राष्ट्र वादी विचार धारा के पोषक अंतर जाल के महत्वपूर्ण लेखक सुरेश चिपलूनकर से हुई बात चीत दो भागों में पेश है
भाग दो
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एक
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शनिवार, फ़रवरी 06, 2010
गत्यात्मक ज्योतिष की प्रवर्तक श्रीमती संगीता पुरी जी की भविष्यवाणी सही हुई
सुधि श्रोता गण
सादर-अभिवादन
पोडकास्ट साक्षात्कार के दूसरे भाग में संगीता पुरी जी ने ज्योतिष को विज्ञान कहने में कहीं कोई कमीं नहीं छोड़ी. किन कारणों से ज्योतिष को विज्ञान की सहमति न मिल सकी यह भी बताया है. साथ ही उनके द्वारा मेरे जन्म से लेकर अब तक के उतार चढ़ाव को भी प्रेषित किया जो 90 प्रतिशत सही पाए गए {देखिये ग्राफ एक एवं दो }
बावरे-फकीरा पर प्रसारित उनसे लिए साक्षात्कार भाग एक को सुनने भाग-एक पर क्लिक कीजिये मिसफिट ब्लॉग पर पहुँच कर तथा भाग-दो सुनने के लिए यहाँ चटके का इंतज़ार है. इस प्रयोग को जारी रखने आपका सहयोग अपेक्षित है .आज की चर्चा सुनकर आपको ज्ञात कि मौसम संबंधी भविष्यवाणी पूर्णत: सही साबित हुई है
संगीता पुरी जी

सादर-अभिवादन
पोडकास्ट साक्षात्कार के दूसरे भाग में संगीता पुरी जी ने ज्योतिष को विज्ञान कहने में कहीं कोई कमीं नहीं छोड़ी. किन कारणों से ज्योतिष को विज्ञान की सहमति न मिल सकी यह भी बताया है. साथ ही उनके द्वारा मेरे जन्म से लेकर अब तक के उतार चढ़ाव को भी प्रेषित किया जो 90 प्रतिशत सही पाए गए {देखिये ग्राफ एक एवं दो }
बावरे-फकीरा पर प्रसारित उनसे लिए साक्षात्कार भाग एक को सुनने भाग-एक पर क्लिक कीजिये मिसफिट ब्लॉग पर पहुँच कर तथा भाग-दो सुनने के लिए यहाँ चटके का इंतज़ार है. इस प्रयोग को जारी रखने आपका सहयोग अपेक्षित है .आज की चर्चा सुनकर आपको ज्ञात कि मौसम संबंधी भविष्यवाणी पूर्णत: सही साबित हुई है
संगीता पुरी जी
ग्राफ एक

ग्राफ दो
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सेकण्ड कापी
गुरुवार, फ़रवरी 04, 2010
श्री राजीव तनेजा जी से बातचीत
राजीव तनेजा दिल वालों की दिल्ली की दिलदार शख्शियत तनेजा जी एक नहीं दो ,तीन न बाबा पूरे चार ब्लाग्स के मालिक हैं आज श्री राजीव तनेजा जी से बातचीत की गई जिसे सुनिए अन्तरंग बात चीत ''सव्यसाची'' पर . मंगलवार, फ़रवरी 02, 2010
तवायफ की मौत

राज कुमार सोनी के बिगुल पर प्रकाशित ''घुंगरू टूट गए'' को पढ़ते ही मुझे अपनी पंद्रह बरस पुरानी एक सम्पादक द्वारा सखेद वापस रचना याद आ गई सोनी जी के प्रति आभार एवं उस आत्मा की शान्ति के लिए रचना सादर प्रेषित है
चीथड़े में लिपटी बूढ़ी माँ
मर गई
कोई न रोया न सिसका
उन सेठों के बच्चों ने भी नहीं
जिन सेठों नें बदन नौचा था इसका
वे बच्चे इसे माँ कह सकते थे
एक एक दिन अपने साथ रख सकते थे
ओरतें भी
इस बूढ़ी सौत की सेवा कर सकतीं थीं
किन्तु कोई हाथ कोई साथ न था इस को सम्हालने
सारे हाथ बंधे थे
सामाजिक-सम्मान की रेशमी जंजीर से
ये अलग बात है
ये परिवार गिर चुके थे ज़मीर से
बूढ़ी शबनम के पास
मूर्ती पूजक
पैगम्बर के आराधक
सब जाते थे
जिस्मानी सुख के सुरूर में गोते खाते थे
आज आख़िरी सांस ली इस बूढ़ी माँ ने
तब कोई भी न था साथ
घमापुर पोलिस ने
रोजनामाचे में
मर्ग कायम कर
लाश पोस्ट मार्टम को भेज दी है
पोलिस वाले उसे जलाते
अगर उसका नाम शबनम न होता
उसे दफना दिया गया है
अल्लाह उस पुलिस वाले को
ज़न्नत दे जिसने
दफनाते वक्त
आँखें भिगोई थीं....!
