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बुधवार, जनवरी 4

कान देखने लगे हैं अब :व्यंग्य गिरीश मुकुल

कानों से देखने की एक अधुनातन तकनीक का विकास एवम उपयोग इन्सानी सभ्यता के बस में ही है यक़ीन कीजिये  इसका उपयोग  इन दिन दिनों बेहद बढ़ गया है.अब कान भी बढ़चढ़ के देखने के अभ्यस्त हो चले हैं. अब गुल्लू को ही लो जित्ते निर्णय लेता है कानन देखी के सहारे लेता है गुल्लू करे भी तो क्या अब आधी से ज़्यादा आबादी के पास  नज़रिया  ही कहां जिससे साफ़ साफ़ देखा जाए.तो भाई लोगों में जैनेटिक बदलाव आने तय थे . एक ज़िराफ़ की गर्दन की लम्बाई भी तो जैनेटिक बदलाव का नतीज़ा है.कहतें है कि लम्बी झाड़ियों से हरी हरी पत्तियां चट करने के लिये बड़ी मशक्क़त करनी होती थी जिराफ़ों को तो बस उनमें बायोलाजिकल बदलाव आने शुरु हो गये . पहले मैं भी इस बात को कोरी गप्प मानता था लेकिन जब से आज के लोगों पर ध्यान दिया तो लगता है है कि सही थ्योरी है जिराफ़ वाली. 
मेरे एक मित्र  अखबार निकालते हैं. मुझे मालूम है कि वे बस हज़ार अखबार छापते हैं हमने पूछा : भई, कैसा चल रहा है अखबार 
बहुत उम्दा दस हज़ार तक जाता है..?
यानि, अब एक नहीं दस हज़ार कापी छाप रए हो दादा वाह बधाई.. !
न भाई छाप तो ऎकै हज़ार रहे हैं पहुंच दस तक रहा है...!
"भईया, झूठ नै बोलो अपने लंगोटिया सै"
   बस भाई ने हिंदुस्तान में सबसे ज़्यादा खाए जाने वाले "आभासी खादय पदार्थ यानी कसम खा के बोले - भाई तुम क्या जानो  रीडर शिप सर्वे के मुताबिक अपना अखबार दस हज़ार बांच रये हैं .जे देक्खो (जेब से एक फोटो कापी निकाल के हमको दिखाते हुए बोले ) जे रहे अलग से  पांच हज़ार, हां देखो नीचे वाली लैन पढ़ो जिनको हमाए समाचार पत्र की कोई न कोई खबर किसी के ज़रिये सुनवा दी जाती है .  रोज़िन्ना पंद्र हज़ार तक जाने वाला अखबार चलाता हूं मुझे महापुरुष वक़ील पत्रकार "छत्ता-पांडे जी" की याद आ गई बड़े जीवट अखबार नवीस थे उनका अखबार की कुछ खबरें वे अक्सर सुना जाया करते थे. यानी कुल मिला के  कानों से देखने दिखाने का सामाजिक बदलाव आज़ से बीस-बाइस बरस पहले ही शुरु हो चुका था अब तो इस कला में चार चांद लग गये. अब बताओ भैया "गुल्लू का गलत कर रिया है..?"
न गुल्लू वही कर रिया है जो अदालत करतीं हैं-"हां वही,सुनवाई, यानी कानन-दिखाई"
कल गुल्लू बीवी को ज़ोर जोर से डांट रहा था पता चला कि गुल्लू की बुढ़िया अम्मा ने बहू की कोई गलती गुल्लू को कान के ज़रिये दिखा दी बस क्या था गुल्लू ने अपना पति धर्म निबाह दिया.. बेचारी गुल्ली का करती सोच रही होगी :"बुढ़िया कित्ते दिन की "
  खैर गुल्लू तो एक आम आदमी है.. आफ़िसों में नाबीना अधिकारी बेचारे कान से न देखें तो का करें. सूचना क्रांति के युग में उनका कान से देखना अवश्यंभावी है. दोस्तो बायोलाजिकल चैंज सन्निकट जान पड़ता है. इस बारे में चश्मा कम्पनियां बहुत गम्भीरता से चश्में की बनावट में चैंज लाएंगी सुना है ओबामा ने "इस अनुसंधान के लिये काफ़ी सारे डालर के बज़ट का मन बना लिया है." यानी अब चश्मे कानौं में लगेंगे आखौं पे नहीं. आंख से इंसान-प्रज़ाति क्या काम लेगी इस काया-शास्त्री गण गहन विमर्श में हैं. 

