राजीव तनेजा दिल वालों की दिल्ली की दिलदार शख्शियत तनेजा जी एक नहीं दो ,तीन न बाबा पूरे चार ब्लाग्स के मालिक हैं आज श्री राजीव तनेजा जी से बातचीत की गई जिसे सुनिए अन्तरंग बात चीत ''सव्यसाची'' पर . Ad
गुरुवार, फ़रवरी 04, 2010
श्री राजीव तनेजा जी से बातचीत
राजीव तनेजा दिल वालों की दिल्ली की दिलदार शख्शियत तनेजा जी एक नहीं दो ,तीन न बाबा पूरे चार ब्लाग्स के मालिक हैं आज श्री राजीव तनेजा जी से बातचीत की गई जिसे सुनिए अन्तरंग बात चीत ''सव्यसाची'' पर . मंगलवार, फ़रवरी 02, 2010
तवायफ की मौत

राज कुमार सोनी के बिगुल पर प्रकाशित ''घुंगरू टूट गए'' को पढ़ते ही मुझे अपनी पंद्रह बरस पुरानी एक सम्पादक द्वारा सखेद वापस रचना याद आ गई सोनी जी के प्रति आभार एवं उस आत्मा की शान्ति के लिए रचना सादर प्रेषित है
चीथड़े में लिपटी बूढ़ी माँ
मर गई
कोई न रोया न सिसका
उन सेठों के बच्चों ने भी नहीं
जिन सेठों नें बदन नौचा था इसका
वे बच्चे इसे माँ कह सकते थे
एक एक दिन अपने साथ रख सकते थे
ओरतें भी
इस बूढ़ी सौत की सेवा कर सकतीं थीं
किन्तु कोई हाथ कोई साथ न था इस को सम्हालने
सारे हाथ बंधे थे
सामाजिक-सम्मान की रेशमी जंजीर से
ये अलग बात है
ये परिवार गिर चुके थे ज़मीर से
बूढ़ी शबनम के पास
मूर्ती पूजक
पैगम्बर के आराधक
सब जाते थे
जिस्मानी सुख के सुरूर में गोते खाते थे
आज आख़िरी सांस ली इस बूढ़ी माँ ने
तब कोई भी न था साथ
घमापुर पोलिस ने
रोजनामाचे में
मर्ग कायम कर
लाश पोस्ट मार्टम को भेज दी है
पोलिस वाले उसे जलाते
अगर उसका नाम शबनम न होता
उसे दफना दिया गया है
अल्लाह उस पुलिस वाले को
ज़न्नत दे जिसने
दफनाते वक्त
आँखें भिगोई थीं....!
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चित्र साभार :-गूगल बाबा
बुधवार, जनवरी 27, 2010
पाबला जी के नाम खुला ख़त
मित्रों भारी वैचारिक संकट उत्पन्न हो गया है ऐसा मुझे लग रहा है 'आज नेट पर डोमेन नाम को लेकर जो समस्या प्रसूति है' उससे सुसंगत कुछ बातें आपसे शेयर करने को जी चाह रहा है आप अपने अतीत में जाएँ तो देखेंगेगे एक ही नाम सरनेम वाले कई बच्चे आपके साथ स्कूल में रहे होंगे जैसे विनय सक्सेना, राजेश दुबे, संजय सिंह, मनीष शर्मा, भीमसेन जोशी, मेरे साथ तो तीन गिरीश और थे दो गिरीश गुप्ता एक मैं एक गिरीश जेम्स उन दिनों न तो नीम का पेटेंट हुआ था न ही हल्दी का न ललित जी की मूंछों का किन्तु पिछले दिन पता चला कि मेरे 'कान' का भी किसी ने पेटेंट करा लिया है अब बताइये मैं क्या करुँ...? लोग सब समझतें हैं इन सब बातौं में कोई दम नहीं अरे कोई कुछ भी कर सकता है डोमेन नाम चर्चा आदि की चीर फाड़ से बेहतर है कि समझा जावे कि इन सब बातौं में क्या रखा हम सबको हिन्दी चिट्ठाकारिता के बेहतर आयाम स्थापित करने हैं अगर हमने ये न किया तो आने वाले समय में जब समीक्षा होगी तो बच्चे हम पर हसेंगे लानतें भेजेंगे तब हम ज़वाब न दे पाने कि स्थिति में होंगे. कबीर को किसने स्वीकारा होगा तब आज सब कबीर को जानते हैं ज़रूरी है कि "एकला चलो लेकिन बहु जान हिताय जात्रा करो''
