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मई, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

“मैं नरेंद्र दामोदर दास मोदी.. ईश्वर की शपथ.... !"

       मित्रो, देश एक अनोखे नुक्कड़ पर आ कर हतप्रभ था चकित कर देने वाले किसी परिणाम के लिये सवाल बार बार देख रहा था. सवाल थे :- “अब क्या.होगा..!”   “सब कैसे.होगा..!”   “ये सब कौन करेगा भई..!” मित्रो सवाल हल हो चुके हैं उत्सव भी मना लिया. अब आपके पास आईकान है.. न .. न भाई.. अब आईकान्स हैं. अपने कई आलेखों में आईकान के अभाव की.. चिंता मैने व्यक्त भी की थी अपने आलेखों में.             आपको याद होगा कि अन्ना के आंदोलन के दौर में  “अन्ना” एक आईकान के रूप में नज़र आए . पर मुझे ऐसा कुछ खास न लगा  न ही मुझ सा अदना लेखक उनको आइकान मान रहा था. इसके कई कारण थे जिसमें सबसे अव्वल था एक  क्योंकि उनके अभियान  से एक सज्जन को जब करीब से जाना और जानने   के  तुरंत  बाद मुझे एहसास हो गया था कि अन्ना के इर्दगिर्द जुड़ाव शायद आकस्मिक और हड़बड़ाहट  का जुड़ाव था. अथवा अन्ना जी का लक्ष्य केवल मुद्दे को हवा देना मात्र रहा हो जो भी हो वे आईकान बनने में असफ़ल  रहे.. कारण जो भी हो आईकान की ज़रूरत यानी एक पोत के लिये दिशासूचक की ज़रूरत थी . अचानक मोदी को सामने गया.. थोड़ी अचकचाहट के साथ भारतीय जनता जनार्दन में

नरेंद्र मोदी जी और उनकी टीम को अग्रिम शुभकामनाऎं.

                      प्रधान मंत्री के रूप में श्री नरेंद्र दामोदर मोदी जी का व्यक्तित्व मानो उदघोषित कर रहा है  कि  शून्य का विस्फ़ोट हूं..!!    एक शानदार व्यक्तित्व जब भारत में सत्तानशीं होगा ही तो फ़िर यह तय है कि अपेक्षाएं और आकांक्षाएं उनको सोने न देंगीं. यानी कुल मिलाकर एक प्रधानमंत्री के रूप में सबसे पहले सबसे पीछे वाले को देखना और उसके बारे में कुछ कर देने के गुंताड़े में मशरूफ़ रहना ... बेशक सबसे जोखिम भरा काम होगा. बहुतेरे तिलिस्म और  ऎन्द्रजालिक परिस्थितियां निर्मित  होंगी. जो सत्ता को अपने इशारों पर चलने के लिये बाध्य करेंगी. परंतु भाव से भरा व्यक्तित्व अप्रभावित रहेगा इन सबसे ऐसा मेरा मानना है.                                शपथ-ग्रहण समारोह में आमंत्रण को लेकर मचे कोहराम के सियासी नज़रिये से हटकर देखा जावे तो साफ़ हो जाता है कि - दक्षेस राष्ट्रों में अपनी प्रभावी आमद को पहले ही झटके में दर्ज़ कराना सबसे बड़ी कूटनीति है. विश्व को भारत की मज़बूत स्थिति का संदेश देना भी तो बेहद आवश्यक था जो कर दिखाया नमो ने. सोचिये न वाज़ साहब को पड़ोसी के महत्व का अर्थ समझाना भी तो आवश्यक था य

“मोदी विजय : पाकिस्तानी मीडिया की टिप्पणियां”

भारतीय सियासी तस्वीर बदलते ही पड़ौसी देशों में हलचल स्वभाविक थी. हुई भी... बीबीसी की मानें तो पाकिस्तानी अखबारों ने उछलकूद मचानी शुरू कर दी है. मोदी को कट्टरपंथी बताते हुए कट्टरपंथी राष्ट्र पाकिस्तान का मीडिया आधी रोटी में दाल लेकर कूदता फ़ांदता नज़र आ रहा है. मोदी विजय पर पाकिस्तानी मीडिया बेचैन ही है.. अखबारों को चिंता है कि –“ कहीं मोदी सरकार 370 ,राम मंदिर निर्माण, कामन सिविल कोड पर क़दम न उठाए ”  अखबार अपने आलेखों में सूचित करते नज़र आते हैं कि “मोदी ने  विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ा है..!” यानी सिर्फ़ विकास की बात करें ... तो ठीक ही है.. !             पाकिस्तान जो भारत जैसे वास्तविक प्रजातंत्र से कोसों दूर की चिंता बेमानी और अर्थहीन प्रतीत होती है. उम्मत अखबार ने तो सीमा पार करते हुए मोदी को कसाई का दर्ज़ा दे रहा है. इसे पाक़िस्तानी प्रिंट मीडिया की कुंठा-ग्रस्तता एवम हीनभावना से ग्रस्तता के पक़्क़े सबूत मिल रहे हैं.             नवाए-वक़्त को कश्मीर मुद्दे पर चचा चीन की याद आ रही है. भारत इस मुद्दे पर न तो कभी सहमत था न ही होगा.        पाक़िस्तानी मीडिया को भारत में मुस्लिमों की

मोदी विजय पर एक ग़ैर सियासी टिप्पणी “सम्मोहक चाय वाला...!”