रविवार, अक्तूबर 2

आदरणीय आडम्बर जी

             वे किस दर्ज़े के  थे मैं नहीं समझ पा रहा हूं. लेकिन उनका दर्ज़ा सबसे ऊंचा है वे ऐसा जतलाते थे सो सब मानते थे भी ऐसा ही.. लोगों से एक निश्चित दूरी सहज ही स्थापित करने वाले वे "जी साहब"  मेरी नज़र में आदरणीय आडम्बर जी  थे . उनके  सामने तो न कहता था पर अक्सर सोचता था अपने दिल की बात कह दूं उनको. 
         थे तो नहीं पर ड्रेस-कोड मक़बूल दद्दा की घांईं (के समान). किसी ने झूठ-मूठ पूछा कि दादा बहुत दिनों से दर्शन नहीं हुए ..? बस बताय देते थे-”अरे, आजकल फ़ुरसत किसको है, अब बताओ आपके घर ही न आ सका गुप्ता जी के नि:धन पर दिल्ली गया था ”लौटा तो जाना कि गुप्ता जी की असमायिक ..किसी को मुम्बई की सेमिनार का झटका तो किसी हो आगरे में पेंटिंग प्रदर्शनी की व्यस्तता का किस्सा गाहे बगाहे सुनाया करते जाते तो थे पर पाटन-शहपुरा से आगे नहीं. 
                  गुप्ता जी का लड़का पूरे शहर की खबर रखता था. उसे मालूम था आडम्बर जी का पूरा दिन कहवाघर में रात दारू खोरी में बीतती है, मन ही मन हंस दिया उसे यह भी तो मालूम था कि बाबूजी की शवयात्रा में  उनका लड़का आया था शमशान में किसी से  कह रहा था "पापा न आ पाए कल देर रात लौटे" उन दिनों हमारे मुहल्ले में रेल-कर्मी, पुलिस वाले, जैसे लोग ही रोज़गारीय मज़बूरी के  देर से आते थे. आडम्बर जी का  देर रात किसी का लौटने की वज़ह सिवाय दारू खोरी में मस्त रहने से इतर कुछ न होती.  
         आडम्बर जी को अपनी पेंटिंग के आगे बाक़ी सब की बनाई पेंटिंग्स "छिपकली के पंजों से बनी लक़ीरों" की सी लगतीं थीं जो बिखरी स्याही पर से सरपट आई हो.यानी कुल मिला कर हज़ूर की के अलावा कोई न तो था न है .. शायद न रहेगा भी यदी इनका पुनर्जन्म न हुआ तो. हमारी भी मूंछें रुएं के रूप में निकलने लगीं थीं कुछ तुकबंदी कर कुरा के बसस्टैंड वाले "नवभारत" प्रेस जाया करते थे. तुकबंदी छपवाने. अपने मोहन शशि जी उसे ठोंक-पीट कर सुधार देते और छाप देते नामवर हो गए थे उन दिनों ही  पर स्वांग रचाना न सीख पाए आज तलक. कवि कथाकार, उपन्यासकार, चित्रकार गोया अब ब्लागर भी   एक असामान्य सा लबादा क्यों ओढ़ा करते हैं इस बात पर एक मनोवैग्यानिक अनुसंधान कराने की मंशा है.
हम से बड़ा कौन ? 
         इस तरह के लोग बस एक खोल में जीते हैं, जैसे कि प्याज़.और आप जानते ही हैं  प्याज़ के  भीतर कहां है प्याज़ इसका अंदाज़ा लगाने जाओ तो सिर्फ़ आंसू ही निकलेंगे.एक कवि जो कवि क्या कविता की फ़ुल टाईम फ़ैक्ट्री हैं की अब तक बीसेक किताबें तो छप गईं. इधर ससुरे अपन को किताब छपाना और फ़िर उसे आम पाठक तक पहुंचाने के नाम पर पसीना निकल आता है वो कैसे इतना कर गुज़रे उनका किताब छपाना कागज़ की बरबादी से इतर कुछ खास नहीं. अरे उनको कौन समझाए भार्तेंदु की ड्रेस पहन लेने से कोई कालजयी कृति नही लिख पाता लिखने वाले के विचारों में एक फ़लसफ़ा होता है. कविता यदी जीवंत न हो तो कितनी भी शास्त्रीय सीमाओं में लिखी जाए धन, कागज,स्याही और वक़्त  की बरबादी से अधिक कुछ नहीं. 
    आपसे बड़ा कौन है इस बात को आप कबीर तुलसी,आदि आदि से जान सकते हैं. हमारे भाई आडम्बर जी रविवर्मा या मक़बूल दद्दा से पूछ लें कि महान कलाकार कैसे बना जाता है. 