कोई आपसे असहमत है होने दीजिये कोई आपको झुठला रहा है झुठलाने दीजिये अपना काम मत छोढ़िये और न ही अपने आल माइटी होने का गुमान पालिए. हम तो कुछ भी नहीं हैं हम उनको देखें जो ताड़पत्रों पे लिख रहे थे उनको देखें जिनके पास शक्तिशाली विचार थे सम्प्रेषण के साधन न थे जो आज हमारे पास हैं.. सब कुछ हैं बस समष्टि के विकास की सोच को छोड़ के जो कबीर के पास थी
साभार विक्की पीडिया
आज एक ख़त लिख रहा हूँ पाबला जी को भी मज़ाक में कुछ संकेत दे रहा हूँ शायद पसंद आयें मेरी बात असहमत हों या सहमत हों मैंने जो कहना था वो तो कह दिया विचार आप कीजिये विवादों को ख़त्म कर दीजिये भारत के ब्लॉग जगत के सीनियर्स को भी चिट्ठा चर्चा.काम पर सादर आमंत्रित कर लीजिये रही नीलामी की बात अगर बात न बने तो फिर ज़रूर कीजिये नीलामी. लीजिये चिट्ठी लिख देता हूँ पाबला जी को
पाबला जीअभिवादन
आपका प्रस्ताव जाना मिश्रित सोच में पड़ गया हूँ. . यदि इस ब्लॉग/साईट की नीलामी करते हैं तो उसके लिए मेरी सलाह बिन्दुवार नि:शुल्क भेज रहा हूँ कृपया पावती भेजिए
एक:- इसका मौद्रिक मूल्य न रखा जावे.
दो:- इस नीलामी को ऑन लाइन किया जावे किन्तु कहीं कहीं नेट कनेक्शन में स्पीड का संकट होता है अत: आप किसी चेनल से बतिया लो और समस [ एस एम् एस ] से बोली लगवाइए
तीन:-बोली हेतु प्राथमिक शर्तों का निर्धारण
- एक क्षेत्र से 5 से अधिक बोली न लगायेंगे
- हर बोली लगाने वाले/वाली को चर्चा का लंबा अनुभव न भी हो तो कम से कम पिछले तीन बरस में प्रतिवर्ष पांच चर्चा ज़रूर की हों
- टिप्पणी अनुभव प्रति दिन बीस
- हर ब्लॉग को बांचने की क्षमता
पांच:- किसी को पानी की टंकी पे न चढ़ाया हो
छै :- बोली कर्ता को निष्ठावान,संतुलित,समालोचन की क्षमता का धनी होना ज़रूरी
सात:- किसी भी स्थिति में असंसदीय भाषा में टिपियाने वाले अथवा रचना चोर /छद्मनाम से टिपियाने वाले/ टांग खिचाऊ ब्लॉगर भाग न लें
शेष सुभ
आपका ही
गिरीश बिल्लोरे मुकुल
आपका ही
गिरीश बिल्लोरे मुकुल
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शनिवार, जनवरी 23, 2010
वेब दुनिया के उप सम्पादक कुलवंत हैप्पी से पोडकास्ट साक्षात्कार
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अपने बारे में कुलवंत का बयान
