून्यप्राय: कर देने में सक्षम साबित हो जाते हैं. इनमें से कुछेक नहीं लम्बी फ़ेहरिस्त है.. मेरे ज़ेहन में इस क्रम में आई ए. एस. श्री पी. नरहरी की क्रियेटिविटि का प्रमाण प्रस्तुत है.