सोमवार, जून 20

सावधान....चमचों के साथ छुरी-कांटे भी होते हैं...!!


चमचों के बिना जीना-मरना तक दूभर है. खास कर रसूखदारों-संभ्रांतों के लिये सबसे ज़रूरी  सामान बन गया है चम्मच. उसके बिना कुछ भी संभव नहीं चम्मच उसकी पर्सनालिटी में इस तरहा चस्पा होता है जैसे कि सुहागन के साथ बिंदिया, पायल,कंगन आदि आदि. बिना उसके रसूखदार या संभ्रांत टस से मस नहीं होता. 
       एक दौर था जब चिलम पीते थे लोग तब हाथों से आहार-ग्रहण किया जाता था तब आला-हज़ूर लोग चिलमची पाला करते थे. और ज्यों ही खान-पान का तरीक़ा बदला तो साहब चिलमचियों को बेरोज़गार कर उनकी जगह चम्मचों ने ले ली . लोग-बाग अपनी  आर्थिक क्षमतानुसार चम्मच का प्रयोग करने लगे. प्लैटिनम,सोने,चांदी,तांबा,पीतल,स्टेनलेस, वगैरा-वगैरा... इन धातुओं से इतर प्लास्टिक महाराज भी चम्मच के रूप में कूद पड़े मैदाने-डायनिंग टेबुल पे. अपने अपने हज़ूरों के सेवार्थ. अगर आप कुछ हैं मसलन नेता, अफ़सर, बिज़नेसमेन वगैरा तो आप अपने इर्द गिर्द ऐसे ही विभिन्न धातुओं के चम्मच देख पाएंगे. इनमें आपको बहुतेरे चम्मच बहुत पसंद आएंगे. कुछ का प्रयोग आप कभी-कभार ही करते होंगे. 
      चम्मच का एक सबसे महत्वपूर्ण और काबिले तारीफ़ गुण भी होता है कि वो सट्ट से गहराई तक चला जाता है. यानी आपके कटोरे के बारे में और आपके मुंह  के बारे में, आपके हाथों के बारे में 
                                              अब आप डायनिंग टेबल पर सजे चम्मच देखिये और याद कीजिये उस दौर को जब हमारे खाने-खिलाने के तरीके़ में "छुरी-कांटे" का कोई वज़ूद न था.केवल चम्मच से ही काम चलाया जाता था... हज़ूर आप बे-खौफ़ थे अभी भी हैं बे-खौफ़ तो आज़ आपको खबरदार किये देता हूं... अब हर जगह एक से बढ़कर एक "चम्मच" मौज़ूद मिलेंगे... पर छुरी-कांटों के साथ अब तय आपको करना है कि "चम्मच-बिरादरी" का उपयोग आप कितना और कैसे करना है. जैसे भी करें पर "खाते-वक़्त" इस बात का ध्यान भी रखें कि आप सिर्फ़ चम्मच से नहीं खाएंगे. उसके साथ छुरी-कांटों का प्रयोग भी करेंगे. और आप तो जानते हैं कि छुरी-कांटा तो छुरी-कांटा है .......
इसे भी कभी देख लीजिये जी जब फ़्री हों 

हमें हर मामले में उंगली करनें में महारत हासिल है .