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चित्र साभार :-गूगल बाबा
बुधवार, जनवरी 27, 2010
पाबला जी के नाम खुला ख़त
मित्रों भारी वैचारिक संकट उत्पन्न हो गया है ऐसा मुझे लग रहा है 'आज नेट पर डोमेन नाम को लेकर जो समस्या प्रसूति है' उससे सुसंगत कुछ बातें आपसे शेयर करने को जी चाह रहा है आप अपने अतीत में जाएँ तो देखेंगेगे एक ही नाम सरनेम वाले कई बच्चे आपके साथ स्कूल में रहे होंगे जैसे विनय सक्सेना, राजेश दुबे, संजय सिंह, मनीष शर्मा, भीमसेन जोशी, मेरे साथ तो तीन गिरीश और थे दो गिरीश गुप्ता एक मैं एक गिरीश जेम्स उन दिनों न तो नीम का पेटेंट हुआ था न ही हल्दी का न ललित जी की मूंछों का किन्तु पिछले दिन पता चला कि मेरे 'कान' का भी किसी ने पेटेंट करा लिया है अब बताइये मैं क्या करुँ...? लोग सब समझतें हैं इन सब बातौं में कोई दम नहीं अरे कोई कुछ भी कर सकता है डोमेन नाम चर्चा आदि की चीर फाड़ से बेहतर है कि समझा जावे कि इन सब बातौं में क्या रखा हम सबको हिन्दी चिट्ठाकारिता के बेहतर आयाम स्थापित करने हैं अगर हमने ये न किया तो आने वाले समय में जब समीक्षा होगी तो बच्चे हम पर हसेंगे लानतें भेजेंगे तब हम ज़वाब न दे पाने कि स्थिति में होंगे. कबीर को किसने स्वीकारा होगा तब आज सब कबीर को जानते हैं ज़रूरी है कि "एकला चलो लेकिन बहु जान हिताय जात्रा करो''
कोई आपसे असहमत है होने दीजिये कोई आपको झुठला रहा है झुठलाने दीजिये अपना काम मत छोढ़िये और न ही अपने आल माइटी होने का गुमान पालिए. हम तो कुछ भी नहीं हैं हम उनको देखें जो ताड़पत्रों पे लिख रहे थे उनको देखें जिनके पास शक्तिशाली विचार थे सम्प्रेषण के साधन न थे जो आज हमारे पास हैं.. सब कुछ हैं बस समष्टि के विकास की सोच को छोड़ के जो कबीर के पास थी
साभार विक्की पीडिया
आज एक ख़त लिख रहा हूँ पाबला जी को भी मज़ाक में कुछ संकेत दे रहा हूँ शायद पसंद आयें मेरी बात असहमत हों या सहमत हों मैंने जो कहना था वो तो कह दिया विचार आप कीजिये विवादों को ख़त्म कर दीजिये भारत के ब्लॉग जगत के सीनियर्स को भी चिट्ठा चर्चा.काम पर सादर आमंत्रित कर लीजिये रही नीलामी की बात अगर बात न बने तो फिर ज़रूर कीजिये नीलामी. लीजिये चिट्ठी लिख देता हूँ पाबला जी को
पाबला जीअभिवादन
आपका प्रस्ताव जाना मिश्रित सोच में पड़ गया हूँ. . यदि इस ब्लॉग/साईट की नीलामी करते हैं तो उसके लिए मेरी सलाह बिन्दुवार नि:शुल्क भेज रहा हूँ कृपया पावती भेजिए
एक:- इसका मौद्रिक मूल्य न रखा जावे.