 गुजरात के बड़नगर रेल्वे-स्टेशन पर  एक चाय बेचने वाले का बेटा  . जो खुद चाय बेचता ..   शीर्ष पर जा बैठा भारतीय सांस्कृतिक आध्यात्मिक और धार्मिक आख्यानों में चरवाहे कृष्ण वनचारी राम.. को शीर्ष तक देखने वालों के लिये कोई आश्चर्य कदाचित नहीं . विश्व चकित है.. विरोधी भ्रमित हैं .. क्या हुआ कि कोई अकिंचन शीर्ष पर जा बैठा .. ! भ्रम था उनको जो मानते हैं.. सत्ता धनबल, बाहुबल और छल से पाई जाती है... ! क्या हुआ कि अचानक दृश्य बदल गए .. लोगों को क्या हुआ सम्मोहित क्यों हैं.. इस व्यक्ति का सम्मोहक-व्यक्तित्व सबको कैसे जंचा.. सब कुछ  ज़ादू सरीखा घट रहा था.. मुझे उस दिन आभास हो गया कि कुछ हट के होने जा रहा है.. जब उसने एक टुकड़ा लोहे का मांग लौह पुरुष की प्रतिमा के वास्ते चाही थी. संकेत स्पष्ट था ... एक क्रांति का सूत्रपात का जो एक आमूलचूल परिवर्तन की पहल भी रही है.                     कितना महान क्यों न हो प्रेरक किंतु जब तक प्रेरित में ओज न हो तो परिणाम शून्य ही होना तय है. इस अभियान में मोदी जी के पीछे कौन था .... ये सवाल तो मोदी जी या उनके पीछे का फ़ोर्स ही बता सकता है किंतु मोदी में निहित अंत

बता दो.. शून्य का विस्फ़ोट हूं..!!

दूरूह पथचारी   तुम्हारे पांवों के छालों की कीमत अजेय दुर्ग को भेदने की हिम्मत   को नमन... !! निशीथ-किरणों से भोर तक   उजाला देखने की उत्कंठा  ….! सटीक निशाने के लिये तनी प्रत्यंचा ... !! महासमर में नीचप थो से ऊंची आसंदी तक की जात्रा में   लाखों लाख विश्वासी जयघोष आकाश में   हलचल को जन्म देती यह हरकत जड़-चेतन सभी ने देखी है तुम्हारी विजय विधाता की लेखी है..   उठो.. हुंकारो... पर संवारो भी   एक निर्वात को सच्ची सेवा से भरो जनतंत्र और जन कराह को आह को   वाह में बदलो... ********** सुनो , कूड़ेदान से भोजन निकालते बचपन   रूखे बालों वाले अकिंचन.   रेत मिट्टी मे सना मजूरा   नर्मदा तट पर बजाता सूर बजाता तमूरा सब के सब तुम्हारी ओर टकटकी बांधे अपलक निहार रहे हैं .... धोखा तो न दोगे   यही विचार र हे है...! कुछ मौन है पर अंतस से पुकार र हे हैं .. सुना तुमने... वो मोमिन है..   वो खिस्त है..   वो हिंदू है... उसे एहसास दिला दो पहली बार कि   वो भारतीय है...   उ नको हिस्सों हिस्सों मे प्यार मत देना प्यार की पोटली एक साथ सामने सबके रख देना  शायद मां ने तु