मंगलवार, नवंबर 16

सटायर : कृष्ण--क्यों जनम लेते हो तुम

हे कॄष्ण ------

सुनिये एक व्यंग रचना---अरविंद झा जी के ब्लॉग क्रांतिदूत से ---


 


                 अब कौन सी देवकी इतना रिस्क लेकर तुम्हे जनम देगी ? जिस मां लक्ष्मी से तुम्हें जन्म के साथ ही एक्सचेंज किया गया था उसे भ्रुण में ही मार नहीं दिया गया होगा..?. अब तो गायों के चारे लोग खुलकर खाने लगे हैं. क्या खिलाओगे अपनी गैया को ? राधा जैसी हजारो गोपियों के साथ जात और उम्र की परवाह किये बगैर इश्क करने पर चौराहे पर टांगकर जिंदा नहीं जला दिये जाओगे?. आज की औरतें जो फ़िगर के लिये अपने बच्चों को भी अपना दूध नहीं पिलाती , मक्खन चोरी करने पर तुम्हारा फ़िगर नहीं बिगार देंगी....? उपर से मक्खन आइ एस ओ सर्टिफ़ाइड तो होगा नहीं.मिलावट भी हो सकती है...यदि जहरीला निकला तो...? सुदामा जैसे जो छोकङा लोग तुम्हारे साथ गायें चराया करते थे..आज के डेट में चाइल्ड लेबर बने हुए हैं, जो अच्छे घर के थे ईंगलिश स्कूल में पढ रहे हैं. किसके साथ खेलोगे..? तुम्हीं बताओ तुम्हारा एडुकेशन कैसे होगा..? तुम्हारे पापा बसुदेव के पास कोई खजाना तो है नहीं कि लाखो रुपये डोनेशन दे देंगे..रही बात नन्दराज की तो सुन लो आजकल पूरे भारत में राजा कंस की चलती है.(आगे इधर से )

रविवार, सितंबर 19

अरे दिमाग पे असर कैसे होगा तुम्हारे दौनो कानों की घुटने से दूरी नापी कभी ?

