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जून, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मारे खुशी के निर्भय के हिज्जे बड़े हो गए ...बस और क्या..!!

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निर्भय को उम्मीद न थी की मैं  उनसे बाल कटवाने पहुँचूंगा .उस रात इंदौर जाते वक्त हरदा रुका तो लगा अपनी सोलह बरस पुराने कर्मस्थान टिमरनी  को अभिनंदित कर आऊँ जाने की वज़ह भी थी सो वापस टिमरनी पहुँचा. निर्भय की दूकान पर गाड़ी रुकते ही निर्भय अपना   आल्हाद आवाज़ में बदलने की कोशिश करने लगा  पर निर्भय के मुंह से आवाज़ न  निकल सकी .जब निकली तो  मारे खुशी के  निर्भय के हिज्जे बड़े हो गए सच .और  जब हमने कहा -"भाई निर्भय हम आए हैं आपसे बाल-कटवाने " तो फिर क्या था अब तो निर्भय के मुंह से आवाज़ निकलनी ही बंद हो गई। यानी कुल मिला कर नि:शब्द ..   दरअसल निर्भय के मन में आने वाले  विचारों और उनकी अभिव्यक्ति में अंतराल होता है। जिसे  आम बोलचाल में लोग हकलाना कहते हैं। लेकिन मेरी सोच भिन्न है मैं निर्भय को न तो  हकला  मानता  हूँ और न ही उसे किसी को हकला कहलवाना  मुझे पसंद है। मेरी नज़र में निर्भय के हिज्जे ज़रा से बड़े हो गए हैं और कुछ नहीं है। लोग  अक्सर निर्भय जैसे लोगों को  हँसने का साधन बना लेते हैं। शायद हम सबसे बड़ी भूल करते हैं किसी की दैव प्रदत्त  विकृति की वज़ह से उस पर हँसते हैं

बॉस इज़ आलवेज़ राइट .. प्लीज़ डोंट फ़ाइट ...

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सर्वशक्तिवान  बॉस    की वक्र-दृष्टि से स्वयम  बॉस   ही बचाते हैं.                                 सरकारी गैर-सरकारी दफ़्तरों, संस्थानों के प्रोटोकाल में कौन ऊपर हो कौन नीचे ये तय करना आलमाईटी यानी सर्व-शक्तिवान  बॉस नाम के जीवट जीव का कर्म  है. इस कर्म पर किसी अन्य के अधिकार को अधिकारिता से बाहर जाकर अतिचार का दोष देना अनुचित नहीं माना जा सकता. एक दफ़्तर का   बॉस   जो भी तय करता है वो उसके सर्वश्रेष्ठ चिंतन का परिणाम ही कहा जाना चाहिये.उसके किये पर अंगुली उठाना सर्वथा अनाधिकृत रूप से किये गये कार्य यानी "अनुशासनहीनता" को क़तई बर्दाश्त नहीं  करना चाहिये.   हमारे एक मित्र हैं गिलबिले  एक दिन बोले- बॉस सामान्य आदमी से भिन्न होता है ..! हमने कहा -भई, आप ऐसा कैसे कह सकते हैं ? प्रूव कीजिये ..   गिलबिले :- उनके कान देखते हैं.. हम आपकी आंखे देखतीं हैं.  हम:-"भैये तो फ़िर आंख ?" गिलबिले:- आंख तो तिरछी करने के लिये होतीं हैं.. सर्वशक्तिवान    बॉस    की वक्र-दृष्टि से स्वयम   बॉस   ही बचाते हैं.दूजा कोई नहीं.  गिलबिले जी के ब्रह्म ज्ञान के हम दीवाने हो गए बताया

“बाबूजी तुम हमें छोड़ कर…..!”

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साभार : मल्हार ब्लाग से मेरे सपने साथ ले गए दु:ख के झंडे हाथ दे गए ! बाबूजी तुम हमें छोड़ कर नाते-रिश्ते साथ ले गए...? काका बाबा मामा ताऊ सब दरबारी दूर हुए..! बाद तुम्हारे मानस नाते ख़ुद ही हमसे दूर हुए. अब तो घर में मैं हूँ माँ हैं और पड़ोस में विधवा काकी रातें कटती अब भय से नींद अल्ल-सुबह ही आती. क्यों तुम इतना खटते थे बाबा क्यों दरबार लगाते थे क्यों हर एक आने वाले को अपना मीत बताते थे सब के सब विदा कर तुमको तेरहीं तक ही साथ रहे अब माँ-बेटी के साथी जीवन के संताप रहे !! अब सबको पहचान लिया है अपना-तुपना जान लिया है घर में क्यों आते थे ये सारे  मैंने तो पहचान लिया है • गिरीश बिल्लोरे "मुकुल"

माता-पिता के लिये सिर्फ़ एक दिन नियत मत करो ..भई..!!

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जब लौटता दफ़्तर से रास्ते में मुझे एक ज़रूरी काम होता है. बिना ड्रायवर को ये कहे कि ज़रा रुकना मैं वो काम पूरा कर ही लेता हूं जानते हैं कैसे डा. वेगड़ के पिता माता यानी   अमृतलाल जी बेगड़ सपत्नीक शाम छै: बजे के आस पास अपने घर से निकलते हैं शाम की तफ़रीह पर और मुझे लगता है देव-पुरुष सहचरी के साथ मुझे दर्शन देने स्वयम बाहर आते हैं.  _____________________________________                 मेरे सहकर्मी धर्मेंद्र के बाबूजी फ़्रीडम फ़ाइटर के सी जैन  शाम पांच बजे से बेटे का इंतज़ार करती इनकी आंखें .....  फ़ादर्स डे पर  ..... धर्मेंद्र कहते हैं.. "सर,अपन तो पिता के नाम पूरी ज़िंदगी कर दें तो बहुत छोटी सी बात है...!!". ___________________________________  आते ही सबसे दयनीय पौधे के पास गए फ़िर अगले ही पल मुस्कुराने लगते मेरे बाबूजी  सुबह सबेरे की अपने   छत वाले गार्डन तक जाते हैं गार्डन वाले बच्चों  दुलारते हैं.. पौधे भी एहसास कर ही लेते होंगे :-''पितृत्व कितना स्निग्ध होता है "  नन्हे-मुन्ने पौधे  इंतज़ार करते हैं.बाबूजी बग

पापा, क्यों भौंकते हैं................ये कुत्ते ?