27 अक्टूबर 1984 को श्री हेमराज शर्मा के घर स्व. श्रीमती कृष्णादेवी की कोख से जन्म लिया। जन्म के वक्त मेरा नाम कुलवंत राय रखा गया, और प्यार का नाम हैप्पी। लेकिन आगे चलकर मैंने दोनों नामों का विलय कर दिया "कुलवंत हैप्पी"। तब हम हरियाणा के छोटे से गाँव दारेआला में रहते थे। इस गांव में मुझे थोड़ी थोड़ी समझ आई। इस गाँव से शहर बठिंडा तक का रास्ता नापा और इस शहर में गुजारे कुछ साल मैंने। शहर से फिर कदम गाँव की ओर चले.लेकिन इस बार गाँव कोई और था. मेरा पुश्तैनी गांव..जहां मेरे दादा परदादा रहा करते थे, जिस गाँव की गलियों खेतों में खेलते हुए मेरे पिता जवान हुए। वो ही गांव जिस गाँव हीरके (मानसा) में मेरी मां दुल्हन बन आई थी। यहां पर मैंने दसवीं कक्षा तक जमकर की पढ़ाई और खेती। इस गांव से फिर पहुंचा, उसी शहर जिसको छोड़ा था, कुछ साल पहले। 27 जुलाई 2000 को दैनिक जागरण के साथ जुड़ा, मगर कमबख्त शहर ने मुझे फिर धक्के मारकर निकाल दिया और मैं पहुंच गया छोटी मुम्बई बोले तो इंदौर। इस यात्रा दौरान दैनिक जागरण, पंजाब केसरी दिल्ली, सीमा संदेश, ताज-ए-बठिंडा हिंदी समाचार पत्रों में काम किया, इसके अलावा सीनियर इंडिया, नैपट्यून पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित हुए और 27 दिसंबर 2006 से वेबदुनिया.कॉम के पंजाबी संस्करण को संवारने में लगा हुआ हूं
रविवार, जनवरी 17, 2010
यशभारत पर मिसफिट
| | Sunday, 17 January, 2010 | ||
शुक्रवार, जनवरी 15, 2010
शहर जबलपुर की शान लुकमान
![[Chacha01.jpg]](https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjRcPnoojkxGOK7KbKbY0dUDFyA1WLy4KlsT4Ao_icZznxwFR0v9ogDtAhOAnm-0hN6qmdtBxuZ2cjTSZA6ZFEGleZYBhfSuWbh16cUvR71SmGdwze8AhQvE1qpP0cShk3WXgzNV0xxQiw/s1600-rw/Chacha01.jpg)
जी अब इस शहर में आइनों की कमीं को देख के मलाल होता है की क्यों लुकमान नहीं हैं साथ . बवाल हों या समीर लाल चचा लुकमान थे ही ऐसे . गोया अल्लाह ने लुकमान के लिबास में एक फ़रिश्ता भेजा था इस ज़मीं पर....जिसे मैंने छुआ था उनके चरण स्पर्श कर. दादा लुकमान की याद किसे नहीं आती . सच मेरा तो रोयाँ-रोयाँ खड़ा हो गया था .....27 जुलाई 2002 का वो दिन जब लुकमान जी ने शहर जबलपुर से शरीरी रिश्ता तोडा ........ वे जेहन से दूर कभी हो भी नहीं सकते . जाने किस माटी के बने थे जिसने देखा-सुना लट्टू हो गया . इस अद्भुत गंगो-जमुनी गायन प्रतिभा को उजागर किया पंडित भवानी प्रसाद तिवारी ने , इस बिन्दु पर वरिष्ठ साहित्यकार मोहन शशि का कहना है:-"भवानी दादा के आशीर्वाद से लुकमान का बेलौस सुर-साधक होना सम्भव हो सका धर्म गुरुओं ने भी लुकमान की कव्वालियाँ सुनी"शशि जी ने आगे बताया -"लुकमान सिर्फ़ लुकमान थे (शशि जी ने उनमें नकलीपन कभी नहीं देखा) वे मानस पुत्र थे भवानी दादा के " १४ जनवरी १९२५ (मकर संक्राति) को जन्मा यह देवपुत्र जन्म से मोमिन,था किंतु साम्प्रदायिक सदभाव का मूर्त-स्वरुप था उनका व्यक्तित्व. सिया-चरित,भरत-चरित, मैं मस्त चला हूँ मस्ती में थोडी थोडी मस्ती लेलो , माटी की गागरिया , जैसे गीत बिना किसी लुकमानी महफ़िल का पूरा होना सम्भव ही नहीं होता था।