हरिवंशराय जी के पोते हैं जो कहेंगे वो हम सुनेंगे बोलते हैं अब बोलने के लिये किसी भाषा की ज़रूरत नहीं "What an idea sir ji...!!"  इस बिन्दु पर मन में विचार चल रहा था कि अचानक एक अज़नवी मेरे एन सामने आ खड़ा हुआ बोलने लगा तुमाए मन की बात का खुलासा कर दूं...?
मुझे लगा परम ज्ञानी की परीक्षा क्यों न लूं सो हां कर दी 
वो बोला :- सेलवा के एड की बात सोचत हौ न बाबू...?
हां लोग काहे इन झूठी बात को मानत ह्वें  दादू....? इ झुट्टा ह्वै ... कम्पनी जुट्ठी ह्वे हामाए फ़ोनवा का मीटर ऐसने घूमत है कि बस बिना बात कै ४०० सौ रुपिया ज़ादा का बिल थमा देवत है कम्पनी ?
दादू बोला :- मूरुख ब्लागर उही तो वो बोलत ह्वै...? वो चेतावनी दैके समझा रहा है  कम्पनी का फ़ण्डा ''अब बोलने के लिये किसी भाषा की ज़रूरत नहीं समझे बिना बोले का पैसा लगेगागुरु ''
हम चकरा गये कि कित्ती दूर से दादू कौड़ी लाया होगा सो हमने पूछा :- दादू, आप ओकर हर बात मानत  हौ ...
हम उसकी का उसके बाप दादा सबकी मानत हैं मधुशाला से शराबी तक दादू ने ये कहते हुए कांधे पे टंगे खादी के झुल्ले से बाटल निकाली और पूछा:- पियोगे..?
”न..”
न सुनते ही गटगट अद्धी .... आधी कर दी  और टुन्न होके बोला :-उनकी बात हम न सुनें ऐसा हो ही नहीं सकता . दिलो दिमाग पर छा जाने वाले इस एड में बिटवा जो कहा ओकर बहुतै बड़ा अर्थ निकलत है..... पिछले दिन आप कौ याद आवे ज़रा फ़्लेश बेक म जावें .... संसद मा यही तो हुआ था "........जी " के बोलने जौन  ज़रूरत थी वो पूरी हुई..... अब उकील साहबान को लेओ बोलने की खातिर जितना दिये उससे कम बोले हम बोले हज़ूर थोड़ा अऊर बोलते हमारी तरफ़ से कोरट को समझ आ जाती बात ...?
उकील साब बोले:- अगली बार बोलेंगे, समझत नाईं हौ अरे अभी सगरा बोल देते तो अगल पेशी म का बोलते बोलो..?
सुन कय हज़ूर हमाई तौ बोलती बंद हवे लगी... हम का बोलते बोलो भैया..
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पीछा छुड़ाने की गरज़ से हम बोले दादू तुम जाओ हम को भी जाने दो हमको काम है... दादू फ़ुर्र से गायब तभी समीर लाल का फ़ोन बज़ा बोले:- गिरीश भाई, नवम्बर में आ रहा हूं..."
”जी स्वागत है, और बैटरी लो क्या पूरी बंद हो गई ” हम बिना किसी विचार को लिये घूमने की गरज़ से आगे बड़ने ही वाले थे कि मुआं दादू फ़िर आ टपका आते ही पूछने  लगा :-"काहे बायें कान में फ़ुनवा काहे चिपकाए थे "
.हम बोले:- एक शोध से पता चला है कि ’दाएं कान में फ़ोन लगाने से दिमाग़  पर नेगैटिव रेज़ का असर होता है..?
दादू:- अरे दिमाग पे असर कैसे होगा तुम्हारे दौनो कानों  की घुटने से दूरी नापी कभी ?
हम गरियाने ही वाले थे कि फ़िर दादू फ़ुर्र ...
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वैसे दादू ने ठीक ही कहा हम ज़्यादातर इधर उधर की बातों जैसे सियासत, नेता, धार्मिक उन्माद जैसे विषयों भोंथरी चिन्ता करते हैं.... जबकी खुशहाल वतन के बारे में शायद कम सोचते हैं. ज़रा सोचिये कित्ता वक्त ज़ाया करतें  हैं हम सियासी दांवपेंच , व्यवस्था को गरियाने , फ़िल्मी सितारों की गासिप, अड़ोसी-पड़ोसी रिश्तेदारों की निन्दा आदि पर लनभग नब्बे प्रतिशत है न .. तब हम यक़ीन कीजिये घुटने से सोचतें हैं.....

शुक्रवार, अगस्त 27

व्यंग्य: ये आपके मित्र करते क्या हैं..!”