मेरे करुणाकर बुद्ध तुमको कोटिश: नमन

तस्वीर क्रमांक दो तस्वीर क्रमांक एक   आध्यात्मिक-दर्शन   ने समकालीन सामाजिक आर्थिक  जीवन शैली को परिवर्तित कर विश्व को जो दिशा दी है उसे वर्तमान संदर्भ में देखने की कोशिश कर रहा हूं संभवतया मुझसे आप असहमत भी हों..  किन्तु बुद्ध को जितना जाना समझा एवम बांचा है उसके आधार पर बुद्ध मेरी दृष्टि  करुणाकर हैं. उनका आध्यात्मिक चिंतन जीव मात्र के लिये करुणा से भरा है.  बुद्ध   ने आक्रमण को जीवन में अर्थ हीन माना . शाक्य और कोली विवाद के कारण परिव्राज़क बने बुद्ध का तप और फ़िर दिव्यानुभूतीयां इस बात का प्रारंभिक प्रमाण है कि युद्ध विहीन विश्व  की अवधारणा का सूत्रपात करुणाकर बुद्ध ने राजसुख त्याग के किया . इसा के  483 और 563 ईस्वी पूर्व  जन्मे करुणाकर बुद्ध का अनुशरण सामरिक तृष्णा वाले राष्ट्रों के लिये अनिवार्यत: विचारणीय है. युद्ध से व्युत्पन्न परिस्थितियां विश्व को अधोपतान की ओर ले जाएंगी यह सत्य है. युद्ध अगले निर्माण का आधार कभी हो ही नहीं सकता. मेरी दृष्टि में युद्ध  चाहे वो धर्म की प्रतिष्ठार्थ हो अथवा राज्य के विस्तार के लिये अस्वीकार्य होना ही चाहिये.  तस्वीर क्रमांक तीन 

स्वतंत्रता को बीमारी मत बनाईये

साभार : पंजाब केसरी    आज़ मैं एक ऐसे मनोरोगी से मिला जिसे किसी की अधीनता स्वीकार्य नहीं. मेरे अधीनस्त अधिकारी है. उसे देखता हूं तो लगता है एक सपाट सा जीवन एक सपाट सी अभिव्यक्ति अतिसंवेदनशील उसे मिसफ़िट कहना ही होगा.  जो भी हो जितना भी पावन हो वह पर आज़ादी को वो बीमारी की तरह स्तेमाल कर रहा है मुझे ऐसा आभास हुआ . पिछले कई दिनों से मैं उनकी हरक़त का मुआयना कर रहा हूं. वो किसी न किसी से कोई न कोई पूर्वाग्रह पाले हुए हैं.  एक अधिकारी से अपेक्षा होती है कि वो अपने अधिकारिता वाले क्षेत्र में के दायित्व का निर्वाह करे . किंतु काम न करना तथा काम का दबाव आते ही स्वतंत्रता का बोध होना अपमे मानवाधिकार का हवाला देते हुए कार्य न करना कुल मिला कर स्वातंत्र्य को एक बीमारी की तरह जीने वाली स्थिति को प्रस्तुत करता है.                   कुछ लोग अपनी बातों में कहा करते हैं ...    ये कि मुझे अब सहा नहीं जाता मेरी आदत ही यही है, मैं क्या करूं... शुद्ध देशी शब्दावली में इसे ठीठपन ही कहा जाएगा.. पर मेरी दृष्टि में इसे स्वतंत्रता के प्रति लोलुप होकर मनोरोगी हो जाना है.                  घर से निकत

ब्लाग सेतु एग्रीगेटर शोध छात्र केवलराम की सफ़ल कोशिश

ब्लागसेतु एक ऐसा नया एग्रीगेटर  है जो भारतीय भाषाओं के चिट्ठों के लिये अत्यंत उपयोगी साबित होना तय है . अब से पहले आप जो पार पांच बरस पूर्व से ब्लाग लिख रहे हैं जानते ही होंगे कि हिंदी ब्लागिंग को प्रोत्साहित करने में - •  चिट्ठाजगत.इन  •  ब्लॉगवाणी  •  दो सबसे मशहूर एग्रीगेटर थे  मह्त्वपूर्ण अवदान रहा है.  हिंदी के पाठकों तक ब्लाग्स यानी चिट्ठों को पहुंचाना एग्रीगेटर का कार्य होता है. किन्तु काफ़ी श्रमसाध्य एवम खर्चे का मामला होता है.ऐसा नहीं है कि इन दो ब्लाग एग्रीगेटर्स के पहले कुछ न था हिन्दी ब्लागिंग के लिये     नारद   हिन्दीब्लॉग्स.ऑर्ग   चिट्ठा विश्व  • आदि एग्रीगेटर्स का योगदान रहा है जो पाटकों को हिंदी ब्लाग तक भेजने का का काम करते थे.  में " हिन्दी चिट्ठे एवम पाडकास्ट " मेल बाक्स में ताज़ा चिट्ठों की सूचना जारी कर रहा है. चिट्ठाजगत एवम ब्लागवाणी के विकल्प के रूप में दिल्ली के श्री कनिष्क कश्यप ने ब्लागप्रहरी की शुरुआत की .    इनमे पूर्वोक्त वर्णित वेबसाईट्स के अलावा भी अक्षर ग्राम नेटवर्क के स्वयमसेवी लोगों ने पाठकों तक हिंदी ब्लागस भेजने की कोशिशें की है