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बात दसेक साल पुरानी है. मेरी बिटिया श्रद्धा ने पूछा-"पापा, क्यों भौंकते हैं................ये कुत्ते ?"          जवाब क्या दूं सोच में पड़ गया. नन्हीं सी बिटिया को जवाब देने से इंकार भी तो नहीं कर सकता थी और न ही जवाब सोच पा रहा था . अक्सर बच्चों के पूछे गये सवालों को से अचकचाकर जवाब न होने की स्थिति में  गार्ज़ियन्स इधर उधर की बात  करने लगते हैं अपन भी तो आम अभिभावक ही हैं. अपने राम को ज़्यादा सोचने का न तो वक़्त था और न ही कोई ज़वाब जो बाल सुलभ सवाल को हल कर दे. अब आप ही बताइये क्या ज़वाब देता. फ़िर भी हमने  छत्तीसगढ़ के  सुप्रसिद्ध ब्लॉग लेखक श्री   अवधिया जी  के कथन    को उत्तर बनाया :-" संसार में भला ऐसा कौन है जिसके भीतर कभी बदले की भावना न उपजी हो  ?  मनुष्य तो क्या पशु-पक्षी तक के भीतर बदले की भावना उपजती है।  यही कारण है कि कुत्ता कुत्ते पर और कभी कभी इन्सान पर भी गुर्राने लगता है ।" पापा, क्यों भौंकते हैं................ये कुत्ते ? अब आप इस सवाल का विग्रह कीजिये एक ....पापा,  क्यों भौंकते हैं .... .....? एक भाग है:.." पापा, क्यों भौंकते है

Ability Unlimited Talk Show With Guruji Syed Sallauddin Pasha

मिसफ़िट पर शीघ्र गुरुजी सैयद सलाउद्दीन पाशा से सीधी बात शीघ्र लाइव प्रसारित एवम प्रसारित होगी उम्मीद है आपने विकलांगों पर केंद्रित "सत्य मेव जयते" का एपीसोड  कल यानी  दिनांक 10/06/2012 को देखा ही होगा यहां यानी बैमबसर पर देखिये जल्द ही "Talk Show With Guruji Syed Sallauddin Pasha " ________________________ <p><p>Your browser does not support iframes.</p></p> ________________________ यू ट्यूब पर शो देखिये

जब नेता जी गांव में आते तब तब मैं शाला जाता हूं.

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शो मस्ट गो आन

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साभार:-"Owaisihospital " वातावरण की गहमा गहमीं के बाद  एक निर्वात सी स्थिति थी सहमे सहमे चेहरे . कुछ देर पहले की ही तो बात है   स्ट्रैचर  पर बेहोश देह आई.सीं.यू. में प्रवेश करा दी मुस्तैद स्टाफ़ ने. लगभग भागता हुआ ड्यूटी-डाक्टर मरीज के लिये सही डाक्टर को बुलाने में सफ़ल हो जाता है. अगले दस मिनिट में  आत्मविश्वास से लकदक एक काया प्रवेश करती है आई.सी.यू. में. परिजन नि:शब्द किंतु उनकी पथराई आंखें अपलक गोया पूछतीं हैं -"बचालोगे न ? "              कुछ देर के बाद ही स्ट्रैचर को मरीज़ सहित ओ.टी. में आकस्मिक आपरेशन  के लिये ले जाया गया. और अगले पंद्रह मिनिट बाद हताश डाक्टर के मुंह से "सारी" निकलता है. परिजनों में से किसी एक के मुंह से चीख.. और एक धैर्यवान युवक सम्भवत: बेटा तो न था पडौसी सी रहा होगा..(बेटे तो विदेशों में होते हैं ) जेब से रुपये निकालते हुये  रिशेप्शन पर कुछ बतियाता है.      फ़र्स्ट फ़्लोर से ग्राउंड-फ़्लोर तक के सारे मरीज़ों के परिजनों के चेहरों पर एक अज़ीब सा भाव था. भयातुर ही तो थे वे ..    पडौसी का बेटा सेल फ़ोन से  :- "बोस साहब नह

तुम जो बिच्छू हो तुम्हारे पास डंक ही एक मात्र विकल्प

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साभार:  हिंदी-लतीफ़े अक्सर खुद से पूछता हूं एक हारी देह लेकर अब तक ज़िंदा क्यों हूं..? खुद से पूछने का मतलब है कि -"शायद अब कोई निर्णय लेना है" मुझे खुल के कुछ कह देना है ..!! पर नि:शब्द हो जाता हूं .. तुम्हैं देखकर... तुम जो मुझे ग़लत साबित कर खुद से कभी नहीं पूछते कुछ भी...!! आज़ भी षड़यंत्रों की बू आई थी तुम्हारे कथन से तुम जो थकते नही हो गलीच आचरण से.. चलो ठीक है .. मैंने भी बहते हुए बिच्छूओं को बचाने का लिया है संकल्प.. तुम जो बिच्छू हो तुम्हारे पास डंक ही एक मात्र विकल्प