                                              आज़ आफ़िस में मैने सहकर्मी को  बातों बातों में बताया  मेरे एक मित्र  हैं जिनके पास शब्दों का अक्षय भण्डार है. विचारों की अकूत सम्पदा है, कुल मिला कर ज्ञानवान उर्जावान मेरे मित्र को हम अपने बीच का ओशो मानते हैं. उनकी  तर्क-क्षमता  के तो भाई हम कायल हैं.... 
सहकर्मी  ने पूछा कि :”ये आपके मित्र करते क्या हैं..!” 
मैं :-  सोचा न आपने ऐसे व्यक्ति के बारे में सोचना भी चाहिये जी ज़रूरी है पर आपको बता दूं कि वो उस कार्य को नही  करते हैं जो आप हम  करते करते हैं. जैसे हम-आप नौकरी-धन्धा आदि कुछ करते हैं है न वो ये नहीं करते. जी शादी -शुदा हैं...?
...न भई न ये भी नहीं की उनने . 
तो फ़िर क्या..करते है ..?
जी , एक बात बताओ..? 
पूछो...?
आपने अपने सहकर्मी के खिलाफ़ बास से कल चुगली की थी न...?
सहकर्मी :- अरे ये कोई बात हुई... भाई गलत बातें साहब को बताना ज़रूरी थी  न सो बता दिया. इसमें चुगली जैसी बात कहां..?
जो भी हो वो ये नहीं करते ...!
सहकर्मी थोड़ा झल्लाया पर उसकी खीज पता नहीं क्यों उभर नहीं पाई. एक दीर्घ चुप्पी के बाद उसने पूछा-सा’ब, अब तो बताईये वे करते क्या हैं. 
मैने कहा:- कल हम सबने मिल कर गुप्ता जी के ट्रांसफ़र वाली बात छिपाई थी न गुप्ता जी से ...? यहां तक के सरकारी मेल डिलीट तक कर दी पूरे कमीने पन से ..... हमने ताकि गुप्ता स्टे न पा सके है न ...!
हमारे इस काम  का आपके मित्र से क्या वास्ता ?
वास्ता है न भाई मेरा मित्र इतना कमीनापन नहीं करता जितना हम ने मिलकर किया . 
अब सहकर्मी लगभग आग बबूला होने की जुगत में था कि मैंने कहा:- भाई, भगवान से डरते हो...?
जी 
कितना ?
अटपटे सवाल में अटका सहकर्मी तुरंत तो कुछ  बोल न सका फिर धीरे से बोला :-''बहुत,,,!''
मैंने कहा:- वो नहीं डरता पूरा नास्तिक लगता है ...!
तत्क्षण सहकर्मी ने दावा ही ठोंक दिया :-लगता क्या है ही नास्तिक..फिर भी आप उसके मित्र हो...?
  जी था हूं और रहूंगा भी क्योंकि वो बिना किसी को जाने कोई राय कायम नहीं करता जैसा आपने उसे समझे बगैर नास्तिक होने का दावा कर लिया . भाई मैंने कहा था न कि वो नास्तिक लगता है , दावा तो तुम ने कर दिया कि ''लगता क्या है ही नास्तिक..'' बिना जाने समझे अरे वो भगवान से क्यों डरे ? डरे वो जो पापों में लिप्त है हमारी तरह. 
सहकर्मी ने मुझ से दूर भागने की एक कोशिश और की बोला:-सा’ब, चलूं एक ज़रूरी फ़ाईल निपटाना है . 
अब आप ही बताइये मेरा मित्रता जिससे है वो  कितना मिसफ़िट है है न....?

गुरुवार, जून 10

एक लघुकथा....................पॉड्कास्ट.........

नमस्कार..............‘‘मिसफ़िट:सीधीबात‘‘ पाडकास्टर के रूप में मेरी पहली कोशिश  .............................आज इस ब्लॉग पर ये मेरा पहला प्रयास है ...................सुझाव सादर अपेक्षित है.........
आज सुनिए....... दीपक"मशाल" की लिखी एक लघुकथा................शीर्षक है ------"दाग अच्छे हैं"............. आप इसे यहाँ पढ सकते हैं