दो:- इस नीलामी को ऑन लाइन किया जावे किन्तु कहीं कहीं नेट कनेक्शन में स्पीड का संकट होता है अत: आप किसी चेनल से बतिया लो और समस [ एस एम् एस ] से बोली लगवाइए
तीन:-बोली हेतु प्राथमिक शर्तों का निर्धारण
- एक क्षेत्र से 5 से अधिक बोली न लगायेंगे
- हर बोली लगाने वाले/वाली को चर्चा का लंबा अनुभव न भी हो तो कम से कम पिछले तीन बरस में प्रतिवर्ष पांच चर्चा ज़रूर की हों
- टिप्पणी अनुभव प्रति दिन बीस
- हर ब्लॉग को बांचने की क्षमता
पांच:- किसी को पानी की टंकी पे न चढ़ाया हो
छै :- बोली कर्ता को निष्ठावान,संतुलित,समालोचन की क्षमता का धनी होना ज़रूरी
सात:- किसी भी स्थिति में असंसदीय भाषा में टिपियाने वाले अथवा रचना चोर /छद्मनाम से टिपियाने वाले/ टांग खिचाऊ ब्लॉगर भाग न लें
शेष सुभ
आपका ही
गिरीश बिल्लोरे मुकुल
आपका ही
गिरीश बिल्लोरे मुकुल
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शनिवार, जनवरी 23, 2010
वेब दुनिया के उप सम्पादक कुलवंत हैप्पी से पोडकास्ट साक्षात्कार
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अपने बारे में कुलवंत का बयान
27 अक्टूबर 1984 को श्री हेमराज शर्मा के घर स्व. श्रीमती कृष्णादेवी की कोख से जन्म लिया। जन्म के वक्त मेरा नाम कुलवंत राय रखा गया, और प्यार का नाम हैप्पी। लेकिन आगे चलकर मैंने दोनों नामों का विलय कर दिया "कुलवंत हैप्पी"। तब हम हरियाणा के छोटे से गाँव दारेआला में रहते थे। इस गांव में मुझे थोड़ी थोड़ी समझ आई। इस गाँव से शहर बठिंडा तक का रास्ता नापा और इस शहर में गुजारे कुछ साल मैंने। शहर से फिर कदम गाँव की ओर चले.लेकिन इस बार गाँव कोई और था. मेरा पुश्तैनी गांव..जहां मेरे दादा परदादा रहा करते थे, जिस गाँव की गलियों खेतों में खेलते हुए मेरे पिता जवान हुए। वो ही गांव जिस गाँव हीरके (मानसा) में मेरी मां दुल्हन बन आई थी। यहां पर मैंने दसवीं कक्षा तक जमकर की पढ़ाई और खेती। इस गांव से फिर पहुंचा, उसी शहर जिसको छोड़ा था, कुछ साल पहले। 27 जुलाई 2000 को दैनिक जागरण के साथ जुड़ा, मगर कमबख्त शहर ने मुझे फिर धक्के मारकर निकाल दिया और मैं पहुंच गया छोटी मुम्बई बोले तो इंदौर। इस यात्रा दौरान दैनिक जागरण, पंजाब केसरी दिल्ली, सीमा संदेश, ताज-ए-बठिंडा हिंदी समाचार पत्रों में काम किया, इसके अलावा सीनियर इंडिया, नैपट्यून पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित हुए और 27 दिसंबर 2006 से वेबदुनिया.कॉम के पंजाबी संस्करण को संवारने में लगा हुआ हूं
रविवार, जनवरी 17, 2010
यशभारत पर मिसफिट
| | Sunday, 17 January, 2010 | ||
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