लुकमान साहब को अगर साम्प्रदायिक सौहार्द का स्तम्भ कहें तो कम न होगा। भरत चरित सुन के कितनी पलकें भीगीं किसे मालूम ? मुझे याद है कविवर रामकिशोर अग्रवाल कृत भरत चरित्र, सिया चरित,सुनने वालों की पलकें अक्सर भीग जातीं मैंने देखीं हैं . साधना उपाध्याय,मोहन शशि,स्वयं रामकिशोर अग्रवाल "मनोज", ओंकार तिवारी,रासबिहारी पांडे , बाबू लाल ठाकुर मास्साब, डाक्टर सुधीर तिवारी,और यदि लिखने बैठूं तो एक लम्बी लिस्ट है जिसे लिखना लाजिमी नहीं है.लुकमान का चचा के साथी एक बवाल दूजा डुलकिया कुबेर ,शेषाद्री एक बाजा यानी बैंजो ,और पेटी जिसे खुद चचा बजाते थे. चचा विश्व के लिए मिसाल थे हिन्दू मुसलमान ईसाई सभी चचा की गायकी मुरीद कुल मिला ले कट्टर पंथियों के गाल पे करारा तमाचा थे लुकमान.
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श्रीमती जी के साथ एक बार साहित्यिक कार्यक्रम में चचा से मिला चरण स्पर्श किया श्रीमती जी ने अनमने भाव से नमस्कार किया किन्तु ज्यों हीं उनके मुख से सिया चरित सुना तो बस गोया मन उनका कंचन सा हो गया मानो कार्यक्रम की समाप्ति पर सुलभा ने सबसे पहले चरण स्पर्श किये. हम जो चचा के चरण-स्पर्श से इतने सफल हो गए तो वे कितने सफल न हुए होंगे जिनने चचा के अंतस को स्पर्श किया होगा.
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आप सोच रहें हैं न कौन लुकमान कैसा लुकमान कहाँ का लुकमान जी हाँ इन सभी सवालों का ज़वाब उस दौर में लुकमान ने दे दिया था जब उनने पहली बार भरत-चरित गाया. और हाँ तब भी तब भी जब गाया होगा ''माटी की गागरिया '' या मस्त चला इस मस्ती से थोड़ी-थोड़ी मस्ती ले लो
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मैं इस कोशिश में हूँ कि चचा के गाये गीत आप तक शीघ्र लाऊं यदि बवाल ने मदद की तो ये संभव होगा
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पंडित लुकमान भाईजान हो विनत श्रद्धांजलियां
गुरुवार, जनवरी 14, 2010
राज मिट जाते हैं
सादर अभिवादन
बावरे-फकीरा एलबम से भजन
मकर-संक्रांति के शुभ अवसर पर सादर
शुभ कामनाओं सहित बावरे=फकीरा एलबम से राज मिट जाते हैं भाव-गीत सादर
सुधि पाठकों के लिए पोड कास्ट पर
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आपकी प्रतिक्रया प्रार्थनीय है
बावरे-फकीरा एलबम से भजन
मकर-संक्रांति के शुभ अवसर पर सादर
शुभ कामनाओं सहित बावरे=फकीरा एलबम से राज मिट जाते हैं भाव-गीत सादर
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