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शनिवार, अप्रैल 10

सांड कैसे कैसे

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एक बुजुर्ग लेखक  अपने शिष्य को समझा रहे थे -"आव देखा न ताव टपका दिये परसाई के रटे रटाए चंद वाक्य परसाई के शब्दों का अर्थ जानने समझने के लिये उसे जीना होगा. परसाई को बिछौना समझ लिये हो का.?, दे  दिया विकलांग श्रद्धा को रोकने का नुस्खा हमको. अरे एक तो चोरी खुद किये उपर से कोतवाल को लगे बताने चोर का हुलिया . अगर  पुलिस के चोर खोजी कुत्ते नें सूंघ लिया तो सांप सूंघ जायेगा . ....?
 तभी दौनो के पास से एक सांड निकला चेला चिल्लाया-जाने सांड कैसे कैसे ऐरा घूम रहे हैं इन दिनों कम्बख्त मुन्सीपाल्टी वाले इनको दबोच कानी हाउस कब ले जावेगें राम जाने.
बात को नया मोड देता चेला गुरु से बोला:-गुरु जी, अब बताइये दस साल हो गये एक भी सम्मान नसीब न हुआ मुझे ?
तो, क्या कबीर को कोई डी-लिट मिली,तुलसी को बुकर मिला ?
अरे गुरु जी , मुझे तो शहर के लोग देदें इत्ता काफ़ी है .
सम्मान में क्या मिलता है बता दिलवा देता हूं ?
गुरु, शाल,श्रीफ़ल,मोमेन्टो...और क्या.....?
मूर्ख, सम्मान के नारीयल की ही चटनी बनाये गा क्या...इत्ती गर्मी है शाल चाहता है, कांच के मोमेंटो चाहिये तुझे इस के लिये हिन्दी मैया की सेवा का नाटक कर रहा था ? जानता हूं तुझे आदमी से हट के रुतबा चाहिये उन अखबारों में नाम चाहिये जिसको रद्दी-पेप्पोर बाला पुडे बनाने बेच आता है, या कोई बच्चे की ................ साफ़ करने में काम आता है उसमें फ़ोटो छपाना है..वाह से हिन्दी-सुत, तुझे सूत भर भी अकल नईं है. जा जुमले रट के बने साहित्यकार. मैने तुझे मुक्त किया जा भाग जा घूम उसी छुट्टॆ-सांड सा जो पिछले नुक्कड पे मिला था.
गुरु से मुक्त हुआ साहित्यकार इन दिनों ब्लागिंग कर रहा है जहां साड सा एन सडक पे गोबर कर देता है. चाहे किसी का पैर कोई आहत हो उसे चरे हुए को निकालना है सो निकाल रहा है. इधर न तो संपादक के खेद सहित का डर न ही ज़्यादा प्रतिस्पर्धी ........ कभी इसकी पीठ खुजा आता तो कभी उसकी........ बेचारा करे भी तो क्या. दफ़्तर में मुफ़्त का कम्प्यूटर फ़िर हिन्दी की सेवा का संकल्प... हा हा हा......?

गुरुवार, अक्तूबर 29

अफसर और साहित्यिक आयोजन :भाग एक

::एक अफसर का साहित्यिक आयोजन में आना ::
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पिछले कई दिनों से मेरी समझ में आ रहा है और मैं देख भी रहा हूँ एक अफसर नुमा साहित्यकार श्री रमेश जी को तो जहां भी बुलाया जाता पद के साथ बुलाया जाता है ..... अगर उनको रमेश कुमार को केवल साहित्यकार के रूप में बुलाया जाता है तो वे अपना पद साथ में ज़रूर ले जाते हैं जो सांकेतिक होता है। यानी साथ में एक चपरासी, साहब को सम्हालता हुआ एक बच्चे को रही उनकी मैडम को सम्हालने की बात साहब उन्हें तो पूरी सभा सम्हाले रहती है। एक तो आगे वाली सीट मिलती फ़िर व्यवस्था पांडे की हिदायत पर एक ऐसी महिला बतौर परिचर मिलती जिसे आयोजन स्थली का पूरा भौगौलिक ज्ञान हो ताकि कार्यक्रम के दौरान किसी भी प्रकार की शंका का निवारण सहजता से कराया जा सके। और कुछ लोग जो मैडम की कुरसी के उस सटीक एंगल वाली कुर्सी पर विराजमान होते हैं जहाँ से वे तो नख से शिख तक श्रीमती सुमिता रमेश कुमार की देख भाल करते हैं । उधर कार्यक्रम को पूरे यौवन पे आता देख रमेश जी पूरी तल्लीनता से कार्यक्रम में शामिल रहतें हैं साहित्यिक कार्यक्रम उनके लिए तब तक आकर्षक होता है जब तक शहर के लीडिंग अखबार और केबल टी वी वाले भाई लोग कवरेज़ न कर लें । कवरेज़ निपटते ही रमेश कुमार जी के दिव्य चक्षु ओपन हो जातें हैं और वे अपनी सरकारी मज़बूरी का हवाला देते हुए जनता से विदा लेते हैं । रमेश कुमार जैसे लोगों को इस समाज में साहित्य समागम के प्रमुख बना कर व्यवस्था पांडे जन अपना रिश्ता कायम कर लेतें हैं साहित्य की इस सच्ची सेवा से मित्रों मन अभीभूत है .................शायद आप भी ..........!!
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